Monday, 30 March 2026

शारदा पीठ



                                                शारदा पीठ और जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक परंपरा
ऋषि दुर्वासा, संगमादित्य, वसुगुप्त, सोमानंद, अत्रिगुप्त, अभिनव गुप्त, संत लल्लेश्वरी, श्री भट्ट, भगवान् गोपीनाथ । कश्मीर का इतिहास ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ उपलब्ध है। कल्हण का शोध है कि जहाँ श्रीनगर बसा है, उस घाटी में खारे पानी का सतीसार नाम का विशाल सरोवर था। नीलमत पुराण के अनुसार ज्वालामुखी फटने से वराहम नामक (वर्तमान बारा मुल्ला) स्थान से सारा का सारा पानी बह गया एवं एक सुन्दर घाटी अस्तित्व में आयी। पश्चात् ब्रह्मा के पौत्र मारीच ऋषि के पुत्र कश्यप ने घाटी बसाई, जो घाटी कश्मीर कहलाई। इतिहास का संयोग समझें, पुत्र ने उत्तर में कश्मीर बसाया तो पिता मारीच ने दक्षिण लंका बसाई। मार्कण्डेय पुराण में ऐसा जिस दुर्गा सप्तशती का वर्णन है, उन नव दुर्गाओं में एक वैष्णव देवी कश्मीर में ही विराजमान हैं।
एक संदर्भ और आया कि श्रीकृष्ण ने दामोदर पत्नी यशोवती को श्रीनगर (कश्मीर) के राज सिंहासन पर अभिषिक्त किया। पश्चात् अर्जुन का पौत्र परीक्षित का पुत्र हरनदेव कश्मीर का राजा बना। ईसा पू. छठी शताब्दी में श्रीनगर के पास आद्य शंकराचार्य ने शारदा पीठ की स्थापना की थी। उस समय कश्मीर का राज्य विस्तार वर्तमान गांधार से कन्नौज तक और उत्तर में मध्य एशिया तक था। स्पष्ट है, वर्तमान अफगानिस्थान, बाल्टीस्थान, सियाचीन, लद्दाख, कश्मीर के अंग थे। विशाल शारदा विद्यापीठ के अवशेष आज भी कश्मीर में देखे जा सकते हैं।
काश्मीर पर ललितादित्य का शासन (ई.स. ५७५ से ६३५ तक, तिब्बत से लेकर मालवा एवं द्वारिका से लेकर बंगभूमि तक) साठ वर्ष रहा। ई.स. ६३५ से ७०० तक अवन्तिवर्मन का राज्य रहा। उसने भी वर्तमान पहलगाँव के पास अवन्तिश्वर एवं अवन्ति स्वामिन नामक दो सुन्दर और विशाल मन्दिर भगवान विष्णु के बनवाये। तात्पर्य यह कि प्राक वैदिक काल से ईसवी सन् १३०० तक काश्मीर में हिन्दू राज्य अंतर्गत हिन्दू धर्म व संस्कृति प्रभावी रही। राजकाज की भाषा संस्कृत रही। विद्या के केन्द्र, मन्दिर, पुस्तकालय रहे। ‘वृहतकथा’ के लेखक आद्य कथाकार गुणाढ्य, संस्कृत पण्डित भामह, उद्भट, आनंदवर्धन, अभिनव गुप्त, मम्मट, भवभूति कश्मीर के गौरव हैं। हिन्दूकुश, ब्रह्मशिखर, हरमुकुट, देव गोपादि, चन्दनवन, नौबंधन, नाग आदि पर्वत नाम कश्मीर में संस्कृति के स्मारक हैं। सिंधु, कनकवाहिनी (कनकई), वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चिनाब) आदि नदियाँ संस्कृति की प्रवाहिनी हैं। शारदातीर्थ, अमरनाथ, सुरेश्वर, जेठेश्वर, शिवभूतेश्वर यह तीर्थस्थान भी संस्कृत एवं संस्कृति का ही गुणगान करते आ रहे हैं।
