Friday, 6 February 2026

madhy prades ke agyaat sant


























मध्यप्रदेश की धरती आध्यात्मिक रूप से बहुत समृद्ध रही है। यहाँ कई महान संतों ने जन्म लिया और अपनी साधना से समाज को नई राह दिखाई।
 
संत कवि ईसुरी 1841 - 1909 ई. मेंढकी (झांसी के पास, कार्यक्षेत्र बुंदेलखंड) 'बुंदेलखंड के जयदेव' और फाग विधा के जनक।

संत गजानन महाराज 19वीं शताब्दी शेगांव (महाराष्ट्र), पर इनका प्रभाव मालवा-निमाड़ में अत्यधिक है।

 कुबेर मगरे (कुबेर बाबा): इनका संबंध इंदौर और मालवा क्षेत्र से रहा है। इन्होंने समाज सेवा और अध्यात्म के माध्यम से लोगों को जोड़ा

श्री चक्रधर स्वामी :(Sarvajna Shri Chakradhar Swami)जन्म नाम हरिपालदेव / Haripaladevaजन्म वर्ष लगभग 1194 ई. (13वीं शताब्दी) जन्म तिथि भाद्रपद शुक्ल द्वितीया के दिन माना जाता है (पंचांग अनुसार)जन्म स्थान Bharuch (भादोच), गुजरात, भारत पिता का नाम विषलदेव (Vishal Deva) माता का नाम मल्हना देवी / Malhana Devi धर्म / पंथ महानुभाव पंथ (Mahanubhav Sampradaya) मुख्य कार्यक्षेत्र गुजरात से महाराष्ट्र तक भक्ति प्रचार एवं अध्यात्मिक शिक्षा अध्यात्मिक योगदान महानुभाव पंथ की स्थापना, भक्ति और सामाजिक समता का प्रचार विशेष जानकारी चक्रधर स्वामी को अद्वैत-धार्मिक सुधारक और कृष्ण भक्ति के समर्थक के रूप में जाना जाता है। 
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चक्रधर स्वामी: महानुभाव पंथ के अन्य प्रमुख साधक (Mahanubhava Parampara) जन्म: ~1194 ई. इन्हें अंतिम अवतार और संप्रदाय का केंद्र मानते हैं। 
महानुभाव पंथ की परंपरा में चक्रधर स्वामी से पहले और बाद में कई अन्य संत माने जाते हैं। वैध मान्यताओं के अनुसार निम्न संत पंथ की परंपरा से जुड़े हैं-
चक्रपाणी प्रभु (Chakrapani / Changadeva Raul) Phaltan (महाराष्ट्र) — जन्म: ~1121 ई. इन्हें पंथ के पहले अवतार के रूप में माना जाता है। 
गोविंद प्रभु (Govinda Prabhu) Amravati (महाराष्ट्र) — जन्म: Bhadrapada Shukla Trayodashi, 1187 ई. पंथ के दूसरे अवतार और चक्रधर के गुरु। 
 निष्कर्ष- सबसे प्रमुख संत: श्री चक्रधर स्वामी -महानुभाव पंथ के संस्थापक, जन्म भादोच (Bharuch) में हुआ और उन्होंने भक्ति-परंपरा का विस्तृत प्रचार किया। अन्य पंथ-संत: चक्रपाणी प्रभु तथा गोविंद प्रभु –ये पंथ की परंपरा के प्रारंभिक सिद्धांतों से जुड़े प्रमुख साधक हैं। 
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विंध्य क्षेत्र_(रीवा – सीधी – शहडोल – मऊगंज – सतना – पन्ना – ग्वालियर तक)
संत/साधक क्षेत्र काल (अनुमान) लोकमान्यता-
संत बिरसिंह बाबा - रीवा 15–16वीं सदी वनवासी योगी, पशु-रक्षक।
संत भीखमदास मऊगंज -16वीं सदी निर्गुण भक्ति।
संत हरिहरदास सतना 15वीं सदी रामनाम साधना।
संत गोरखनाथ (विंध्य भ्रमण) रीवा–सीधी 11–12वीं नाथ परंपरा।
संत कंकाली बाबा -पन्ना 17वीं तांत्रिक-योगी।
संत चरणदास -(विंध्य शाखा) ग्वालियर अंचल 18वीं निर्गुण संत।
संत लखेश्वर बाबा- सीधी 16वीं लोकदेव।
संत नरहरिदास -ग्वालियर 16वीं वैष्णव संत।
संत दयाराम बाबा -भिंड 17वीं अहिंसा उपदेश।
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🕉️ 2. मालवा – निमाड़ – नर्मदा अंचल
(इंदौर – उज्जैन – देवास – सीहोर – होशंगाबाद – मंडला – अमरकंटक – पेंड्रा)
संत स्थान काल पहचान_
संत दादू दयाल- (मालवा भ्रमण) उज्जैन 16वीं निर्गुण।
संत रामानंद -(नर्मदा तट) मंडला 14वीं रामभक्ति।
संत नर्मदादास -अमरकंटक 15वीं नर्मदा उपासक।
संत हरिराम बाबा -होशंगाबाद 17वीं नर्मदा तप।
संत भीलट बाबा पेंड्रा 16वीं आदिवासी संत।
संत कालू राम देवास -18वीं सामाजिक सुधार।
संत गंगादास बाबा -सीहोर 17वीं योग साधना।
संत नागेश्वर बाबा -मंडला 15वीं शैव।
