Friday, 31 October 2025

maadhavi माधवी महाभारत

 

 

उपन्यास कर्म से तपोवन तक की भाषा, शैली, संवाद, पात्र पर समीक्षकों ने विस्तार से चर्चा की है। उस पर मुझे कोई टिप्पणी नहीं करना है।

यहां कथा वस्तु और लेखिका के प्रश्नों पर मैं बात करूंगा, जो सामान्य पाठक के साथ साहित्यकार के लिए भी बहुत आवश्यक हैं।

यहां बता दूं भीष्म साहनी का माधवी और वीणा सिन्हा का 'पथ प्रज्ञा ' पहले से काफी चर्चा में हैं। किंतु भीष्म साहनी ने 'उपवन' के मार्मिक'  प्रसंग को नहीं छुआ तो वीणा सिन्हा ने भी भाषा की सांस्कृतिक संरचना में ठीक सर्जनात्मक उपयोग नहीं कर सकीं। माधवी पर तमिल में भी एक उपन्यास 'नित्यकन्नि' (नित्यकन्या) है।

महाभारत के उद्योग पर्व के अन्तर्गत १० उपपर्व हैं और इसमें कुल १९६ अध्याय हैं । १९६ अध्यायों में से अध्याय १०६ से १२३ के बीच माधवी और गालव की अंतरंगता की कथा आती है , जो इस उपन्यास का आधार है,  ऐसा लेखिका का कथन है।

वे लिखती हैं माधवी को लिखते हुए मैं स्त्री को जी रही थी। अनदेखे पहलुओं को जी रही थी, उसके दुर्भाग्य को जी रही थी।

 लेखिका ने बताया कि कथा का सूत्र गालव की उस योजना में मिलता है जहां गालव माधवी को तीन-तीन राजाओं के पास एक- एक साल के लिए रखतें हैं। अंत तक गालव और माधवी अन्तरंग हो गए और उनके शारीरिक सम्बन्ध हो गए। 

लेखिका ने ययाति के बारे में लिखा कि उन्हें श्राप था की युवा अवस्था में वे वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाए और उन्होंने पुरु से जवानी मांग ली (लेखिका को पुरु की अपने पिता के प्रति जवानी दान करने  की त्याग और दानशीलता की वृति क्यों नजर नहीं आई ? वह यह भी कैसे भूल गईं की माधवी यहाँ दायित्व निर्वहन करनेवाली, कर्तव्य परायण, त्यागी और सेवाभावी नारी है ।

 और उन्हें ययाति की पुत्री का अपने पिता की इक्षा पालन के लिए गालव के साथ जाना अन्याय लगा? 

उन्हें माधवी की यह बात तो याद है की उसे चिर कुमारी का वरदान प्राप्त है किन्तु यह विस्मरण हो गया की उसे तीन यशस्वी राजकुमार भी इस संसार को देने का वरदान प्राप्त था !) 

महाभारत की ऐसी तमाम कथाओं, घटनाओं और प्रसंगों के हर बार नए अर्थ खुलते हैं। दुर्वासा का कुंवारी कुन्ती को वरदान स्वरूप मंत्र क्यों देते हैं? औचित्य बहुत बाद में पांडु की मृत्यु के बाद समझ आता है। अम्बिका,अंबालिका से व्यास का विनियोग?

लेखिका ने यह तो कह दिया की विश्वमित्र कामांध थे और उन्होंने तप से काम को नहीं जीता किन्तु वह भूल गई की गालव उनका ही शिष्य था जो अपने गुरु की आज्ञा के लिए संसार की लोक उपेक्षा की परवाह किये बिना ८०० घोड़ों की प्राप्ति के लिए माधवी को ययाति की इस युक्ति को स्वीकार करता है ?

यद्यपि इसका एक समाधान शांति पर्व में (227/31) में मिलता है-

न विद्या न तपो दानं न मित्राणि न बांधवा।

शक्नुवन्ति परित्रातु नरं कालेन पीड़ितम्।।

काल की मार में उक्त कोई बात काम नहीं आती।

 जब उपन्यासकार वरदान और श्राप को स्वीकार करता है तब उसे दैवी विधान क्यों स्मरण नहीं रहता की युग में यह होना ही था?

