Wednesday, 18 March 2026

राम का चारित्रिक वैशिष्ट्य

 

                                    (4)

         राम का चारित्रिक वैशिष्ट्य

        वाल्मीकि रामयण में महर्षि वाल्मीकि ने नारद जी से प्रश्न किया कि ‘इस समय सारे भूमण्डल और नव द्वीपों में ऐसा कौन सा अपूर्व मेधावी, विद्वान, परोपकारी, ज्ञान-विज्ञान में पारंगत, धर्मात्मा तथा समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति है ? जो मनुष्य मात्र का ही नहीं, चर-अचर और प्राणि मात्र का कल्याण करने के लिये सदैव तत्पर रहता हो? जिसने अपने पराक्रम और त्याग से संपूर्ण इन्द्रियों, विषय-वासनाओं एवं मन को वश में कर लिया हो, जो कभी क्रोध, अहंकार जैसी दुष्प्रवृतियों के वशीभूत न होता हो? यदि ऐसा कोई महापुरुष आपकी दृष्टि में आया हो तो कृपया संपूर्ण वृतान्त मुझे सांगोपांग सुनाइये ।

              प्रश्न के उत्तर में महर्षि नारद कहते हैं - हे मुनिराज! ऐसी महान विभूति का नाम रामचन्द्र है। उन्होंने वैवस्वत मनु के वंश में महाराजा इक्ष्वाकु के कुल में जन्म लिया है। वे अत्यंत वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करनेवाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादा पुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत वत्सल, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं।’

अब ज़रा राम के संपूर्ण चारित्रिक वैशिष्ट्य को जो बाल्मीकि-नारद संवाद में रामायण में आया है, कुबेरनाथ जी के शब्दों में समझें - ‘रामकथा सविता-कथा है। इसकी प्रकृति सूर्यात्मक है और यह द्यु-मण्डल का काव्य है जो सगुण सृष्टि के विकास का ‘आदि’ रूप है। इसी से यह ‘आदिकाव्य’ कहा जाता है। इसका अधिदेवता है विष्णु का सवितारूप जो सोम और अग्नि के ‘विस्तार’ रूपों का आदि बिन्दु है। क्रियाशक्ति-प्रधान होने से यह ‘गार्हस्थ्य’ का महाकाव्य है।

  यह बात धनुर्भग के अवसर पर ही स्पष्ट हो जाती है। रामचन्द्र ने जब धनुष तोड़ा तो उसके तीन खण्ड हो गये। वह शिव-पिनाक त्रिगुणात्मक प्रकृति का प्रतीक था जो शिव के वाम भाग में रहती है। ऊपरवाला खण्ड ज्ञान-खण्ड था जो व्योम में चला गया। नीचेवाला खण्ड इच्छा-खण्ड था जो पाताल में प्रवेश कर गया। रह गया मध्य-खण्ड जो क्रिया-खण्ड था। उसे ही राम ने धरती पर रख दिया।

रामावतार में ज्ञान और इच्छा यवनिका के पीछे ठेल दिए जाते हैं। रंगमंच पर क्रियाशक्ति ही खेलती है। इस काव्य का आदर्श ही है ‘अनासक्त पुरुषार्थ-योग’ ।’ जिसे राम के चरित्र में पाते हैं  ।

राम के क्रिया योग में गृहस्थ धर्म और नागरिक धर्म का अत्यधिक महत्व है। इसलिए रामकथा में गृहस्थ जीवन का सम्पूर्ण वृत्त उतर आया है। राम कथा का आधार मानवीय धरातल है। इसमें गृहस्थ और नागरिक शील है।

कुबेरनाथ जी कहते हैं, ‘कथा के अन्दर अर्थ का त्रिपुर है। मानवीय धरातल पर यह कथा है पारिवारिक शील के आदर्शों की। अधिदैवी धरातल पर यह कथा है देवासुर-द्वन्द्व की, जिसमें राम प्रच्छन्न ‘इन्द्र’ हैं। परन्तु शाश्वत तल पर यह कथा है द्यु-मण्डल के सविता की। राम द्यु-मण्डल के सविता (सगुण परमात्मा), अन्तरिक्ष के इन्द्र तथा पार्थिव-मण्डल के राजा राम तीनों के प्रतीक हैं।