संत झींगनाथ -अमरकंटक 14वीं नाथ योग।
संत लालदास -उज्जैन 16वीं निर्गुण संत।
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 3. भोपाल – विदिशा – सागर – बुंदेलखंड विस्तार
संत क्षेत्र काल लोक छवि-
संत गोरख बाबा -(स्थानीय परंपरा) विदिशा 12वीं नाथ।
संत चरनदास -(सागर परंपरा) सागर 18वीं निर्गुण।
संत ब्रह्मानंद बाबा -भोपाल 17वीं ध्यान साधना।
संत खैराती बाबा -सीहोर 16वीं लोकसंत।
संत गरीबदास -बुंदेलखंड 18वीं निर्गुण।
संत तेजाजी -(प्रभाव क्षेत्र) मालवा-बुंदेल 15वीं लोकदेव।
संत गोविंददास -विदिशा 17वीं वैराग्य।
संत परमहंस बाबा -सागर  ।
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1. निमाड़ अंचल (खरगोन, खंडवा, बड़वानी)
निमाड़ को "संतों की खेती" कहा जाता है। 
 संत कालूजी महाराज -(खरगोन): सिंगाजी के समकालीन और उनके भतीजे/शिष्य माने जाते हैं।
संत बालीनाथ +(इंदौर/उज्जैन): लोक कथाओं में इनका उल्लेख मिलता है, विशेषकर अनुसूचित समाज और पिछड़ों के उद्धारक के रूप में।
 अज्ञात बाबा - (मक्सी/देवास मार्ग): इस क्षेत्र में कई ऐसे "मौन साधक" रहे हैं जिन्हें स्थानीय लोग केवल 'बाबा' या 'महाराज' के नाम से जानते हैं, जिनका कोई लिखित इतिहास नहीं है।
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 महाकौशल और नर्मदा तट (जबलपुर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर)
नर्मदा के किनारे "परिक्रमावासी" संतों की एक लंबी परंपरा है जो गुमनाम रहकर साधना करते हैं।
•स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती -(सिवनी/नरसिंहपुर): झोतेश्वर के परमहंसी गंगा आश्रम के माध्यम से लोक कल्याण।
 सच्चिदानंद 'पगला बाबा' -(जबलपुर): नर्मदा किनारे के एक प्रसिद्ध अवधूत संत।
 गोंडवाना के अज्ञात ऋषि: डिंडोरी और मंडला के जनजातीय क्षेत्रों में ऐसे अनेक संत हैं जो प्रकृति पूजा और अध्यात्म को जोड़ते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग 'बैगा साधु' के रूप में सम्मान देते हैं।
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4. ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड (ग्वालियर, दतिया, सागर)
यहाँ सिद्धों और तांत्रिक संतों की प्रधानता रही है-
• स्वामी जी महाराज (दतिया): पीतांबरा पीठ के संस्थापक, जिनका वास्तविक परिचय आज भी रहस्यमय और "अज्ञात" जैसा ही है।
• संत गुलाब सिंह -(सागर): बुंदेलखंड के लोक भजनों में इनका नाम प्रमुखता से आता है।
• देव प्रभाकर शास्त्री 'दद्दा जी' -(कटनी/दतिया): शिवलिंग निर्माण के माध्यम से जन-जन को जोड़ने वाले आधुनिक लोक संत।
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क्षेत्र संत का नाम (स्थानीय संबोधन) विशेषता-
बड़वानी -'पहाड़ी बाबा' सतपुड़ा की कंदराओं में रहने वाले अज्ञात साधु।
होशंगाबाद- 'नर्मदा माई के पागल' कई ऐसे अवधूत जो नर्मदा किनारे बिना कुछ मांगे रहते थे।
मालवा 'खड़ेवरी बाबा' -वे साधु जो वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर तपस्या के लिए प्रसिद्ध हुए।
झाबुआ - 'भिलट देव' इन्हें जनजातीय समाज में एक दिव्य पुरुष और रक्षक संत के रूप में पूजा जाता है।
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रायसेन (सांची) -सारिपुत्र और महामोगलायन बुद्ध के प्रधान शिष्य। इनकी अस्थियाँ आज भी यहाँ पूजनीय हैं।
अनूपपुर (अमरकंटक)- ऋषि भृगु व मार्कण्डेय नर्मदा पुराण के अनुसार यहाँ इन ऋषियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व तपस्या की थी।जबलपुर (तेवर) जाबालि ऋषि जिनके नाम पर 'जाबालिपुरम्' (जबलपुर) पड़ा।चित्रकूट (सतना) ऋषि अत्रि और सती अनुसूया रामायण काल के प्रसिद्ध ऋषि युगल।मन्दसौर तपस्वी वत्सभट्टी गुप्त काल से पूर्व के प्रसिद्ध विद्वान और साधक।