     खैर, जिस महाभारत से यह कथानक उठाया गया है, उसमें तो ऐसे अनेक प्रसंग बार-बार आये हैं। माना जाता है जो ज्ञान महाभारत में नहीं है, वो ज्ञान संसार में कहीं नहीं है। महाभारत में जीवन से जुड़ी कई बातें हैं जो हमें आधुनिक जीवन में भी काम आ सकती है। 

महाभारत युद्ध के बाद शांति पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को जो ज्ञान दिया उसे आज भी राजनीति और सामाजिक मामलों का सबसे बेहतर ज्ञान माना जाता है । 

वस्तुत: काल कभी खण्डों में नहीं जीता वह निरंतर चलता है और उसमें पात्र आते हैं और अपनी लीला करके चले जाते हैं , इतिहास की इन्हीं घटनाओं से कल्पना कर साहित्यकार साहित्य की रचना करता है ।

 किन्तु जब अतीत की घटनाओं को चक्रीय काल की निरंतरता में वर्तमान को तलाशा जाता है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि उसके यथार्थ को अपने कल्पना में लेते समय तत्कालीन यथार्थ में भी कुछ कल्पना रही होगी, विस्मरण नहीं किया जा सकता।

    लेखिका को ययाति पर क्रोध है कि उसने अपनी पुत्री को एक जवान गालव को सौप दिया और उसकों तीन-तीन राज्यों को पुत्र देने के लिए बाध्य किया।

और यहाँ एक विशेष बात यह है कि लेखिका को यह बात तो बुरी लगी कि  ययाति अपने ख्याति के लिए अपनी पुत्री का जीवन नष्ट कर दिया और यह भी कह दिया की बेचारी माधवी को कभी न तो पुराणों में स्थान मिलेगा और न इतिहास में याद किया जाएगा। 

अब लेखिका अपने ही विचार या दृष्टिकोण पर चिंतन करें कि यदि माधवी को पुराणों ने भुला दिया होता और इतिहास न स्मरण रखता तो उन्हें आप कैसे उपन्यास का केंद्र बिंदु बनाते। 

दूसरी बात आपको देह का समर्पण याद है किन्तु तीन-तीन बड़े इतिहास पुरुषों की माता होने का जो गौरव माधवी को इतिहास और महाभारत जैसे गर्न्थों में प्राप्त है, क्या वह केवल स्त्री के शोषण का विषय बन सकता है? 

क्या वेदव्यास जैसा ऋषि केवल काम वासना और स्वच्छंद यौनाचार को बताने के लिए उस गालव को पात्र बनाया है जो ऋषि परम्परा में आते हैं।

वस्तुत भारतीय ज्ञान परम्परा पर कलम चलाने के पहले उसके पक्ष को समझना होगा । वेदव्यास जैसा ऋषि माधवी और गालव को महाभारत में लाता ही इसलिए है कि इतिहास उनका ऋणी रहे न की उनके वासना में स्वयं गोता लगाये और पाठकों के मन मस्तिष्क को भी कुंठित करे।

      लेखिका का मन इसलिए उद्वेलित है कि माधवी अपनी पीड़ा का प्रतिकार क्यों नहीं कराती ? मैं पूछना चाहता हूं की क्या माधवी एक सामान्य स्त्री है ?

 क्या वह किसी विशिष्ट जीवन दर्शन , अप्सरा की कन्या (अप्सरा देवलोक की नृत्यांगनायें हैं। इनमें से प्रमुख हैं उर्वशी, रम्भा और मेनका आदि कुल 11 अप्सराये हैं ।) की प्रतिनिधि नहीं है ? 

शब्दों के साथ खेलना साहित्यकार का काम है किन्तु शब्द के कुल गोत्र को समझे बिना नहीं।  लेखिका ने स्व- कथन में लिखा है कि विश्वमित्र गुरु ही नहीं, एक ऐसे तपस्वी थे जो काम को जीत नहीं पाए । कामंधता में ही उन्होंने अप्सरा मेनका से सम्बन्ध बनाए और माधवी को भी प्रेरित किया ! 

मैं समझता हूँ कि लेखिका कि यह सबसे बड़ी कमजोरी है कि उन्होंने दर्शन की भूमि को अपने लौकिक चिंतन में ढालने का प्रयास किया।  

क्या लेखिका के अनुसार इस बात को माना जाये की हर्यश्च, उशीनर और दिविदास ने अपनी काम वासना के लिए माधवी का उपयोग किया या चक्रवर्ती राजाओं  का जन्म  कारण था ? क्या शिवी के हम भुला सकते हैं ।

भारत को समझाने के लिए भारत का दृष्टिकोण चाहिए। भारतीय वांग्मय में वेद, श्रुतियां, महाभारत, रामायण आदि स्वत: प्रमाण हैं। जैसे आंख स्वत: प्रमाण है, कान स्वत: प्रमाण है। आंख का काम कान नहीं कर सकता और न ही कान का काम आंख।

ययाति यदि एक पिता है तो वे एक विशिष्ट जीवन के प्रतिनिधि भी हैं। एक ओर हम गालव को ऋषि कहते है, ययाति को राजा कहते हैं , माधवी को वरदानी कन्या मानते हैं तो उसके बीच हमारी दैहिक पाश्विचात्य विमर्श की सोच कहाँ से जागृत हो उठती है।

      भारत के जीवन दर्शन को देखेंगे तो पाएंगे की यहाँ सदा से हर व्यक्ति दो जीवन एक साथ जीते हैं एक - भौतिक जीवन , दूसरा अध्यात्मिक जीवन।

 भगवान् श्रीकृष्ण ने उसी महभारत के अंश श्रीमद्भागवद गीता में कहा है ।

लेखिक के कुछ प्रश्न हैं - 

क्या तप स्वार्थ सीद्धि के लिए किया जाता है ? 

