Friday, 13 March 2026

साहित्य और विचारधाराएं

जय गुरुदेव!
विचार एक ही है। विद्वान जन उसे अलग-अलग तरह से काल -परिस्थिति के अनुसार व्यवहारिक बना कर रखते हैं।

यद्यपि विचारधारा भी आईडिया का अनुवाद माना गया है। क्योंकि यह शब्द सर्वप्रथम फ्रा़सिसी साहित्यकार, दार्शनिक,विचारक द्वारा इसका प्रयोग अठारहवीं सदी में किया गया है।

भारत में 'विचारधारा' शब्द 19वीं बीसवीं सदी में आलोचना के मंच से आया। जिसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने आगे बढ़ाया।

भारतीय ज्ञान परम्परा में 'विचार' शब्द योग वशिष्ठ में आया है। जहां वशिष्ठ जी श्री राम जी को 'विचार' का महत्व बता रहे हैं।

यह ठीक है कि वैदिक, तमिल-संगम, नास्तिक -लोकायत में यह विचारधारा शब्द विमर्श, तत्व चिंतन और प्रज्ञा प्रवाह या विचार प्रवाह के रूप में आता है।

निहितार्थ इतना की भारतीय ज्ञान परम्परा में ' मैं एक हूं,अनेक होऊं।' पहला विचार (इच्छा) है। यह तब के कई युगों पूर्व का है, जब जम्बूद्वीप ही वैचारिक यज्ञ कुंड का एक मात्र स्थान था।

दूसरा भारत भूमि को ठीक से समझें तो हिमालय में कश्यप, आज की श्रीलंका में मारीच, तमिल में ईसा पूर्व 900 सौ वर्ष पहले तमिल संगम की अध्यक्षता अगस्त्य ऋषि कर रहे हैं। नैमीषारण्य की वैदिक और बौद्धिक चर्चा जन जन को ज्ञात है।
लगभग इसी समय शंकराचार्य -मंडन मिश्र विमर्श चल रहा है।

 नास्तिक विचारधाराओं का उदय भी चार्वाक,ब्राहस्पत्य, तथा जैन और बौद्ध विचारों के साथ आगे बढ़ रहे थे।

आस्तिक धारा दर्शन के रूप में सामने थी।
तमिल-संगम में अहम् और इदम् की चर्चा अर्थात व्यक्ति से समष्ठि का संगम चल रहा था।

भारत की उक्त सभी दर्शनों, मतों, विचारधाराओं, तत्व चिन्तनों के मूल में एक ही तत्व विद्यमान था 'पूर्णता'का।  
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

सार यह कि भारत कल से आज तक पूर्णता में विचार करता है।

अठारहवीं शताब्दी की विचारधारा और उसके बाद के अनेक शब्द - मार्क्सवादी भारत में (1936), गांधीवाद, प्रयोगवाद आदि- आदि जितने भी वाद हैं, सभी अपूर्ण और एकांगी हैं। भौतिकवादी हैं। वहां दर्शन अनुपस्थित है। मार्क्स की राजनीति और आर्थिक विचारधारा से भारत के अर्थ और काम को निकाल देने का परिणाम नक्सलवाद, प्रगतिशीलता बन गयी।

गाधी की सत्य अहिंसा आस्तिक योग की शब्दावली है। सत्य, अहिंसा,अस्तेय योग, वेदांग से लेकर स्मृतियों तक भरा पड़ा है। दुर्भाग्यवश इसे मील की पत्थर की तरह गांधीवाद और गांधी दर्शन बता कर स्वतंत्रता के बाद से छायावाद तक खूब डमरू बजाया। हर विषय गांधी से शुरू और गांधी में खत्म। बाद में राजनीति में तो ब्रह्मास्त्र बन गया।

जैसे 'उतिष्ठत जाग्रत...' उपनिषद् का वाक्य विवेकानंद जी के नाम से शिक्षा संस्थानों में चिपक गया।

विचार करें , हमने साहित्य और शिक्षा को बड़ी चतुराई से वैदिक धारा से काट कर बीसवीं सदी में मील के पत्थरों की तरह गंतव्य बना दिया।

राष्ट्रनीति को राजनीति के तराज़ू में रख कर 'सब धान बाइस पसेरी' कर दिया।

काल मार्स के चिंतन के पहले यदि भारत के चारों पुरुषार्थ की बात बताई जाती तो शायद स्वाधीनता के बाद के साहित्य , शिक्षा और राजनीत के विचारधारा की धार ही कुछ और होती।

विचारधारा जब खंड -खंड में बहती है, तब नदी नालों की तरह तबाही मचाती हैं।

विचारधारा जब पूर्णता में रहती है तो (सुरसरिता) गंगा बनती है, त्रिवेणी बनती है और सभी विचारधाराओं को लेकर सागर रूपी ज्ञान परम्परा में समाहित होकर घाट -घाट में, पाट -पाट में तीर्थ स्थापित करती हैं, जहां संस्कृति वर्धित होती है। धर्म,अर्थ और काम का संतुलन बना रहता है।

दरअसल पूर्णता की दृष्टि ही 'परा' से आती है। यह भारतीय (हिन्दू) परम्परा है। जहां अतिचेतन है। जब कि पश्चिम की यात्रा हमारे लोकायत दर्शन की तरह शरीर और मन में ही समाप्त हो जाती है।

इसका अर्थ यह कतई नहीं की पश्चिम में यह दृष्टि मिलती ही नहीं है। वहां वह क्वचित है तो भारत में वंचित तक में है।

इसलिए विचारधाराओं का साहित्य में प्रवेश तब तक वर्जित नहीं, जब तक वह मानवता के कल्याण के लिए है (पश्चिम की तरह व्यक्तिवादी नहीं), सांस्कृतिक संवर्द्धन के लिए है। राष्ट्रीय चिति -चेतना की पोषक है और उसकी दृष्टि वैश्विक (सर्वेभवन्तु सुखिन:...) है। तुलसी बाबा के शब्दों में लोक-मंगल है, सिया राम मय सम्पूर्ण जगत है। स्व का बोध है। 

आप धर्म को न माने, संस्कृति को न माने, परम्परा को छोड़ दें किंतु आप अपने 'स्व' को नहीं छोड़ सकते , क्योंकि आप जन्म से 'स्व' को लेकर आते हैं। अन्यथा बच्चे के पैदा होते ही उसका बोध मां के दूध में समाप्त हो जाता, संतुष्ट हो जाता।

किंतु ऐसा होता नहीं। तब वह भौतिक व्यवस्था को प्राप्त करने के बाद भी 'स्व' की तलाश करता हुआ उसी 'एकोऽहम द्वितीयो नास्ति' तक जाने का प्रयत्न नहीं करता और न ही मार्क्सवादी, गांधीवादी, लेनिन वादी, जनवादी, प्रगति वादी की घोषणा ही कर सकता!

इसलिए 'पूर्णता में देखना भारतीय विचार धारा' जीवन के हर क्षेत्र में नितांत आवश्यक है। 

आखिर जो साहित्य में विचाराधाराओं का विरोध करते हैं उनकी भी तो अपनी एक विचारधारा है, अन्यथा उन्हें विचारधारा की समझ ही कैसे होती?

भारतीय विचारधारा का नाम समन्वय है, सौहार्द है, लोक कल्याण है। इसका स्वरूप अखंड मंडलाकार है।
सादर धन्यवाद 
मुक्तिबोध पीठ के कार्यक्रम में यह मेरे वक्तव्य का सार है।
13/02/26
भोपाल 

1 comment:

  1. बहुत सुविचारित वक्तव्य के लिए हार्दिक बधाई।

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