(1) ऋषि दुर्वासा: (i) गुरु-शिष्य-परम्परा: काश्मीर में शैव दर्शन के पुनरोदय के बारे में एक कथा प्रचलित है। कलियुग में शैव-दर्शन का लोप और आगम ग्रंथों का अभाव हो गया था। भगवान भूतेश्वर शिव को लगा कि अब समय आ गया है कि लोकोपयोगी दर्शन और आगम ग्रंथों को पुनः लोक में प्रचलित करके विश्व को पुनः ज्ञान से आलोकित करना चाहिये। वे कैलाश पर्वत पर श्रीकण्ठ के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने ऋषि दुर्वासा को जन-जन तक शिव-सन्देशों को पहुँचाने का कार्य सौंपा। (ii) सांस्कृतिक विरासत: काश्मीर में शैवदर्शन का पुनरोदय। (iii) मूर्त विरासत: कैलाश पर्वत पर श्रीकण्ठरूप में शिव प्रकट होना। ऋषि दुर्वासा को जन-जन तक शिव-सन्देशों को पहुँचाने का कार्य सौंपा। (iv) अमूर्त विरासत: दुर्वासा का अपने योगबल से तीन मानस पुत्रों को जन्म देना। शिवसूत्र का ज्ञान। (v) भक्ति और साधना: दुर्वासा जी द्वारा योगबल से तीनों मानस पुत्रों को भक्ति की साधना का महत्व बताना। (vi) शिक्षा और ज्ञान-परम्परा: शिव जी का दुर्वासा को शिव सूत्र का ज्ञान परम्परा से प्राप्त ज्ञान था। उन्हें ऋषि दुर्वासा ने आगे आने वाले भक्तों के लिए शिव के आदेश से भारतवर्ष में शैव-दर्शन की पुनस्र्थापना करना। (vii) सांस्कृतिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक विरासत: तीनों मानस पुत्रों को शिष्यत्व का आचरण करने के निर्देश देते हुए, शैव दर्शन के तीन अलग-अलग आयामों- भेद, अभेद और भेदाभेद पर काम करने को कहा। उन मानस पुत्रों में से त्र्यम्बक को अभेद-त्तत्त्व का ज्ञान दिया, अमर्दक को भेद का और श्रीनाथ को भेदाभेद का। ये तीन ही शैव-दर्शन के मूल तत्त्व हैं। अभेद ही कालांतर में ‘त्रिक दर्शन’ के नाम से जाना गया। इन शिष्यों ने भी अपने मानस पुत्रों को आध्यात्मक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में यह शिक्षा दी और यह परम्परा पंद्रह पीढ़ी तक चली।
(2) संगमादित्य (जन्म: लगभग 8वीं–9वीं शताब्दी ईस्वी) : ये कश्मीर शैव दर्शन की गुरु-परंपरा के प्रारंभिक आचार्य माने जाते हैं। इनका संबंध सोमानन्द की पूर्ववर्ती परंपरा से जोड़ा जाता है। (i) गुरु-शिष्य-परम्परा: मानस पुत्रों की गुरु शिष्य परम्परा निरंतर प्रवाह मान रही। (ii) सामाजिक योगदान: दुर्वासा ऋषि के मानस पुत्रों से चली आ रही परम्परा विवाह के साथ परिवार परम्परा में बदली। पंद्रहवीं पीढ़ी में एक मानस पुत्र ने नियम तोड़ा और एक ब्राह्मण-कन्या से विवाह किया। (iii) भक्ति का स्वरूप: सरल, लोक-आधारित भक्ति। (iv) सत्संग: संगमादित्य परिव्राजक की तरह शैव शिक्षा केंद्रों में ज्ञानार्जन हेतु घूमता रहा। इसी यायावरी में वह शारदा क्षेत्र, यानी काश्मीर पहुँच गया। उसे यह भूमि ज्ञानार्जन के लिए अधिक उपयुक्त लगी, क्योंकि यहाँ निर्विघ्न साधना की जा सकती थी। (v) शिक्षा परम्परा: संगमादित्य के पुत्र अरुणादित्य और उनके पौत्र आनन्द भी पैतृक आश्रम में शैवदर्शन का तब तक पठन-पाठन करते रहे, जब तक आनन्द का पुत्र सोमानन्द युवावस्था को प्राप्त नहीं हुआ।