यदि हाँ तो सतयुग में तप को क्यों उत्कृष्ट कहा गया है ? 

क्यों तपस्वियों का पेट उनके शिष्यों की भिक्षा वृति से भरा गया ? 

क्यों तपस्या ने काम पर विजय नहीं पाई ? 

बड़े महत्वपूर्ण प्रश्न हैं (किन्तु न समझी के )। इसके लिए मैं लेखिका से अनुरोध करूँगा की थोड़ा भारतीय ज्ञान परम्परा को अवश्य पढ़ें । 

आज योग का बड़ा नाम है । उसमें अष्टांग योग का भी । उसके दूसरे अंग नियम में पञ्च बातें कही गई हैं  - शौच, संतोष , तप , स्वाध्याय, और इश्वर प्रणिधान । 

तप को उसी महाभारत (गीता ) में तीन प्रकार से बताया गया है - शरीर तप, मन और वाणी का तप । 

श्रीमाद्भाग्वद गीता में तेरहवें अध्याय में सातवें से ग्यारहवें श्लोक तक जो ज्ञान के बीस साधनों का वर्णन आया है, उनमें भी शारीरिक तप के तीन लक्षण- शौच, आर्जव और अहिंसा तथा मानसिक तप के दो लक्षण- मौन और आत्मविनिग्रह आये हैं।

 ऐसे ही सोलहवें अध्याय में पहले से तीसरे श्लोक तक जो दैवी सम्पत्ति के छब्बीस लक्षण बताये गये हैं, उनमें भी शारीरिक तप के तीन लक्षण -शौच, अहिंसा और आर्जव तथा वाचिक तप के दो लक्षण- सत्य और स्वाध्याय आये हैं। 

इन्ही सब को एक साथ  17/17-18-19 में 'श्रद्धया परया तप्तम्' - शरीर, वाणी और मन के  तप को इस प्रकार बताया गया है-

 देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌ ।ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥

 ईश्वर, ब्राह्मण, गुरु, माता, पिता के समान पूज्यनीय व्यक्तियों का पूजन करना, आचरण की शुद्धता, मन की शुद्धता, इन्द्रियों के विषयों के प्रति अनासक्ति और मन, वाणी और शरीर से किसी को भी कष्ट न पहुँचाना, शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है। 

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌ । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते ॥

-किसी को भी कष्ट न पहुँचाने वाले शब्द बोलना, सत्य वोलना, प्रिय लगने वाले हितकारी शब्द वोलना और वेद-शास्त्रों का उच्चारण द्वारा अध्यन करना, वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है। 

मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भाव संशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ 

   तुलसी बाबा ने तो तप को सृष्टि का आधार ही बताया है तो हम अपने ऋषियों , मुनियों और महापुरुषों के जीवन के निमित्त को बिना समझे कैसे कह सकते हैं की तप निजी स्वार्थ के लिए किया जाता है ?

 यदि हम माधवी के साथ जितने भी पात्र जुड़े हैं, उनके जीवन को देखें तो क्या किसी का जीवन व्यक्तिगत हित के लिए है ?

 अन्यथा यदि लोक हित न होता तो क्या ययाति जैसा पिता अपनी पुत्री को ऐसे ही गालव को समर्पित कर देता ?

 क्या कभी हमें ८०० घोड़ो के निमित्त को समझाने का प्रयास किया ? 

दूसरा सतयुग में ही नहीं हर युग में तप को उत्कृष्ट कहा गया है, चाहे द्वापर हो या कृतयुग या कलयुग ।

दुर्वाषा की तपस्या क्या क्रोध के कारण निर्मूल हो जाएगी ? परशुराम की तपस्या को फिर क्या मानेगें ? तात्पर्य यह कि तप को सीमित अर्थ में देखना उचित नहीं है   

    जहाँ तक तपस्वियों के पेट भरने का प्रश्न है उसके पीछे का कारण शिष्य को समाज से जोड़ने , उसके सुख दुःख को समझने का एक मार्ग था। वह  प्रशिक्षण का एक अंग था , अन्यथा चक्रवर्ती राजा के पुत्र राम को गुरु की सेवा नहीं करनी पड़ती । 

यदि भिक्षा वृति नहीं होती तो शंकराचार्य जैसा आचार्य आप के पास होता?

