SRIJANKIAANCH
Sunday, 22 March 2026
नारी चेतना के भारतीय प्रतिमान
राम का चारित्रिक वैशिष्ट्य
(4)
राम का चारित्रिक वैशिष्ट्य
वाल्मीकि रामयण में महर्षि वाल्मीकि ने नारद जी से प्रश्न किया कि ‘इस समय सारे भूमण्डल और नव द्वीपों में ऐसा कौन सा अपूर्व मेधावी, विद्वान, परोपकारी, ज्ञान-विज्ञान में पारंगत, धर्मात्मा तथा समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति है ? जो मनुष्य मात्र का ही नहीं, चर-अचर और प्राणि मात्र का कल्याण करने के लिये सदैव तत्पर रहता हो? जिसने अपने पराक्रम और त्याग से संपूर्ण इन्द्रियों, विषय-वासनाओं एवं मन को वश में कर लिया हो, जो कभी क्रोध, अहंकार जैसी दुष्प्रवृतियों के वशीभूत न होता हो? यदि ऐसा कोई महापुरुष आपकी दृष्टि में आया हो तो कृपया संपूर्ण वृतान्त मुझे सांगोपांग सुनाइये ।
प्रश्न के उत्तर में महर्षि नारद कहते हैं - ‘हे मुनिराज! ऐसी महान विभूति का नाम रामचन्द्र है। उन्होंने वैवस्वत मनु के वंश में महाराजा इक्ष्वाकु के कुल में जन्म लिया है। वे अत्यंत वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करनेवाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादा पुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत वत्सल, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं।’
अब ज़रा राम के संपूर्ण चारित्रिक वैशिष्ट्य को जो बाल्मीकि-नारद संवाद में रामायण में आया है, कुबेरनाथ जी के शब्दों में समझें - ‘रामकथा सविता-कथा है। इसकी प्रकृति सूर्यात्मक है और यह द्यु-मण्डल का काव्य है जो सगुण सृष्टि के विकास का ‘आदि’ रूप है। इसी से यह ‘आदिकाव्य’ कहा जाता है। इसका अधिदेवता है विष्णु का सवितारूप जो सोम और अग्नि के ‘विस्तार’ रूपों का आदि बिन्दु है। क्रियाशक्ति-प्रधान होने से यह ‘गार्हस्थ्य’ का महाकाव्य है।
यह बात धनुर्भग के अवसर पर ही स्पष्ट हो जाती है। रामचन्द्र ने जब धनुष तोड़ा तो उसके तीन खण्ड हो गये। वह शिव-पिनाक त्रिगुणात्मक प्रकृति का प्रतीक था जो शिव के वाम भाग में रहती है। ऊपरवाला खण्ड ज्ञान-खण्ड था जो व्योम में चला गया। नीचेवाला खण्ड इच्छा-खण्ड था जो पाताल में प्रवेश कर गया। रह गया मध्य-खण्ड जो क्रिया-खण्ड था। उसे ही राम ने धरती पर रख दिया।
रामावतार में ज्ञान और इच्छा यवनिका के पीछे ठेल दिए जाते हैं। रंगमंच
पर क्रियाशक्ति ही खेलती है। इस काव्य का आदर्श ही है ‘अनासक्त पुरुषार्थ-योग’ ।’ जिसे
राम के चरित्र में पाते हैं ।
राम के क्रिया योग में गृहस्थ धर्म
और नागरिक धर्म का अत्यधिक महत्व है। इसलिए रामकथा में गृहस्थ जीवन का सम्पूर्ण
वृत्त उतर आया है। राम कथा का आधार मानवीय धरातल है। इसमें गृहस्थ और नागरिक शील
है।