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भाग 2: मध्यकाल (19वीं सदी से पूर्व - भक्ति काल)



• संत धन्ना जाट (मालवा क्षेत्र): भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत, जिनका प्रभाव पश्चिमी मध्य प्रदेश में बहुत है।
बुंदेलखंड और बघेलखंड (सागर, दतिया, रीवा)
• अक्षर अनन्य (दतिया/सेवढ़ा): 17वीं-18वीं सदी। छत्रसाल के समकालीन प्रसिद्ध वेदान्ती संत।
 अज्ञात 'सिद्ध बाबा' (भिंड/मुरैना): चंबल के हर गांव में एक 'सिद्ध बाबा' की ओट (स्थान) होती है। ये अधिकतर 16वीं-18वीं सदी के स्थानीय योद्धा-संत रहे हैं।
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भाग 3: अज्ञात और लोक-विस्मृत संत (लोक कथाओं के आधार पर)-
1. कनफड़े साधु (मालवा): ये अज्ञात नाथपंथी साधु थे जो 12वीं सदी के बाद पूरे मालवा के गांवों में घूमते थे। आज भी इनके मठ 'अज्ञात' नामों से मिलते हैं।
2. बावली बाबा (होशंगाबाद/नर्मदा तट): 18वीं सदी के आसपास नर्मदा किनारे कई ऐसे संत हुए जिन्होंने अपनी पहचान छिपाई और केवल 'बावली' (पागल) कहलाना पसंद किया।
3. पहाड़ी पीर (पचमढ़ी/बैतुल): सतपुड़ा की पहाड़ियों में कई अज्ञात सूफी संत और हिंदू योगियों की गुफाएं हैं जो 15वीं सदी के आसपास की मानी जाती हैं।
4. मौन साधक (अमरकंटक): नर्मदा की कंदराओं में ऐसे कई संतों का जिक्र लोककथाओं में है जिन्होंने कभी अपना नाम नहीं बताया और 'गुफा वाले बाबा' के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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• ब्रह्म बाबा (अज्ञात - गाँव-गाँव): बुंदेलखंड के लगभग हर पुराने गाँव के बाहर एक 'ब्रह्म बाबा' का स्थान होता है। ये वे अज्ञात विद्वान संत थे जिन्होंने लोक कल्याण के लिए अपने प्राण त्यागे।
• लाल जी महाराज (टीकमगढ़): रामानंदी संप्रदाय के अज्ञात संत, जिन्होंने इस क्षेत्र में भक्ति मार्ग को ग्रामीण स्तर पर फैलाया।