सविता सूर्य का आदिरूप है। इन्द्र भी बारह आदित्यों में से एक है। राघव राम सूर्यवंशी हैं। अतः तीनों स्तर पर राम सूर्य-प्रतीक से जुड़े हैं। कथा में राम को विष्णु का अवतार कहा गया है। विष्णु आदित्य है। विष्णु ही नारायणरूप सविता तथा सहस्रशीर्षा परमात्मा भी है।’ राम सूर्य की ही तरह ‘शरण्यं सर्वभूतानां’ - पुरुष हैं। 

सूर्य ‘ऋत’ का नियामक और ऋत का अनुगामी रहता है। उसके ‘ऋत’ (विधान या नियमचक्र) का छन्द कभी पतित नहीं होता, कभी टूटता नहीं। मनुष्य जीवन में ‘शील’ ही ऋतरूप है। राम के शील का छन्द कभी पतित नहीं होता। वे ऋत-मार्ग से कभी भ्रष्ट नहीं होते। इसी से उन्हें ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ कहा गया है।

 ऋत की मर्यादा का शत-प्रतिशत निर्वाह सूर्य की ही तरह वे भी करते हैं। रावण इस ऋत को अस्वीकार करता है। फलतः वह ‘अनृत’ का प्रतीक बन जाता है।’

 आइये ‘ऋत’ की स्वीकारोक्ति के साथ ‘अनृत’ के प्रतीकों को राम-धाम-पधारने / दर्शन करने का आमंत्रण दें, अन्यथा राम का बुलावा तो सब को एक न एक दिन आयेगा ही क्योंकि राम का शील ही उनका ऋत है !

विंशोत्तरी महादशा बोध चक्र

 

 

 

 विंशोत्तरी महादशा बोध चक्र

            …............

1- ग्रह- सूर्य, वर्ष -6, जन्म काल में चंद्र नक्षत्र - कृत्तिका, उ.फा., उ षा.।

2- ग्रह- चंद्र, वर्ष -10 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र -रोहिणी,हस्त, श्रवण।

3-ग्रह- मंगल, वर्ष -7 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- मृग, चित्रा, धनिष्ठा।

4-  ग्रह- राहु , वर्ष -18 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- आर्द्रा,स्वाती, शतभिषा।

5- ग्रह- गुरु, वर्ष -16 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- पुनर्वसु, विशाखा,पू भा.।

6- ग्रह-शनि , वर्ष -19 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- पुष्प, अनुराधा,उ.भा.।

7- ग्रह- बुध, वर्ष -17 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र-अश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती।

8- ग्रह- केतु, वर्ष -7 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- मघा,मूल, अश्विन।

9- ग्रह- शुक्र, वर्ष -20 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र-पू फा, पू षा, भरणी।

नक्षत्र नाम और स्वामी

1-अश्विनी- केतु 2-भरणी- शुक्र 3-कृत्तिका- सूर्य 4-रोहिणी-  चन्द्र  5-मृगशिरा- मंगल 6-आर्द्रा- राहू  7-पुनर्वसु- गुरु 8-पुष्य- शनि 9-आश्लेषा- बुध

10-मघा- केतु 11-पूर्वाफल्गुनी- शुक्र ,12- उत्तराफल्गुनी-सूर्य 13-हस्त- चन्द्र 14-चित्रा मंगल 15-स्वाती- राहू 16-विशाषा -गुरु 17-अनुराधा शनि 18-ज्येष्ठा- बुध

19-मूल- केतु 20-पूर्वाषाढा- शुक्र 21-उत्तराषाढा-अभिजित्-सूर्य 22-श्रवण- चन्द्र 23-धनिष्ठा- मंगल 24- शतभिषक्,- राहू 25- पूर्वा भाद्रपद -गुरु 26- उत्तरा भाद्रपदा-शनि27-रेवती- बुध ।

राष्ट्र और संस्कृति rashtr aur sanskriti

 

वैदिक काल से लेकर आज तक जो भी सद्साहित्य हमारे सामने आता है, उसका उद्देश्य लोक कल्याण है । ऋग्वेद का प्रसिद्ध मन्त्र है -