(3) वसुगुप्त (लगभग 800–850 ईस्वी) : (i) सांस्कृतिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक विरासत: वास्तव में काश्मीर में शैवदर्शन को पुनस्र्थापित करने का श्रेय वसुगुप्त को जाता है। (ii) लोककथ्य: वसुगुप्त की असाधारण प्रतिभा को देखते हुए साक्षात् शिव ने स्वयं उन्हें शिवसूत्र का ज्ञान दिया। एक रात जब वसुगुप्त गहरी नींद में थे, सदाशिव स्वयं उनके सपने में आये। शिव ने उन्हें कहा कि अब समय आ गया है कि तुम वास्तविक ज्ञान का पुनर्प्रकाश करो। प्रातः तुम महादेव पर्वत के आँचल में जाकर एक विशेष चट्टान को हटाओ और उसके नीचे तुम्हें दैवीय ज्ञान मिलेगा। (iii) मूर्त विरासत: वसुगुप्त प्रातः उठे और वहाँ गए जहाँ स्वप्न में जाने को कहा गया था। कुछ श्रम करने के पश्चात् उन्हें वह चट्टान मिली जो एक छोटी नदी के किनारे पर थी। वसुगुप्त ने छू भर लिया कि चट्टान अपने स्थान से हट गई और उसके नीचे वह महान् रचना दिखाई दी, जिसे साक्षात् शिव ने रचा था। यही शिवसूत्र थे। (iv) भक्ति और शिष्य परम्परा: वसुगुप्त ने उस ज्ञान को आत्मसात् किया और फिर अपने कुछ शिष्यों को भी बाँटा। ज्ञान इतना गूढ़ था कि उसे केवल उन्हीं शिष्यों को देने का आदेश था, जो इसकी पात्रता पा चुके हों। (v) अमूर्त विरासत: यहीं से काश्मीर में शैवदर्शन का नया युग आरम्भ हो गया। (vi) सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत: वसुगुप्त ही शैवदर्शन के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त स्पन्दशास्त्र के जनक माने जाते हैं। आठवीं शताब्दी में वसुगुप्त को शैव-दर्शन का प्रथम व्याख्याता माना जाता है। (vii) भाषा और कला: यह काश्मीर में भाषा, कला और दर्शन का सूर्योदय काल था।
(4) सोमानन्द (लगभग 850–875 ईस्वी) : (i) साधना का समन्वय: प्रतिभावान् युवक था और शैवदर्शन के प्रति उसकी जिज्ञासा को देखते हुए वसुगुप्त की उन पर दृष्टि पड़ी और काश्मीर में इन दोनों का मिलन शैव-दर्शन के लिए एक ऐतिहासिक घटना सिद्ध हुई। (ii) दर्शन के नए आयाम की खोज: उन्होंने शिवदृष्टि के अतिरिक्त ईश्वर प्रत्यभिज्ञासूत्र लिखा, जिसकी बाद में अभिनवगुप्त ने विशद व्याख्या की। वसुगुप्त के कई अन्य शिष्यों ने अपने गुरु के सिद्धान्तों पर विस्तार से लिखा। (iii) गुरु शिष्य परम्परा: कल्लट भट्ट और उत्पलदेव इनमें बहुत प्रसिद्ध हुए।
