SRIJANKIAANCH
Wednesday, 24 June 2026
हनुमानाष्टक
प्रार्थना
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।1।।
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्तः स्थमीश्वरम्।।2।।
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।3।।
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ।।4।।
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।5।।
यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।6।।
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-
भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7
Sunday, 21 June 2026
श्रीनवग्रहस्तोत्रम्
श्री शिव कवच
साधारण मनुष्यों हेतु कार्य-पद्धतियाँ
साधारण मनुष्यों हेतु कार्य-पद्धतियाँ
१.विचार-प्रसारण (Thought Broadcasting): * विचार=रेडियो तरंगें। योगियों की शक्तिशाली विचार-तरंगें वैज्ञानिकों/विचारकों को प्रेरणा देती हैं। अनेक महान आविष्कार = दिव्य प्रेरणा का परिणाम।
२. सामूहिक कर्म-शमन (Collective Karma Mitigation): *तपशक्ति द्वारा युद्ध, आपदा और नकारात्मकता का संतुलन।
* शांति-तरंगें पृथ्वी हेतु “सुरक्षा कवच” बनती हैं।
३. सूक्ष्म सहायता (Astral Assistance): *सच्ची पुकार पर योगी सूक्ष्म शरीर से प्रकट होते हैं। *स्वप्न, संकेत या अज्ञात व्यक्ति के रूप में मार्गदर्शन। * संकट से रक्षा एवं आध्यात्मिक सहायता।
४. आध्यात्मिक रिले स्टेशन (Spiritual Relay Station):* योगी ब्रह्मांडीय ऊर्जा को ग्रहण कर सामान्य मानव हेतु अनुकूल बनाते हैं। *वे “ट्रांसफॉर्मर” की तरह दिव्य शक्ति को सहनीय रूप में प्रवाहित करते हैं।* परिणाम = संसार में शांति, भक्ति और संतुलन।
५. गुप्त शिष्यों द्वारा कार्य:* साधारण रूप में समाज के बीच रहकर सेवा। *डाक्टर, शिक्षक, मजदूर, कर्मचारी आदि रूपों में मानवता का मार्गदर्शन।*ज्ञानगंज के आचार्य अप्रत्यक्ष रूप से समाज-परिवर्तन कराते हैं।
"एक सच्चा गुरु कभी अपने शिष्य को अकेला नहीं छोड़ता। दूरी केवल शरीर की होती है, चेतना की नहीं।" - स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि
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◆ ‘द होली साइंस’ (कैवल्य दर्शनम्) के अनुसार काल-गणना ◆
१. युगांतर का गणित (Correct Yuga Cycle): * कलयुग = १२०० वर्ष। * कलयुग का अंधकारमय अंत = ई. स. ४९९।* सन् १७०० = चढ़ते हुए द्वापर युग का प्रारंभ। *आधुनिक विज्ञान, बिजली और ऊर्जा-विज्ञान का तीव्र विकास = द्वापर युग का प्रभाव।* मानव चेतना = पदार्थ से ऊर्जा की ओर अग्रसर।
२. ज्ञानगंज के योगियों का दृष्टिकोण:* महासिद्ध = युग -परिवर्तन के निरीक्षक (Overseers)।* द्वापर → त्रेता → सत्ययुग = चेतना का क्रमिक उत्कर्ष।* भविष्य में टेलिपैथी और सूक्ष्म-दृष्टि का पुनर्जागरण।* भविष्य का विज्ञान = चेतना-आधारित विज्ञान।*संकल्प-शक्ति द्वारा ब्रह्मांडीय यात्रा संभव।* सत्ययुग = ज्ञानगंज और सामान्य मानव समाज के बीच का पर्दा समाप्त।*मानव और सिद्ध पुरुषों का सह-अस्तित्व।
