Monday, 9 March 2026

साहित्य कि विचारधाराएँ

 

 

साहित्य कि विचारधाराएँ

विषय व्यापक और गंभीर है । कुछ प्रश्न हैं , (i) भारतीय वांग्मय की विचारधाराएं ?  साहित्य की विचारधाराएं या हिंदी साहित्य की विचारधाराएं ? स्वतंत्रता के बाद के साहित्य की विचारधाराएं ? या स्वतंत्रता के पूर्व की विचारधाराएं ? (ii) साहित्य का काल-खंड कहाँ से देखा जाएं ? वैदिक काल से? रामायण को आधार बनाकर ? व्यास को, कालिदास या भवभूति को ? हिंदी साहित्य के काल विभाजन के आधार पर या दशकों के आधार पर ?

दरअसल भारतीय साहित्य का पहला विचार- 

(एक) पहला दार्शनिक विचार-  (1)  ऋग्वेद (मण्डल 1, सूक्त 164, मंत्र 46) में कहा गया है-

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुःअथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥

ज्ञानी लोग एक ही सत्य (परम तत्व) को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। कोई उसे इन्द्र, कोई मित्र, कोई वरुण, कोई अग्नि कहते हैं; उसी को कोई यम और कोई मातरिश्वा (वायु) कहता है। -सत्य एक है, परंतु ज्ञानी उसे अनेक नामों से कहते हैं। यह वैदिक परम्परा का मूल दार्शनिक विचार माना जाता है कि ‘सृष्टि के पीछे एक ही परम सत्ता है’, भले ही उसे अलग-अलग रूपों में समझा जाए।* एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति> सत्य एक है, पर नाम अनेक > ईश्वर की एकता।

(2)  यह विचार किसे आया? वैदिक परम्परा के अनुसार यह विचार किसी एक मनुष्य द्वारा बनाया हुआ नहीं माना जाता। * वेद “अपौरुषेय” माने जाते हैं, अर्थात् वे किसी मनुष्य की रचना नहीं हैं। ** प्राचीन ऋषियों ने गहन ध्यान और तपस्या में इन सत्यताओं का “श्रवण” या “दर्शन” किया। **इसलिए उन्हें मन्त्रद्रष्टा ऋषि” कहा जाता है, रचयिता नहीं।

उदाहरण के रूप में कई ऋषियों के नाम मिलते हैं, जैसे - ऋषि वशिष्ठ। ऋषि विश्वामित्र। ऋषि अत्रि। ऋषि भारद्वाज। इन ऋषियों ने वेदों के मन्त्रों का अनुभव किया और उन्हें परम्परा में प्रकट किया।  संक्षेप में: वैदिक परम्परा का पहला विचार * ‘एक परम सत्य ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति।’ यह किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं, बल्कि ‘ऋषियों द्वारा अनुभूत अपौरुषेय ज्ञान’ माना जाता है।

(दो) वैदिक और उपनिषदिक परम्परा: इसमें कहा गया है कि जब केवल ब्रह्म (परमात्मा) ही था, तब उसने विचार कर संकल्प किया , इसी संकल्प से सृष्टि की रचना मानी जाती है। वह विचार संकल्प के रूप में ‘परा’ से प्रकट हुआ और पश्यन्ति से अनुभूत होता हुआ ‘वैखरी’ में व्यक्त हुआ।  * एकोऽहम् बहुस्याम् > मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ > सृष्टि की उत्पत्ति। यहाँ तीन सूक्त इसकी पुष्टि करते हैं -

तीन सूक्त : (i) पुरुष सूक्त> (ऋग्वेद 10.90)  का मंत्र इस प्रकार है-

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।

स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥

  : उस विराट पुरुष (परमात्मा) के हजार सिर, हजार नेत्र और हजार चरण हैं। वह सम्पूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त करके उससे भी दस अंगुल ऊपर (अर्थात उससे परे) स्थित है। यह मंत्र विराट पुरुष (सर्वव्यापी ब्रह्म) की व्यापकता और सर्वव्यापक स्वरूप को प्रकट करता है। इसी एक महापुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष) से सम्पूर्ण सृष्टि बनी। उसके यज्ञ से- *देवता, प्राणी और प्रकृति बने। *समाज की चार वर्ण व्यवस्था का प्रतीकात्मक वर्णन भी मिलता है।

