Monday, 9 March 2026

साहित्य विचार


(एक) पहला दार्शनिक विचार-  (1)  ऋग्वेद (मण्डल 1, सूक्त 164, मंत्र 46) में कहा गया है-

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुःअथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥

ज्ञानी लोग एक ही सत्य (परम तत्व) को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। कोई उसे इन्द्रकोई मित्रकोई वरुणकोई अग्नि कहते हैंउसी को कोई यम और कोई मातरिश्वा (वायु) कहता है। -सत्य एक हैपरंतु ज्ञानी उसे अनेक नामों से कहते हैं। 


यह वैदिक परम्परा का मूल दार्शनिक विचार माना जाता है कि ‘सृष्टि के पीछे एक ही परम सत्ता है’भले ही उसे अलग-अलग रूपों में समझा जाए।


* एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति> सत्य एक हैपर नाम अनेक > ईश्वर की एकता।



उदाहरण के रूप में कई ऋषियों के नाम मिलते हैंजैसे - ऋषि वशिष्ठ। ऋषि विश्वामित्र। ऋषि अत्रि। ऋषि भारद्वाज।



(दो) वैदिक और उपनिषदिक परम्परा: इसमें कहा गया है कि जब केवल ब्रह्म (परमात्मा) ही थातब उसने विचार कर संकल्प किया इसी संकल्प से सृष्टि की रचना मानी जाती है। वह विचार संकल्प के रूप में ‘परा’ से प्रकट हुआ और पश्यन्ति से अनुभूत होता हुआ ‘वैखरी’ में व्यक्त हुआ।  * एकोऽहम् बहुस्याम् > मैं एक हूँअनेक हो जाऊँ > सृष्टि की उत्पत्ति। यहाँ तीन सूक्त इसकी पुष्टि करते हैं -

तीन सूक्त : (iपुरुष सूक्त> (ऋग्वेद 10.90)  का मंत्र इस प्रकार है-

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।

स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥

  : उस विराट पुरुष (परमात्मा) के हजार सिरहजार नेत्र और हजार चरण हैं। वह सम्पूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त करके उससे भी दस अंगुल ऊपर (अर्थात उससे परे) स्थित है। यह मंत्र विराट पुरुष (सर्वव्यापी ब्रह्म) की व्यापकता और सर्वव्यापक स्वरूप को प्रकट करता है। इसी एक महापुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष) से सम्पूर्ण सृष्टि बनी। उसके यज्ञ से- *देवताप्राणी और प्रकृति बने। *समाज की चार वर्ण व्यवस्था का प्रतीकात्मक वर्णन भी मिलता है।

(iiहिरण्यगर्भ सूक्त > (ऋग्वेद 10.121) – सृष्टि का प्रथम कारण यह (हिरण्यगर्भ सूक्त) का प्रथम मंत्र है। पूरा मंत्र इस प्रकार है-

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

यह सूक्त सृष्टि के मूल कारण और परम सत्ता के बारे में गहन वैदिक चिंतन प्रस्तुत करता है। यहाँ कहा गया है कि प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ (स्वर्ण अंड/कॉस्मिक एम्ब्रियो) प्रकट हुआ। उसी से- *पृथ्वी और आकाश बने। ** सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति हुई। ***वही समस्त जगत का स्वामी है।

(iii) नासदीय सूक्त > (ऋग्वेद 10.129) – सृष्टि से पहले की अद्वितीय रहस्यमय अवस्था -नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।

   किमावरीवः कुह कस्य शर्मन् अम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्॥

  इस सूक्त में बताया गया है कि सृष्टि से पहले*न सत् थान असत्। **न आकाश थान पृथ्वी। ***केवल एक रहस्यमय सत्ता थी। उस समय क्या ढका हुआ थाकहाँ और किसके आश्रय में थाक्या वहाँ कोई गहरा और अगाध जल था? फिर काम (इच्छा) उत्पन्न हुईजो सृष्टि का पहला बीज बनी। यह सूक्त सृष्टि के रहस्य पर दार्शनिक प्रश्न भी उठाता है।

निष्कर्ष: इन तीनों सूक्तों को मिलाकर देखने पर वैदिक दर्शन यह बताता है कि-  (1) पहले अद्वैत अवस्थाफिर सृष्टि का मूल कारणऔर अंत में जगत का विस्तार हुआ। (2) भारतीय साहित्य के मूल वैदिक विचार- (iमैं एक हूँअनेक रूपों में प्रकट हो जाऊँ।” (ii) विचार को पूर्णता में देखना (iii) संपूर्ण विश्व उसी एक परम सत्य की अभिव्यक्ति है। (iv) सृष्टि की रचना से साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है ।     

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