• संत लक्ष्मणदास (रीवा): 18वीं सदी के आसपास। लोकमान्यता है कि इन्होंने रीवा के राजाओं को आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया, पर स्वयं झोपड़ी में रहे।
• तीरका बाबा- (सीधी/सिंगरौली): ये एक अज्ञात सिद्ध संत थे जो लोक कथाओं में चमत्कारी महापुरुष के रूप में जाने जाते हैं।
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3. मालवा अंचल (इंद्रौर, उज्जैन, धार, रतलाम, देवास)
  कालू बाबा (अज्ञात - देवास अंचल): खेतों की रक्षा करने वाले संत के रूप में लोकमान्य।
• खड़ेवरी बाबा (अज्ञात): मालवा के कई गांवों में ऐसे संतों की समाधियाँ हैं जो आजीवन तपस्या में लीन रहे और अपना परिचय गुप्त रखा।
4. महाकौशल अंचल (जबलपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी, नरसिंहपुर)
नर्मदा तट के कारण यहाँ 'परिक्रमावासी' अज्ञात संतों की भरमार है।

• बौना महाराज (जबलपुर/मंडला): 18वीं सदी के एक ऐसे सिद्ध संत जिनका कद छोटा था, लेकिन उनकी आध्यात्मिक पहुँच बहुत बड़ी मानी जाती थी।

5. ग्वालियर अंचल (ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी)
यहाँ 'सिद्धों' और 'नागा साधुओं' की लोकमान्यता अधिक है।
• सिद्ध बाबा (मुरैना/चंबल): चंबल के बीहड़ों और गांवों में 'सिद्ध बाबा' के नाम से सैकड़ों स्थान हैं। ये वे अज्ञात संत थे जो डाकुओं और राजाओं दोनों को सन्मार्ग पर लाते थे।
• संत गुलाब सिंह (शिवपुरी): 18वीं सदी के लोक संत जिनके पदों को आज भी ग्रामीण अंचलों में गाया जाता है।
• गोपाल दास जी (ग्वालियर): तानसेन के समय के अज्ञात संत जो संगीत को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम मानते थे।
6. भोपाल और मध्य क्षेत्र (भोपाल, रायसेन, विदिशा)
यहाँ सूफी संतों और वैरागी संतों का संगम मिलता है।
 
• पहाड़ी बाबा (रायसेन): रायसेन के किले और आसपास की पहाड़ियों में रहने वाले अज्ञात विरक्त साधु।
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अज्ञात संतों की पहचान का सूत्र:
मध्य प्रदेश में यदि आपको सबसे पुराने अज्ञात संतों को खोजना हो, तो इन तीन शब्दों को याद रखें:
1. खेड़ापति: हर गाँव का वह अज्ञात संत जो गाँव का रक्षक माना गया।
2. ब्रह्मदेव: वे विद्वान संत जिनका नाम लुप्त हो गया पर स्थान पूज्य है।
3. ओघड़/अवधूत: वे जो नर्मदा किनारे या श्मशान में साधना करते थे।
 
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1. निमाड़ अंचल (खरगोन, खंडवा, बड़वानी)
निमाड़ को "संतों की खेती" कहा जाता है। यहाँ कई ऐसे संत हुए जिन्होंने समाज सुधार और भक्ति का अनूठा संगम प्रस्तुत किया।
• संत कालूजी महाराज (खरगोन): सिंगाजी के समकालीन और उनके भतीजे/शिष्य माने जाते हैं।
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Wednesday, 28 January 2026

सिंदूर लगाया है तो प्रणाम तो करना है। माने तो महाबली, माने तो रामभक्त, माने तो राष्ट्रभक्त। न मानें तो भी नायक तो है ही। 

रुचि से, अरुचि से, भय से, दंड से, दान से, भेद से मानना नियति है। अर्जित सम्मान गांडीव है। परशुराम है। वर्तमान का वैश्विक नायक है। 

