Thursday, 23 April 2026

जाति नहीं ज्ञान पूज्य है

विमर्श -

यदि शूद्र में सत्य, शील , धर्म आदि लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र -शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण -ब्राह्मण। (युधिष्ठिर 
-महाभारत,वनपर्व सर्प-युधिष्ठिर संवाद)
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"पूजिअ विप्र सील गुन हीना।
 सूद्र न गुन गन ग्यान प्रवीना।।" रामचरितमानस (उत्तरकांड) 
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बिन्दु -(एक)
१- धर्मशात्रों में ब्राह्मण -विप्र -सूद्र के दो दृष्टांत।

२-* क्या सभी शास्त्रकार ब्राह्मण ही थे? 
** क्या सूद्र (सूत) वैदिक ऋचाओं के दृष्टा नहीं थे?
***  ऋग्वेद में ऋषि हैं या ब्राह्मण और सूद्र?
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बिन्दु -(दो)
* मन्युप्रहरणा विप्राः न विप्रा शस्त्रयोधिनः।
निहन्युर्मन्युना विप्राः बज्रपाणिर वासुरान।।

ब्राह्मण का हथियार शस्त्र नहीं, उसका हथियार उसका क्रोध है। क्रोध के द्वारा ब्राह्मण वैसा ही विनाश करता है, जैसा विनाश असुरों का इंद्र करते हैं।

प्रश्न - क्या क्रोधी को,आत्मसंयम हीन को ब्राह्मण कहेंगे?

* दरअसल शील, स्वभाव और चरित्र की उत्कृष्टता व्यक्ति को श्रद्धास्पद बनाती है,  न कि जाति।
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तथ्य -
* ऋषि और संत, धर्म, संस्कृति और नैतिकता के प्रहरी हैं।
**  समाज के विवेक हैं।
*** इसीलिए ब्रम्हर्षि राजर्षि से बड़ा होता है। किन्तु जन्मना नहीं, तप, त्याग तथा लोक कल्याणकारी दृष्टि के कारण। 
**** ऐसे राजर्षि और ब्रह्मर्षि भी निंदा के पात्र बने हैं, जिन्होंने क्रोध, मोह और प्रतिष्ठा में अपने को संयमित नहीं रखा।
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उल्लेखनीय -
सनातन परंपरा कहती हैं -
* ऋषि, संत, संन्यासी से परमहंस तक की यात्रा में तीन पुरुषार्थ -अर्थ, धर्म, काम को पार कर ही मोक्ष प्राप्त होता है। (यदि कोई मोक्ष है तो!)

** करुणा के कारण ही भूखी गृहणी शंकराचार्य को अपनी भूख शांत करने के अंतिम भोज्य आंवला को शंकराचार्य को देती है।

*** करुणा के कारण ही शंकराचार्य गृहणी को जीविकोपार्जन हेतु आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराते हैं।

*** भिक्षुक और गृहस्थ की यह दृष्टि ही सामाजिक समरसता का आधार है। (अन्यथा गृहणी अपनी क्षुधा शांत करती और आचार्य शंकर तप से इच्छित फल प्राप्त करते) 

**** किंतु गृहस्थ और तपस्या के इस निहितार्थ को स्थापित नहीं कर सकते थे।
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स्मृतियों के संदेश - (चिंतन)
* असम्मानात्तपोवृद्धिः सम्मानातु तपःक्षयः

असम्मान पाने से तपस्या में वृद्धि होती है, सम्मान पाने से तप का विनाश होता है।

** सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यं उद्धिजेत विषादिव।
अमृतस्यैव चाकांक्षेत अवमानस्य सर्वदा।।

सम्मान से ब्राह्मण उसी प्रकार भागे, जैसे मनुष्य जहर से भागता है और अपमान की कामना वह उसी प्रकार करे, जैसे लोग अमृत की कामना करते हैं।