(ii) हिरण्यगर्भ सूक्त > (ऋग्वेद 10.121) – सृष्टि का प्रथम कारण यह (हिरण्यगर्भ सूक्त) का प्रथम मंत्र है। पूरा मंत्र इस प्रकार है-

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

यह सूक्त सृष्टि के मूल कारण और परम सत्ता के बारे में गहन वैदिक चिंतन प्रस्तुत करता है। यहाँ कहा गया है कि प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ (स्वर्ण अंड/कॉस्मिक एम्ब्रियो) प्रकट हुआ। उसी से- *पृथ्वी और आकाश बने। ** सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति हुई। ***वही समस्त जगत का स्वामी है।

(iii) नासदीय सूक्त > (ऋग्वेद 10.129) – सृष्टि से पहले की अद्वितीय रहस्यमय अवस्था -नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।

   किमावरीवः कुह कस्य शर्मन् अम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्॥

  इस सूक्त में बताया गया है कि सृष्टि से पहले, *न सत् था, न असत्। **न आकाश था, न पृथ्वी। ***केवल एक रहस्यमय सत्ता थी। उस समय क्या ढका हुआ था? कहाँ और किसके आश्रय में था? क्या वहाँ कोई गहरा और अगाध जल था? फिर काम (इच्छा) उत्पन्न हुई, जो सृष्टि का पहला बीज बनी। यह सूक्त सृष्टि के रहस्य पर दार्शनिक प्रश्न भी उठाता है।

निष्कर्ष: इन तीनों सूक्तों को मिलाकर देखने पर वैदिक दर्शन यह बताता है कि-  (1) पहले अद्वैत अवस्था, फिर सृष्टि का मूल कारण, और अंत में जगत का विस्तार हुआ। (2) भारतीय साहित्य के मूल वैदिक विचार- (i) मैं एक हूँ, अनेक रूपों में प्रकट हो जाऊँ।” (ii) विचार को पूर्णता में देखना (iii) संपूर्ण विश्व उसी एक परम सत्य की अभिव्यक्ति है। (iv) सृष्टि की रचना से साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है ।     

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(एक)   पहली विचारधारा है? * “भारतीय साहित्य के विचारधारा का आधार है , विचार को पूर्णता में देखना! भारतीय साहित्य ने काल का अध्ययन किया और काल को खंड -खंड में नहीं पूर्णता में पाया और ऋषियों ने कहा ,

“ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

  वह (परमात्मा) पूर्ण है, यह (जगत) भी पूर्ण है। उस पूर्ण से यह पूर्ण उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। ** यह भारतीय साहित्य के विचारधारा का आधार है । हम जैसे काल को पूर्णता में देखते हैं, उसी तरह प्रकृति और पुरुष को भी पूर्णता में देखते हैं । यह प्रकृति और पुरुष इस संसृति का कारक है । *** सृष्टि की रचना से साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है ।      

(दो) यहाँ से विचारधाराओं का जन्म होता है - भारतीय वाङ्मय की मुख्य विचारधाराओं को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है: आस्तिक , नास्तिक और अन्य । (1) आस्तिक- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त ।  (2) नास्तिक विचार धाराएं (वेदों की सत्ता को न मानने वाली): चार्वाक, बार्हस्पत्य (लोकायत)- (i) प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्-  चार्वाक दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष (इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान) ही एकमात्र प्रमाण है। अनुमान, उपमान या शब्द को वे प्रमाण नहीं मानते। (ii) देहवाद- चार्वाक के अनुसार देह ही आत्मा है शरीर से अलग कोई स्वतंत्र आत्मा नहीं मानी जाती। चेतना शरीर के तत्त्वों के संयोजन से उत्पन्न होती है। (iii) स्वभाववाद- संसार की उत्पत्ति और क्रियाएँ स्वभाव (प्राकृतिक गुणों) से होती हैं। किसी ईश्वर या अलौकिक शक्ति की आवश्यकता नहीं मानी जाती। (iv) परलोक खंडन- चार्वाक दर्शन परलोक, स्वर्ग-नरक और पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं करता। उनके अनुसार मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता। ।  