३. परिवर्तन काल (Transition Period):* युग-परिवर्तन = पुरानी सोच और नई चेतना का संघर्ष।* ज्ञानगंज के योगी = वैश्विक ऊर्जा-संतुलनकर्ता।* शांति-केंद्र एवं आध्यात्मिक संस्थाएँ = उच्च ऊर्जा ग्रहण करने की तैयारी।* उद्देश्य = मानवता को विनाश से बचाकर चेतना-उत्कर्ष की ओर ले जाना।
४. वर्तमान समय का महत्व:* वर्तमान काल = “आध्यात्मिक फसल” का समय।* क्रियायोग जैसी वैज्ञानिक साधनाएँ = तीव्र आत्म-विकास का माध्यम।* ब्रह्मांडीय तरंगें = Evolution (उत्कर्ष) के पक्ष में सक्रिय।* साधना की गति = पूर्व युगों की तुलना में अधिक तीव्र।
सूत्ररूप सार : “कलियुग से द्वापर की ओर बढ़ती मानवता अब पदार्थ से ऊर्जा, और ऊर्जा से चेतना की यात्रा पर है; ज्ञानगंज के सिद्ध इस संक्रमण के मौन मार्गदर्शक हैं।”
"युग बदल रहे हैं, और उनके साथ मनुष्य की नियति भी। अब सोने का समय नहीं, बल्कि जागने और अपनी दिव्य शक्ति को पहचानने का समय है।" - परमहंस योगानंद
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◆ क्रियायोग के ५ मुख्य सूत्र ◆
१. “दोहरे जीवन” का अभ्यास (Double Life): * बाहर से सक्रिय, भीतर से मौन।* कार्य करते हुए भी श्वास एवं ‘हं-सौ’ पर सजगता।→ कर्म + ध्यान = थकान रहित ऊर्जा।
२. सुबह और रात का “सुनहरा समय”: *भोर का ध्यान=पूरे दिन का आध्यात्मिक कवच। → रात्रि का क्रियायोग = तनाव-विसर्जन एवं योग-निद्रा।→ नियमित साधना = चेतना की स्थिरता।
३. “शांत रहकर काम करो” (निष्काम कर्म): 'युग-परिवर्तन' में आपकी भूमिका- क्रियायोग से भीतर जो शांति पैदा होती है, वह परिवार, कार्यक्षेत्र और अंततः पूरे ब्रह्मांड की तरंगों (Vibrations) को बदलती है। यही वह सूक्ष्म तरीका है जिससे एक साधारण गृहस्थ 'सत्ययुग' को पृथ्वी पर लाने में मदद करता है।
"संसार को छोड़ना समाधान नहीं है; संसार में रहकर संसार को अपने भीतर न आने देना ही असली योग है।" -लाहिड़ी महाशय
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'द होली साइंस' (कैवल्य दर्शनम) सूत्र रूप
मूल परिचय: रचयिता : स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि । रचना वर्ष : १८९४ । प्रेरणा : महावतार बाबाजी का आदेश । उद्देश्य : पूर्व और पश्चिम के दर्शन का समन्वय ।
१. युग-चक्र सूत्र: युग चक्र = २४,००० वर्ष । सौर मंडल = द्वितारा (Binary Star) प्रणाली का भाग । वर्तमान काल = द्वापर युग । द्वापर युग = ऊर्जा एवं विज्ञान का युग । आधुनिक उन्नति = विद्युत + परमाणु शक्ति + अंतरिक्ष विज्ञान का परिणाम
२. कैवल्य के चार सूत्र: (i) वेद सूत्र- सभी धर्म = एक सत्य की भिन्न अभिव्यक्ति । गीता + बाइबल = एक ही आध्यात्मिक अनुभव । (ii) अभिष्ट सूत्र: जीवन का लक्ष्य = दुःख निवृत्ति + आनंद प्राप्ति । (iii) साधन सूत्र: क्रियायोग = आत्मोन्नति की वैज्ञानिक विधि । आत्म-संयम = चेतना शुद्धि का साधन । (iv) विभूति सूत्रल: उच्च साधना = सिद्धियाँ + आत्मप्रकाश । अंतिम अवस्था = कैवल्य (मोक्ष) ।