 जहाँ तक तपस्या और काम का सम्बन्ध है उसे ठीक से समझने की आवश्यकता है । काम और काम वासना में अंतर है । दूसरा निमित्त से संतानोपत्ति वासना का अंग नहीं हो सकती । 

अन्यथा जिस महाभारत की कथा को लेकर आप उपन्यास लिख रही है वह महाभारत ही नहीं होता। पंडू और कौरब ही नहीं होते, व्यास ही नहीं होते ।

 इसलिए भारतीय पौराणिक आख्यानों पर कलम चलाने के पहले अपने को तमाम वसनाओं, कुंठाओं से अपने को ऊपर रखना होगा ।

तपस्या करके ही तपस्या , आत्मसमर्पण, बलिदान की सार्थकता को समझा जा सकता है और उसके प्रश्नों के उत्तर को पाया जा सकता है ।

 हमें बुलाने और सुनने के लिए धन्यवाद।

 

Sunday, 26 October 2025

आरक्षण की प्रकृति और प्रवृत्ति



दरअसल आरक्षण सुरसा का मुंह है।

 यह यक्ष और राक्षस की दुरभिसंधि से उपजी ऐसी व्याधि है,जो मंत्र -तंत्र भी करता है,यज्ञ हवन भी। 

वह कुवेर का धन भी चहता है। और दसमुखी पराक्रम भी।

पुष्पक विमान भी, और त्रिदेवों का आश्वासन और आशीर्वाद भी।

सत्ता लोक भी, सुरक्षित अमरत्व का कवच भी।

बस इस बात को अपने अहंकार में भूल जाता है कि दोनों सहोदर हैं।

संतोष, सात्विकता की चादर ओढ़ना और बात है। संतुष्ट होकर सात्विकता के साथ प्राप्त को अंगीकार करना दूसरी बात है।

खेलता इंद्र है। मौन सरस्वती मतिभ्रम पैदा करने को बाध्य है।

इंद्र घातक है।उसकी प्रवृत्ति श्वान की है। उसकी चेष्टा काग की और निष्ठा स्वार्थ की।

यही मूल है। 

मूक हैं तो महाकाल! हस्त बद्ध हैं तो ब्रह्मा और शेषशैय्या पर चिरपरिचित मुस्कान के साथ भविष्य को देखते विष्णु।

आरक्षण कभी आर्थिक आधार लेकर सामने आता है,तो कभी सामाजिक समता और सामाजिक सम्मान को लेकर।

परम्परा कहती है, आर्थिक आधार जाति पर सीमित नहीं है। समानता गुण धर्म की बराबरी पर होती है। सम्मान मांगा और खरीदा नहीं जा सकता। अर्जित किया जाता है।

ताली सम्मान की हो या सामाजिक बराबरी की एक हाथ से नहीं बजती। हृदय धन,बल,मान से नहीं मिलता, उसके लिए दोनों तरफ से प्रेम का रस बरसना चाहिए।

 छल,बल, सत्ता दिलाती है। गरीब का जातीय अहंकार स्कालरशिप या पांच किलो चावल और गेहूं, शक्कर से तुष्ट नहीं होता। उसके स्वाभिमान की रक्षा करनी होगी, वह कृपा से नहीं, निर्हेतुक सेवा भाव से ही बोध हो सकती है।

उसे प्रतिशत में बांटकर या जितनी जिसकी जाति बड़ी,उतनी उसकी हिस्सेदारी देकर संतुष्ट नहीं किया जा सकता।

अमीर अपनी जातीय श्रेष्ठता पीढ़ी- दर- पीढ़ी स्थापित किए रहना चाहता है।

नव धनाढ्य दोनों को रौंद कर अपने केतु के लिए दुराग्रही होता जाता है।

ऐसे में प्याज के समान सुन्दर समाज कट-फट कर छिलका दर छिलका राजनीति की बलि चढ़ता जा रहा है।

इधर राजनीतिक और मतांतरण के उद्योग में लगा मुल्ला उस प्याज को कुछ ज्यादा चटखारे के साथ खाने पर तुला है।

समाजिक सरोकार, समरसता, समानता के शिल्पकारों की छेनी -हथौड़ी जब तक एक स्वरूप गढ़ती है, आरक्षण की सुरसा अपना रूप और आकार बदल चुकी होती है। 

बचता है केले का सनातनी विलाप करता कंद। जिसके तने को काट कर उसको उधेड़ दिया गया है। 

फिर भी समझिए वही तोरण बन आगत के स्वागत के लिए खड़ा है। छली इद्र की पूजा के लिए। 🙏

तुष्टिकरण समस्या है, स्वबोध का जागरण समाधान । 
दीपावली की शुभकामनाएं 

14/10/2025

Tuesday, 7 October 2025

षट्चक्रों का स्वरूप

 