निष्कर्ष: :ये सिद्धान्त भौतिकवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं, इसलिए इन्हें चार्वाक या लोकायत दर्शन का मूल आधार माना जाता है।‘लोकायत’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह केवल इसी ‘लोक’ (संसार) की सत्ता मानता है और जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय रहा।         

 (तीन) अन्य प्रमुख नास्तिक (अवैदिक) विचारधाराएँ : बुद्ध और महावीर के काल में प्रचलित अन्य महत्वपूर्ण विचार: (i) आजीवक संप्रदाय (मक्खलि गोशाल): * नियतिवाद: सब कुछ पहले से तय है। मनुष्य के कर्म का भाग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। **ऐतिहासिक साक्ष्य: मौर्य सम्राट बिंदुसार इसके अनुयायी थे; बराबर की गुफाएं इन्हीं के लिए बनी थीं। (ii) अज्ञान या अज्ञेयवाद (संजय बेलट्ठिपुत्त): मूल विचार: ईश्वर या मृत्यु के बाद के जीवन जैसे आध्यात्मिक प्रश्नों का निश्चित उत्तर जानना असंभव है। (iii) अक्रियवाद (पूरण कश्यप): * मूल विचार: कर्म का कोई फल नहीं होता। न पुण्य से लाभ होता है, न पाप से हानि। यह कर्म सिद्धांत का पूर्ण खंडन है। (iv) उच्छेदवाद / भौतिकवाद (अजित केशकंबली): मूल विचार: मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के साथ सब नष्ट हो जाता है। यह चार्वाक दर्शन का आधार बना। (V) अनिश्चयवाद (विक्षेपवाद): मूल विचार: किसी भी अंतिम सत्य पर पहुँचना संभव नहीं, इसलिए वाद-विवाद से बेहतर मौन रहना है।

निष्कर्ष : इन विचारधाराओं को मुख्यतः तीन वर्गों में रखा जा सकता है, आस्तिक, नास्तिक और अन्य अवैदिक धाराएँ। (i) आस्तिक दर्शनों ने वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के रूप में व्यवस्थित दार्शनिक परम्परा विकसित की। (ii) नास्तिक विचारधाराओं, विशेषतः चार्वाक या लोकायत ने प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हुए आत्मा, परलोक और कर्मफल का खंडन किया। (iii)  आजीवक, अज्ञेयवाद, अक्रियवाद, उच्छेदवाद और अनिश्चयवाद जैसी अन्य विचारधाराएँ भी प्रचलित थीं, जिन्होंने नियति, ज्ञान, कर्म और जीवन-मरण के प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। (iv)  स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही है, जहाँ एक ही मूल वैदिक पृष्ठभूमि से विविध दार्शनिक मतों का विकास हुआ और सत्य की खोज विभिन्न मार्गों से निरन्तर चलती रही।

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इन विचारधाराओं को मुख्यतः तीन वर्गों में रखा जा सकता है, - (i) आध्यात्मिक> सांस्कृतिक > राष्ट्रीय विचारधाराएं -  यह विचारधारा (आस्तिक दर्शनों ने) वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के रूप में व्यवस्थित दार्शनिक परम्परा विकसित की। (ii) नास्तिक विचारधाराएं - विशेषतः चार्वाक या लोकायत ने प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हुए आत्मा, परलोक और कर्मफल का खंडन किया।  इनसे भौतिक एवं बौधिक विचारधाराएँ जन्मी। (iii) भौतिक एवं राजनीतिक विचारधाराएँ - आजीवक, अज्ञेयवाद, अक्रियवाद, उच्छेदवाद और अनिश्चयवाद जैसी अन्य विचारधाराएँ भी प्रचलित थीं, जिन्होंने नियति, ज्ञान, कर्म और जीवन-मरण के प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। (iv)  स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही है, जहाँ एक ही मूल वैदिक पृष्ठभूमि से विविध दार्शनिक मतों का विकास हुआ और सत्य की खोज विभिन्न मार्गों से निरन्तर चलती रही।  

