Wednesday, 28 January 2026

सिंदूर लगाया है तो प्रणाम तो करना है। माने तो महाबली, माने तो रामभक्त, माने तो राष्ट्रभक्त। न मानें तो भी नायक तो है ही। 

रुचि से, अरुचि से, भय से, दंड से, दान से, भेद से मानना नियति है। अर्जित सम्मान गांडीव है। परशुराम है। वर्तमान का वैश्विक नायक है। 

मानो तो साथ है अन्यथा अकेला हाथ है।

मानने से देश को दिशा मिलेगी। राष्ट्र का तीर्थ जिंदा रहेगा। भारत माता जगद्गुरू रहेगी। सांस्कृतिक राष्ट्र, वादों से मुक्त चिर पुरातन नित्य नूतन जीवन मूल्यों को संरक्षित करेगा। ऋषियों का कल्प संकल्प के साथ भविष्य बनेगा।

ब्राह्मण तो ब्रह्म में रमण करता है। उसे राम ही प्रिय हैं। वह जाति नहीं तप है। वह ऋत का वाहक है। वह दर्शन देता है। अध्यात्म को खेता है। वह संस्सृत का नेता है।

 वह समदर्शी को भजता है, समदर्शी रहता है। वह संतत्प नहीं। वह संत हैं। संतत्व को जीता है।समाज का मार्गदर्शन करता है। 

वह राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति करता है। ब्राह्मण-ब्राह्मण है। वह अग्नि- होता है। अग्नेमय सुपथा राये.... (ईशावास्योपनिषद)

29/01/26
उमेश कुमार सिंह 

क्या इतिहास दुहराया जा रहा है

क्या इतिहास दुहराया जा रहा है?
मंडल -कमंडल। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह!
अब यूजीसी+ कमंडल!!

दरअसल यह एक दिन की भड़ास नहीं है। सरकार का पलड़ा सामाजिक न्याय के साथ जाति के बजन और वोट के जतन में बराबर एक तरफ झुकता आ रहा है।

जातियां सरकार बनाती हैं तो उपकृत होना स्वाभाविक है।

किंतु इस बार कुछ तो चूक हुई। एसी-एस टी के नाम पर अभी भी हिन्दू एस सी,एस टी की तुलना में धर्मांतरित ईसाई ज्यादा लाभ ले रहे हैं। एस सी एस टी यह ढुलमुल नीति देख अपना धर्म बदलकर ईसाई बन रहे हैं।

 नियम अपनी जगह है। किस पर लागू होगा स्पष्ट है। किंतु व्यवहार में हिन्दू मतांतरित हो रहा है।

दूसरी यह व्याधि ओबीसी को जोड़ कर आ गई है। इसमें अब सभी मत पंथ के ओबीसी आयेंगे। हमारी बात आप समझ रहे हैं ।
 
यह एम बाय समीकरण को पुष्ट करेगा। लाभ किसको कितना मिलेगा पता नहीं। शिकायतों का क्या होगा?समय बतायेगा।

किंतु हिन्दू जिस तरह सवर्ण -अवर्ण के नाम पर, अगड़ा, पिछड़ा के नाम पर, अनारक्षित -आरक्षित के नाम पर बंटेगा, सनातन को ही हानि पहुंचायेगा। 

सरकारें बन बिगड़ सकती हैं, किंतु जातीय लाभ-हानि भविष्य तो छोड़िए वर्तमान में भी घातक है।

इस पर सरकार 'भय गति सांप छछूंदर केरी।' की स्थिति में आ गई है।

पता नहीं सरकार के सलाहकार कौन हैं? शिक्षा के क्षेत्र में कितने राष्ट्रीय विचारों को लेकर संगठन कार्य कर रहे हैं, क्या उनको विश्वास में नहीं लिया गया। विद्यार्थी परिषद की अपील तो यही बता रही है।

रा शिक्षा निति - 2020 बनी थी तब कहा गया था इतने - इतने लोगों से पूछा गया था।अब क्यों राय नहीं ली गई?