षट्चक्रों का स्वरूप

  

कुण्डलिनी की शक्ति के मूल तक पहुँचने के मार्ग में छ: फाटक हैं अथवा यों कहना चाहिए कि छ: ताले लगे हुए हैं। यह फाटक या ताले खोलकर ही कोई जीव उन शक्ति- केन्द्रों तक पहुँच सकता है। इन छ: अवरोधों को आध्यात्मिक भाषा में षट्चक्र कहते हैं।

सुषुम्ना के अन्तर्गत रहने वाली तीन नाडिय़ों में सबसे भीतर स्थित ब्रह्मनाड़ी से वह छ: चक्र सम्बन्धित हैं। माला के सूत्र में पिरोये हुए कमल- पुष्पों से इनकी उपमा दी जाती है।

 मूलाधार चक्र योनि की सीध में, स्वाधिष्ठान चक्र पेडू की सीध में, मणिपुर चक्र नाभि की सीध में, अनाहत चक्र हृदय की सीध में, विशुद्ध चक्र कण्ठ की सीध में और आज्ञा चक्र भृकुटि के मध्य में अवस्थित है। उनसे ऊपर सहस्रार है।

सुषुम्ना तथा उसके अन्तर्गत आने वाली चित्रणी आदि नाडिय़ाँ इतनी सूक्ष्म हैं कि उन्हें नेत्रों से देख सकना कठिन है। फिर उनसे सम्बन्धित यह चक्र तो और भी सूक्ष्म हैं।

 किसी शरीर को चीर- फाड़ करते समय इन चक्रों को नस- नाडिय़ों की तरह स्पष्ट रूप से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि हमारे चर्मचक्षुओं की वीक्षण शक्ति बहुत ही सीमित है। शब्द की तरंगें, वायु के परमाणु तथा रोगों के कीटाणु हमें आँखों से दिखाई नहीं पड़ते, तो भी उनके अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता।

 इन चक्रों को योगियों ने अपनी योग दृष्टि से देखा है और उनका वैज्ञानिक परीक्षण करके महत्त्वपूर्ण लाभ उठाया है और उनके व्यवस्थित विज्ञान का निर्माण करके योग- मार्ग के पथिकों के लिए उसे उपस्थित किया है।

षट्चक्रएक प्रकार की सूक्ष्म ग्रन्थियाँ हैं, जो ब्रह्मनाड़ी के मार्ग में बनी हुई हैं। इन चक्र- ग्रन्थियों में जब साधक अपने ध्यान को केन्द्रित करता है, तो उसे वहाँ की सूक्ष्म स्थिति का बड़ा विचित्र अनुभव होता है। वे ग्रन्थियाँ गोल नहीं होतीं, वरन् उनमें इस प्रकार के कोण निकले होते हैं, जैसे पुष्प में पंखुडिय़ाँ होती हैं। इन कोष या पंखुडिय़ों को पद्मदलकहते हैं। यह एक प्रकार के तन्तु- गुच्छक हैं।

इन चक्रों के रंग भी विचित्र प्रकार के होते हैं, क्योंकि किसी ग्रन्थि में कोई और किसी में कोई तत्त्व प्रधान होता है। इस तत्त्व- प्रधानता का उस स्थान के रक्त पर प्रभाव पड़ता है और उसका रंग बदल जाता है। पृथ्वी तत्त्व की प्रधानता का मिश्रण होने से गुलाबी, अग्नि से नीला, वायु से शुद्ध लाल और आकाश से धुमैला हो जाता है। यही मिश्रण चक्रों का रंग बदल देता है।

 चक्रों में होता हुआ प्राण वायु आता- जाता है, उसका मार्ग उस ग्रन्थि की स्थिति के अनुसार कुछ टेढ़ा- मेढ़ा होता है। इस गति की आकृति कई देवनागरी अक्षरों की आकृति से मिलती है, इसलिए वायु मार्ग चक्रों के अक्षर कहलाते हैं।

प्राण वायु का सुषुम्ना प्रवाह इन चक्रों में होकर द्रुतगति से गुजरता है, तो वहाँ एक प्रकार से सूक्ष्म भँवर पड़ते हैं जिनकी आकृति मूलाधार में चतुष्कोण, स्वाधिष्ठान में अर्धचन्द्राकार, मणिपुर में त्रिकोण, हृदय चक्र-अनाहत में षट्कोण, विशुद्ध -गोलाकार, आज्ञा चक्र में लिङ्गकार तथा सहस्त्रसार में पूर्ण चन्द्राकार बनती है। 

अग्नि जब भी जलती है, उसकी लौ ऊपर की ओर उठती है, जो नीचे मोटी और ऊपर पतली होती है। इस प्रकार अव्यवस्थित त्रिकोण- सा बन जाता है। इस प्रकार की विविध आकृतियाँ वायु प्रवाह से बनती हैं। इन आकृतियों को चक्रों के यन्त्र कहते हैं।