नोट : पहली एवं दूसरी को संतातन विचारधारा कहा गया जबकि तीसरी को राजनीतिक, आर्थिक विचारधारा माना जा सकता है ।

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अब इन तीनों विचार धाराओं की आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझें -

(1) आध्यात्मिक> सांस्कृतिक > राष्ट्रीय विचारधाराएं -  यह विचारधारा (आस्तिक दर्शनों ने) वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के रूप में व्यवस्थित दार्शनिक परम्परा विकसित की।

(एक)  वेदान्त का प्रभाव-  अद्वैत वेदान्त में प्रतिपादित ब्रह्म–आत्मा की एकता (सर्वात्मभाव) का प्रभाव आधुनिक हिंदी साहित्य के अनेक कवियों, लेखकों और आलोचकों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस विचार के अनुसार समस्त सृष्टि एक ही परम सत्ता (ब्रह्म) की अभिव्यक्ति है और आत्मा उसी का अंश है। हिंदी साहित्य में यह भावना एकात्मता, विश्व बंधुत्व, आत्मचेतना और आध्यात्मिक अनुभव के रूप में व्यक्त हुई है। प्रमुख साहित्यकारों पर इसका प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है- (1) भारतेंदु हरिश्चंद्र: रचना: भारत दुर्दशा- भारतेंदु के साहित्य में भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का प्रभाव दिखाई देता है। उनकी दृष्टि में समस्त समाज एक ही सांस्कृतिक चेतना का अंग है। यह विचार वेदान्त के सर्वात्मभाव से जुड़ा हुआ है। उनके लेखन में भारतीय संस्कृति की एकात्म दृष्टि दिखाई देती है। (2) महावीर प्रसाद द्विवेदी: रचना: कविता क्या है- द्विवेदी जी ने साहित्य को मानवता और नैतिक चेतना से जोड़ा। उनके विचारों में मनुष्य और समाज की एकता पर बल मिलता है, जो वेदान्तीय दृष्टि से जुड़ा है। वे साहित्य को मानव के आंतरिक विकास का साधन मानते थे। (3) मैथिलीशरण गुप्त:रचना: साकेत- गुप्त जी के काव्य में भारतीय दर्शन का प्रभाव स्पष्ट है। साकेत में राम का चरित्र मानव और ईश्वर के बीच एकात्म संबंध का प्रतीक है। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति – वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।” वेदान्त के मानवतावादी स्वरूप को व्यक्त करती है। (4) जयशंकर प्रसाद- रचना: कामायनी- प्रसाद की काव्य-दृष्टि में अद्वैत वेदान्त का गहरा प्रभाव है। * कामायनी में मनुष्य के भीतर स्थित अनन्त चेतना का विचार मिलता है। *यह अद्वैत वेदान्त के ब्रह्म–आत्मा एकता के सिद्धान्त से संबंधित है।कामायनी में मनु और श्रद्धा के माध्यम से मनुष्य की आत्मचेतना और ब्रह्म से एकात्मता की भावना व्यक्त होती है।