कुबेरनाथ जी कहते हैं, ‘कथा के अन्दर अर्थ का त्रिपुर है। मानवीय धरातल पर यह कथा है पारिवारिक शील के आदर्शों की। अधिदैवी धरातल पर यह कथा है देवासुर-द्वन्द्व की, जिसमें राम प्रच्छन्न ‘इन्द्र’ हैं। परन्तु शाश्वत तल पर यह कथा है द्यु-मण्डल के सविता की। राम द्यु-मण्डल के सविता (सगुण परमात्मा), अन्तरिक्ष के इन्द्र तथा पार्थिव-मण्डल के राजा राम तीनों के प्रतीक हैं।
सविता सूर्य का आदिरूप है। इन्द्र भी बारह आदित्यों में से एक है। राघव राम सूर्यवंशी हैं। अतः तीनों स्तर पर राम सूर्य-प्रतीक से जुड़े हैं। कथा में राम को विष्णु का अवतार कहा गया है। विष्णु आदित्य है। विष्णु ही नारायणरूप सविता तथा सहस्रशीर्षा परमात्मा भी है।’ राम सूर्य की ही तरह ‘शरण्यं सर्वभूतानां’ - पुरुष हैं।
सूर्य ‘ऋत’ का नियामक और ऋत का अनुगामी रहता है। उसके ‘ऋत’ (विधान या नियमचक्र) का छन्द कभी पतित नहीं होता, कभी टूटता नहीं। मनुष्य जीवन में ‘शील’ ही ऋतरूप है। राम के शील का छन्द कभी पतित नहीं होता। वे ऋत-मार्ग से कभी भ्रष्ट नहीं होते। इसी से उन्हें ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ कहा गया है।
ऋत की मर्यादा का शत-प्रतिशत निर्वाह सूर्य की ही तरह वे भी करते हैं। रावण इस ऋत को अस्वीकार करता है। फलतः वह ‘अनृत’ का प्रतीक बन जाता है।’
आइये ‘ऋत’ की स्वीकारोक्ति के साथ ‘अनृत’ के प्रतीकों को राम-धाम-पधारने / दर्शन करने का आमंत्रण दें, अन्यथा राम का बुलावा तो सब को एक न एक दिन आयेगा ही क्योंकि राम का शील ही उनका ऋत है !
Thursday, 19 March 2026
राष्ट्र और संस्कृति rashtr aur sanskriti
वैदिक काल से लेकर आज तक जो भी सद्साहित्य हमारे सामने आता है, उसका उद्देश्य लोक कल्याण है । ऋग्वेद का प्रसिद्ध मन्त्र है -
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्
देवा भागं यथा पूर्वे संजाना उपासते ।।
हम सद्भाव में चलें, एक स्वर में बोलें; अपने मन एक मत रहें; ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन देवताओं ने बलिदान का अपना हिस्सा साझा किया था।
समानो मंत्र:
समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम्
समानं मंत्रमभिमंत्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ।।
हमारा उद्देश्य एक ही हो; क्या हम सब एक मन के हो सकते हैं? ऐसी एकता बनाने के लिए मैं एक सामान्य प्रार्थना करता हूँ।
समानि व
आकूति: समाना हृदयानि व: ।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।।
हमारा उद्देश्य एक हो, हमारी भावनाएँ सुसंगत हो। हमारा विचार संयोजन हो। जैसे इस विश्व के, ब्रह्मांड के विभिन्न सिद्धांतों और क्रियाकलापों में तारात्मयता और एकता है ॥ ऋग्वेद 8.49.4
विचार करें , यह प्रार्थना अपने को सीधे विश्व से जोड़ती है । यह कौन सी संस्कृति है ? वैदिक संस्कृति, सनातन संस्कृति , हिन्दू संस्कृति । जहाँ अपने लिए नहीं सम्पूर्ण जीवमात्र के लिए है प्रार्थना है ?