(5) अत्रिगुप्त (लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी) :(i) शौर्य और ज्ञान का संगम: संगमानन्द के काश्मीर आने से कुछ समय पहले काश्मीर के एक मेधावी राजा ललितादित्य मुक्तापीड दिग्विजय के लिए निकले और कन्नौज राज्य के राजा को युद्ध में पराजित किया। कन्नौज के राजा ने पराजय स्वीकार कर राजा ललितादित्य को धन और स्वर्ण भेट किया, किन्तु विजेता राजा ने कन्नौज के कुछ विद्वानों की मांग की। जिसमें शैवाचार्य अत्रिगुप्त प्राप्त हुए। (ii) जन्म और कर्मभूमि: अत्रिगुप्त मूलतः गंगा और यमुना के दोआब में स्थित ‘अंतर्वेदी’ नामक क्षेत्र के रहनेवाले थे। लेकिन अपने दार्शनिक ज्ञान के कारण राजदरबार में पहुंच चुके थे। (ii) शैव एवं वैष्णव भक्ति का समन्वय: यह एक विचित्र संयोग था कि राजा ललितादित्य घोर भागवत यानी विष्णु भक्त थे, फिर भी एक शैवाचार्य को लेकर आये। लेकिन यह संयोग कुछ ही दशक बाद काश्मीर के दार्शनिक इतिहास में एक क्रान्तिकारी घटना बन गयी।(iv) मूर्त विरासत: ललितादित्य ने उनके लिए कुबेर की नगरी अलकापुरी की भाँति सुंदर श्रीनगरी में वितस्ता नदी के किनारे शीतांशमौलि के मन्दिर के निकट एक भव्य भवन बनवा दिया और उसमें अपना आश्रम चलाने के लिए अत्रिगुप्त को एक जागीर भी दे दी।
(6) अभिनवगुप्त (लगभग 950 ईस्वी) :(i) कश्मीर दर्शन की शिष्य परम्परा: अत्रिगुप्त और संगमानन्द दोनों की कई पीढ़ियाँ काश्मीर में शैव धर्म के सिद्धान्तों का ही अध्ययन नहीं करती रहीं। (ii) सांस्कृतिक अभ्युदय: उनके वंशजों में से कुछ कला, व्याकरण, नाटक, रसशास्त्र और संगीत का भी अध्ययन करते रहे, जिसका लाभ बाद में अभिनवगुप्त को मिला। (iii) शिष्य परम्परा: दोनों के शिष्यों में असाधारण और मर्मज्ञ विद्वान् पैदा हुए। संगमानन्द के प्रपौत्र सोमानन्द और अत्रिगुप्त की कई पीढ़ी पश्चात् अभिनवगुप्त काश्मीर में शैवदर्शन को एक नये रूप में स्थापित करनेवाले प्रमुख दार्शनिक बने। (iv) सांस्कृतिक योगदान: अभिनवगुप्त की माता विमला, जिसे अभिनवगुप्त श्रद्धा से विमलकला कहते हैं, उनके बचपन में ही चल बसीं। लेकिन मान्यता है कि वे स्वयं भी एक योगिनी थीं। इसलिए अभिनवगुप्त को ‘योगिनीभू’ कहा जाता है। (v) भाषा ज्ञान की अभिनव परम्परा: बाल्यकाल में अभिनवगुप्त किसी पाठशाला नहीं गए, क्योंकि उनके परिवार में ही बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ थे। उनके पिता ने उन्हें संस्कृत-व्याकरण और तर्कशास्त्र सिखाया, उनके चाचा वामनगुप्त काव्यशास्त्र के ज्ञाता थे। (vi) रूढ़ि मुक्त गुरु शिष्य परम्परा: बताया जाता है अभिनव गुप्त के उन्नीस गुरु थे। जिनमें एक जालंधर नगर के एक आचार्य शम्भुनाथ से उन्होंने कौल मत या धारणा का ज्ञान प्राप्त किया। उनका कहना था "मधुमक्खी की भाँति बनो, जो बहुत-से फूलों से पराग बटोरकर उसे अपने ही प्रयास से मधु बनाती है।" यद्यपि शैव धर्म के अनुसार साधकों के लिए विवाह करने का निषेध नहीं है, तथापि अभिनवगुप्त ने जीवन पर्यंत विवाह नहीं किया। अभिनवगुप्त के मूल गुरु लक्ष्मणगुप्त थे। अभिनवगुप्त के शिष्यों में उनके मामा उत्पल के पुत्रों चकार, पञ्चगुप्त एवं क्षेम