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्

देवा भागं यथा पूर्वे संजाना उपासते ।।

              हम सद्भाव में चलें, एक स्वर में बोलेंअपने मन एक मत रहेंठीक वैसे ही जैसे प्राचीन देवताओं ने बलिदान का अपना हिस्सा साझा किया था।

समानो मंत्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम्
समानं मंत्रमभिमंत्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ।।

              हमारा उद्देश्य एक ही होक्या हम सब एक मन के हो सकते हैंऐसी एकता बनाने के लिए मैं एक सामान्य प्रार्थना करता हूँ।

समानि व आकूति: समाना हृदयानि व: ।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।।

              हमारा उद्देश्य एक हो, हमारी भावनाएँ सुसंगत हो। हमारा विचार संयोजन हो। जैसे इस विश्व के,  ब्रह्मांड के विभिन्न सिद्धांतों और  क्रियाकलापों में तारात्मयता और एकता है ॥ ऋग्वेद 8.49.4

              विचार करें , यह प्रार्थना अपने को सीधे विश्व से जोड़ती है । यह कौन सी संस्कृति है ? वैदिक संस्कृति, सनातन संस्कृति , हिन्दू संस्कृति । जहाँ अपने लिए नहीं सम्पूर्ण जीवमात्र के लिए है प्रार्थना है ?

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

               “सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो, किसी को भी कोई दुख ना रहे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

              यह शान्ति कैसे मिले तो, हे परमपिता! मझे असत से सत की ओर ले चल। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल। मृत्यु से अमृत की ओर ले चल। 

 असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय 
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।

              यह प्रार्थना कौन कर रहा है - "वयं राष्ट्रांग्भूता” जो यह मानता है कि हम इस राष्ट्र के अंगभूत घटक हैं ।

 यह राष्ट्र क्या है? तो कहा गया राजते दीप्यते प्रकाशते शोभते इति राष्ट्रम् जो स्वयं देदीप्यमान हो वह राष्ट्र है । 

राष्ट्र का आधार क्या है ? जो कुछ भी भौतिक है वह राष्ट्र का आधार नहीं है क्योंकि राष्ट्र एक आध्यात्मिक इकाई है। 

इस आध्यात्मिक सिद्धांत को दो वस्तुएं निर्माण कराती हैं , इनमें से एक अतीत में होती है, जिसे हम स्मृतियों की विरासत और दूसरी वर्तमान में वास्तविक समझौता अर्थात् साथ रहने की इच्छा, साझी विरासत से अधिकाधिक लाभ उठाने का संकल्प।

 जैसे मनुष्य का शरीर धारण कर लेने से हर व्यक्ति मनुष्य नहीं बन जाता उसे बनने या बनाने में एक लम्बा समय लगता है, उसी तरह राष्ट्र उक्त दोनों शर्तों पर जीने वाले लोगों के प्ररिश्रम, बलिदान और निष्ठा के लम्बे अतीत का फल होता है । 

राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा, एक धर्म अथवा आर्थिक हितों वाले एक समुदाय की आवश्यकता नहीं होती । इसके लिए एक भावना, संवेदनशीलता, एक जीवन मूल्य की आवश्यकता होती है ।

            उदाहरण के लिए चौथाई सदी पहले तक यू.एस.एस.आर.में लातीवियाजार्जियाकजाकिस्तानआर्मेनियाउज्बेकिस्तान आदि कई राष्ट्र शामिल थेयुगोस्लाविया में भी एक से अधिक राष्ट्र थे

भारत आदिकाल से एक राष्ट्र हैइसमें बहुत से राजा थे , सिकंदर के आक्रमण के समय नंद साम्राज्य के साथ ही यहां बहुत से गणतंत्र थे

 भगवान बुद्ध का जन्म एक गणतंत्र में ही हुआ था नर्मदा के उत्तर में राजा हर्षवर्धन का राज्य था और दक्षिण में पुलकेशिन का। किन्तु भारतवर्ष का भू-भाग वृहत्तर और सांस्कृतिक था।

जर्मनी बरसों तक एक राष्ट्र रहापर 1945 से 1990 के बीच यह दो राज्यों में बंटा हुआ थाराष्ट्र और राज्य के अंतर को हमेशा याद रखना होगा