*** अर्चितः पूजितो विप्रः दुग्ध गौरिव सीदति।

 पूजित विप्र दुही हुई गौ के समान सूख जाता है। (मनु स्मृति)

यहां ब्राह्मण और विप्र शब्द आये हैं। दोनों कठोर जीवन साधना के संकेत हैं, न कि जन्म से।

**** (१) जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उचयते।

 -वर्ण निर्धारण कर्म से होना चाहिए।

(२) जन्मना ब्राह्मणौं ग्येयः संस्काराद् द्विज उच्यते।
- जन्म से ही ब्राह्मण होता है, संस्कारों से द्विजत्व की प्राप्ति होती है। 
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निराकरण -
ब्राह्मण कौन ? ब्राह्मण वह है, जिसमें सत्य, क्षमा, सुशीलता, अक्रूरता , तपस्या और दया हो। 

यदि ये लक्षण शूद्र में हैं तो ?

शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानम्क्रोध एव च
आनृशंस्रमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर।
 (सर्प)

समाधान -
शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते,
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः।
यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः
यत्रैतन्न भवेत सर्प तं शूद्रमति निर्दिशेत।

( यदि शूद्र में  उक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए।)
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भ्रम क्यों?
* श्रुति और स्मृति परंपरा वैदिक ग्रंथों की टीकाएं सुविधानुसार संस्कृत ( न कि ब्राह्मण -अब्राह्मण द्वारा) के विद्वानों द्वारा की गईं। 

** परिणाम ऋषि परंपरा से प्रकाशित संपदा व्याख्या और व्यवस्था के साथ अनर्थकारी होती गयी। 

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सामाजिक बोध -

* ज्ञान किसी भी काल में किसी जाति की थाती नहीं रही है।
** बाल्मीक और व्यास जाति के प्रतिनिधि नहीं, ऋषि और संत थे। युगदृष्टा थे। तपस्वी थे। 

*** इसलिए रामायण और महाभारत जन्मना जाति के रचित ग्रंथ नहीं, कालजयी दृष्टि के परिणाम हैं।
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* नैमीषारण्य में विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के भाष्यकार तत्वदर्शी सूत जी थे। सूत समाज को पिरोने वाले थे , न कि शूद्र ! 

** 88000 हजार ऋषियों के बीच शौनक जैसे प्रकांड विद्वान श्रोता थे। जाति के प्रतिनिधि नहीं।

*** नैमीषारण्य में अनेक ऋषि वैदिक काल जैसे ही सपरिवार थे । किसी महिला ऋषि के कान में शीशा घोल कर नहीं डाला गया था।

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तात्पर्य -  वैदिक ऋषियों से लेकर तुलसी, कबीर, सूर, रसखान, रविदास तक की परम्परा को सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समझने की आवश्यकता है। जाति और राजनीतिक नजरिये से नहीं।
'आत्मवत् सर्वभूतेषु।'

7389814071

कुटुम्ब व्यवस्था

( उलझे -अन सुलझे प्रश्न और समाधान के चरण)

समस्या 
डबल बेड कल्चर! 

माता पिता की ता उम्र जवान बने रहने की इच्छा! 

धन और ऐश्वर्य की लालसा! 

समाज में आदर्श का गिरता प्रतिशत!

करनी कथनी में अंतर!

प्रवचनकर्ताओं की धन और काम की तीव्र लालसा!

इकलौती संतान!

अनियंत्रित अधर्माधारित धन का गृहप्रवेश!