मानो तो साथ है अन्यथा अकेला हाथ है।

मानने से देश को दिशा मिलेगी। राष्ट्र का तीर्थ जिंदा रहेगा। भारत माता जगद्गुरू रहेगी। सांस्कृतिक राष्ट्र, वादों से मुक्त चिर पुरातन नित्य नूतन जीवन मूल्यों को संरक्षित करेगा। ऋषियों का कल्प संकल्प के साथ भविष्य बनेगा।

ब्राह्मण तो ब्रह्म में रमण करता है। उसे राम ही प्रिय हैं। वह जाति नहीं तप है। वह ऋत का वाहक है। वह दर्शन देता है। अध्यात्म को खेता है। वह संस्सृत का नेता है।

 वह समदर्शी को भजता है, समदर्शी रहता है। वह संतत्प नहीं। वह संत हैं। संतत्व को जीता है।समाज का मार्गदर्शन करता है। 

वह राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति करता है। ब्राह्मण-ब्राह्मण है। वह अग्नि- होता है। अग्नेमय सुपथा राये.... (ईशावास्योपनिषद)

29/01/26
उमेश कुमार सिंह 

क्या इतिहास दुहराया जा रहा है

क्या इतिहास दुहराया जा रहा है?
मंडल -कमंडल। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह!
अब यूजीसी+ कमंडल!!

दरअसल यह एक दिन की भड़ास नहीं है। सरकार का पलड़ा सामाजिक न्याय के साथ जाति के बजन और वोट के जतन में बराबर एक तरफ झुकता आ रहा है।

जातियां सरकार बनाती हैं तो उपकृत होना स्वाभाविक है।

किंतु इस बार कुछ तो चूक हुई। एसी-एस टी के नाम पर अभी भी हिन्दू एस सी,एस टी की तुलना में धर्मांतरित ईसाई ज्यादा लाभ ले रहे हैं। एस सी एस टी यह ढुलमुल नीति देख अपना धर्म बदलकर ईसाई बन रहे हैं।

 नियम अपनी जगह है। किस पर लागू होगा स्पष्ट है। किंतु व्यवहार में हिन्दू मतांतरित हो रहा है।

दूसरी यह व्याधि ओबीसी को जोड़ कर आ गई है। इसमें अब सभी मत पंथ के ओबीसी आयेंगे। हमारी बात आप समझ रहे हैं ।
 
यह एम बाय समीकरण को पुष्ट करेगा। लाभ किसको कितना मिलेगा पता नहीं। शिकायतों का क्या होगा?समय बतायेगा।

किंतु हिन्दू जिस तरह सवर्ण -अवर्ण के नाम पर, अगड़ा, पिछड़ा के नाम पर, अनारक्षित -आरक्षित के नाम पर बंटेगा, सनातन को ही हानि पहुंचायेगा। 

सरकारें बन बिगड़ सकती हैं, किंतु जातीय लाभ-हानि भविष्य तो छोड़िए वर्तमान में भी घातक है।

इस पर सरकार 'भय गति सांप छछूंदर केरी।' की स्थिति में आ गई है।

पता नहीं सरकार के सलाहकार कौन हैं? शिक्षा के क्षेत्र में कितने राष्ट्रीय विचारों को लेकर संगठन कार्य कर रहे हैं, क्या उनको विश्वास में नहीं लिया गया। विद्यार्थी परिषद की अपील तो यही बता रही है।

रा शिक्षा निति - 2020 बनी थी तब कहा गया था इतने - इतने लोगों से पूछा गया था।अब क्यों राय नहीं ली गई?

कितने विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, छात्रों से राय ली गई? कुलपतियों को भूल जाइये। वे तुलसी बाबा के अनुसार - प्रिय बोलने में विश्वास रखते हैं? क्या शैक्षणिक संगठनों के अध्यक्ष -महामंत्री भी प्रिय बोलने बाले -
सचिव,बैद, गुरु बन गये हैं?