का नाम आता है। आचार्य बनने के पश्चात् अभिनवगुप्त को कहीं-कहीं ‘अभिनव गुप्तपाद’ भी कहा गया है और शेषावतार भी। (vii) संगम तीर्थ: भारतीय ज्ञान परम्परा में अभिनवगुप्त एवं काश्मीर की तत्कालीन स्थिति को एक संगम तीर्थ बताया जा सकता है, जैसे काश्मीर (शारदा देश) सम्पूर्ण भारत का सर्वज्ञपीठ है, वैसे ही आचार्य अभिनवगुप्त सम्पूर्ण भारतवर्ष की सभी ज्ञान विधाओं में एवं साधना की परम्पराओं के सर्वोपरी समादृत आचार्य हैं। (viii) भाषा और साहित्य: अभिनवगुप्त ने शैव दर्शन के हर आयाम पर लिखा। उनके ग्रंथों और गीता भाष्य हैं, जिसमें परमार्थसार, तंत्रसार और गीतार्थ संग्रह प्रमुख हैं। अभिनवगुप्त अपना मत व्यक्त करते हुए ध्वनि को ‘चौथा आयाम’ बताते हैं। पुराने आचार्यों के महान ग्रंथों पर अपनी टिप्पणियाँ करते समय अभिनवगुप्त काल और समाज दोनों के आलोक में ही व्याख्या करते हैं। ईश्वर प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी उनके प्रिय विषय प्रत्यभिज्ञा को समझानेवाला महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें उन्होंने बताया कि अज्ञान के कारण जिसे भूल गए हैं, उस परमशिव के साथ पुनर्साक्षात्कार कैसे हो। (ix) दर्शन की नवीन व्याख्या: गीता के उपदेश और प्रसंग को उन्होंने नकारा नहीं, अपतु प्रतीकार्थ रूप में व्यक्त किया है। उनका कहना है कि सभी प्रकार के दुःखों से मुक्ति केवल परमशिव को साक्षात देखने से ही सम्भव है। उन्हें आपत्ति नहीं कि शिव को कोई कृष्ण के रूप में सम्बोधित करे। कौरव-पाण्डव युद्ध को उन्होंने विद्या और अविद्या के बीच संघर्ष बताया है। (x) काव्य शास्त्र में दिशा बोध: ‘सहदय’ की एकमात्र परिभाषा भी आचार्य अभिनवगुप्त की ही दी हुई है— "काव्यों के अध्ययन-मनन के अभ्यास से जिनके निर्मल और विस्तृत मनरूपी दर्पण में वर्णनीय वस्तु के साथ तन्मय हो जाने की योग्यता हो, वे अपने हृदय के साथ संवाद का आनन्द अनुभव करनेवाले सहृदय हैं।"
(7) वैद्य श्रीभट्ट (i) जन्म और कृतित्व: श्री भट्ट १६वीं शताब्दी में कश्मीर के प्रसिद्द वैद्य थे। उन्होंने तत्कालीन शासक जुनेल के प्राणों की रक्षा की। (ii) नागरिक कर्तव्य: उन्हें शासन स्वर्णालंकारों से सत्कारित करना चाहा। श्रीभट्ट ने मना कर दिया और अपनी छह माँगे प्रस्तुत कीं। जैनुल बाध्य था। उसने स्वीकृत दे दी। (iii) राष्ट्रीय दृष्टि: श्री भट्ट की मांगें थीं- (i) हिन्दुओं की हत्या बंद करो (ii) मंदिरों का ध्वंस रोको (iii) संस्कृत पाठ शालाओं को पुन: प्रारम्भ करो (iv) गोवंश का वध बंद करो। (v) धार्मिक उत्सवों पर लगा प्रतिबंध हटाओं (vi) पुस्तकालयों का जीर्णोद्धार करो। सभी मांगे मान्य की गयीं। (iv) धर्म और राष्ट्र रक्षा: भारत के इतिहास में वैद्यराज श्री भट्ट का धर्म एवं राष्ट्र रक्षा के लिए यह उदाहरण अपवाद स्वरूप और गौरवास्पद है।