समाधान
माता पिता का कठोर संयमित आचरण।

दिखावा, झूठ, प्रपंच से दूरी।

विवाह व्यवस्था पर व्यवसाय को प्राथमिकता नहीं दी जाये।

घर में पठन-पाठन , स्वाध्याय का वातावरण। 

फिर भी अंतिम इच्छा प्रभु की।
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विचार -

सामाजिक सरोकारों में अध्यात्मिकता की प्राणवायु ही व्यक्ति से लेकर समष्टि तक के आत्मानुशासन और आत्मसंयम की कुंजी है।

करणीय - व्यक्तिगत।


पंच परिवर्तन - (व्यक्ति से समाज तक)

(१) शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विकास।

(२)*सत्य-अहिंसा,**अस्तेय- अपरिग्रह, ***शौच -तप,**** स्वाध्याय -ईश्वर प्राणिधान, *****अभ्यास - वैराग्य।

(३) कुटुम्ब बोध, स्वबोध, नागरिकता बोध, राष्ट्र बोध, वैश्विक दृष्टि बोध।

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Thursday, 2 April 2026

गुवाहाटी वि वि रा शि नीति

गुवाहाटी विश्वविद्यालय में NEP 2020 पर कार्यशाला: स्वदेशी ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर मंथन
गुवाहाटी | 17 मार्च, 2026

विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के संयुक्त प्रयासों से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु एक दिवसीय महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसका मुख्य विषय "स्वदेशी ज्ञान परंपरा एवं उभरती प्रौद्योगिकियों के माध्यम से विषयवस्तु विकास" रहा।

प्रमुख बिंदु और चर्चा के विषय
कार्यशाला के दौरान शिक्षा जगत के दिग्गजों ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली में भारतीय मूल्यों को पिरोने पर बल दिया:

सर्वांगीण विकास: मुख्य वक्ता श्री के. एन. रघुनंदन (संगठन मंत्री, विद्या भारती) ने कहा कि नई नीति का आधार भारतीय ज्ञान परंपरा है, जो तकनीक के साथ मिलकर छात्रों का पूर्ण विकास सुनिश्चित करेगी।

अंतराल विश्लेषण (Gap Analysis): डॉ. देवव्रत दास ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली और भविष्य की आवश्यकताओं के बीच के अंतर को पाटने पर तकनीकी सत्र लिया।

उद्योग-शिक्षा सहयोग: प्रो. आलोक बुढ़ागोहाईं ने शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इंडस्ट्री और शिक्षण संस्थानों के बीच तालमेल को अनिवार्य बताया।

परिणाम आधारित शिक्षा: डॉ. दिव्यज्योति महंत ने 'आउटकम बेस्ड एजुकेशन' के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार करने पर मार्गदर्शन दिया।

विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस वैचारिक मंथन में पूर्वोत्तर भारत के कई प्रतिष्ठित शिक्षाविदों ने भाग लिया:

प्रो. ननी गोपाल महंता: कुलपति, गुवाहाटी विश्वविद्यालय (मुख्य अतिथि)
प्रो. नलिनी प्रभा त्रिपाठी: निदेशक, IIM शिलांग
श्री पी.वी.एस.एल.एन. मूर्ति: निदेशक, NEDFi
डॉ. पवन तिवारी: संगठन मंत्री, विद्या भारती पूर्वोत्तर क्षेत्र
प्रो. परिमल भट्टाचार्य: अध्यक्ष, विद्वत परिषद (कार्यक्रम अध्यक्ष)

निष्कर्ष और आगामी योजना
कार्यशाला का समापन भविष्य की कार्ययोजना पर चर्चा और प्रतिभागियों के सुझावों के साथ हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. ईशांकुर सैकिया के स्वागत भाषण और दीप प्रज्वलन से हुई। इस अवसर पर शिशु शिक्षा समिति असम के पदाधिकारियों सहित अनेक विश्वविद्यालयों के आचार्य और छात्र उपस्थित रहे।

सार: यह कार्यशाला इस बात की पुष्टि करती है कि शिक्षा को केवल "साक्षरता" तक सीमित न रखकर उसे व्यवहारिक, संस्कारयुक्त और आधुनिक बनाने के लिए स्वदेशी जड़ों की ओर लौटना और भविष्य की तकनीक को अपनाना अनिवार्य है।
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