हो सके तो आरक्षण का लाभ ले रहे या उसकी परिधि में आ रहे संगठन प्रमुख,नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रेट्स अवश्य विचार करें।

 देश सुरक्षित है तो हम सब सुरक्षित हैं, अन्यथा उदाहरण आंखों के सामने हैं।
अति उत्साह गाय बनाते -बनाते गधा न बना दे।

27/01/26

चिंतन

मित्रवर!

आदरणीय मोदी जी और शाह जी देश के लिए वह सब कर रहे हैं , जो चाहिए किंतु टीम और तंत्र भी उसी चिंतन का होना चाहिए। 

जनता का सम्प्रेषण दिशा देगा। पूर्णता तो देवताओं में भी नहीं होती।तभी तो अंशावतार कहा जाता है। कर्ता तो एक ही दीनानाथ हैं। 

काल किसी को क्षमा नहीं करता। हां कभी कभी सौ दो सौ साल भी दिशा पकड़ने को कम लगते हैं।
आरक्षण का युक्तियुक्तकरण आवश्यक है 🙏 

प्रतिभा को यह कह कर नहीं दबाया या उसके अधिकार से बंचित किया जा सकता कि उसके पुर्खों ने किसी वर्ग,जाति पर अत्याचार किये हैं तो अब उन्हें अत्याचार सहना होगा।

समानता और समरसता का यह मार्ग भी सिंहावलोकन की अपेक्षा रखता है।

यह ज्योतिष का कौन-सा आचार्य है जो समाज सेवकों को बताता है कि आज जिसे आप सवर्ण कह रहे हैं , वह कल राजा,आतातायी, गरीबों पर अत्याचार करने वाला था।

और जो आज दलित के नाम पर चार पीढ़ियों से आरक्षण ले रहे हैं,  वे हमारे तथाकथित अत्याचारी पुरखों से कुचले गये थे।

पुनर्जन्म का भारतीय दर्शन आत्मा की अमरता के परिप्रेक्ष्य में कहता है , न कि जाति विशेष में पूर्व जन्मों का चिट्ठा बताता है।

फिर यह सवर्णों को जिन्हें संविधान निर्माताओं/ समाजसेवकों ने अघोषित उपाधि दे डाली कहां से जन्म-जन्मांतर का खाका प्राप्त किए हैं।

कहने को पंचवर्षीय योजनाओं का विचार है। किंतु क्या वह केवल भौतिक वस्तुओं के निर्माण और संग्रह के लिए ही है। गुण दोष के आधार पर आरक्षण, चुनाव प्रणाली,मुफ्त राशन वितरण, मतांतरित व्यक्तियों के आरक्षण के सम्बंध में पुनर्विचार का अवसर नहीं देता?

तथाकथित समाज के आर्थिक रूप से प्रतिभावान युवा आज दर -दर रोजी रोटी को भटक रहे हैं! कार्यालयों में अपने से कम योग्य व्यक्ति के सामने अपमानित हो नौकरी कर रहे हैं। चयन से लेकर प्रमोशन तक जाति,वर्ग में पैदा होना एक मनुष्य के लिए वरदान बना दिया तो दूसरे को श्राप!! यह प्राकृतिक न्याय नहीं है। 

सतहत्तर साल में सुधार नहीं हुआ।केवल सत्ता पक्ष विपक्ष को गाली दे,समय पास करे, तंत्र लूट खसोट करे और यह सवर्ण का एजेंडा खड़ा कर हिंदुओं को बांटे। वाह रे! नीति निर्माताओं!! 

सुधरो, समझो, वोट और सत्ता की खुमारी से बाहर आकर सड़ांध मार रहे कैंसर की शल्य चिकित्सा करो। अन्यथा आज जैसे आप अपने पूर्व के सत्ताधारियों को नकारा साबित कर रहे हैं कल आपको भी यही उपाधि मिलेगी।

 सत्ता देश के लोक मंगल के लिए है और इसमें संतों, आचार्यों, और समाजों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

यह विचार आज अपेक्षित है। समाज स्वार्थ से ऊपर उठे यह विचार होना चाहिए।
शेष जिसकी जैसी मर्ज़ी। हरि ओम् तत्सत 🕉️🙏

