साधारण
मनुष्यों हेतु कार्य-पद्धतियाँ
१.विचार-प्रसारण (Thought Broadcasting): * विचार=रेडियो
तरंगें। योगियों की शक्तिशाली विचार-तरंगें वैज्ञानिकों/विचारकों को प्रेरणा देती
हैं। अनेक महान आविष्कार = दिव्य प्रेरणा का परिणाम।
२. सामूहिक कर्म-शमन
(Collective Karma Mitigation): *तपशक्ति
द्वारा युद्ध, आपदा और नकारात्मकता का संतुलन।
* शांति-तरंगें पृथ्वी
हेतु “सुरक्षा कवच” बनती हैं।
३. सूक्ष्म सहायता (Astral
Assistance): *सच्ची पुकार पर
योगी सूक्ष्म शरीर से प्रकट होते हैं। *स्वप्न, संकेत या
अज्ञात व्यक्ति के रूप में मार्गदर्शन। * संकट से रक्षा एवं आध्यात्मिक सहायता।
४. आध्यात्मिक रिले स्टेशन
(Spiritual Relay Station):* योगी ब्रह्मांडीय
ऊर्जा को ग्रहण कर सामान्य मानव हेतु अनुकूल बनाते हैं। *वे “ट्रांसफॉर्मर” की तरह
दिव्य शक्ति को सहनीय रूप में प्रवाहित करते हैं।* परिणाम = संसार में शांति,
भक्ति और संतुलन।
५. गुप्त शिष्यों द्वारा
कार्य:* साधारण रूप में समाज के बीच रहकर सेवा। *डाक्टर,
शिक्षक, मजदूर, कर्मचारी
आदि रूपों में मानवता का मार्गदर्शन।*ज्ञानगंज के आचार्य अप्रत्यक्ष रूप से
समाज-परिवर्तन कराते हैं।
"एक सच्चा गुरु कभी अपने शिष्य को अकेला नहीं छोड़ता। दूरी केवल शरीर की होती
है, चेतना
की नहीं।" - स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि
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◆
‘द होली साइंस’ (कैवल्य
दर्शनम्) के अनुसार काल-गणना ◆
१.
युगांतर का गणित (Correct Yuga Cycle): * कलयुग = १२०० वर्ष। * कलयुग का अंधकारमय अंत = ई. स. ४९९।* सन् १७०० = चढ़ते हुए द्वापर युग का प्रारंभ। *आधुनिक
विज्ञान, बिजली
और ऊर्जा-विज्ञान का तीव्र विकास = द्वापर युग का प्रभाव।* मानव चेतना = पदार्थ से ऊर्जा की ओर अग्रसर।
२.
ज्ञानगंज के योगियों का दृष्टिकोण:* महासिद्ध = युग -परिवर्तन के निरीक्षक (Overseers)।* द्वापर →
त्रेता → सत्ययुग = चेतना का क्रमिक उत्कर्ष।* भविष्य में टेलिपैथी और सूक्ष्म-दृष्टि का
पुनर्जागरण।* भविष्य
का विज्ञान = चेतना-आधारित
विज्ञान।*संकल्प-शक्ति द्वारा ब्रह्मांडीय यात्रा संभव।* सत्ययुग = ज्ञानगंज और सामान्य मानव समाज के बीच का पर्दा
समाप्त।*मानव और सिद्ध पुरुषों का सह-अस्तित्व।
३.
परिवर्तन काल (Transition
Period):* युग-परिवर्तन = पुरानी सोच
और नई चेतना का संघर्ष।* ज्ञानगंज के योगी = वैश्विक ऊर्जा-संतुलनकर्ता।*
शांति-केंद्र एवं आध्यात्मिक
संस्थाएँ = उच्च ऊर्जा ग्रहण करने की तैयारी।* उद्देश्य = मानवता को विनाश से
बचाकर चेतना-उत्कर्ष की ओर ले जाना।
४.