कितने विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, छात्रों से राय ली गई? कुलपतियों को भूल जाइये। वे तुलसी बाबा के अनुसार - प्रिय बोलने में विश्वास रखते हैं? क्या शैक्षणिक संगठनों के अध्यक्ष -महामंत्री भी प्रिय बोलने बाले -
सचिव,बैद, गुरु बन गये हैं?

हो सके तो आरक्षण का लाभ ले रहे या उसकी परिधि में आ रहे संगठन प्रमुख,नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रेट्स अवश्य विचार करें।

 देश सुरक्षित है तो हम सब सुरक्षित हैं, अन्यथा उदाहरण आंखों के सामने हैं।
अति उत्साह गाय बनाते -बनाते गधा न बना दे।

27/01/26

चिंतन

मित्रवर!

आदरणीय मोदी जी और शाह जी देश के लिए वह सब कर रहे हैं , जो चाहिए किंतु टीम और तंत्र भी उसी चिंतन का होना चाहिए। 

जनता का सम्प्रेषण दिशा देगा। पूर्णता तो देवताओं में भी नहीं होती।तभी तो अंशावतार कहा जाता है। कर्ता तो एक ही दीनानाथ हैं। 

काल किसी को क्षमा नहीं करता। हां कभी कभी सौ दो सौ साल भी दिशा पकड़ने को कम लगते हैं।
आरक्षण का युक्तियुक्तकरण आवश्यक है 🙏 

प्रतिभा को यह कह कर नहीं दबाया या उसके अधिकार से बंचित किया जा सकता कि उसके पुर्खों ने किसी वर्ग,जाति पर अत्याचार किये हैं तो अब उन्हें अत्याचार सहना होगा।

समानता और समरसता का यह मार्ग भी सिंहावलोकन की अपेक्षा रखता है।

यह ज्योतिष का कौन-सा आचार्य है जो समाज सेवकों को बताता है कि आज जिसे आप सवर्ण कह रहे हैं , वह कल राजा,आतातायी, गरीबों पर अत्याचार करने वाला था।

और जो आज दलित के नाम पर चार पीढ़ियों से आरक्षण ले रहे हैं,  वे हमारे तथाकथित अत्याचारी पुरखों से कुचले गये थे।

पुनर्जन्म का भारतीय दर्शन आत्मा की अमरता के परिप्रेक्ष्य में कहता है , न कि जाति विशेष में पूर्व जन्मों का चिट्ठा बताता है।

फिर यह सवर्णों को जिन्हें संविधान निर्माताओं/ समाजसेवकों ने अघोषित उपाधि दे डाली कहां से जन्म-जन्मांतर का खाका प्राप्त किए हैं।

कहने को पंचवर्षीय योजनाओं का विचार है। किंतु क्या वह केवल भौतिक वस्तुओं के निर्माण और संग्रह के लिए ही है। गुण दोष के आधार पर आरक्षण, चुनाव प्रणाली,मुफ्त राशन वितरण, मतांतरित व्यक्तियों के आरक्षण के सम्बंध में पुनर्विचार का अवसर नहीं देता?

तथाकथित समाज के आर्थिक रूप से प्रतिभावान युवा आज दर -दर रोजी रोटी को भटक रहे हैं! कार्यालयों में अपने से कम योग्य व्यक्ति के सामने अपमानित हो नौकरी कर रहे हैं। चयन से लेकर प्रमोशन तक जाति,वर्ग में पैदा होना एक मनुष्य के लिए वरदान बना दिया तो दूसरे को श्राप!! यह प्राकृतिक न्याय नहीं है। 

सतहत्तर साल में सुधार नहीं हुआ।केवल सत्ता पक्ष विपक्ष को गाली दे,समय पास करे, तंत्र लूट खसोट करे और यह सवर्ण का एजेंडा खड़ा कर हिंदुओं को बांटे। वाह रे! नीति निर्माताओं!! 