३. तत्त्व एवं चेतना सूत्र: शरीर = २४ तत्त्वों का संयोजन । चेतना प्रवाह । : चित्त → अहंकार → बुद्धि → इंद्रियाँ → भौतिक जगत । रीढ़ + मस्तिष्क = विद्युत-चुंबकीय यंत्र । क्रियायोग = ब्रह्मांडीय चेतना ग्रहण करने की प्रक्रिया ।
४. बाबाजी उद्देश्य सूत्र: योग = विज्ञान + गणित + चेतना का अनुशासन । कृष्ण + बुद्ध + ईसा = सार्वभौमिक सत्य के विभिन्न स्वर ।
५. मुक्ति सूत्र: “मुक्ति शरीर की मृत्यु नहीं, अज्ञान की मृत्यु है।” * प्राणशक्ति नियंत्रण = काल और स्थान पर विजय। * आत्मज्ञान = वास्तविक स्वतंत्रता। *चेतना विस्तार = ब्रह्मानुभूति ।
सार सूत्र: “क्रियायोग द्वारा चेतना को शुद्ध कर मनुष्य अपनी दिव्य सत्ता का अनुभव करता है; यही कैवल्य है।”
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‘द होली साइंस’ - बाइबल और वेदों का सूत्र-संगम
१. ॐ–आमीन सूत्र: ॐ = Amen = Word = ब्रह्मांडीय कंपन। “आदि में शब्द था” = सृष्टि का मूल स्पंदन। प्रणव (ॐ) = ईश्वर का ध्वनि-स्वरूप । ब्रह्मांड = कंपन से निर्मित चेतन ऊर्जा ।
वाक्य सूत्र: “शब्द ही ईश्वर है, और ॐ उसी शब्द का अनुभव है।”
२. सात चर्च–सात चक्र सूत्र: Seven Churches = शरीर के सात चक्र । Seven Stars = चेतना के सात केंद्र । रीढ़ = आध्यात्मिक मार्ग । क्रियायोग = चक्र जागरण की प्रक्रिया । सहस्रार = स्वर्ग चेतना ।
चेतना प्रवाह :मूलाधार → स्वाधिष्ठान → मणिपुर → अनाहत → विशुद्ध → आज्ञा → सहस्रार।
३. पवित्र आत्मा–प्राण सूत्र: Holy Ghost = प्राण शक्ति । वास्तविक बपतिस्मा = आंतरिक चेतना जागरण। दिव्य अनुभव = प्राण के शुद्ध प्रवाह से । श्वास नियंत्रण = आत्मिक प्रकाश का द्वार ।
योग सूत्र: “जहाँ प्राण स्थिर, वहाँ मन स्थिर; जहाँ मन स्थिर, वहाँ ईश्वर प्रकट।”
४. ज्ञान वृक्ष–मेरुदंड सूत्र: Garden of Eden = मानव चेतना । Tree of Knowledge = मस्तिष्क + मेरुदंड । सर्प = नीचे की ओर बहती जीवन ऊर्जा । पतन = चेतना का इंद्रियों में फँसना । उत्थान = ऊर्जा का ऊपर सहस्रार की ओर आरोहण।
क्रियायोग सूत्र: अधोगामी ऊर्जा = बंधन । ऊर्ध्वगामी ऊर्जा = मुक्ति ।
५. स्वर्ग राज्य सूत्र: “Kingdom of God is within you” = स्वर्ग भीतर की चेतना अवस्था । कूटस्थ (तीसरी आँख) = दिव्य द्वार । ध्यान = आंतरिक स्वर्ग का अनुभव । कैवल्य = आत्मा की परम स्वतंत्रता ।
६. सार्वभौमिक धर्म सूत्र: धर्म अनेक, सत्य एक । कृष्ण + बुद्ध + ईसा = एक ही चेतना के विभिन्न प्रकाश। बाहरी मतभेद = आंतरिक एकता का आवरण। विद्युत उपमा: तार अलग-अलग। धारा एक । धर्म अलग-अलग। दिव्य प्रकाश एक ।
सार सूत्र: *“जब मनुष्य भीतर के शब्द, प्रकाश और प्राण को पहचान लेता है, तब उसे ज्ञात होता है कि सभी धर्म एक ही सनातन सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।” * "सत्य का कोई देश या धर्म नहीं होता; वह विज्ञान की तरह अटल है।" -स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि
पाँच क्लेश- सूत्र रूप
पाँच क्लेश- सूत्र रूप में :
(पतंजलि योगसूत्र की स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि द्वारा व्याख्या)
मूल क्लेश सूत्र: “अज्ञान ही वह पर्दा है जो आत्मा और परमात्मा के बीच खड़ा है।”