वर्तमान समय का महत्व:* वर्तमान काल = “आध्यात्मिक फसल” का समय।* क्रियायोग जैसी वैज्ञानिक साधनाएँ = तीव्र आत्म-विकास का माध्यम।* ब्रह्मांडीय तरंगें = Evolution (उत्कर्ष)
के पक्ष में सक्रिय।* साधना की गति = पूर्व युगों की तुलना में अधिक तीव्र।
सूत्ररूप सार : “कलियुग से द्वापर की ओर बढ़ती मानवता अब पदार्थ से
ऊर्जा, और
ऊर्जा से चेतना की यात्रा पर है; ज्ञानगंज के सिद्ध इस संक्रमण के मौन मार्गदर्शक हैं।”
"युग बदल रहे हैं, और उनके साथ मनुष्य
की नियति भी। अब सोने का समय नहीं, बल्कि जागने और अपनी दिव्य
शक्ति को पहचानने का समय है।" - परमहंस
योगानंद
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◆ क्रियायोग के ५ मुख्य सूत्र ◆
१. “दोहरे जीवन” का अभ्यास
(Double Life): * बाहर से सक्रिय, भीतर से मौन।*
कार्य करते हुए भी श्वास एवं ‘हं-सौ’ पर सजगता।→ कर्म + ध्यान = थकान रहित ऊर्जा।
२. सुबह और रात का “सुनहरा
समय”: *भोर का ध्यान=पूरे दिन का आध्यात्मिक कवच। → रात्रि का क्रियायोग = तनाव-विसर्जन एवं
योग-निद्रा।→ नियमित साधना = चेतना की स्थिरता।
३. “शांत रहकर काम करो”
(निष्काम कर्म): 'युग-परिवर्तन'
में आपकी भूमिका-
क्रियायोग से भीतर जो शांति पैदा होती है, वह परिवार, कार्यक्षेत्र और अंततः
पूरे ब्रह्मांड की तरंगों (Vibrations)
को बदलती है। यही वह सूक्ष्म तरीका है जिससे एक साधारण गृहस्थ 'सत्ययुग' को पृथ्वी पर लाने में मदद
करता है।
"संसार को छोड़ना समाधान नहीं है; संसार में रहकर संसार को
अपने भीतर न आने देना ही असली योग है।" -लाहिड़ी महाशय
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'द
होली साइंस' (कैवल्य
दर्शनम) सूत्र रूप
मूल
परिचय: रचयिता
: स्वामी
श्री युक्तेश्वर गिरि । रचना वर्ष : १८९४ । प्रेरणा : महावतार बाबाजी का आदेश । उद्देश्य : पूर्व और पश्चिम के दर्शन का समन्वय ।
१.
युग-चक्र सूत्र: युग चक्र = २४,००० वर्ष । सौर मंडल = द्वितारा (Binary Star) प्रणाली का भाग ।
वर्तमान काल = द्वापर युग । द्वापर युग = ऊर्जा एवं विज्ञान का युग । आधुनिक उन्नति = विद्युत + परमाणु शक्ति + अंतरिक्ष विज्ञान का परिणाम
२.
कैवल्य के चार सूत्र: (i)
वेद सूत्र- सभी धर्म = एक सत्य की भिन्न अभिव्यक्ति । गीता + बाइबल = एक ही आध्यात्मिक अनुभव ।
(ii) अभिष्ट
सूत्र: जीवन
का लक्ष्य = दुःख निवृत्ति + आनंद प्राप्ति । (iii) साधन
सूत्र: क्रियायोग
= आत्मोन्नति की वैज्ञानिक विधि । आत्म-संयम = चेतना शुद्धि का साधन ।
(iv) विभूति
सूत्रल: उच्च
साधना = सिद्धियाँ + आत्मप्रकाश । अंतिम अवस्था = कैवल्य (मोक्ष) ।
३.
तत्त्व एवं चेतना सूत्र: शरीर = २४ तत्त्वों का संयोजन ।
चेतना प्रवाह । : चित्त → अहंकार → बुद्धि → इंद्रियाँ → भौतिक जगत ।
रीढ़ + मस्तिष्क = विद्युत-चुंबकीय यंत्र ।
क्रियायोग = ब्रह्मांडीय चेतना
ग्रहण करने की प्रक्रिया ।
४.