शरीर पंचतत्त्वों का बना हुआ है। इन तत्त्वों के न्यूनाधिक सम्मिश्रण से विविध अंग- प्रत्यंगों का निर्माण कार्य, उनका संचालन होता है। जिस स्थान में जिस तत्त्व की जितनी आवश्यकता है, उससे न्यूनाधिक हो जाने पर शरीर रोगग्रस्त हो जाता है।

 तत्त्वों का यथास्थान, यथा मात्रा में होना ही निरोगिता का चिह्न समझा जाता है। चक्रों में भी एक- एक तत्त्व की प्रधानता रहती है। जिस चक्र में जो तत्त्व प्रधान होता है, वही उसका तत्त्व कहा जाता है।

ब्रह्मनाड़ी की पोली नली में होकर वायु का अभिगमन होता है, तो चक्रों के सूक्ष्म छिद्रों के आघात से  हर चक्र के एक सूक्ष्म छिद्र में वंशी के स्वर- छिद्र की सी प्रतिक्रिया होने के कारण स, रे, , म जैसे स्वरों की एक विशेष ध्वनि प्रवाहित होती है, जो- लॅ-मूलाधार,  वॅ- स्वाधिष्ठान, रँ -मणिपुर, यॅ-अनाहत, हँ -विशुद्ध, शॅ-आज्ञा और विंदुविसार -सहस्त्रधार में ॐ जैसे स्वरों में सुनाई पड़ती है, इन्हें चक्रों के बीज कहते हैं।

चक्रों में वायु की चाल में अन्तर होता है। जैसे वात, पित्त, कफ की नाड़ी कपोत, मण्डूक, सर्प, कुक्कुट आदि की चाल से चलती है। उस चाल को पहचान कर वैद्य लोग अपना कार्य करते हैं। उसी तरह तत्त्वों के मिश्रण से टेढ़ा- मेढ़ा मार्ग, भँवर, बीज आदि के समन्वय से प्रत्येक चक्र में रक्ताभिसरण, वायु अभिगमन के संयोग से एक विशेष चाल वहाँ परिलक्षित होती है।

 यह चाल किसी चक्र में हाथी के समान मन्दगामी, किसी में मगर की तरह डुबकी मारने वाली, किसी में हिरण की- सी छलाँग मारने वाली, किसी में मेढक़ की तरह फुदकने वाली होती है। उस चाल को चक्रों का वाहन कहते हैं।

इन चक्रों में विविध दैवी शक्तियाँ सन्निहित हैं। उत्पादन, पोषण, संहार, ज्ञान, समृद्धि, बल आदि शक्तियों को देवता विशेषों की शक्ति माना गया है अथवा यों कहिये कि ये शक्तियाँ ही देवता हैं।

 प्रत्येक चक्र में एक पुरुष वर्ग की उष्णवीर्य और एक स्त्री वर्ग की शीतवीर्य शक्ति रहती है, क्योंकि धन और ऋण, अग्नि और सोम दोनों तत्त्वों के मिले बिना गति और जीव का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता। यह शक्तियाँ ही चक्रों के देवी- देवता हैं।

पंचतत्त्वों के अपने- अपने गुण होते हैं। पृथ्वी का गन्ध, जल का रस, अग्रि का रूप, वायु का स्पर्श और आकाश का गुण शब्द होता है। चक्रों में तत्त्वों की प्रधानता के अनुरूप उनके गुण भी प्रधानता में होते हैं। यही चक्रों के गुण हैं।

यह चक्र अपनी सूक्ष्म शक्ति को वैसे तो समस्त शरीर में प्रवाहित करते हैं, पर एक ज्ञानेन्द्रिय और एक कर्मेन्द्रिय से उनका सम्बन्ध विशेष रूप से होता है। सम्बन्धित इन्द्रियों को वे अधिक प्रभावित करते हैं। चक्रों के जागरण के चिह्न उन इन्द्रियों पर तुरन्त परिलक्षित होते हैं। इसी सम्बन्ध विशेष के कारण वे इन्द्रियाँ चक्रों की इन्द्रियाँ कहलाती हैं।

देव शक्तियों में डाकिनी, राकिनी, शाकिनी, हाकिनी आदि के विचित्र नामों को सुनकर उनके भूतनी, चुड़ैल, मशानी जैसी कोई चीज होने का भ्रम होता है, वस्तुत: बात ऐसी नहीं है। 

मुख से लेकर नाभि तक चक्राकार से लेकर तक के समस्त अक्षरों की एक ग्रन्थिमाला है, उस माला के दानों को मातृकायेंकहते हैं।