सुधरो, समझो, वोट और सत्ता की खुमारी से बाहर आकर सड़ांध मार रहे कैंसर की शल्य चिकित्सा करो। अन्यथा आज जैसे आप अपने पूर्व के सत्ताधारियों को नकारा साबित कर रहे हैं कल आपको भी यही उपाधि मिलेगी।

 सत्ता देश के लोक मंगल के लिए है और इसमें संतों, आचार्यों, और समाजों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

यह विचार आज अपेक्षित है। समाज स्वार्थ से ऊपर उठे यह विचार होना चाहिए।
शेष जिसकी जैसी मर्ज़ी। हरि ओम् तत्सत 🕉️🙏

संतों की विरासत

संतों की विरासत को जीवित रखने के लिए यह आवश्यक है कि 'भारतीय ज्ञान परंपरा' को शिक्षा के हर स्तर पर (व्यक्ति, परिवार, कुटुंब, राज्य और राष्ट्र आदि के साथ ) साझा किया जाए ।

 युवाओं में स्व’ (आत्म-बोध) और अतीत के प्रति गौरव का भाव जागृत हो । पश्चिमी अंधानुकरण के स्थान पर धर्म, नैतिकता और वैज्ञानिक चेतना के बीच संतुलन बनाया जाए । 

कुटुम्ब भाव सुगन्धित-सुवासित रहे।सामाजिक समरसता व्यवहार से आये न कि धन, पद और प्रतिष्ठा के संतुष्टीकरण से ।

 संतों का सत्संग सतत चले, मठ, मंदिर और धर्मशालाएं धार्मिकता के साथ सांस्कृतिक केंद्र बने ।

 मनुष्य की दृष्टि वैश्विक हो । स्त्री, बाल, वृद्ध सुरक्षित और अनुकूलित रहें। साहित्य का विकास परम्परा के अन्वेषण के साथ हो। गौवंश, नदियाँ और जलस्रोत पवित्र और प्राणमय बने रहें। सरस्वती अपने सभी स्वरूपों में प्रसन्नवदना रहे । 

सत्ता निरहंकारी हो। संत परोपकारी हों। तभी बोध होगा कि भारत की वास्तविक शक्ति इसके सैनिक धर्म के साथ संत और ऋषि भाव में है, जहाँ अध्यात्मिकता सांस्कृतिक कलेवर के साथ राष्ट्र को बलवती बनाती है।

 भारतवर्ष एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में अपने अमरता के विश्वास को विश्व के कल्याण के लिए कारक बना रहे । 

 तभी सनातन राष्ट्र विश्व गुरु के पद पर आसीन रहकर संसृति के भविष्य की दुबिधा और द्वंद्व से ग्रसित मानवता को त्राण के सूत्र दे सकेगा।

 - विश्व धरा की प्रथम स्रोतस्विनी माँ नर्मदा के दोनों स्वरुप ‘नर्मदा और रेवा’ को प्रणाम। 🙏🙏🙏🕉️ 

24/01/26

Wednesday, 21 January 2026

अभिमुक्तेश्वरानंद

अभिमुक्तेश्वरानन्द जी को जिस तरह सोशल मीडिया पर लक्ष्य किया जा रहा है, वह दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डालेगा।सनातन में सब प्रकार के लोग हैं। सनातन सब को पचा कर चलता आया है, इसलिए सनातन है।वे जो कर रहे हैं उन्हें यदि बोध होगा तो ठीक है अन्यथा वे स्वयं अपने कर्मों का फल भोगेंगे।दरअसल इसमें शंकराचार्यों को ही केवल अभिमत देना चाहिए। यह उनकी व्यवस्था है।हर बात में यदि हिन्दू स्वयं को सोशल मीडिया में सनातन का न्यायाधीश बनेगा तो वह परम्परा को क्षति पहुंचायेगा।यदि वे स्वयं के विवेक से नकारात्मक या धर्म व्यवस्था के विपरीत कार्य कर राज्य विधि व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे हैं तो सरकार या संन्यास मार्गी कार्यवाही करेंगे।यदि वे किसी विशिष्ट एजेंडे के तहत माघ मेला जैसे पर्व पर लोकेषणा प्राप्त करना चाहते हैं तो ईश्वर उन्हें रास्ता दिखायेगा।नीति -धर्म - व्यवस्था -अतिरेक आदि को ईश्वरीय व्यवस्था ही ठीक करती है। माध्यम भी वही तय करती है।अंत में यह स्मरण रखना होगा हिन्दू समाज को किसी भी तरह एक रहना होगा,चाहे वह राजनीति हो, राष्ट्र नीति हो, अध्यात्म हो या सांस्कृतिक धरोहर और विरासत हो।