बाबाजी उद्देश्य सूत्र: योग = विज्ञान + गणित + चेतना का अनुशासन । कृष्ण + बुद्ध + ईसा = सार्वभौमिक सत्य के विभिन्न स्वर ।
५.
मुक्ति सूत्र: “मुक्ति शरीर की मृत्यु नहीं,
अज्ञान की मृत्यु है।” * प्राणशक्ति नियंत्रण = काल और
स्थान पर विजय। * आत्मज्ञान = वास्तविक स्वतंत्रता। *चेतना विस्तार = ब्रह्मानुभूति ।
सार
सूत्र: “क्रियायोग द्वारा चेतना को शुद्ध कर मनुष्य अपनी दिव्य
सत्ता का अनुभव करता है; यही कैवल्य है।”
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‘द होली साइंस’ - बाइबल और वेदों का
सूत्र-संगम
१. ॐ–आमीन सूत्र: ॐ = Amen = Word = ब्रह्मांडीय कंपन। “आदि में शब्द था” = सृष्टि का मूल स्पंदन। प्रणव (ॐ) = ईश्वर का ध्वनि-स्वरूप । ब्रह्मांड
= कंपन से निर्मित चेतन ऊर्जा ।
वाक्य सूत्र: “शब्द ही ईश्वर है, और ॐ उसी शब्द का अनुभव है।”
२. सात चर्च–सात चक्र
सूत्र: Seven Churches = शरीर के सात चक्र । Seven
Stars = चेतना के सात केंद्र । रीढ़ = आध्यात्मिक मार्ग । क्रियायोग
= चक्र जागरण की प्रक्रिया । सहस्रार = स्वर्ग चेतना ।
चेतना प्रवाह :मूलाधार → स्वाधिष्ठान → मणिपुर → अनाहत → विशुद्ध → आज्ञा → सहस्रार।
३. पवित्र आत्मा–प्राण
सूत्र: Holy Ghost = प्राण शक्ति । वास्तविक
बपतिस्मा = आंतरिक चेतना जागरण। दिव्य अनुभव = प्राण के शुद्ध प्रवाह से । श्वास
नियंत्रण = आत्मिक प्रकाश का द्वार ।
योग सूत्र: “जहाँ प्राण स्थिर, वहाँ मन स्थिर; जहाँ मन स्थिर, वहाँ ईश्वर प्रकट।”
४. ज्ञान वृक्ष–मेरुदंड
सूत्र: Garden of Eden = मानव चेतना । Tree
of Knowledge = मस्तिष्क + मेरुदंड । सर्प = नीचे की ओर बहती
जीवन ऊर्जा । पतन = चेतना का इंद्रियों में फँसना । उत्थान = ऊर्जा
का ऊपर सहस्रार की ओर आरोहण।
क्रियायोग सूत्र: अधोगामी ऊर्जा = बंधन । ऊर्ध्वगामी ऊर्जा = मुक्ति ।
५. स्वर्ग राज्य सूत्र: “Kingdom
of God is within you” = स्वर्ग भीतर की चेतना
अवस्था । कूटस्थ (तीसरी आँख) = दिव्य द्वार । ध्यान = आंतरिक स्वर्ग का अनुभव । कैवल्य
= आत्मा की परम स्वतंत्रता ।
६. सार्वभौमिक धर्म सूत्र: धर्म अनेक,
सत्य एक । कृष्ण + बुद्ध + ईसा = एक ही चेतना के विभिन्न
प्रकाश। बाहरी मतभेद = आंतरिक एकता
का आवरण। विद्युत उपमा: तार
अलग-अलग। धारा एक । धर्म अलग-अलग। दिव्य प्रकाश एक ।
सार सूत्र: *“जब मनुष्य भीतर के शब्द, प्रकाश और प्राण को पहचान
लेता है, तब उसे ज्ञात होता है कि सभी धर्म एक ही सनातन सत्य
की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।” * "सत्य का कोई देश या धर्म
नहीं होता; वह विज्ञान की तरह अटल है।" -स्वामी श्री युक्तेश्वर
गिरि