संतों की विरासत

संतों की विरासत को जीवित रखने के लिए यह आवश्यक है कि 'भारतीय ज्ञान परंपरा' को शिक्षा के हर स्तर पर (व्यक्ति, परिवार, कुटुंब, राज्य और राष्ट्र आदि के साथ ) साझा किया जाए ।

 युवाओं में स्व’ (आत्म-बोध) और अतीत के प्रति गौरव का भाव जागृत हो । पश्चिमी अंधानुकरण के स्थान पर धर्म, नैतिकता और वैज्ञानिक चेतना के बीच संतुलन बनाया जाए । 

कुटुम्ब भाव सुगन्धित-सुवासित रहे।सामाजिक समरसता व्यवहार से आये न कि धन, पद और प्रतिष्ठा के संतुष्टीकरण से ।

 संतों का सत्संग सतत चले, मठ, मंदिर और धर्मशालाएं धार्मिकता के साथ सांस्कृतिक केंद्र बने ।

 मनुष्य की दृष्टि वैश्विक हो । स्त्री, बाल, वृद्ध सुरक्षित और अनुकूलित रहें। साहित्य का विकास परम्परा के अन्वेषण के साथ हो। गौवंश, नदियाँ और जलस्रोत पवित्र और प्राणमय बने रहें। सरस्वती अपने सभी स्वरूपों में प्रसन्नवदना रहे । 

सत्ता निरहंकारी हो। संत परोपकारी हों। तभी बोध होगा कि भारत की वास्तविक शक्ति इसके सैनिक धर्म के साथ संत और ऋषि भाव में है, जहाँ अध्यात्मिकता सांस्कृतिक कलेवर के साथ राष्ट्र को बलवती बनाती है।

 भारतवर्ष एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में अपने अमरता के विश्वास को विश्व के कल्याण के लिए कारक बना रहे । 

 तभी सनातन राष्ट्र विश्व गुरु के पद पर आसीन रहकर संसृति के भविष्य की दुबिधा और द्वंद्व से ग्रसित मानवता को त्राण के सूत्र दे सकेगा।

 - विश्व धरा की प्रथम स्रोतस्विनी माँ नर्मदा के दोनों स्वरुप ‘नर्मदा और रेवा’ को प्रणाम। 🙏🙏🙏🕉️ 

24/01/26

Wednesday, 21 January 2026

अभिमुक्तेश्वरानंद

अभिमुक्तेश्वरानन्द जी को जिस तरह सोशल मीडिया पर लक्ष्य किया जा रहा है, वह दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डालेगा।सनातन में सब प्रकार के लोग हैं। सनातन सब को पचा कर चलता आया है, इसलिए सनातन है।वे जो कर रहे हैं उन्हें यदि बोध होगा तो ठीक है अन्यथा वे स्वयं अपने कर्मों का फल भोगेंगे।दरअसल इसमें शंकराचार्यों को ही केवल अभिमत देना चाहिए। यह उनकी व्यवस्था है।हर बात में यदि हिन्दू स्वयं को सोशल मीडिया में सनातन का न्यायाधीश बनेगा तो वह परम्परा को क्षति पहुंचायेगा।यदि वे स्वयं के विवेक से नकारात्मक या धर्म व्यवस्था के विपरीत कार्य कर राज्य विधि व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे हैं तो सरकार या संन्यास मार्गी कार्यवाही करेंगे।यदि वे किसी विशिष्ट एजेंडे के तहत माघ मेला जैसे पर्व पर लोकेषणा प्राप्त करना चाहते हैं तो ईश्वर उन्हें रास्ता दिखायेगा।नीति -धर्म - व्यवस्था -अतिरेक आदि को ईश्वरीय व्यवस्था ही ठीक करती है। माध्यम भी वही तय करती है।अंत में यह स्मरण रखना होगा हिन्दू समाज को किसी भी तरह एक रहना होगा,चाहे वह राजनीति हो, राष्ट्र नीति हो, अध्यात्म हो या सांस्कृतिक धरोहर और विरासत हो।

Monday, 19 January 2026

लेखक,लेखन और समाज



01 जनवरी से प्रारम्भ हुआ. 19/01/2026 को ख़त्म हो रहा है.