 राज्य एक राजनीतिक इकाई है जो कानून से चलती है 

कानून प्रभावकारी होइसके लिए राजा को शक्ति की आवश्यकता होती है 

यहूदियों को उनकी मातृभूमि से खदेड़ दिया गया थाऔर 1800 साल तक वे विभिन्न देशों में रहे ,पर वे कभी नहीं भूले कि फिलस्तीन उनकी मातृभूमि है 


दूसरी शर्त है साझा इतिहासआखिरकार इतिहास अतीत में घटी घटनाएं ही तो होती हैं इन घटनाओं में से कुछ के प्रति गर्व की अनुभूति होती है और कुछ लज्जा का कारण बनती हैं इतिहास की घटनाओं के प्रति खुशी और पीड़ा की एक जैसी भावनाओं वाले एक राष्ट्र बनाते हैं

 तीसरी और सबसे महत्त्व पूर्ण शर्त  है  एक  सामान जीवनमूल्य-प्रणाली में आस्था

यही मूल्य प्रणाली संस्कृति कहलाती है। दुनिया  के सभी राष्ट्र ये तीनों शर्तें पूरी करते हैं

 हमारे देश में ही इन शर्तों को लेकर विवाद हैं

भारत माता की जय और वंदे मातरम् का नारा लगाने में गर्व महसूस करने वाले कौन लोग हैंरामकृष्णचाणक्यविक्रमादित्यराणा प्रताप और शिवाजी तक अपना इतिहास मानने वाले कौन लोग हैं

वे कौन हैं जिनकी साझी मूल्य प्रणाली है?

 इस मूल्य प्रणाली का एक मुख्य सिद्धांत है विश्वासों और धर्मों की बहुलता में विश्वास करना सारी दुनिया इन लोगों को हिंदू के रूप में जानती हैइसलिए यह हिंदू राष्ट्र है

 इसका इस बात से कुछ लेनादेना नहीं है कि आप आस्तिक हैं या नास्तिकआप मूर्तिपूजा में विश्वास करते हैं या नहींआप वेदों को मानते हैं अथवा किसी अन्य धार्मिक ग्रंथ को

हमारे संविधान निर्माता इस बात को समझते थेइसीलिए संविधान की धारा 25 में कहा गया है कि ‘हिंदू शब्द में सिखजैन और बौद्ध धर्मावलाम्बियों का भी समावेश है.’ ।

यह ईसाइयत और इस्लाम को मानने वालों पर लागू क्यों नहीं होना चाहिए?

इसको एक विद्वान के संस्मरण से समझें -

"सत्रह साल तक मैं एक ईसाई कॉलेज में पढ़ाता था1957 में  एक वरिष्ठ ईसाई प्राध्यापक ने मुझसे पूछा क्या वे आर.एस.एस के सदस्य बन सकते हैं?

 मेरे हां कहने पर उन्होंने सवाल किया,‘इसके लिए मुझे क्या करना होगा?’ मैंने उत्तर दिया,आपको  चर्च छोड़ना पड़ेगा बाइबिल में विश्वास आप ईसा मसीह में अपनी आस्था भी बनाये रख सकते हैंपर आपको अन्य विश्वासोंधर्मों की वैधता को भी स्वीकारना होगा’ इसपर उन्होंने कहा मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता यदि मैं यह स्वीकारता हूं तो अपने धर्म का प्रसार नहीं कर पाऊंगा’ इस पर मैंने कहा-तब आप आरएसएस के सदस्य नहीं बन सकते हिंदू’ के बारे में हमारी समझ में जो भ्रम है, वह हिंदूवाद को एक पंथ मानने के कारण है। यह धर्म नहीं है "

साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोक कल्याण के कार्यों के लिए सदैव प्ररेणा देने का कार्य करता रहा है। प्रत्येक देश का साहित्य अपने देश की भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों से जुड़ा होता है ।भाषा के बिना यदि संस्कृति सर्मथहीन है तो संस्कृति के आभाव में भाषा अंधी।

 संस्कृति के पूरक तत्व भाषा के साथ-साथ देश के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, ज्ञान-विज्ञान, परम्परागत अनुभव, कला-प्रेम, जीवन यापन के भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र उसकी उदारता, सहिष्णुता और समस्त वसुधा को एक कुटुंब मानने में है । भारतीय संस्कृति गिरि शिखरों की भाँति उदात्त, गंगा की भांति निरंतर प्रवाहमान , समुद्र की तरह विशाल है।