सर्वे भवन्तु
सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
“सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो, किसी को भी कोई दुख ना रहे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
यह शान्ति कैसे मिले तो, हे परमपिता! मझे असत से सत की ओर ले चल। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल। मृत्यु से अमृत की ओर ले चल।
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय ।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।
यह प्रार्थना कौन कर रहा है - "वयं राष्ट्रांग्भूता” जो यह मानता है कि हम इस राष्ट्र के अंगभूत घटक हैं ।
यह राष्ट्र क्या है? तो कहा गया ‘राजते दीप्यते प्रकाशते शोभते इति राष्ट्रम्’ जो स्वयं देदीप्यमान हो वह राष्ट्र है ।
राष्ट्र का आधार क्या है ? जो कुछ भी भौतिक है वह राष्ट्र का आधार नहीं है क्योंकि राष्ट्र एक आध्यात्मिक इकाई है।
इस आध्यात्मिक सिद्धांत को दो वस्तुएं निर्माण कराती हैं , इनमें से एक अतीत में होती है, जिसे हम स्मृतियों की विरासत और दूसरी वर्तमान में वास्तविक समझौता अर्थात् साथ रहने की इच्छा, साझी विरासत से अधिकाधिक लाभ उठाने का संकल्प।
जैसे मनुष्य का शरीर धारण कर लेने से हर व्यक्ति मनुष्य नहीं बन जाता उसे बनने या बनाने में एक लम्बा समय लगता है, उसी तरह राष्ट्र उक्त दोनों शर्तों पर जीने वाले लोगों के प्ररिश्रम, बलिदान और निष्ठा के लम्बे अतीत का फल होता है ।
राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा, एक धर्म अथवा आर्थिक हितों वाले एक समुदाय की आवश्यकता नहीं होती । इसके लिए एक भावना, संवेदनशीलता, एक जीवन मूल्य की आवश्यकता होती है ।
उदाहरण के लिए चौथाई सदी पहले तक यू.एस.एस.आर.में लातीविया, जार्जिया, कजाकिस्तान, आर्मेनिया, उज्बेकिस्तान आदि कई राष्ट्र शामिल थे।युगोस्लाविया में भी एक से अधिक राष्ट्र थे।
भारत आदिकाल से एक राष्ट्र है, इसमें बहुत से राजा थे , सिकंदर के आक्रमण के समय नंद साम्राज्य के साथ ही यहां बहुत से गणतंत्र थे।
भगवान बुद्ध का जन्म एक गणतंत्र में ही हुआ था। नर्मदा के उत्तर में राजा हर्षवर्धन का राज्य था और दक्षिण में पुलकेशिन का। किन्तु भारतवर्ष का भू-भाग वृहत्तर और सांस्कृतिक था।
जर्मनी बरसों तक एक राष्ट्र रहा, पर 1945 से 1990 के बीच यह दो राज्यों में बंटा हुआ था।राष्ट्र और राज्य के अंतर को हमेशा याद रखना होगा।
राज्य एक राजनीतिक इकाई है जो कानून से चलती है।
कानून प्रभावकारी हो, इसके लिए राजा को शक्ति की आवश्यकता होती है।
यहूदियों को उनकी मातृभूमि से खदेड़ दिया गया था, और 1800 साल तक वे विभिन्न देशों में रहे ,पर वे कभी नहीं भूले कि फिलस्तीन उनकी मातृभूमि है।
दूसरी शर्त है साझा इतिहास।आखिरकार इतिहास अतीत में घटी घटनाएं ही तो होती हैं। इन घटनाओं में से कुछ के प्रति गर्व की अनुभूति होती है और कुछ लज्जा का कारण बनती हैं। इतिहास की घटनाओं के प्रति खुशी और पीड़ा की एक जैसी भावनाओं वाले एक राष्ट्र बनाते हैं।
तीसरी और सबसे महत्त्व पूर्ण शर्त है एक सामान जीवनमूल्य-प्रणाली में आस्था।
यही मूल्य प्रणाली संस्कृति कहलाती है। दुनिया के सभी राष्ट्र ये तीनों शर्तें पूरी करते हैं ।
हमारे देश में ही इन शर्तों को लेकर विवाद हैं।
भारत माता की जय और वंदे मातरम् का नारा लगाने में गर्व महसूस करने वाले कौन लोग हैं? राम, कृष्ण, चाणक्य, विक्रमादित्य, राणा प्रताप और शिवाजी तक अपना इतिहास मानने वाले कौन लोग हैं?
वे कौन हैं जिनकी साझी मूल्य प्रणाली है?