बिन्दुवार संक्षेप

1. कार्य पूर्ण होने से पहले उसका प्रचार नहीं करना चाहिए; कर्म स्वयं अपनी वाणी होता है।
* लघुकथा विमर्श इसका प्रमाण है।

2. कर्म की शक्ति शब्दों से अधिक प्रभावशाली और परिणामकारी होती है।
* स्पष्ट है भाषण, उद्वोधन, चर्चा की तुलना में लेखन कर्म अधिक महत्वपूर्ण है। तभी तो हम आज समीक्षा कर रहे हैं।

3. साधना और सृजन में प्रसिद्धि बाधक होती है, सहायक नहीं।
* कभी कभी लेखक जब प्रसिद्ध, पुरस्कार और सम्मान की ओर दोड़ता है तो उसके उत्कृष्ट लेखन में बाधा पैदा होती है।

4. न्यूटन-हेले प्रसंग यह दिखाता है कि महान व्यक्ति 'नाम' नहीं, 'कार्य' को महत्त्व देता है।

5. न्यूटन ने ग्रंथ प्रकाशित होने की चिंता नहीं की, न ही लेखक-नाम को आवश्यक माना।

6. सच्चा साधक प्रशंसा-निन्दा से अप्रभावित रहकर अपने लक्ष्य में रत रहता है।
* समीक्षाएं और पाठक की टिप्पणियां जहां लेखक को प्रोत्साहित करती हैं, वही प्रशंसा और निंदा उसको लक्ष्य से विचलित करती हैं।

7. किसी व्यक्ति या रचना का सही मूल्यांकन उसके जीवनकाल में प्रायः संभव नहीं होता।
,* इसलिए फल की इच्छा से अनासक्त रह कर रचना कर्म करते रहना चाहिए।

8. भारतीय ऋषि-परम्परा में मौलिकता का अहं नहीं, परम्परा की निरन्तरता का भाव है।
*लेखक को मौलिकता के अहं से दूर रहना चाहिए। विचार प्रवाह के साथ लक्ष्मी की तरह साधक के पास पहुंचते रहते हैं ।
धन जैसे बांटने से बढ़ता है,चिंतन भी साझा करने से सामर्थ्य प्राप्त करता है।


9. वेद अपौरुषेय माने गए क्योंकि वे व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* साहित्यकार की यही समझ उसे समष्टि से जोड़ती है।

10. अनाम रहकर कार्य करना भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठ माना गया है।
* साहित्य एकांत साधना है। समय के साथ साधना पूर्ण होने पर वह लोक के सामने आती है।

11. वास्तविक सौंदर्य के दर्शन से पहले अपनी सीमाओं का बोध नहीं होता (नॉटरडेम का कुबड़ा प्रसंग)।
* हमारी ही रचना सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा अहंकार पालना साहित्यकार को पालना उचित नहीं है।वृहत्तर साहित्य के अध्ययन से यह भ्रम दूर होता है और लेखक का लेखन गंभीरता को प्राप्त होता है।

12. साहित्य और आलोचना आत्मबोध तथा विनम्रता उत्पन्न करने का माध्यम हैं।
* रचना कर्म अदृश्य सत्ता/नियंत्ता के निर्देश से होता है।

13. साहित्य में लेखक, समीक्षक और पाठक का त्रिकोणात्मक संबंध होता है।

14. लेखक रचना का सृजन करता है, समीक्षक उसका अर्थ खोलता है, पाठक उसे जीवन देता है।

15. बिना पाठक के रचना अपूर्ण मानी जाती है।

16. रचना की महत्ता उसके लोकमंगल, मानवीय सत्य और वैचारिक गहराई में निहित है।

17. साहित्य का उद्देश्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सार्थक संप्रेषण है।

18. सच्चा साहित्य अपने समय से संवाद ंकरता है और भविष्य को दिशा देता है।

ह्विटमैंन की पंक्तियां हैं -
बन्धु तुम पुस्तक को नहीं,
मुझे स्पर्श कर रहे हो।
तुम्हारे हाथों में पुस्तक नहीं 
मेरी काया है।
इन पृष्ठों से प्रकट होकर मैं 
तुम्हारे हृदय में समा जाउंगा।
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