एक प्रसिद्ध महात्मा के उद्गार
लोग मेरी पूजा करनेको बहुत उत्सुक रहते हैं; पर जब मैं उनसे उसकी पूजा करने को कहता हूँ, जिसकी पूजा मैं भी करता हूँ, तो वे मेरी बातों की उपेक्षा करते हैं।
मुझे यह देखकर खेद होता है कि वे किसी सच्चे महात्मा को प्राप्त करने के अधिकारी नहीं। धूर्तों द्वारा ठगे जा सकते हैं, किंतु किसी भी सदाशय के हितकारी वचन उनके हृदय तक नहीं पहुँचते।
स्वार्थ ने संसार को अन्धा कर दिया है। लोग मुझे शरीर से निरपेक्ष और समदर्शी कहते हैं। आश्वर्य तो यह है कि मुख से ऐसा कहते समय भी वे मेरे द्वारा अपना कुछ लाभ होने की इसलिये आशा रखते हैं; क्योंकि वे मेरे निकट सम्पर्क में रहते और मेरी शारीरिक सेवाओं में तत्परता से लगे रहते हैं।
मैं स्पष्ट देखता हूँ कि लोग मुझे झूठा और महात्मा एक साथ समझते हैं। जब मैं उनसे कहता हूँ 'मुझमें कोई सिद्धि नहीं, मेरी चरणधूलि लेने या पूजा करने से कोई लाभ नहीं, मैं भी तुम्हारी भाँति साधारण पुरुष हूँ' तो वे इन शब्दों को हँसीमें उड़ा जाते हैं। इन पर वे विश्वास नहीं करते। इसके विरुद्ध मुझसे ऐसी आशा रखते। हैं, जिसे मैंने स्पष्ट अस्वीकार कर दिया है।
श्रद्धालु कहे जानेवालों की भीड़ चाहती है कि मैं दिन-रात उनके सामने बोला करूँ, उनके ऊटपटांग पदार्थ खाता रहूँ, इतने पर भी स्वस्थ रहूँ। वे साधन करने का अवकाश नहीं देना चाहते; परंतु साधननिष्ठ से होनेवाले लाभ को चाहते हैं।
अच्छे भोजन, अच्छे वस्त्र में रखकर वे मुझे त्यागी कहते हैं। मैं सोचता हूँ कि वे मेरा उपहास कर रहे हैं।
स्त्रियों ने तो और भी ऊधम मचा रखा है। वे चाहती हैं कि एकान्त में मैं उनकी पूजा ग्रहण करूँ, उन्हें उपदेश दूँ। उनके अभिभावक भी यही चाहते हैं।
साथ ही सब चाहते हैं कि मैं निर्विकार रहूँ। एक कलियुग के प्राणी से वह आशा की जाती है जो पराशर, विश्वामित्र, श्रृंगीऋषि प्रभृति के लिये भी विफल रही है।
जब तक ऐसी परिस्थिति है, धूर्तों से समाज को नहीं बचाया जा सकता। घृणित काण्डों का होना बन्द नहीं होगा ।साधक एवं महात्माओं को भगवान् ही बचायें तो बचें।
प्रभु समाज को सुबुद्धि दें। वह अपने एवं साधकों के पतन इस मार्गसे बचे। [कल्याण दिसम्बर १९३९ ई०]
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