संस्कृति की प्रकृति
हमें
न तो कल्चर,
‘सभ्यता’ और
‘संस्कृति’
शब्दों के गुणार्थ के बारे में पांडित्यपूर्ण चर्चा करनी है
और न ही इस दृष्टिकोण का अनुमोदन करना है कि ‘संस्कृति’ की भांति 'कल्चर’
के बारे में सार्वदेशिक स्वरूप की धारणा होनी चाहिये। हमें तो
इस तथ्य को स्वीकार करना है कि बोलचाल की भाषा में ‘कल्चर’ किसी समाज के मानस पर पड़ने वाले प्रभावों की ऐसी प्रवृत्ति का द्योतक है जो विशेष
रूप से उसकी अपनी होती है और पुनः जो उनके समूचे इतिहास में उसके भावों, उद्वेगों,
विचार, वाणी
और कर्म को संचयी रूप से प्रभावित करती है।
सांस्कृतिक विभिन्नताएं उस रीति से उपजती हैं जिस रीति से सामाजिक अनुभव का विश्लेषण और विवेचन होता है और जो संकल्पनाओं, प्रतीकों, मूल्यों तथा भाव मुद्राओं या दृष्टिकोणों के रूप में स्पष्ट रूप से सुनायी पड़ती है।
‘संस्कृति’ विशिष्ट सामाजिक आत्म चेतना है। यथा, इस तथ्य के होते हुए भी कि पाश्चात्य संगीत में लयबद्धता (हार्मनी) के उपयोग से बहुत पहले वैदिक ऋचाओं का ‘लयबद्धता गान’ भारत के ऋषि-मुनियों के आश्रमों में गूंजता था, यह स्वीकार करना ही होगा कि भारतीय संगीत पाश्चात्य संगीत से इस दृष्टि से भिन्न है कि उसमें लयबद्धता के लिए कोई स्थान नहीं है जबकि लयबद्धता पाश्चात्य संगीत का अनिवार्य अंग है।
भारतीय संगीत का स्वरूप सुरीला रागात्मक होता है और वह भाव की सहज भाषा को व्यक्त करता है। लयबद्धता राग को गहनता प्रदान करके उसे सजाती-संवारती है और उसमें चार चांद लगा देती है। एक विशेषज्ञ के अनुसार ‘पाश्चात्य संगीत में समरसता के भाव तथा भारतीय संगीत में उसके अभाव का कारण इन भागों में रहने वाले लोगों के स्वभाव के ही कारण हो सकता है।’
भारतीय
को अपने पड़ोसी की अपेक्षा अनन्त से नाता जोड़ना अधिक सरल लगता है। भारतीय संगीत का
प्रयोजन है,
आत्मा को शुद्ध किय जाए, तन पर अनुशासन का अंकुश लगाया जाए, अपने
भीतर स्थित अनन्त के प्रति राग पैदा की जाए
अपने सास की डोर को अंतरिक्ष के स्वास की डोर से और अपने स्पन्दन की चिन्ता करते हैं। इन सब कारणों से भारतीय संगीतज्ञ अपेक्षाकृत
एकल वादक होता है कि दसते के स्यन्दनों से जोड़ा
जाए। प्रायः भारतीय बाह्य समूहों की अपेक्षा अपने परिवार के बारे में अधि खोटे-छोटे
समूह करते हैं। मुख्यतः एकल वादक होने के नाते कला मर्मज्ञ की एक विशेषता होती है के
साथ मिलकर संगत करने वाला वादक जैसा कि पाश्चात्य संगीत के बड़े-बड़ेवादी के स्वर, संगीत प्रदर्शन का अपूर्व कौशल।
भारतीय संगीत में वर्ग के अन्दर भी एकल वादन बना रहता है और वह कभी भी सुसंगत रूप में एकाकार नहीं हो पाता। अतः आर्केस्ट्रा भारतीय संगीत की प्रकृति के प्रतिकूल है।
पश्चिमी में सामाजिक परिवर्तन अधिक द्रुतगति से हुए हैं और कभी-कभी तो क्रान्तिकारी ढंग से हुए हैं। सामाजिक जीवन के विकास में राज्य ने अहं भूमिका निभायी है और सत्ता के लिए संघर्ष अधिक तीखा और अधिक व्यापक रहा है। वैचारिक प्रतिबद्धता को पराकाष्ठा रही है और मतभेद तथा विरोध के प्रति सहिष्णुता अल्पतम।
तर्क संगतता के अपने पागलपन में पश्चिमी विचारधारा ने चित्तियों तथा वृत्तियों की असंगतियों को ऐसे असाध्य अन्तर्विरोधी का रूप दे दिया है जो निरंकुश चयन की अपेक्षा करते हैं।
दूसरी ओर भारतीय मानस ने प्रयास किया है कि सामाजिक संबंधों का विनियमन अमूर्त कारण से नहीं अपितु सहज ज्ञान तथा सहानुभूति से किया जाए। नई चुनौतियों का सामना करने के लिए उसने पुराने समाधानों में संशोधन-परिवर्द्धन किए हैं, उसे अस्वीकार नहीं किया है। (अवोधगम्य ३४९)
शक्ति के माध्यम से मुक्ति के स्थान पर उसने आत्म-नियंत्रण के माध्यम से मुक्ति का प्रयास किया है।
पश्चिम में धर्म को संगठित संस्थागत सिद्धान्त के मत के रूप में मान्यता दी गयी है जो समुदाय व्यवस्था के अनुरूप है। आमाजिक परम्परा पर वहां के शहरी जीवन तथा सभ्यता की तकनीकी व्यवस्था' का प्रभुत्व रहा है।
भारत में धर्म को सदैव व्यक्तिगत एवं समाज से ऊपर मानने की सशक्त परम्परा रही है।
पश्चिम का इतिहास एथेन्स तथा सिकन्दरिया रोम तथा कुन्स्तुन्तुनिया, पेरिस तथा लंदन का इतिहास है। उसमें सामाजिक तथा राजनीतिक रूप में संक्रमण का एक सुचिन्हित कालक्रम रहा है। अतः उसका सहज काल विभाजन किया जा सकता है।
दूसरी ओर भारत की सामाजिक तथा सांस्कृतिक परम्परा में प्राचीन तथा नवीन व्यवस्थाएं साथ-साथ चलती रही हैं और यह निरन्तरता प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। अनुदारवाद के साथ-साथ अतीत की पुनरव्याख्या करने की तत्परता ने यहां क्रांतियां नहीं होने दी और जाति-व्यवस्था ने वर्ग-वैमनस्यों तथा वर्ग संघर्षों को पनपने नहीं दिया है।
भारतीय समाज के इतिहास को और आधिक सहज रूप से परस्परव्यापी सुस्पष्ट कालखंडों में विभाजित किया जा सकता है। वह सम्पूर्ण प्रगति तथा एकता की परिधि में आश्चर्यजनक अविच्छिनता एवं विषमता का कौतुक उपस्थित प्रस्तुत करता है।"
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