 वह विधा-अविधा, श्रेय और प्रेय, अभ्युदय और निह्श्रेयस,  द्यावा-पृथिवी  सभी को आत्मसात करती हुई  विश्व को  ज्योतिर्मय करती आ रही है। 'आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।' सभी दिशाओं से शुभ विचार मेरी ओर आएँ।

सोहन लाल द्विवेदी कहते हैं -

पर्वत कहता शीश उठाकर , तुम भी ऊंचे बन जाओं ।

सागर कहता  लहराकर , मन में गहराई लाओ ।

पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ों , कितना ही हो सर पर भार।

नभ कहता है फैलो इतना , ढंक लो तुम सारा संसार।  (सोहनलाल द्विवेदी )

  

मणिं दत्वा

जिज्ञासा -मणिं दत्त्वा ततः सीता हनूमन्तमथाब्रवीत् । अभिज्ञानमभिज्ञातमेतद् रामस्य तत्त्वतः (१)मणि देने के पश्चात् सीता हनुमान्‌ जी से बोलीं- 'मेरे इस चिह्न को भगवान् श्री रामचन्द्र जी भलीभाँति पहचानते हैं (१) मणिं दृष्ट्वा तु रामो वै त्रयाणां संस्मरिष्यति । वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च (२)'इस मणि को देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियों का- मेरी माता का, मेरा तथा महाराज दशरथ का एक साथ ही स्मरण करेंगे ॥ २ ॥(श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे एकोनचत्वानरिंश: सर्ग:)दूसरे श्लोक में सीता कहती हैं,इस मणि को देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियों का- मेरी माता का, मेरा तथा महाराज दशरथ का एक साथ ही स्मरण करेंगे। बाल्मीकि जी तीनों के स्मरण का कारण नहीं बताते।मैं जो अनुमान लगा पा रहा हूं, 'यहां माता अर्थात् मायका, मेरा अर्थात सीता के वर्तमान परिस्थिति का,(इस मणि का प्रसंग दूसरी वार सर्ग 66/4 में आता है, जहां हनुमान जी जब श्रीराम को मणि देते हैं और सीता का संदेश बताते हैं कि इसे देखकर श्रीराम को जनन्या,मेरी और दशरथ का स्मरण होगा,तब राम कहते हैं,यह मणि हमारे श्वसुर ने सीता को दिया था। इसे देख कर मुझे वैदेहस्य, पिता दशरथ के दर्शन हो रहे हैं और ऐसा लग रहा है मानो सीता मिल गई है।यह मुद्रिका जनक को इंद्र ने दी थी।)  दशरथ याने ससुराल का।'⭐'मेरा ऐश्वर्य पूर्ण मायका, चक्रवर्ती सम्राट की बहू, अजेय राम की पत्नी।'⭐⭐क्या यह भी संकेत है कि आपातकाल में प्रत्येक बेटी /पत्नी/बहू को यही तीन स्मरण आते हैं?⭐⭐⭐और भी बहुत कुछ हो सकता है। बाल्मीकि कविपुंगव जो ठहरे।…............⭐ वृहत्तर कुटुम्ब के निहितार्थ।⭐⭐ कुटुम्ब का स्वाभिमान।⭐⭐⭐ कुटुम्ब की रक्षा में अपनी सुरक्षा।…...#परिवार प्रवोधन #अतीत का गौरव

संगम साहित्य 2

 

संगम साहित्य दक्षिण भारत के प्राचीन तमिल साहित्य की अत्यन्त महत्वपूर्ण परम्परा है। परम्परा के अनुसार कहा जाता है कि लगभग ईसा-पूर्व 9000 वर्ष से लेकर ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों तक विद्वानों और कवियों की कई सभाएँ (संगम) आयोजित हुईं, जिनमें अनेक साहित्यकार एकत्र होकर साहित्य की रचना और समीक्षा करते थे।