क्लेश श्रृंखला: अविद्या → अस्मिता → राग → द्वेष → अभिनिवेश ।
१. अविद्या सूत्र: अविद्या = आत्म-विस्मृति । शरीर को आत्मा मानना = मूल भ्रम । नश्वर को शाश्वत समझना = अज्ञान । समस्त दुःखों का मूल = अविद्या ।
चेतना सूत्र: “सपने को सत्य मान लेना ही अविद्या है।”
२. अस्मिता सूत्र: अविद्या से उत्पन्न = अहंकार । “मैं शरीर हूँ” = झूठी पहचान । आत्मा का बुद्धि और देह से तादात्म्य = अस्मिता । परिणाम = ब्रह्म चेतना से अलगाव ।
विज्ञान सूत्र: सीमित ‘मैं’ = अस्मिता । असीम ‘मैं’ = आत्मा ।
३. राग सूत्र : सुख की स्मृति = आसक्ति । इंद्रिय सुख = बंधन का कारण । “मुझे यह चाहिए” = राग का स्वरूप । राग = संसार चक्र की जंजीर । मन सूत्र: “जहाँ आकर्षण है, वहाँ बंधन है।”
४. द्वेष सूत्र: दुःखद अनुभव = घृणा । सुख की चाह + दुःख से भागना = मानसिक अशांति । राग और द्वेष = मन के दो झूले । संतुलन सूत्र: आकर्षण और विकर्षण से ऊपर उठना = योग ।
५. अभिनिवेश सूत्र: मृत्यु का भय = देह आसक्ति । आत्मा को शरीर मानना = भय का कारण । = भय का अंत ।
अमरत्व सूत्र: “जो स्वयं को आत्मा जान लेता है, उसके लिए मृत्यु केवल परिवर्तन है।”
क्लेश-निवारण सूत्र: विवेक = अविद्या का नाश । ध्यान = अहंकार का शमन। वैराग्य = राग-द्वेष से मुक्ति। आत्मज्ञान = मृत्यु भय का अंत । क्रियायोग = चेतना शुद्धि का विज्ञान।
सार सूत्र: “जब मनुष्य स्वयं को शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना अनुभव करता है, तब पाँचों क्लेश स्वतः नष्ट हो जाते हैं और कैवल्य का प्रकाश प्रकट होता है।”
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पाँच क्लेशों से मुक्ति का मार्ग :
सयम और क्रियायोग।
* हृदय का शुद्धिकरण: जब हृदय की भावनाएँ शुद्ध होती हैं, तो 'राग' और 'द्वेष' शांत हो जाते हैं।
* बुद्धि का जागरण: जब बुद्धि जागृत होती है, तो 'अस्मिता' (झूठा अहंकार) गल जाता है।
* कैवल्य: जब ये पाँचों क्लेश मिट जाते हैं, तो साधक 'कैवल्य' (परम मुक्ति) की अवस्था में पहुँच जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि साक्षात् चैतन्य है।
"जब तक मन इन पाँच क्लेशों के प्रभाव में है, वह एक गंदे दर्पण की तरह है जिसमें ईश्वर का प्रतिबिंब साफ नहीं दिखता। क्रियायोग इस दर्पण को साफ करने की प्रक्रिया है।"- स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि
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• क्षिप्त — रजोगुणी, चंचल और इच्छाओं-क्रोध से व्याकुल मन।
• मूढ़ — तमोगुणी, आलस्य, अज्ञान और जड़ता से भरा मन।
• विक्षिप्त — कभी एकाग्र, कभी भटकता; साधना का प्रारम्भिक स्तर।
• एकाग्र — सत्त्वप्रधान, मन एक ध्येय पर स्थिर; समाधि का आरम्भ।
• निरुद्ध — चित्तवृत्तियों का पूर्ण शांत होना; कैवल्य या परम समाधि।
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श्री युक्तेश्वर जी का समाधान: क्रियायोग द्वारा प्राण को स्थिर कर मन को क्षिप्त-मूढ़ अवस्था से उठाकर एकाग्र और अंततः निरुद्ध अवस्था तक पहुँचाया जाता है। “चित्त का निरोध ही योग है; मन शांत होने पर आत्मा अपना वास्तविक स्वरूप देखती है।” —