श्रद्धा” सर्ग में समस्त जगत को एक ही चेतना का रूप बताया गया है। प्रसाद की दार्शनिक दृष्टि में मनुष्य, प्रकृति और ब्रह्म की एकता का भाव दिखाई देता है। (5) सुमित्रानंदन पंत: रचनाएँ: चिदम्बरा, लोकायतन-पंत के काव्य में वेदान्त का चेतनावाद और सर्वात्मभाव प्रमुख है। चिदम्बरा में उन्होंने ब्रह्म को सर्वव्यापी चेतना के रूप में स्वीकार किया। प्रकृति और मनुष्य के बीच अद्वैत संबंध को उन्होंने बार-बार व्यक्त किया। काव्य में सर्वव्यापी चेतना और प्रकृति–मानव की एकता का भाव मिलता है। यह वेदान्त के सर्वात्मवाद से प्रेरित है। सार यह कि उनका काव्य “मानव में ईश्वर का निवास” जैसी वेदान्तीय भावना को प्रकट करता है। (6) महादेवी वर्मा: रचना: यामा-महादेवी के काव्य में आत्मा और परमात्मा के मिलन की रहस्यवादी अनुभूति मिलती है। उनकी कविताओं में एक ऐसी अनन्त सत्ता की खोज है जो वेदान्तीय ब्रह्म की याद दिलाती है। उनकी संवेदना में आत्मा का परम सत्य से मिलन ही जीवन का लक्ष्य प्रतीत होता है। (7) सूर्यकांत त्रिपाठी निराला: रचनाएँ: राम की शक्ति पूजा, अनामिका-निराला की रचनाओं में अद्वैत की मानवतावादी व्याख्या दिखाई देती है। राम की शक्ति पूजा में शक्ति और चेतना का जो स्वरूप है, वह ब्रह्म की सार्वभौमिक शक्ति का रूप है। उनके काव्य में मनुष्य की आत्मशक्ति को ब्रह्म की शक्ति से जोड़ा गया है। यह वेदान्त के एक ही परम चेतना के विचार से संबंधित है। (8) प्रेमचंद: रचना: गोदान-प्रेमचंद के साहित्य में सामाजिक यथार्थ के साथ मानव-एकता और करुणा की भावना मिलती है। गोदान में होरी का चरित्र यह दिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य मानवीय संवेदना में है। यह दृष्टि वेदान्त के सर्वभूतात्मभाव (सभी में एक ही आत्मा) से मेल खाती है। (9) अज्ञेय: रचना: शेखर: एक जीवनी-अज्ञेय के साहित्य में आत्मानुभूति और आत्म-अन्वेषण का भाव मिलता है।शेखर: एक जीवनी में व्यक्ति अपने अस्तित्व के गहरे सत्य को खोजता है, जो वेदान्तीय आत्मचेतना से जुड़ा है। उनकी कविता और कथा साहित्य में अस्तित्व और चेतना की एकता का विचार मिलता है। (10) रामचंद्र शुक्ल (आलोचक): रचना: हिंदी साहित्य का इतिहास- शुक्ल जी ने भारतीय साहित्य की परम्परा में आध्यात्मिक और दार्शनिक चेतना को महत्त्व दिया। वेदान्तीय दृष्टि से उन्होंने साहित्य में मानवता और व्यापक चेतना के तत्व को रेखांकित किया। हिंदी साहित्य में वेदान्त के अद्वैत सिद्धान्त (ब्रह्म–आत्मा की एकता) का प्रभाव अनेक साहित्यकारों की कृतियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है। इस प्रभाव के कारण साहित्य में मानव–एकता, आत्मचेतना, विश्वबंधुत्व और आध्यात्मिक मानवतावाद की भावना प्रकट होती है।  (11) रामविलास शर्मा: रचना: निराला की साहित्य साधना- रामविलास शर्मा ने भारतीय दर्शन और साहित्य के संबंध पर गहरा विचार किया। उन्होंने निराला और भारतीय परम्परा की व्याख्या करते हुए भारतीय दार्शनिक चेतना को रेखांकित किया। उनके आलोचनात्मक लेखन में भारतीय ज्ञान परम्परा और वेदान्त की पृष्ठभूमि दिखाई देती है। (12) गजानन माधव मुक्तिबोध: रचना: अँधेरे में- मुक्तिबोध की कविता में आत्मान्वेषण और चेतना की गहराई प्रमुख है। अँधेरे में कविता में कवि आत्मा के भीतर छिपे सत्य को खोजता है। यह आत्म-खोज वेदान्त के आत्मज्ञान की प्रक्रिया से जुड़ी प्रतीत होती है।