संगमों की संक्षिप्त जानकारी:(i) प्रथम संगम: इसका आयोजन प्राचीन नगर Thenmadurai में माना जाता है। इसमें अनेक ऋषि-कवि शामिल हुए, परन्तु इस संगम का साहित्य अब उपलब्ध नहीं है।(ii) द्वितीय संगम :यह Kapatapuram में आयोजित माना जाता है। यहाँ भी कई कवियों ने रचनाएँ कीं, लेकिन इनका अधिकांश साहित्य नष्ट हो गया।(iii) तृतीय संगम: इसका केन्द्र Madurai था। इसी संगम का साहित्य आज उपलब्ध है, जिसे Sangam Literature कहा जाता है। इसमें प्रमुख ग्रंथ एट्टुत्तोकै (आठ संग्रह) और पट्टुपाट्टु (दस गीत) हैं।महत्व: संगम साहित्य में प्रेम, वीरता, प्रकृति, समाज और राजनीति का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। यह तमिल भाषा और संस्कृति के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित हैउन्हें तमिल परंपरा 'महम्और 'इदम्नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैंजो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक 'संगमकी याद दिलाते हैं जिस में व्यष्टि और समष्टि के साथ साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उस को एक 'भारतजनमें परिणत करने वाली एक ऐसी 'संगम-दृष्टिहमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय सेन केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थीअपितु व्यष्टि एवं समष्टि के न्तर्गत आने वाले देह और देहीस्त्री और पुरुषव्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

 

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन 'अहम्बोर 'इदम्में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

 

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को 'राष्ट्रीतथा 'संगमनीकहा गया है। यही हमारे बहुभाषाभाषी भारतजन का 'संगमनकराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी नेआसेतु हिमालय तकइस महादेश को एक संस्-कृति दीएक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे 'अद्भुत संगमका निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकीऔर न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

 

ऋग्वेद ने 'संगच्छध्वं सवदध्वम्का जो महामंत्र इस रराष्ट्र के कानों में फूंका थावह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनोंआक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी 'संगमजीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

Monday, 16 March 2026

एक प्रसिद्ध महात्माके उद्गार।

एक प्रसिद्ध महात्मा के उद्गार

लोग मेरी पूजा करनेको बहुत उत्सुक रहते हैं; पर जब मैं उनसे उसकी पूजा करने को कहता हूँ, जिसकी पूजा मैं भी करता हूँ, तो वे मेरी बातों की उपेक्षा करते हैं। 

मुझे यह देखकर खेद होता है कि वे किसी सच्चे महात्मा को प्राप्त करने के अधिकारी नहीं। धूर्तों द्वारा ठगे जा सकते हैं, किंतु किसी भी सदाशय के हितकारी वचन उनके हृदय तक नहीं पहुँचते।

स्वार्थ ने संसार को अन्धा कर दिया है। लोग मुझे शरीर से निरपेक्ष और समदर्शी कहते हैं। आश्वर्य तो यह है कि मुख से ऐसा कहते समय भी वे मेरे द्वारा अपना कुछ लाभ होने की इसलिये आशा रखते हैं; क्योंकि वे मेरे निकट सम्पर्क में रहते और मेरी शारीरिक सेवाओं में तत्परता से लगे रहते हैं।

मैं स्पष्ट देखता हूँ कि लोग मुझे झूठा और महात्मा एक साथ समझते हैं। जब मैं उनसे कहता हूँ 'मुझमें कोई सिद्धि नहीं, मेरी चरणधूलि लेने या पूजा करने से कोई लाभ नहीं, मैं भी तुम्हारी भाँति साधारण पुरुष हूँ' तो वे इन शब्दों को हँसीमें उड़ा जाते हैं। इन पर वे विश्वास नहीं करते। इसके विरुद्ध मुझसे ऐसी आशा रखते। हैं, जिसे मैंने स्पष्ट अस्वीकार कर दिया है।

श्रद्धालु कहे जानेवालों की भीड़ चाहती है कि मैं दिन-रात उनके सामने बोला करूँ, उनके ऊटपटांग पदार्थ खाता रहूँ, इतने पर भी स्वस्थ रहूँ। वे साधन करने का अवकाश नहीं देना चाहते; परंतु साधननिष्ठ से होनेवाले लाभ को चाहते हैं। 

अच्छे भोजन, अच्छे वस्त्र में रखकर वे मुझे त्यागी कहते हैं। मैं सोचता हूँ कि वे मेरा उपहास कर रहे हैं।

