स्त्रियों ने अठारहवीं शताब्दी से आज तक की यात्रा करती हुई नारी चेतना के साथ सामने आई है।
जबकि भारत में वैदिक काल से नारी चिति,-चेतना, प्रकृति, ब्रह्म,जीव,समाज, राष्ट्र, संस्कृति और जीवन मूल्यों, जीवन शैली पर संवाद करती रही हैं।
विमर्श शब्द मुख्य रूप से अंग्रेजी शब्द 'Discourse' (डिस्कोर्स) के अनुवाद के रूप में प्रयोग किया जाता है, विशेषकर अकादमिक और दार्शनिक संदर्भों में।
मूल: 'विमर्श' संस्कृत भाषा का शब्द है। यह 'वि + मृश्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है—जांचना, विचार करना, चिंतन करना या किसी विषय के गहरे अर्थ को स्पर्श करना।
कश्मीरी शैव दर्शन (प्रत्यभिज्ञा दर्शन) में 'विमर्श' का बहुत महत्व है, जहाँ इसे चेतना की सक्रिय शक्ति माना गया है।
वैदिक काल का शब्द: भारत में वैदिक काल से इसके लिए 'वाद' या 'विवाद' (सकारात्मक अर्थ में चर्चा) और 'मीमांसा' शब्दों का प्रयोग होता रहा है। विशेष रूप से 'मीमांसा' शब्द का प्रयोग किसी तत्व की गहराई से परीक्षा या विवेचन करने के लिए किया जाता था
आज नारी विमर्श या स्त्री विमर्श के संदर्भ में 'विमर्श' का अर्थ केवल 'चर्चा' नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन और विश्लेषण है। यहाँ विमर्श का सीधा अभिप्राय 'पहचान की खोज' और 'सत्ता की संरचना को चुनौती देना' है।
इसे तीन बिंदुओं से समझ सकते हैं:
दृष्टिकोण का बदलाव: इसका अर्थ है इतिहास, समाज, और साहित्य को 'पुरुष की नज़र' (Male Gaze) के बजाय 'स्त्री की नज़र' से देखना। यह उन परंपराओं और मान्यताओं पर सवाल उठाता है जो स्त्रियों को गौण (Secondary) मानती हैं।
अस्मिता (Identity) की तलाश: यहाँ विमर्श का अर्थ स्त्री को एक 'वस्तु' या 'देवी' के बजाय एक स्वतंत्र 'इंसान' के रूप में स्थापित करना है। यह उसकी अपनी इच्छाओं, अधिकारों और स्वतंत्रता की बात करता है।
पितृसत्ता का विश्लेषण: स्त्री विमर्श के तहत इस बात का गहरा 'विवेचन' (Critical Analysis) किया जाता है कि कैसे धर्म, समाज और कानून ने स्त्री को हाशिए पर रखा है।
आइये उक्त तीनों बिंदुओं को एक प्रसंग से देखें -जिज्ञासा -मणिं दत्त्वा ततः सीता हनूमन्तमथाब्रवीत् । अभिज्ञानमभिज्ञातमेतद् रामस्य तत्त्वतः (१)मणि देने के पश्चात् सीता हनुमान् जी से बोलीं- 'मेरे इस चिह्न को भगवान् श्री रामचन्द्र जी भलीभाँति पहचानते हैं (१) मणिं दृष्ट्वा तु रामो वै त्रयाणां संस्मरिष्यति । वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च (२)'इस मणि को देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियों का- मेरी माता का, मेरा तथा महाराज दशरथ का एक साथ ही स्मरण करेंगे ॥ २ ॥(श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे एकोनचत्वानरिंश: सर्ग:)दूसरे श्लोक में सीता कहती हैं,इस मणि को देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियों का- मेरी माता का, मेरा तथा महाराज दशरथ का एक साथ ही स्मरण करेंगे। बाल्मीकि जी तीनों के स्मरण का कारण नहीं बताते।मैं जो अनुमान लगा पा रहा हूं, 'यहां माता अर्थात् मायका, मेरा अर्थात सीता के वर्तमान परिस्थिति का,(इस मणि का प्रसंग दूसरी वार सर्ग 66/4 में आता है, जहां हनुमान जी जब श्रीराम को मणि देते हैं और सीता का संदेश बताते हैं कि इसे देखकर श्रीराम को जनन्या,मेरी और दशरथ का स्मरण होगा,तब राम कहते हैं,यह मणि हमारे श्वसुर ने सीता को दिया था। इसे देख कर मुझे वैदेहस्य, पिता दशरथ के दर्शन हो रहे हैं और ऐसा लग रहा है मानो सीता मिल गई है।यह मुद्रिका जनक को इंद्र ने दी थी।) दशरथ याने ससुराल का।'⭐'मेरा ऐश्वर्य पूर्ण मायका, चक्रवर्ती सम्राट की बहू, अजेय राम की पत्नी।'⭐⭐क्या यह भी संकेत है कि आपातकाल में प्रत्येक बेटी /पत्नी/बहू को यही तीन स्मरण आते हैं?⭐⭐⭐और भी बहुत कुछ हो सकता है। बाल्मीकि कविपुंगव जो ठहरे।…............⭐ नारी के वृहत्तर कुटुम्ब के साथ निहितार्थ।⭐⭐ नारी कुटुम्ब का स्वाभिमान।⭐⭐⭐ कुटुम्ब के स्वाभिमान की रक्षा में राष्ट्रीय सुरक्षा।…...# अर्द्ध नारीश्वर #अतीत का गौरव।# आध्यात्मिक सुरक्षा कवच।
निष्कर्ष: नारी विमर्श का मतलब है—वह संवाद या विमर्श जो स्त्री को समाज की मुख्यधारा में बराबरी का हक दिलाने और उसके आत्म-सम्मान को स्वर देने के लिए किया जाता है। दरअसल
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