Tuesday, 10 March 2026

अन्य प्रमुख नास्तिक विचार धाराएं

(तीन) अन्य प्रमुख नास्तिक (अवैदिक) विचारधाराएँ : बुद्ध और महावीर के काल में प्रचलित अन्य महत्वपूर्ण विचार: (i) आजीवक संप्रदाय (मक्खलि गोशाल): * नियतिवाद: सब कुछ पहले से तय है। मनुष्य के कर्म का भाग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। **ऐतिहासिक साक्ष्य: मौर्य सम्राट बिंदुसार इसके अनुयायी थे; बराबर की गुफाएं इन्हीं के लिए बनी थीं। (ii) अज्ञान या अज्ञेयवाद (संजय बेलट्ठिपुत्त): मूल विचार: ईश्वर या मृत्यु के बाद के जीवन जैसे आध्यात्मिक प्रश्नों का निश्चित उत्तर जानना असंभव है। (iii) अक्रियवाद (पूरण कश्यप): * मूल विचार: कर्म का कोई फल नहीं होता। न पुण्य से लाभ होता है, न पाप से हानि। यह कर्म सिद्धांत का पूर्ण खंडन है। (iv) उच्छेदवाद / भौतिकवाद (अजित केशकंबली): मूल विचार: मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के साथ सब नष्ट हो जाता है। यह चार्वाक दर्शन का आधार बना। (V) अनिश्चयवाद (विक्षेपवाद): मूल विचार: किसी भी अंतिम सत्य पर पहुँचना संभव नहीं, इसलिए वाद-विवाद से बेहतर मौन रहना है।

निष्कर्ष : इन विचारधाराओं को मुख्यतः तीन वर्गों में रखा जा सकता है, आस्तिक, नास्तिक और अन्य अवैदिक धाराएँ। (i) आस्तिक दर्शनों ने वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के रूप में व्यवस्थित दार्शनिक परम्परा विकसित की। (ii) नास्तिक विचारधाराओं, विशेषतः चार्वाक या लोकायत ने प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हुए आत्मा, परलोक और कर्मफल का खंडन किया। (iii)  आजीवक, -नियतिवाद,अज्ञेयवाद, अक्रियवाद, उच्छेदवाद और अनिश्चयवाद जैसी अन्य विचारधाराएँ भी प्रचलित थीं, जिन्होंने नियति, ज्ञान, कर्म और जीवन-मरण के प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। (iv) स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही है, जहाँ एक ही मूल वैदिक पृष्ठभूमि से विविध दार्शनिक मतों का विकास हुआ और सत्य की खोज विभिन्न मार्गों से निरन्तर चलती रही।

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