इस मूल्य प्रणाली का एक मुख्य सिद्धांत है विश्वासों और धर्मों की बहुलता में विश्वास करना। सारी दुनिया इन लोगों को हिंदू के रूप में जानती है।इसलिए यह हिंदू राष्ट्र है।
इसका इस बात से कुछ लेनादेना नहीं है कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक; आप मूर्तिपूजा में विश्वास करते हैं या नहीं, आप वेदों को मानते हैं अथवा किसी अन्य धार्मिक ग्रंथ को।
हमारे संविधान निर्माता इस बात को समझते थे।इसीलिए संविधान की धारा 25 में कहा गया है कि ‘हिंदू शब्द में सिख, जैन और बौद्ध धर्मावलाम्बियों का भी समावेश है.’ ।
यह ईसाइयत और इस्लाम को मानने वालों पर लागू क्यों नहीं होना चाहिए?
इसको एक विद्वान के संस्मरण से समझें -
"सत्रह साल तक मैं एक ईसाई कॉलेज में पढ़ाता था।1957 में एक वरिष्ठ ईसाई प्राध्यापक ने मुझसे पूछा क्या वे आर.एस.एस के सदस्य बन सकते हैं?
मेरे हां कहने पर उन्होंने सवाल किया,‘इसके लिए मुझे क्या करना होगा?’ मैंने उत्तर दिया,‘आपको न चर्च छोड़ना पड़ेगा, न बाइबिल में विश्वास आप ईसा मसीह में अपनी आस्था भी बनाये रख सकते हैं।पर आपको अन्य विश्वासों, धर्मों की वैधता को भी स्वीकारना होगा।’ इसपर उन्होंने कहा ‘मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता। यदि मैं यह स्वीकारता हूं तो अपने धर्म का प्रसार नहीं कर पाऊंगा।’ इस पर मैंने कहा- ‘तब आप आरएसएस के सदस्य नहीं बन सकते।’ ‘हिंदू’ के बारे में हमारी समझ में जो भ्रम है, वह हिंदूवाद को एक पंथ मानने के कारण है। यह धर्म नहीं है। "
साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोक कल्याण के कार्यों के लिए सदैव प्ररेणा देने का कार्य करता रहा है। प्रत्येक देश का साहित्य अपने देश की भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों से जुड़ा होता है ।भाषा के बिना यदि संस्कृति सर्मथहीन है तो संस्कृति के आभाव में भाषा अंधी।
संस्कृति के पूरक तत्व भाषा के साथ-साथ देश के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, ज्ञान-विज्ञान, परम्परागत अनुभव, कला-प्रेम, जीवन यापन के भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र उसकी उदारता, सहिष्णुता और समस्त वसुधा को एक कुटुंब मानने में है । भारतीय संस्कृति गिरि शिखरों की भाँति उदात्त, गंगा की भांति निरंतर प्रवाहमान , समुद्र की तरह विशाल है।
वह विधा-अविधा, श्रेय और प्रेय, अभ्युदय और निह्श्रेयस, द्यावा-पृथिवी सभी को आत्मसात करती हुई विश्व को ज्योतिर्मय करती आ रही है। 'आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।' सभी दिशाओं से शुभ विचार मेरी ओर आएँ।
सोहन लाल द्विवेदी कहते हैं -
पर्वत कहता शीश उठाकर , तुम भी ऊंचे बन जाओं ।
सागर कहता लहराकर , मन में गहराई लाओ ।
पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ों , कितना ही हो सर पर भार।
नभ कहता है फैलो इतना , ढंक लो तुम सारा संसार। (सोहनलाल द्विवेदी )
Wednesday, 18 March 2026
विंशोत्तरी महादशा बोध चक्र
विंशोत्तरी महादशा बोध चक्र
…............