निष्कर्ष: हिंदी साहित्य में वेदान्त का प्रभाव केवल आध्यात्मिक काव्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रयता, मानवता और आलोचनात्मक साहित्य में भी दिखाई देता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर गजानन माधव मुक्तिबोध तक अनेक साहित्यकारों ने अपने-अपने ढंग से आत्मचेतना, मानव-एकता और सार्वभौमिक चेतना के विचार को व्यक्त किया। आत्मा की एकता के विचार का प्रभाव कई साहित्यकारों पर पड़ा। जयशंकर प्रसाद की कृति कामायनी में मनुष्य के आत्मिक विकास और ब्रह्म से संबंध की दार्शनिक झलक मिलती है। सुमित्रानंदन पंत की कविताओं में प्रकृति और आत्मा की एकता का भाव वेदान्त से प्रभावित है। के साहित्य में वेदान्त का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से दार्शनिक ग्रंथों की तरह नहीं, बल्कि आत्मचेतना, अंतःसंघर्ष और सत्य की खोज के रूप में दिखाई देता है। विशेषतः अद्वैत वेदान्त की तरह वे मनुष्य के भीतर छिपे सत्य और चेतना की खोज करते हैं। मुक्तिबोध के साहित्य में वेदान्त का प्रभाव आत्मान्वेषण, अंधकार और प्रकाश का संघर्ष , सत्य की खोज और चेतना के संघर्ष के रूप में प्रकट होता है। उनकी कविता अँधेरे में इसका प्रमुख उदाहरण है, जहाँ कवि मनुष्य के भीतर छिपे सत्य को खोजने का प्रयास करता है। योग दर्शन का प्रभाव: आत्मसंयम और साधना महादेवी वर्मा की काव्यधारा में अंतर्मुखता, विरक्ति और आत्मानुभूति का स्वर योग दर्शन से जुड़ा हुआ है। सांख्य दर्शन का प्रभाव: पुरुष–प्रकृति सिद्धांत और प्रकृति के महत्व - सुमित्रानंदन पंत की प्रकृति-प्रधान कविताएँ इसका उदाहरण हैं।  न्याय और वैशेषिक का प्रभाव- तर्कशीलता और यथार्थवादी दृष्टि का प्रभाव।  मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान और कर्मभूमि में सामाजिक यथार्थ और नैतिक तर्क का स्वर मिलता है।  मीमांसा का प्रभाव: मीमांसा के कर्म और कर्तव्य के सिद्धांत का प्रभाव - रामधारी सिंह दिनकर की कृति कुरुक्षेत्र में कर्म, धर्म और कर्तव्य का गहन विवेचन मिलता है। इस प्रकार आस्तिक दर्शनों ने आधुनिक हिंदी साहित्य को आध्यात्मिक गहराई, नैतिक चेतना, प्रकृति–मानव संबंध और आत्मचिन्तन की समृद्ध परंपरा प्रदान की, जिसके कारण साहित्य केवल मनोरंजन न रहकर जीवन-दर्शन का माध्यम बन गया।