Monday, 19 January 2026

लेखक,लेखन और समाज



01 जनवरी से प्रारम्भ हुआ. 19/01/2026 को ख़त्म हो रहा है.

बिन्दुवार संक्षेप

1. कार्य पूर्ण होने से पहले उसका प्रचार नहीं करना चाहिए; कर्म स्वयं अपनी वाणी होता है।
* लघुकथा विमर्श इसका प्रमाण है।

2. कर्म की शक्ति शब्दों से अधिक प्रभावशाली और परिणामकारी होती है।
* स्पष्ट है भाषण, उद्वोधन, चर्चा की तुलना में लेखन कर्म अधिक महत्वपूर्ण है। तभी तो हम आज समीक्षा कर रहे हैं।

3. साधना और सृजन में प्रसिद्धि बाधक होती है, सहायक नहीं।
* कभी कभी लेखक जब प्रसिद्ध, पुरस्कार और सम्मान की ओर दोड़ता है तो उसके उत्कृष्ट लेखन में बाधा पैदा होती है।

4. न्यूटन-हेले प्रसंग यह दिखाता है कि महान व्यक्ति 'नाम' नहीं, 'कार्य' को महत्त्व देता है।

5. न्यूटन ने ग्रंथ प्रकाशित होने की चिंता नहीं की, न ही लेखक-नाम को आवश्यक माना।

6. सच्चा साधक प्रशंसा-निन्दा से अप्रभावित रहकर अपने लक्ष्य में रत रहता है।
* समीक्षाएं और पाठक की टिप्पणियां जहां लेखक को प्रोत्साहित करती हैं, वही प्रशंसा और निंदा उसको लक्ष्य से विचलित करती हैं।

7. किसी व्यक्ति या रचना का सही मूल्यांकन उसके जीवनकाल में प्रायः संभव नहीं होता।
,* इसलिए फल की इच्छा से अनासक्त रह कर रचना कर्म करते रहना चाहिए।

8. भारतीय ऋषि-परम्परा में मौलिकता का अहं नहीं, परम्परा की निरन्तरता का भाव है।
*लेखक को मौलिकता के अहं से दूर रहना चाहिए। विचार प्रवाह के साथ लक्ष्मी की तरह साधक के पास पहुंचते रहते हैं ।
धन जैसे बांटने से बढ़ता है,चिंतन भी साझा करने से सामर्थ्य प्राप्त करता है।


9. वेद अपौरुषेय माने गए क्योंकि वे व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* साहित्यकार की यही समझ उसे समष्टि से जोड़ती है।

10. अनाम रहकर कार्य करना भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठ माना गया है।
* साहित्य एकांत साधना है। समय के साथ साधना पूर्ण होने पर वह लोक के सामने आती है।

11. वास्तविक सौंदर्य के दर्शन से पहले अपनी सीमाओं का बोध नहीं होता (नॉटरडेम का कुबड़ा प्रसंग)।
* हमारी ही रचना सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा अहंकार पालना साहित्यकार को पालना उचित नहीं है।वृहत्तर साहित्य के अध्ययन से यह भ्रम दूर होता है और लेखक का लेखन गंभीरता को प्राप्त होता है।