स्त्रियों ने तो और भी ऊधम मचा रखा है। वे चाहती हैं कि एकान्त में मैं उनकी पूजा ग्रहण करूँ, उन्हें उपदेश दूँ। उनके अभिभावक भी यही चाहते हैं। 

साथ ही सब चाहते हैं कि मैं निर्विकार रहूँ। एक कलियुग के प्राणी से वह आशा की जाती है जो पराशर, विश्वामित्र, श्रृंगीऋषि प्रभृति के लिये भी विफल रही है।

जब तक ऐसी परिस्थिति है, धूर्तों से समाज को नहीं बचाया जा सकता। घृणित काण्डों का होना बन्द नहीं होगा ।साधक एवं महात्माओं को भगवान् ही बचायें तो बचें।

 प्रभु समाज को सुबुद्धि दें। वह अपने एवं साधकों के पतन इस मार्गसे बचे। [कल्याण दिसम्बर १९३९ ई०]

Friday, 13 March 2026

साहित्य और विचारधाराएं

जय गुरुदेव!
विचार एक ही है। विद्वान जन उसे अलग-अलग तरह से काल -परिस्थिति के अनुसार व्यवहारिक बना कर रखते हैं।

यद्यपि विचारधारा भी आईडिया का अनुवाद माना गया है। क्योंकि यह शब्द सर्वप्रथम फ्रा़सिसी साहित्यकार, दार्शनिक,विचारक द्वारा इसका प्रयोग अठारहवीं सदी में किया गया है।

भारत में 'विचारधारा' शब्द 19वीं बीसवीं सदी में आलोचना के मंच से आया। जिसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने आगे बढ़ाया।

भारतीय ज्ञान परम्परा में 'विचार' शब्द योग वशिष्ठ में आया है। जहां वशिष्ठ जी श्री राम जी को 'विचार' का महत्व बता रहे हैं।

यह ठीक है कि वैदिक, तमिल-संगम, नास्तिक -लोकायत में यह विचारधारा शब्द विमर्श, तत्व चिंतन और प्रज्ञा प्रवाह या विचार प्रवाह के रूप में आता है।

निहितार्थ इतना की भारतीय ज्ञान परम्परा में ' मैं एक हूं,अनेक होऊं।' पहला विचार (इच्छा) है। यह तब के कई युगों पूर्व का है, जब जम्बूद्वीप ही वैचारिक यज्ञ कुंड का एक मात्र स्थान था।

दूसरा भारत भूमि को ठीक से समझें तो हिमालय में कश्यप, आज की श्रीलंका में मारीच, तमिल में ईसा पूर्व 900 सौ वर्ष पहले तमिल संगम की अध्यक्षता अगस्त्य ऋषि कर रहे हैं। नैमीषारण्य की वैदिक और बौद्धिक चर्चा जन जन को ज्ञात है।
लगभग इसी समय शंकराचार्य -मंडन मिश्र विमर्श चल रहा है।

 नास्तिक विचारधाराओं का उदय भी चार्वाक,ब्राहस्पत्य, तथा जैन और बौद्ध विचारों के साथ आगे बढ़ रहे थे।

आस्तिक धारा दर्शन के रूप में सामने थी।
तमिल-संगम में अहम् और इदम् की चर्चा अर्थात व्यक्ति से समष्ठि का संगम चल रहा था।

भारत की उक्त सभी दर्शनों, मतों, विचारधाराओं, तत्व चिन्तनों के मूल में एक ही तत्व विद्यमान था 'पूर्णता'का।  
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

सार यह कि भारत कल से आज तक पूर्णता में विचार करता है।

अठारहवीं शताब्दी की विचारधारा और उसके बाद के अनेक शब्द - मार्क्सवादी भारत में (1936), गांधीवाद, प्रयोगवाद आदि- आदि जितने भी वाद हैं, सभी अपूर्ण और एकांगी हैं। भौतिकवादी हैं। वहां दर्शन अनुपस्थित है। मार्क्स की राजनीति और आर्थिक विचारधारा से भारत के अर्थ और काम को निकाल देने का परिणाम नक्सलवाद, प्रगतिशीलता बन गयी।