(दो) वैदिक एवं दार्शनिक विचारधारा (पुनर्जागरण काल):19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय वाङ्मय की प्राचीन जड़ों की ओर लौटने का आह्वान हुआ।(i) आर्य समाज और दयानंद सरस्वती: इन्होंने ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया। इसका प्रभाव भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग पर स्पष्ट दिखता है। साहित्य में अंधविश्वास का विरोध और तर्कसंगत वैदिक मूल्यों की स्थापना हुई।  (ii) अद्वैत वेदांत और रामकृष्ण-विवेकानंद: स्वामी विवेकानंद के विचारों ने साहित्यकारों में ‘आत्मगौरव’ और ‘राष्ट्रीयता’ का भाव भरा। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य में वेदांत का ‘अद्वैत’ तत्व (मनुष्य और ईश्वर की एकता) स्पष्ट झलकता है।  (iii)  अनेक दक्षिण भारतीय साहित्यकारों ने भारतीय वाङ्मय, वेद, उपनिषद् और भक्ति परम्परा की ओर लौटने का आह्वान किया। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं- * सुब्रमणम भारती  (तमिल):भारती ने अपनी कविताओं में वेदों, उपनिषदों और भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का गौरव गाया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और राष्ट्रवाद को जोड़ते हुए प्राचीन वैदिक आदर्शों की पुनर्स्थापना का आह्वान किया। उनकी कविताओं में आध्यात्मिक स्वतंत्रता और मानव समानता का संदेश मिलता है। ** बंकिमचन्द्र  का प्रभाव दक्षिण भारत में: यद्यपि वे बंगाल के थे, पर उनकी रचनाएँ दक्षिण भारत के साहित्यकारों को भी प्रेरित करती रहीं। “वन्दे मातरम्” के माध्यम से उन्होंने भारतमाता और वैदिक-पौराणिक परम्परा की महिमा का पुनरुत्थान किया, जिसका प्रभाव तमिल, तेलुगु और कन्नड़ लेखकों पर पड़ा।  *** श्री अर्विन्दों (पुदुचेरी से सम्बद्ध): उन्होंने वेदों और उपनिषदों की आधुनिक व्याख्या की। उनकी कृतियाँ जैसे The Life Divine और Essays on the Gita में भारतीय दार्शनिक परम्परा को आधुनिक दृष्टि से पुनर्जीवित करने का प्रयास मिलता है। * तेलुगु साहित्य से – *कन्द्कुरी वीरेसालिंगम - समाज सुधार के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक परम्परा और शास्त्रीय ज्ञान की पुनर्स्थापना का प्रयास किया।  **यू एस स्वामीनाथन ऐय्यर - इन्होंने प्राचीन तमिल ग्रंथों को खोजकर प्रकाशित किया और दक्षिण भारत की प्राचीन साहित्यिक परम्परा को पुनर्जीवित किया। ***विश्वनाथ सत्यानारायाना - इनकी रचनाओं में पुराण, वेद और भारतीय दार्शनिक दृष्टि का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। ** कन्नड़ साहित्य- *कुप्पालि वेंकटप्पा पुत्ताप्पा : कुवेम्पु ने अपनी रचनाओं में भारतीय आध्यात्मिक परम्परा, वेद-उपनिषद के विचार और मानवतावाद को महत्व दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़े साहित्य के निर्माण पर बल दिया। **डी .ह्वी. गुंडप्पा - उनकी कृति मंकुतिम्मना कग्गा में उपनिषद और भारतीय दर्शन की गहन झलक मिलती है।  मलयालम साहित्य- *कुमारन असन उनकी कविताओं में आध्यात्मिकता, वेदान्त और सामाजिक समता का विचार मिलता है। वल्लाथोल नारायनाना मेनन -उन्होंने भारतीय संस्कृति, पुराण और संस्कृत परम्परा को अपने काव्य में पुनर्जीवित किया।

निष्कर्ष:  इस प्रकार सम्पूर्ण भारत के अनेक साहित्यकारों ने 19वीं–20वीं सदी के पुनर्जागरण काल में वेद, उपनिषद, भक्ति और भारतीय दार्शनिक परम्परा को पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। उनके साहित्य में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की ओर लौटने की स्पष्ट प्रेरणा दिखाई देती है।        