(8) भगवान् गोपीनाथ: (i) सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन: 20वीं सदी के एक महान संत, जिन्हें ‘जीवनमुक्त’ (मुक्त आत्मा) माना जाता है। वे आत्मलीन संत थे। उनकी आध्यात्मिक यात्रा को शाम्भवी अवस्था (शिव अवस्था) कहा जाता है। वे रहस्यवादी अघोश्वर एवं तत्वदर्शी संत थे। (ii) पंथ अनेक गंतव्य एक: उनका मत था कि "ब्रह्म अर्थात् निराकार ईश्वर को एक वृक्ष के रूप में सीचें और यदि कोई इसकी किसी भी शाखा पर बैठता है, तो प्रत्येक स्थिति में एक ही लक्ष्य प्राप्त होगा।" उन्होंने एक बार टिप्पणी कि थी, "ओंकार ईश्वरत्व का ‘गला’ है और इसके बिना कुछ भी संभव नहीं है।" उनका विश्वास था कि "शिव हर जगह नृत्य कर रहे हैं।" (iii) भाषा: वे अपने लेखन में शारदा लिपि का उपयोग करते थे। उनके लेखन में भक्ति परंपरा दिखाई देती है। (iv) तत्व की गुरु परम्परा: श्रीमदभगवद्गीता को अपना गुरु मानते थे। उनके यहाँ श्रीमदभगवद्गीता एवं योग वशिष्ठ जैसे ग्रंथों का नियमित अध्ययन और चर्चा होती थी। (v) सत्संग से ज्ञान दीक्षा: विद्यार्थी काल में ही वे एक जटाधारी साधु ‘स्वामी बालक काव’ के दर्शन करने जाया करते थे और अवसर मिलते ही उनके पैर दबाते थे। एक अन्य संत ‘स्वामी जीवन साहिब’ के दर्शन करने नियमित रूप से जाया करते थे। वे कश्मीर के बोधगीर इलाके के ‘स्वामी नारायण जू भान’ के भी दर्शन करते थे। वे नियमित रूप से इन संतों की सभाओं में भाग लेते थे, जहाँ वेदान्त, पतंजलि के योग सूत्र और कश्मीर शैव धर्म जैसे आध्यात्मिक और दार्शनिक विषयों पर चर्चा होती थी। (vi) आध्यात्मिक यात्रा: आरंभ में वे सनातन पंचांग उपासना (जिसे पंचायतन पूजा कहते हैं) नामक आध्यात्मिक साधना का अभ्यास किया था, जिसमें इन चार देवताओं और अपने आध्यात्मिक गुरु की पूजा की जाती है। (vii) वीतरागी जीवन: उन्होंने कामवासना और अहंकार को आध्यात्मिक विकास में बाधा माना और ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के गुणों की प्रशंसा की। किराने की दुकान में काम करते समय, वे अक्सर ध्यान में लीन पाए जाते थे। कभी-कभी वे पूरी रात दुकान में ही ध्यान में लीन रहते थे। वे सांसारिक बन्धनों में कभी नहीं बंधे और वीतरागी जीवन जीते हुए समाज जागरण का कार्य किया। (viii) धार्मिक एवं सामाजिक सरोकार: अपने बचपन से ही भगवान गोपीनाथ अपना अधिकांश समय भजन मंडलियों के साथ भगवान शिव, खीर भवानी तथा हरि पर्वत मंदिरों के देवताओं की महिमा गान करने के लिए आयोजित धार्मिक सभाओं में व्यतीत करते थे। (ix) कला के पुजारी: वे धार्मिक नाटकों, रास लीलाओं और आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करने वाले धार्मिक पुरुषों की सभाओं में भाग लेते थे। (x) मूर्त धरोहरों से प्रेम: कहा जाता है कि 22 वर्ष की आयु से उन्होंने श्रीनगर स्थित हरि पर्वत मंदिर की प्रतिदिन परिक्रमा शुरू कर दिया था। उन्हें अक्सर मंदिर के प्रांगण में घंटों ध्यान करते हुए देखा गया। 