 इन मातृकाओं के योग- दर्शन द्वारा ही ऋषियों ने देवनागरी वर्णमाला के अक्षरों की रचना की है। चक्रों के देव जिन मातृकाओं से झंकृत होते हैं, सम्बद्ध होते हैं, उन्हें उन देवों की देवशक्ति कहते हैं।

 ड, , , , , के आगे आदि मातृकाओं का बोधक किनीशब्द जोडक़र राकिनी, डाकिनी बना दिये गये हैं। यही देव शक्तियाँ हैं।

 छहों चक्रों का परिचय इस प्रकार है

मूलाधार चक्र-स्थान- योनि (गुदा के समीप)। दल- चार। वर्ण- लाल। लोक- भू:लोक। दलों के अक्षर- वँ, शँ, षँ, सँ। तत्त्व- पृथ्वी तत्त्व। बीज- लँ। वाहन- ऐरावत हाथी। गुण- गन्ध। देवशक्ति- डाकिनी। यन्त्र- चतुष्कोण। ज्ञानेन्द्रिय- नासिका। कर्मेन्द्रिय- गुदा। ध्यान का फल- वक्ता, मनुष्यों में श्रेष्ठ, सर्व विद्याविनोदी, आरोग्य, आनन्दचित्त, काव्य और लेखन की सामर्थ्य।

स्वाधिष्ठान चक्र-स्थान- पेडू (शिश्न के सामने)। दल- छ:। वर्ण- सिन्दूर। लोक- भुव:। दलों के अक्षर- बँ, भँ, मँ, यँ, रँ, लँ। तत्त्व- जल तत्त्व। बीज- बँ। बीज का वाहन- मगर। गुण- रस। देव- विष्णु। देवशक्ति- डाकिनी। यन्त्र- चन्द्राकार। ज्ञानेन्द्रिय- रसना। कर्मेन्द्रिय- लिङ्गं। ध्यान का फल- अहंकारादि विकारों का नाश, श्रेष्ठ योग, मोह की निवृत्ति, रचना शक्ति।

मणिपूर चक्र-स्थान- नाभि। दल- दस। वर्ण- नील। लोक- स्व:। दलों के अक्षर- डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं। तत्त्व- अग्रितत्त्व। बीज- रं। बीज का वाहन- मेंढ़ा। गुण- रूप। देव- वृद्ध रुद्र। देवशक्ति- शाकिनी। यन्त्र- त्रिकोण। ज्ञानेन्द्रिय- चक्षु। कर्मेन्द्रिय- चरण। ध्यान का फल- संहार और पालन की सामर्थ्य, वचन सिद्धि।

अनाहत चक्र- स्थान- हृदय। दल- बारह। वर्ण- अरुण। लोक- मह:। दलों के अक्षर- कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं। तत्त्व- वायु। देवशक्ति- काकिनी। यन्त्र- षट्कोण। ज्ञानेन्द्रिय- त्वचा। कर्मेन्द्रिय- हाथ। फल- स्वामित्व, योगसिद्धि, ज्ञान जागृति, इन्द्रिय जय, परकाया प्रवेश।

विशुद्ध चक्र-स्थान- कण्ठ। दल- सोलह। वर्ण- धूम्र। लोक- जन:। दलों के अक्षर- से लेकर अ:तक सोलह अक्षर। तत्त्व- आकाश। तत्त्वबीज- हं। वाहन- हाथी। गुण- शब्द। देव- पंचमुखी सदाशिव। देवशक्ति- शाकिनी। यन्त्र- शून्य (गोलाकार)। ज्ञानेन्द्रिय- कर्ण। कर्मेन्द्रिय- पाद। ध्यान फल- चित्त शान्ति, त्रिकालदर्शित्व, दीर्घ जीवन, तेजस्विता, सर्वहितपरायणता।

आज्ञा चक्र-स्थान- भ्रू। दल- दो। वर्ण- श्वेत। दलों के अक्षर- हं, क्षं। तत्व- मह: तत्त्व। बीज- ऊँ। बीज का वाहन- नाद। देव- ज्योतिर्लिंग। देवशक्ति- हाकिनी। यन्त्र- लिङ्गकार। लोक- तप:। ध्यान फल- सर्वार्थ साधन।

षट्चक्रों में उपर्युक्त छ: चक्र ही आते हैं; परन्तु सहस्रार या सहस्र दल कमल को कोई- कोई लोग सातवाँ शून्य चक्र मानते हैं। उसका भी वर्णन नीचे किया जाता है

शून्य चक्र- स्थान- मस्तक। दल- सहस्र। दलों के अक्षर- अं से क्षं तक की पुनरावृत्तियाँ। लोक- सत्य। तत्त्वों से अतीत। बीज तत्त्व- (:) विसर्ग। बीज का वाहन- बिन्दु। देव- परब्रह्म। देवशक्ति- महाशक्ति। यन्त्र- पूर्ण चन्द्रवत्। प्रकाश- निराकार। ध्यान फल- भक्ति, अमरता, समाधि, समस्त ऋद्धि- सिद्धियों का करतलगत होना।