 (तीन) सांस्कृतिक एवं मानवतावादी विचारधारा: यह विचारधारा मध्यकालीन भक्ति और आधुनिक नैतिकता का मिश्रण थी। (i) गांधीवाद : वस्तुतः जिसे हम गांधीवाद कहते हैं वह वैदिक विचारधाराओं के कुछ अंशों का आग्रह है - यथा, सत्य , अहिंसा, अपरिग्रह आदि। यह वैसा ही है जैसे - कठोपनिषद् (प्रथम अध्याय, तृतीय वल्ली, श्लोक 14) का प्रसिद्ध मंत्र स्वामी विवेकानंद ने इसे ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए’ के रूप में लोकप्रिय बनाया था।

मूल संस्कृत श्लोक है, “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ (उत्तिष्ठत: उठो -मोह-रूपी निद्रा से।,जाग्रत: जागो -अज्ञान के अंधकार से बाहर आओ। प्राप्य वरान्निबोधत: श्रेष्ठ महापुरुषों (गुरुओं) के पास जाकर उस परम ज्ञान को प्राप्त करो। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया: यह मार्ग छुरे की पैनी धार के समान कठिन है। दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति: बुद्धिमान लोग इस आत्मज्ञान के मार्ग को अत्यंत दुर्गम (कठिन) बताते हैं।)

यथार्थ तो यह है की गांधीवाद कोई वाद या विचारधारा नहीं है यह वैदिक अनुभूतिओं को जीवन में उतारने का  सन्देश है ।  स्वतंत्रता के पूर्व के साहित्य (प्रेमचंद युग) पर इसका सबसे गहरा प्रभाव था। सत्य, अहिंसा, हृदय-परिवर्तन और अछूतोद्धार जैसे विषयों को प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों (जैसे गोदान, रंगभूमि) में पिरोया। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ और’भारत-भारती’ भी इन मूल्यों से ओत-प्रोत हैं। अब इसे भारतीय दृष्टि जिसे सम्पूर्णता की दृष्टि कहते है तो यहाँ प्रेमचंद आप को वैदिक विचार के अनुगामी दिखाते हैं या मार्क्सवाद /प्रगतिवाद के ? (ii) रवींद्रनाथ टैगोर का मानवतावाद: टैगोर के ‘विश्व-मानव’ और ‘प्रकृति-प्रेम’ के विचार ने छायावाद को जन्म देने में बड़ी भूमिका निभाई। यहाँ व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों को प्रधानता दी गई। किन्तु चिंतन का पक्ष यह है कि क्या यह भी रवींद्रनाथ टैगोर का कोई नया मानवतावाद है ? क्या हमें यहाँ ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ वैदिक विचारधारा नहीं है। (iii) भक्ति कालीन पुनरुत्थान: साहित्यकारों ने तुलसी और कबीर के सामाजिक समरसता वाले विचारों को आधुनिक संदर्भ में फिर से परिभाषित किया।

(चार) राजनीतिक , आर्थिक तथा सामाजिक विचारधाराएँ: स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके ठीक पहले, पश्चिमी और भारतीय राजनीतिक विचारों ने साहित्य का ढांचा बदल दिया। (i) मार्क्सवाद / प्रगतिवाद: 1936 में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना के साथ हिंदी साहित्य में मार्क्सवाद का प्रवेश हुआ। इसने साहित्य को ‘महलों’ से निकालकर ‘खेत-खलिहानों’ तक पहुँचाया। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल  ने शोषक बनाम शोषित के संघर्ष को अपनी लेखनी का आधार बनाया। (ii) राष्ट्रीयता : ‘माखनलाल चतुर्वेदी’(पुष्प की अभिलाषा) और 'सुभद्रा कुमारी चौहान' जैसे कवियों ने वीर रस के माध्यम से स्वाधीनता की अलख जगाई। यह विचारधारा 'स्वराज' की प्राप्ति को ही साहित्य का परम लक्ष्य मानती थी। (iii) मनोविश्लेषणवाद :जैनेंद्र और अज्ञेय जैसे लेखकों पर फ्रायड के विचारों का प्रभाव पड़ा। यहाँ समाज के बजाय व्यक्ति के 'अचेतन मन' और उसकी दमित इच्छाओं का विश्लेषण प्रमुख हो गया।

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