25 वर्ष की आयु में उन्हें माता शारिका भवानी के दर्शन हुए। इसके बाद वे निराकार ईश्वर के ध्यान की ओर अग्रसर हुए। (xi) अमूर्त धरोहर: उन्होंने ध्यान की एक ऐसी प्रक्रिया का अभ्यास किया, जिससे उन्हें कश्मीर शैव धर्म में वर्णित कुल 36 तत्वों (अग्नि, जल आदि) पर नियंत्रण प्राप्त होता था। उन्होंने कश्मीर शैव वाद के अद्वैत तरीका सिद्धांत का पालन किया।
आधुनिक और समकालीन संत: हाल के समय में, महंत रामेश्वर दास, संत वेद प्रकाश महाराज, बाल संत साहिल महाराज जैसे संत जम्मू-कश्मीर में सक्रिय हैं।
निष्कर्ष : कश्मीर के संतों की सांस्कृतिक विरासत: (i) भगवान् शिव से गुरु शिष्य परम्परा। (ii) त्रिक दर्शन - शिवोहम्! शिवोहम्! त्रिक शैव-दर्शन अद्वैत तंत्र पर आधारित है। त्रिक का आशय नर शक्ति और शिव के संबंधों से है। (iii) शैव दर्शन: वेदांत की भाँति ही एक आस्तिक दर्शन है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘शिवोहम्’ दोनों की धारणा एक है। शिव का रूप परम चैतन्य है एवं क्रिया-रूप शक्ति है। (iv) शिव शक्ति: शक्ति शिव का नारी रूप है। शक्ति की सतत क्रियाशीलता ही स्पन्दन है। (v) शिवत्व का विस्तार: शिव का विस्तार ही सृष्टि है। जब परमशिव के चैतन्य का बाहर विस्तार पाता है तो ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आता है। (vi) सृष्टि के पूर्व: शैवों का विश्वास है कि शैव मत सृष्टि से भी पहले लोकातीत ‘परा’-वाक के रूप में था। फिर पश्यंति, मध्यमा और अंत में वैखरी (शब्दों) के रूप में व्यक्त हुआ। (vii) आगम शास्त्र: ये मानवेतर माने जाते हैं। शिवसूत्र के माध्यम से पुनः लोक में प्रचलित हुए। (viii) शैव दर्शन के साधना मार्ग: (1) क्रम-परम्परा (एरकनाथ), (2) कुल-परम्परा (सुमतिनाथ), (3) स्पन्द-परम्परा (वसुगुप्त), (4) प्रत्यभिज्ञा (सोमानंद)। (ix) परमचैतन्य की प्राप्ति: शैव मानते हैं कि माया द्वारा रचे संसार को भोगकर भी परम चैतन्य को पाया जा सकता है। तंत्र एक विरासत (i) तंत्र का अर्थ: जिससे जटिल विषयों की व्याख्या होती है। यह शक्तिपात और शुद्धिकरण की क्रमबद्ध शिक्षा देता है। (ii) आगम: तंत्र में आगमों का बड़ा महत्त्व है।(iii) गोपीनाथ कविराज का कथन: आर्षज्ञान के मूल में भी आगम ही विद्यमान है। (iv) तंत्र के प्रकार: यौगिक, शाक्त और अन्य। तंत्र में अपनी काया को समझने का विधान है।
सार : कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत ‘अद्वैत’ के उस ऊँचे शिखर की भाँति है जहाँ ज्ञान, कर्म और भक्ति का संगम होता है। यह विरासत हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी जड़ों और सत्य से कैसे जुड़े रहना है।

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