गाधी की सत्य अहिंसा आस्तिक योग की शब्दावली है। सत्य, अहिंसा,अस्तेय योग, वेदांग से लेकर स्मृतियों तक भरा पड़ा है। दुर्भाग्यवश इसे मील की पत्थर की तरह गांधीवाद और गांधी दर्शन बता कर स्वतंत्रता के बाद से छायावाद तक खूब डमरू बजाया। हर विषय गांधी से शुरू और गांधी में खत्म। बाद में राजनीति में तो ब्रह्मास्त्र बन गया।

जैसे 'उतिष्ठत जाग्रत...' उपनिषद् का वाक्य विवेकानंद जी के नाम से शिक्षा संस्थानों में चिपक गया।

विचार करें , हमने साहित्य और शिक्षा को बड़ी चतुराई से वैदिक धारा से काट कर बीसवीं सदी में मील के पत्थरों की तरह गंतव्य बना दिया।

राष्ट्रनीति को राजनीति के तराज़ू में रख कर 'सब धान बाइस पसेरी' कर दिया।

काल मार्स के चिंतन के पहले यदि भारत के चारों पुरुषार्थ की बात बताई जाती तो शायद स्वाधीनता के बाद के साहित्य , शिक्षा और राजनीत के विचारधारा की धार ही कुछ और होती।

विचारधारा जब खंड -खंड में बहती है, तब नदी नालों की तरह तबाही मचाती हैं।

विचारधारा जब पूर्णता में रहती है तो (सुरसरिता) गंगा बनती है, त्रिवेणी बनती है और सभी विचारधाराओं को लेकर सागर रूपी ज्ञान परम्परा में समाहित होकर घाट -घाट में, पाट -पाट में तीर्थ स्थापित करती हैं, जहां संस्कृति वर्धित होती है। धर्म,अर्थ और काम का संतुलन बना रहता है।

दरअसल पूर्णता की दृष्टि ही 'परा' से आती है। यह भारतीय (हिन्दू) परम्परा है। जहां अतिचेतन है। जब कि पश्चिम की यात्रा हमारे लोकायत दर्शन की तरह शरीर और मन में ही समाप्त हो जाती है।

इसका अर्थ यह कतई नहीं की पश्चिम में यह दृष्टि मिलती ही नहीं है। वहां वह क्वचित है तो भारत में वंचित तक में है।

इसलिए विचारधाराओं का साहित्य में प्रवेश तब तक वर्जित नहीं, जब तक वह मानवता के कल्याण के लिए है (पश्चिम की तरह व्यक्तिवादी नहीं), सांस्कृतिक संवर्द्धन के लिए है। राष्ट्रीय चिति -चेतना की पोषक है और उसकी दृष्टि वैश्विक (सर्वेभवन्तु सुखिन:...) है। तुलसी बाबा के शब्दों में लोक-मंगल है, सिया राम मय सम्पूर्ण जगत है। स्व का बोध है। 

आप धर्म को न माने, संस्कृति को न माने, परम्परा को छोड़ दें किंतु आप अपने 'स्व' को नहीं छोड़ सकते , क्योंकि आप जन्म से 'स्व' को लेकर आते हैं। अन्यथा बच्चे के पैदा होते ही उसका बोध मां के दूध में समाप्त हो जाता, संतुष्ट हो जाता।

किंतु ऐसा होता नहीं। तब वह भौतिक व्यवस्था को प्राप्त करने के बाद भी 'स्व' की तलाश करता हुआ उसी 'एकोऽहम द्वितीयो नास्ति' तक जाने का प्रयत्न नहीं करता और न ही मार्क्सवादी, गांधीवादी, लेनिन वादी, जनवादी, प्रगति वादी की घोषणा ही कर सकता!

इसलिए 'पूर्णता में देखना भारतीय विचार धारा' जीवन के हर क्षेत्र में नितांत आवश्यक है। 

आखिर जो साहित्य में विचाराधाराओं का विरोध करते हैं उनकी भी तो अपनी एक विचारधारा है, अन्यथा उन्हें विचारधारा की समझ ही कैसे होती?

भारतीय विचारधारा का नाम समन्वय है, सौहार्द है, लोक कल्याण है। इसका स्वरूप अखंड मंडलाकार है।
सादर धन्यवाद 
मुक्तिबोध पीठ के कार्यक्रम में यह मेरे वक्तव्य का सार है।
13/02/26
भोपाल