Wednesday, 11 March 2026

‘संगम-साहित्य 1

 

मुझे साहित्यकारों के उस प्राचीन ‘संगम’ की याद आती है जिसकी स्मृति हमारी तमिल-परंपरा में अभी तक सुरक्षित है। 

कहा जाता है कि ई. पू. 9000 वर्ष से लेकर ईसवी संवत् की प्रारंभिक शताब्दियों तक कई संगमों में अनेक साहित्यकार एकत्र हुए । उन साहित्यकारों की रचनाओं का नमूना आज भी हमारे उस प्राचीन संग्रह में सुरक्षित है जिसे तमिल का ‘संगम-साहित्य’ कहते हैं। 

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित है, उन्हें तमिल परंपरा ‘अहम्’ और ‘इदम्’ नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैं, जो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक ‘संगम’ की याद दिलाते हैं, जिसमें व्यष्टि और समष्टि के साथ-साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उसको एक ‘भारतजन’ में परिणत करने वाली एक ऐसी ‘संगम-दृष्टि’ हमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय से, न केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थी, अपितु व्यष्टि एवं समष्टि के अन्तर्गत आने वाले देह और देही, स्त्री और पुरुष, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी, को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन ‘अहम्’ और ‘इदम्’ में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को ‘राष्ट्री’ तथा ‘संगमनी’ कहा गया है। यही हमारे बहुभाषा-भाषी भारतजन का ‘संगमन’ कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी ने, आसेतु हिमालय तक, इस महादेश को एक संस्कृति दी, एक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे ‘अद्भुत संगम’ का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकी, और न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

ऋग्वेद ने ‘संगच्छध्वं सवदध्वम्’ का जो महामंत्र इस राष्ट्र के कानों में फूंका था, वह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनों, आक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी ‘संगम’ जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

अनुकरण और अनुसंधान: आज हम उक्त भीतरी ‘संगम’ की सर्वथा उपेक्षा करके किसी न किसी बाह्य दिखावे की नकल करने में लगे हुए हैं। कुछ लोगों को नवीनता का मोह है, अतः बाहर से जो भी हवा चलती है, उसी के वे भक्त बन जाते है। विकासवाद हो या मार्क्सवाद, फायडवाद हो वा हिप्पीवाद, सभी का वे स्वागत करते हैं, आँख मूंदकर अनुकरण करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें प्राचीनता से मोह है। वे प्रत्येक नई धारा का बहिष्कार करते हैं और प्रत्येक पुरानी प्रथा का अंधानुकरण । वे लोग इस बात का भी विचार नहीं करते कि बाल-विवाह, छुआछूत जैसी कुप्रवृत्तियां, जो किसी परिस्थिति-विशेष में अपनाई गई थीं, आज की परि-स्थितियों में राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। इस प्रकार नवीनतावादी और परंपरावादी दोनों एकमात्र अनुकरण को ही राष्ट्र-रक्षा का अमोघ अस्त्र मान बैठे हैं।

वास्तविकता यह है कि अनुकरण एवं अनुसंधान नामक दोनों पैरों से मानव जाति प्रगति पथ पर बढ़ी है। अतः केवल अनुकरण से काम नहीं चलेगा । अनुकरणमात्र से मानव ‘सीताराम’ की रट लगाने वाला ‘तोता’ तो बन सकता है, परन्तु समस्त जग को ‘सियाराममय’ समझने बाला ‘तुलसी’ नहीं; ‘नकलची बंदर’ तो हो सकता है, परन्तु ‘जगदीश-चन्द्र बसु’ जैसा वैज्ञानिक नहीं। अनुकरण द्वारा प्राप्त ज्ञान तब तक प्रगति-विधायक नहीं हो सकता जब तक उस के साथ अनुसंधानवृत्ति भी संक्रिय न हो उठे, क्योंकि इस वृत्ति के बिना कोई बंदर नाई की नकल कर के छुरे से अपने को ही घायल कर सकता है ।

अनुकरण के साथ साथ देश, काल और पात्रता का विचार करने की प्रवृत्ति भी जागनी चाहिए, अन्यथा अनुकरण-जन्य ज्ञान हमारे भीतर ‘स्व’ का अंग नहीं बन सकता। देश, काल व पात्रता का विचार करने वाली प्रवृत्ति ही अनुसंधान-वृत्ति है। इसी के द्वारा कोई भी ज्ञान हमारे 'स्व' का अंग बनता है और हम आवश्यकतानुसार उस का उप-योग देश, काल और पात्र का विचार करते हुए विभिन्न ढंग से करने में समर्थ होते हैं।

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