1- ग्रह- सूर्य, वर्ष -6, जन्म काल में चंद्र नक्षत्र - कृत्तिका, उ.फा., उ षा.।
2- ग्रह- चंद्र, वर्ष -10 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र -रोहिणी,हस्त, श्रवण।
3-ग्रह- मंगल, वर्ष -7 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- मृग, चित्रा, धनिष्ठा।
4- ग्रह- राहु , वर्ष -18 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- आर्द्रा,स्वाती, शतभिषा।
5- ग्रह- गुरु, वर्ष -16 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- पुनर्वसु, विशाखा,पू भा.।
6- ग्रह-शनि , वर्ष -19 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- पुष्प, अनुराधा,उ.भा.।
7- ग्रह- बुध, वर्ष -17 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र-अश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती।
8- ग्रह- केतु, वर्ष -7 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र- मघा,मूल, अश्विन।
9- ग्रह- शुक्र, वर्ष -20 , जन्म काल में चंद्र नक्षत्र-पू फा, पू षा, भरणी।
नक्षत्र नाम और स्वामी
1-अश्विनी- केतु । 2-भरणी- शुक्र ।3-कृत्तिका- सूर्य । 4-रोहिणी- चन्द्र । 5-मृगशिरा- मंगल । 6-आर्द्रा- राहू । 7-पुनर्वसु- गुरु । 8-पुष्य- शनि । 9-आश्लेषा- बुध ।
10-मघा- केतु 11-पूर्वाफल्गुनी- शुक्र ,12- उत्तराफल्गुनी-सूर्य 13-हस्त- चन्द्र 14-चित्रा मंगल । 15-स्वाती- राहू 16-विशाषा -गुरु ।17-अनुराधा शनि ।18-ज्येष्ठा- बुध ।
19-मूल- केतु । 20-पूर्वाषाढा- शुक्र । 21-उत्तराषाढा-अभिजित्-सूर्य । 22-श्रवण- चन्द्र । 23-धनिष्ठा- मंगल ।24- शतभिषक्,- राहू 25- पूर्वा भाद्रपद -गुरु । 26- उत्तरा भाद्रपदा-शनि। 27-रेवती- बुध ।
मणिं दत्वा
संगम साहित्य 2
संगम साहित्य दक्षिण भारत के प्राचीन तमिल साहित्य की अत्यन्त महत्वपूर्ण परम्परा है। परम्परा के अनुसार कहा जाता है कि लगभग ईसा-पूर्व 9000 वर्ष से लेकर ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों तक विद्वानों और कवियों की कई सभाएँ (संगम) आयोजित हुईं, जिनमें अनेक साहित्यकार एकत्र होकर साहित्य की रचना और समीक्षा करते थे।
संगमों की संक्षिप्त जानकारी:(i) प्रथम संगम: इसका आयोजन प्राचीन नगर Thenmadurai में माना जाता है। इसमें अनेक ऋषि-कवि शामिल हुए, परन्तु इस संगम का साहित्य अब उपलब्ध नहीं है।(ii) द्वितीय संगम :यह Kapatapuram में आयोजित माना जाता है। यहाँ भी कई कवियों ने रचनाएँ कीं, लेकिन इनका अधिकांश साहित्य नष्ट हो गया।(iii) तृतीय संगम: इसका केन्द्र Madurai था। इसी संगम का साहित्य आज उपलब्ध है, जिसे Sangam Literature कहा जाता है। इसमें प्रमुख ग्रंथ एट्टुत्तोकै (आठ संग्रह) और पट्टुपाट्टु (दस गीत) हैं।महत्व: संगम साहित्य में प्रेम, वीरता, प्रकृति, समाज और राजनीति का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। यह तमिल भाषा और संस्कृति के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित है, उन्हें तमिल परंपरा 'महम्' और 'इदम्' नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैं, जो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक 'संगम' की याद दिलाते हैं जिस में व्यष्टि और समष्टि के साथ साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।
वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उस को एक 'भारतजन' में परिणत करने वाली एक ऐसी 'संगम-दृष्टि' हमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय से, न केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थी, अपितु व्यष्टि एवं समष्टि के न्तर्गत आने वाले देह और देही, स्त्री और पुरुष, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।
इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन 'अहम्' बोर 'इदम्' में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।
इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को 'राष्ट्री' तथा 'संगमनी' कहा गया है। यही हमारे बहुभाषाभाषी भारतजन का 'संगमन' कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी ने, आसेतु हिमालय तक, इस महादेश को एक संस्-कृति दी, एक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे 'अद्भुत संगम' का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकी, और न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।
ऋग्वेद ने 'संगच्छध्वं सवदध्वम्' का जो महामंत्र इस रराष्ट्र के कानों में फूंका था, वह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनों, आक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी 'संगम' जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?