12. साहित्य और आलोचना आत्मबोध तथा विनम्रता उत्पन्न करने का माध्यम हैं।
* रचना कर्म अदृश्य सत्ता/नियंत्ता के निर्देश से होता है।

13. साहित्य में लेखक, समीक्षक और पाठक का त्रिकोणात्मक संबंध होता है।

14. लेखक रचना का सृजन करता है, समीक्षक उसका अर्थ खोलता है, पाठक उसे जीवन देता है।

15. बिना पाठक के रचना अपूर्ण मानी जाती है।

16. रचना की महत्ता उसके लोकमंगल, मानवीय सत्य और वैचारिक गहराई में निहित है।

17. साहित्य का उद्देश्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सार्थक संप्रेषण है।

18. सच्चा साहित्य अपने समय से संवाद ंकरता है और भविष्य को दिशा देता है।

ह्विटमैंन की पंक्तियां हैं -
बन्धु तुम पुस्तक को नहीं,
मुझे स्पर्श कर रहे हो।
तुम्हारे हाथों में पुस्तक नहीं 
मेरी काया है।
इन पृष्ठों से प्रकट होकर मैं 
तुम्हारे हृदय में समा जाउंगा।
........


Monday, 12 January 2026

प्रार्थना

            
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

शुचिता मन्त्र-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्ग तोऽपिवा । 
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तरः शुचिः ॥ 

ॐ सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्त्यादि हेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नमः ।।

ईशावास्योपनिषद

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

केनोपनिषद्
छंदोपनिषद 

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राण श्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि।
सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत् अनिराकरणमस्त्व निराकरणं मेऽस्तु । 
 तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु 
 धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 


प्रश्नोपनिषद् 
मुण्डकोपनिषद्
माण्डूक्योपनिषद् 

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । 
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम
 देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ 
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

ऐतरेयोपनिषद्

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। 
वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः ।
अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधामृत्यं वदिष्यामि।  सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु ।  अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ 
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!


तैत्तिरीयोपनिषद

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम्  ।
ॐ शान्तिः । शान्तिः शान्तिः ।

श्वेताश्वतरोपनिषद्

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
 सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। 
ॐ शान्तिः शान्तिः ॥ शान्तिः !!!


बृहदारण्यकोपनिषद् -

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। 
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः शान्ति:

...............
 हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। 
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।।15 ॥

…....….............

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मिन्समूह  तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि  योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ||16||
…........................
 वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम् ।
 ॐ क्रतो स्मर कृतः स्मर क्रतो स्मर कृतः स्मर ॥ 17॥
…....................
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । 
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥१८॥
ऐ…….....

 शिवमानसपूजा

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं 
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्। 
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा 
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥
 सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं 
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम्। 
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं 
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु।।
छत्रै चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं  निर्मलं 
वीणाभेरिमृदंङ्गकाहलकला गीतं च नित्यं तथा।
 साष्टांग प्रणति: स्तुतिर्बहुविधा होतत्समस्तं मया।।
 सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ 
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।
 पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । 
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वागिरो ।।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ 
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् । 
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व 
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥
….....................
                  अथ ध्यानम् 

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् । वामाङ्कारूढ़सीतामुखकमलमिलल्लोचनंनीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥
              …..................

ध्यानम्

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं
 चारुचन्द्रावतंसं
 रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं 
परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।
 पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं 
वसानं
 विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं 
पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥

..............
मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ॥ 
पद्मनाभं सहस्राक्षं वनमालिं हलायुधम्
गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥
विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।
दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्गं गरुडध्वजम् ॥
अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम्।।
..............
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
 शिवं केवल भासकं भासकानाम् ।
 तुरीयं तमः पारमाद्यन्तहीनं
 प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥ ७ ॥ 

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते 
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते । 
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
 नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥ ८ ॥ 

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ 
महादेव शम्भो महेशं त्रिनेत्र ।
 शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
 त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥ ९॥

शंम्भो महेशं करुणामय शूलपाणें 
गौरीपते पशुपते  पशुपाशनाशिन् । 
काशीपते करुणया जगदेतदेक -
स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ।। १० ।।

 त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे 
त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृण विश्वनाथ।
 त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥ ११॥
             .............

