Monday, 9 March 2026

चार -राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक विचारधाराएं

चार) राजनीतिक , आर्थिक तथा सामाजिक विचारधाराएँ: स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके ठीक पहले, पश्चिमी और भारतीय राजनीतिक विचारों ने साहित्य का ढांचा बदल दिया। (i) मार्क्सवाद / प्रगतिवाद: 1936 में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना के साथ हिंदी साहित्य में मार्क्सवाद का प्रवेश हुआ। इसने साहित्य को ‘महलों’ से निकालकर ‘खेत-खलिहानों’ तक पहुँचाया। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल ने शोषक बनाम शोषित के संघर्ष को अपनी लेखनी का आधार बनाया। (ii) राष्ट्रीयता : ‘माखनलाल चतुर्वेदी’(पुष्प की अभिलाषा) और 'सुभद्रा कुमारी चौहान' जैसे कवियों ने वीर रस के माध्यम से स्वाधीनता की अलख जगाई। यह विचारधारा 'स्वराज' की प्राप्ति को ही साहित्य का परम लक्ष्य मानती थी। (iii) मनोविश्लेषणवाद :जैनेंद्र और अज्ञेय जैसे लेखकों पर फ्रायड के विचारों का प्रभाव पड़ा। यहाँ समाज के बजाय व्यक्ति के 'अचेतन मन' और उसकी दमित इच्छाओं का विश्लेषण प्रमुख हो गया।

                                       ....................................

 



 



साहित्य कि विचारधाराएँ



विषय व्यापक और गंभीर है । कुछ प्रश्न हैं , (i) भारतीय वांग्मय की विचारधाराएं ? साहित्य की विचारधाराएं या हिंदी साहित्य की विचारधाराएं ? स्वतंत्रता के बाद के साहित्य की विचारधाराएं ? या स्वतंत्रता के पूर्व की विचारधाराएं ? (ii) साहित्य का काल-खंड कहाँ से देखा जाएं ? वैदिक काल से? रामायण को आधार बनाकर ? व्यास को, कालिदास या भवभूति को ? हिंदी साहित्य के काल विभाजन के आधार पर या दशकों के आधार पर ?



दरअसल भारतीय साहित्य का पहला विचार- 



(एक) पहला दार्शनिक विचार- (1) ऋग्वेद (मण्डल 1, सूक्त 164, मंत्र 46) में कहा गया है-



इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुःअथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।



एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥



ज्ञानी लोग एक ही सत्य (परम तत्व) को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। कोई उसे इन्द्र, कोई मित्र, कोई वरुण, कोई अग्नि कहते हैं; उसी को कोई यम और कोई मातरिश्वा (वायु) कहता है। -सत्य एक है, परंतु ज्ञानी उसे अनेक नामों से कहते हैं। यह वैदिक परम्परा का मूल दार्शनिक विचार माना जाता है कि ‘सृष्टि के पीछे एक ही परम सत्ता है’, भले ही उसे अलग-अलग रूपों में समझा जाए।* एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति> सत्य एक है, पर नाम अनेक > ईश्वर की एकता।





(2) यह विचार किसे आया? वैदिक परम्परा के अनुसार यह विचार किसी एक मनुष्य द्वारा बनाया हुआ नहीं माना जाता। * वेद “अपौरुषेय” माने जाते हैं, अर्थात् वे किसी मनुष्य की रचना नहीं हैं। ** प्राचीन ऋषियों ने गहन ध्यान और तपस्या में इन सत्यताओं का “श्रवण” या “दर्शन” किया। **इसलिए उन्हें “मन्त्रद्रष्टा ऋषि” कहा जाता है, रचयिता नहीं।



उदाहरण के रूप में कई ऋषियों के नाम मिलते हैं, जैसे - ऋषि वशिष्ठ। ऋषि विश्वामित्र। ऋषि अत्रि। ऋषि भारद्वाज। इन ऋषियों ने वेदों के मन्त्रों का अनुभव किया और उन्हें परम्परा में प्रकट किया। संक्षेप में: वैदिक परम्परा का पहला विचार * ‘एक परम सत्य ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति।’ यह किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं, बल्कि ‘ऋषियों द्वारा अनुभूत अपौरुषेय ज्ञान’ माना जाता है।





(दो) वैदिक और उपनिषदिक परम्परा: इसमें कहा गया है कि जब केवल ब्रह्म (परमात्मा) ही था, तब उसने विचार कर संकल्प किया , इसी संकल्प से सृष्टि की रचना मानी जाती है। वह विचार संकल्प के रूप में ‘परा’ से प्रकट हुआ और पश्यन्ति से अनुभूत होता हुआ ‘वैखरी’ में व्यक्त हुआ। * एकोऽहम् बहुस्याम् > मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ > सृष्टि की उत्पत्ति। यहाँ तीन सूक्त इसकी पुष्टि करते हैं -



तीन सूक्त : (i) पुरुष सूक्त> (ऋग्वेद 10.90) का मंत्र इस प्रकार है-



सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।



स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥



  : उस विराट पुरुष (परमात्मा) के हजार सिर, हजार नेत्र और हजार चरण हैं। वह सम्पूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त करके उससे भी दस अंगुल ऊपर (अर्थात उससे परे) स्थित है। यह मंत्र विराट पुरुष (सर्वव्यापी ब्रह्म) की व्यापकता और सर्वव्यापक स्वरूप को प्रकट करता है। इसी एक महापुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष) से सम्पूर्ण सृष्टि बनी। उसके यज्ञ से- *देवता, प्राणी और प्रकृति बने। *समाज की चार वर्ण व्यवस्था का प्रतीकात्मक वर्णन भी मिलता है।



(ii) हिरण्यगर्भ सूक्त > (ऋग्वेद 10.121) – सृष्टि का प्रथम कारण यह (हिरण्यगर्भ सूक्त) का प्रथम मंत्र है। पूरा मंत्र इस प्रकार है-



हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।



स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥



यह सूक्त सृष्टि के मूल कारण और परम सत्ता के बारे में गहन वैदिक चिंतन प्रस्तुत करता है। यहाँ कहा गया है कि प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ (स्वर्ण अंड/कॉस्मिक एम्ब्रियो) प्रकट हुआ।

No comments:

Post a Comment