* इन पाँच अवस्थाओं को जानकर हम अपनी साधना का आत्म-विश्लेषण (Self-analysis) कर सकते हैं।
* स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि जी ने 'द होली साइंस' में "हृदय के चार चरणों" (Four Stages of the Heart) का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है।
* चित्त की अवस्थाओं को बदलने के लिए हृदय का शुद्ध होना अनिवार्य है, क्योंकि जब तक हृदय में भावनात्मक गंदगी (मल) है, तब तक बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती।
* इन चार चरणों को पार करके ही एक साधक 'कैवल्य' या पूर्ण मुक्ति तक पहुँचता है:
चार चरण -
१. शुद्ध (Sudra/The Servant Stage): यह हृदय की वह प्राथमिक अवस्था है जहाँ व्यक्ति केवल अपनी भौतिक इंद्रियों और शरीर के सुखों की सेवा करता है।
(i) लक्षण: इस चरण में मनुष्य बाहरी दुनिया के आकर्षणों का दास होता है। उसका हृदय 'अंधकार' में होता है और वह केवल भौतिक लाभ-हानि को समझता है।
(ii) साधना: यहाँ व्यक्ति को केवल 'अनुशासन' और 'सेवा' के माध्यम से ऊपर उठने की प्रेरणा दी जाती है।
२. क्षत्रिय (Kshatriya/The Warrior Stage): जब साधक अपने भीतर के विकारों (काम, क्रोध, लोभ) से लड़ना शुरू करता है, तो वह 'क्षत्रिय' अवस्था में आता है।
(i) लक्षण: यहाँ हृदय में संघर्ष होता है। साधक अपनी बुरी आदतों को छोड़ने का प्रयास करता है। वह अब केवल शरीर नहीं, बल्कि 'ऊर्जा' और 'इच्छाशक्ति' के स्तर पर सक्रिय होता है।
(ii) साधना: यहाँ 'धैर्य' और 'साहस' की आवश्यकता होती है।
३. वैश्य (Vaisya/The Cultivator Stage): इस चरण में साधक आध्यात्मिक अनुभवों का "संग्रह" करना शुरू करता है।
(i) लक्षण: यहाँ हृदय अधिक सूक्ष्म हो जाता है। साधक यह समझने लगता है कि आंतरिक शांति और ईश्वरीय आनंद ही वास्तविक संपत्ति है। वह संसार और अध्यात्म के बीच तुलना करना सीख जाता है।
(ii) साधना: यहाँ 'एकाग्रता' और 'ज्ञान' का संचय मुख्य उद्देश्य होता है।
४. ब्राह्मण (Brahmin/The Knower Stage): यह हृदय की उच्चतम अवस्था है जहाँ साधक 'ब्रह्म' (परमात्मा) को जानने के योग्य हो जाता है।
(i) लक्षण: यहाँ हृदय के सारे विकार (राग-द्वेष) समाप्त हो जाते हैं। हृदय दर्पण की तरह स्वच्छ हो जाता है जिसमें परमात्मा का प्रकाश साफ़ दिखता है। यहाँ साधक को अनुभव होता है कि "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ)।
(ii) साधना: यहाँ केवल 'समर्पण' और 'समाधि' शेष रहती है।
श्री युक्तेश्वर जी का निष्कर्ष: * ये चार चरण जन्म आधारित 'जाति' नहीं हैं, बल्कि हृदय के विकास के स्तर हैं।
एक व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण हो सकता है, लेकिन यदि उसका हृदय केवल भौतिक सुखों में लगा है, तो वह आध्यात्मिक रूप से 'शुद्ध' (सेवक) स्तर पर ही है।
* "जब हृदय इन चार चरणों को पार कर लेता है, तब वह 'परमहंस' की अवस्था प्राप्त करता है—जहाँ संसार और ईश्वर का भेद मिट जाता है।" -स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि
साधक की चेतना
साधक की चेतना
*प्राण और अपान का संतुलन ही वह कुंजी है जिससे एक योगी अपने भौतिक शरीर को 'प्रकाश' में बदल देता है और महासमाधि प्राप्त करता है।
* तब साधक की चेतना (प्रकाश) बाहरी दुनिया से हटकर रीढ़ के भीतर 'सुषुम्ना' मार्ग से होती हुई आज्ञा चक्र या 'कूटस्थ' पर केंद्रित हो जाती है।
* यहाँ उस दिव्य प्रकाश और नाद (ध्वनि) का एक सिद्ध योगी अनुभव करता है:
१. कूटस्थ चैतन्य की ज्योति (The Spiritual Eye : जब साधक अपनी आँखें बंद कर दोनों भौहों के बीच एकाग्र होता है, तो उसे एक 'त्रिवर्ण' (तीन रंगों वाला) तारा दिखाई देता है, जिसे 'आध्यात्मिक नेत्र' कहा जाता है:
(i) बाहरी सुनहरा घेरा (Golden Halo): यह 'ब्रह्मांडीय ऊर्जा' या पवित्र आत्मा (Holy Ghost) का प्रतीक है।
(ii) भीतरी गहरा नीला गोला (Opal Blue): यह 'कृष्ण चेतना' का प्रतीक है, जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है।
(iii) केंद्र में सफेद तारा (Five-pointed Silver Star): यह 'परमेश्वर' या 'पिता' (Cosmic Consciousness) का द्वार है।
योगिराज लाहिड़ी महाशय कहते थे कि इस तारे के भीतर प्रवेश करना ही वास्तविक 'पुनर्जन्म' है।
२. अनाहत नाद (The Cosmic Sounds): जैसे-जैसे ध्यान गहरा होता है, साधक को केवल प्रकाश ही नहीं, बल्कि विशिष्ट ध्वनियाँ भी सुनाई देती हैं।
ये ध्वनियाँ ब्रह्मांड के विभिन्न स्तरों (चक्रों) के कंपन हैं:
(i) मूलाधार- भौंरे की गुंजन (Humming of a Bee), पृथ्वी तत्व की ऊर्जा।
(ii) स्वाधिठान: बासुरी की तान (flute), जल तत्व का स्पंदन ।
(iii) मणिपुरक - वीणा या हार्व की ध्वनि (Harp), अग्नि तत्व का तेज ।
(iv) अनाहत : घंटे की गूंज (Bell or Gong), वायु तत्व की व्यापकता ।
(v) विशुद्द : समुद्र की गर्जना , आकाश तत्व की अनंता ।
अंत में, ये सभी ध्वनियाँ मिलकर एक भव्य 'ओम्' (ॐ) की ध्वनि में विलीन हो जाती हैं।
३. 'कूटस्थ' दर्शन का वैज्ञानिक प्रभाव: जब साधक कूटस्थ के इस प्रकाश को देखता है, तो उसके मस्तिष्क की कोशिकाएं (Cells) दिव्य ऊर्जा से नहा जाती हैं।
परिणाम -(i) भ्रम का नाश: इस ज्योति को देखने के बाद साधक को यह प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि 'प्रकाश' है।
(ii) सर्वव्यापकता: नीले गोले के माध्यम से योगी अपनी चेतना को पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ महसूस करता है। वह चींटी से लेकर तारों तक, हर जगह खुद को ही देखता है।
४. "यदि तुम्हारी आँख एक हो...": 'कूटस्थ' या तीसरी आँख है, जहाँ दो भौतिक आँखों की दृष्टि मिलकर एक दिव्य अंतर्दृष्टि बन जाती है।
"यह तारा वह द्वार है जिससे होकर हर साधक को गुजरना पड़ता है ताकि वह अंधकार से निकलकर अनंत प्रकाश के साम्राज्य में प्रवेश कर सके।" — परमहंस योगानंद
यह अनुभव साधना की परिपक्वता का प्रमाण है और साधक के भीतर के भय और मृत्यु के बोध को हमेशा के लिए समाप्त कर देता है।
21/6/26 ..........................................