                बालकाण्ड

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।1।।

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्तः स्थमीश्वरम्।।2।।

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।3।।

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ।।4।।

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।5।।

यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।6।।

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-
भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7


अयोध्या काण्ड 

 यस्याड्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके 
भाले बालविद्युर्गले च गरलं यश्योरसि व्यालराट् । 
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा
 शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभिः श्रीशङ्करः पातुमाम् ॥ 

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा च मम्ले वनवासदु:खतः ।
 मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंञ्जुल मलमङ्गलप्रदा ॥

 नीलाम्बुजश्यामलकोमलांङ्गं सीतासमारोपितवामभागम् ।
 पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ॥


अरण्य काण्ड 
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं
वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।

मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं 
वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम् ॥
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं
पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् ।

राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभित
सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥ 


किष्किन्धाकाण्ड

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ 
शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ ।

 मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ
सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ।

 ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं 
चाव्ययं 
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा ।

 संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं 
धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् ।

सुंदर काण्ड
 शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
 ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । 
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १ ॥

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । 
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे 
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
 सकलगुणनिधान वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥

लंकाकांड 
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
 योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् । 
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं
 वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम् ॥ १ ॥

 शंङ्खेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं
कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम् ।
 काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं 
नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम् ॥ २ ॥

यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम् ।
 खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे ॥ ३ ॥

उत्तरकांड 
 केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं
 शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। 

पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं 
बन्धुना सेव्यमानं
नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम् ।। १ ।।

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ ।
 जानकी करसरोजलालितो चिन्तकस्य मनभृङ्गसंङ्गिनौ ॥ २ ॥

कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्। 
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम् ॥ ३ ॥

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अथ सप्तश्लोकी दुर्गा

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।
कलौ  हि कार्य सिद्धयर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ।

श्रुणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥

 ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः , अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थ सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । 
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १ ॥ 

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । 
दारिद्रधदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ २ ॥

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥३॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४॥

सर्वस्वरूपे  सर्वेशे  सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥५॥

रोगानशेषानपहंसि  तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां  विपन्नराणां
 त्वामाश्रिता  ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ ६ ॥

सर्वाबाधाप्रशमनं   त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ७ ॥

॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा ॥

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सिद्ध कुंजिका स्तोत्र -

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय 
ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।

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तत्त्व शुद्धि -
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । 
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा ॥ 
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्व तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाह।।

 भगवती का ध्यान पञ्चोपचार-

ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । 
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम् ॥ 

ध्यात्वा देवीं पञ्चपूजां कृत्वा योन्या प्रणम्य च।
 आधारं स्थाप्य मूलेन स्थापयेत्तत्र पुस्तकम् ॥

(1) शापोद्धार - करें-

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिका देव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा । 

 इक्कीस इक्कीस बार उत्कीलन हेतु जप करें-

“ ॐ श्रीं क्लीं ह्वीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।"

 (3) मृत संजीवनी विद्या का जप - पुनः मृत सञ्जीवनी विद्या का जप मूल सात-सात बार - निम्नाङ्कित मन्त्र से करें-

'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसञ्जीवन विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।”

- 4 ) सप्तशती - शाप - विमोचन मन्त्र - एक सौ आठ बार जप करने का विधान है-

'ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूँ ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।

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श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र – संस्कृत श्लोक

॥ ॐ श्री दुर्गायै नमः ॥

॥ईश्वर उवाच॥

शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने॥
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भव मोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥३॥

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥४॥

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥५॥

 अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥६॥

 अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥७॥

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥८॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥९॥

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥१०॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥१२

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥१३॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥१४॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥१५॥
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