Saturday, 4 October 2025

परिवर्तन नहीं परावर्तन की शताब्दी

* 'परावर्तन' को विज्ञान घटना कहता है। जिसमें प्रकाश की किरणें किसी सतह से टकरा कर उसी माध्यम से वापस लौट जाती हैं।

* 'परावर्तन' सामाजिक सरोकार की एक ऐसी दृष्टि है, जो मूल से निकले दिशा बदल चुके, पंथों को दुलराती, सहलाती और आत्मीयता से आच्छादित कर 'स्वत्व' का बोध कराती है।

* 'परावर्तन' एक राष्ट्रीय संकल्पना है, जिसमें पंथ, वर्ग, जाति, लिंग, भाषा, भूषा और क्षेत्र का सप्तरंगी इंद्रधनुष बनता है, जो अ-राष्ट्रीय तत्वों, विभेदक नीतियों और विध्वंसकारी संभावनाओं का समूलाग्र उच्चाटन करती है।

* परावर्तन वह व्याप्ति है, जो वैश्विक क्षितिज को स्पर्श करती , उषा की भगवा आभा बिखेरते हुए, प्रचंड भास्कर का सर्वकष मार्ग प्रशस्त कर आहत, अतृप्त, आकांक्षी मनुष्यता को संध्या और रात्रि की गहनतम होती  संम्भावनाओं से निकाल कर,  अर्काय स्वरूप को प्रदीप्त करने,  राकापति के मधु की वर्षा के साथ औषधीय विरेचन का कार्य करती है।

* 'परावर्तन' वह आध्यात्मिक अंत: सलिला है, जो अन्नमय कोष (भु:भुव स्व की यात्रा को) प्राण मय कोष के वाहन में प्रतिस्थापित कर मन और उसकी सारथी इंद्रियों का शिथिलीकरण कर वि-ज्ञान की किरणों से उन्हें उर्ध्वमुखी बना , चेतना की  प्रार्थनाओं और आहुतियों की समिधा 'चिति' में स्वाहा करती आनन्द मय कोष, रसो वै स: का बोध कराती है। 

* यह द्वय का परावर्तन है। परिवर्तन के कारण मूल से बिखरी और विखंडित होती आकांक्षाओं का शीतलीकरण है।

* परावर्तन नैसर्गिक है,  परिवर्तन सुनियोजित /आकस्मिक योजना /घटना है।  

* परिवर्तन में संम्भावनाओं का द्वंद्व है , तो परावर्तन में विकृतिकरण की संम्भावनाओं की इति है।

समझना होगा -

* 'संघ' शताब्दी परिवर्तन और सम्भावनाओं की नहीं, परावर्तन और समाधानों की है।

*शताब्दी लौकिक व्यवहार के परिमार्जन और एकात्मकता के आह्वान की है।

* शताब्दी सनातन की आभा में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व की चेतना को भारतीय चिति में व्याप्तीकरण (अध्या त्मीकरण) की प्रक्रिया है।

* यह उनकी नहीं हमारी शताब्दी है। यह कैलेंडर की नहीं, कर्म पथ की शताब्दी है।

* यह शस्र और शास्त्र की शताब्दी है। अर्थ और काम के धर्म में विसर्जन (धर्माधारित अर्थ का अर्जन और काम का संयोजन) की शताब्दी है।

* यह नौनिहालों के आगत-स्वागत युवाओं के कर्तव्य बोध तथा वृद्धों के आभार और अभिनंदन की शताब्दी है।

* यह वनवासी, गिरि कंदरा निवासी, ग्राम और नगरवासियों की परम्पराओं के स्मरण की शताब्दी है।

* देव, मनुष्य,यक्ष, राक्षसों के लिए 'द' के बोध की शताब्दी है। 

* यह दधीचि, शिवि, राम और कृष्ण के दान, दया, त्याग और पुरुषार्थ की शताब्दी है।

* यह बुद्ध के करुणा, चाणक्य के बुद्धि तथा चंद्र गुप्त के शौर्य की शताब्दी है।

* यह केवल सिंदूर की नहीं, तो हल्दी, दूर्वा, कुमकुम से सजी वह अभिमंत्रित थाली है, जो वसुंधरा के भाल पर तिलक करने उद्यत है।

* सन्नद्ध है, मंगलकारी सुप्रभात के उषा -भगवा - प्रणाम को। 

आइए,जन गण मन की 'संघ शताब्दी' के सरोकारों का अवगाह्न कर जीवन के पुरुषार्थ को चरितार्थ करें।

विजयादशमी 
2025