साहित्य कि विचारधाराएँ
“पश्चिम का मानवतावाद आत्मकेंद्रित है । किन्तु हिन्दू मानवतावाद कि स्थिति भिन्न है ।वह तो परम
सत्य की उस अनुभूति से उपजा है कि “समूचा ब्रह्माण्ड अखंड इकाई है ।"-पूज्य श्रीगुरुजी
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“विकासमान देश को अपने वर्तमान में स्वाभिमान से खड़े होने के लिए आवश्यक है कि वह अपना पिछला कदम दबा कर और अगले कदम को सम्भाल कर रखे। इस लिए प्रज्ञावान एवं प्रतिभाशाली लेखकों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वे भारतीय जन मानस में आलस्य व अधार्मिक वैरुप्य तथा आत्मग्लानि के स्थान पर प्रकाश की ज्योति उद्दीप्त करने में ही अपनी कलम का प्रयोग करेंगे।” - गोविन्द शंकर कुरुप
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“ आधुनिक (पश्चिमी) संस्कृति
मानवता से प्रारम्भ होकर राष्ट्रीयता से होते हुए
पाशविकता तक पहुँच जाती है ।” -डी-मेस्ट्रे
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कहां हिन्दू पुनर्जागरण, कहां यूरोपीय पुनर्जागरण
कला के क्षेत्र में उन्होंने कहा है:
"पश्चिमी मानस रूप तथा
आकार के आकर्षण जाल में फंसा हुआ है। वह उससे चिपटा रहता है और उसके मोहपाश से मुक्त
नहीं हो पाता। वह रूप के अपने सौन्दर्य के कारण उसके प्रति आशक्त रहता है। वह उन भावनात्मक, बौद्धिक,
सौंदर्यात्मक संवेदनाओं पर निर्भर करता है जो सीधे उसकी अति
मूर्त भाषा से उपजती हैं। वह आत्मा को तन तक सीमित रखता है। अतः यह कहा जा सकता है
कि इस मानस रूप के लिए वह आत्मा का सृजन करता है। अपने अस्तित्व तथा हर प्रकार की अभिव्यक्ति
के लिए यह आत्मा रूप पर निर्भर करती है। -ऋषि अरविन्द
भारतीय दृष्टिकोण नितांत सर्वथा
विपरीत है। भारतीय मानस की दृष्टि में रूप का कोई अलग अस्तित्व नहीं है। वह तो आत्मा
का सृजन है और वह अपनी सम्पूर्ण सार्थकता तथा मूल्य आत्मा से ग्रहण करता है। हर रेखा, आकार-व्यवस्था,
रंग, रूप, मुद्रा,
हर शारीरिक हाव-भाव, चाहे
वह कितने भी अनगिनत,
कितने भी विविध, संकुल
तथा प्रचुर हों,
मूलतः और अन्ततः एक सुझाव, एक संकेत और बहुधा एक प्रतीक भर होते हैं।- ऋषि अरविन्द
उनका प्रमुख प्रयोजन होता है कि वह एक
ऐसे आध्यात्मिक भाव,
विचार, छवि
के लिए आधार प्रस्तुत करें जो पुनः अपने से परे उस अल्प वर्चनीय आत्मा के कहीं अधिक
सशक्त रूप से संवेदनीय भाव की वास्तविकता तक पहुंच जाए। इसी से सौन्दर्यपारखी मानस
में गतिशीलता उत्पन्न होकर उन्हें विभिन्न आकार प्रदान कर देती है।"-ऋषि अरविन्द
‘आध्यात्मिकता ने ही भारत की नियति के संकट की हर घड़ी में सदैव उसकी रक्षा की और वही उसके पुनर्जागरण का उद्गम स्रोत भी है। यदि ऐसे संकट किसी भी राष्ट्र के सम्मुख आए होते तो उसकी आत्मा और उसका शरीर कभी का नष्ट हो जाता।’-ऋषि अरविन्द
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‘१८ वी तथा १९ वी शताब्दियों में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंची महान ‘अवनति’ का उल्लेख करते हुए कहा है कि-
“वह तो सान्ध्य काल है जहां से कालचक्र की भारतीय धारणा के अनुसार एक नव-युग का श्रीगणेश होना है।” वह कहते हैं “ यही वह घड़ी थी जब ऊपर से थोपी गई यूरोपीय संस्कृति के भार ने पुनर्जागरण को अनिवार्य बना दिया।” श्री अरविन्द का कहना हैः “जब भारत का पुनर्जागरण पूर्ण हो जायेगा तब निश्चय ही उसमें एक ऐसी चेतना आएगी जो निश्चित रूप से जर्मन की चेतना जैसी क्रूर नहीं होगी. बल्कि वह तो भारत की आत्मा की वास्तविक प्रकृति तथा क्षमता के अनुरूप होगी।”-ऋषि अरविन्द
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“संगीत शैली में परिवर्तन संस्कृति में मूल
परिवर्तन में प्रतिबिम्बित होता है”-अफलातून (प्लेटो)
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*“ हिन्दू पुनर्जागरण की प्रकृति यूरोपीय पुनर्जागरण की प्रकृति से पूर्णरूपेण भिन्न है ।यह शब्द हमें यूरोपीय संस्कृति के उस संक्रमण-बिन्दु का स्मरण कराता है जिसके संदर्भ में पहले-पहल इसका प्रयोग किया गया था वस्तुतः वह उतना पुनर्जागरण नहीं था, जितना कि वह अतीत की ओर लौटना था। वह तो ईसाइयत, ट्यूटानियत और सामन्तवादी यूरोपीय स्थिति से ऊबकर फिर से यूनानी-लैटिन भावना और ज्ञान की ओर मुड़ जाना था और उससे होने वाले परिणामों से प्रभावित होना था। अतः वह पुनर्जागरण निश्चित रूप से उस प्रकार का नहीं है जो भारत में कभी संभव हो।”--जेम्स एच० कजेन्स
** “क्या भारत के संदर्भ में ‘पुनर्जागरण’ शब्द की कोई सार्थकता है भी, क्योंकि भारत तो सदा-सर्वदा जाग्रत रहा है और उसे पुनर्जागरण की तो कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी।”-जेम्स एच० कजेन्स
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French Revolution के बाद पश्चिमी आधुनिकता, अति-तर्कवाद और अनियंत्रित व्यक्तिवाद की आलोचना की। उनका विचार था कि
"केवल भौतिक प्रगति पर आधारित आधुनिक पश्चिमी सभ्यता अंततः मानवता से हटकर शक्ति और संघर्ष की प्रवृत्ति की ओर जा सकती है।"-“डी-मेस्ट्रे”
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तात्पर्य:
यह कि जैसे भारत के लिए राष्ट्रवाद शब्द अनुवाद है जो पूर्ण
अर्थ देने में सक्षम नहीं है , उसी प्रकार ‘पुनर्जागरण’ भी निहितार्थ से दूर है , क्योंकि हम आज भी कहते
हैं, “ वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। यह मंत्र (ऋग्वेद के
9.23.2) में मिलता है। “हम इस राष्ट्र में
सदैव जागरूक रहने वाले पुरोहित (मार्गदर्शक) बनें।”
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**(गोविन्द
शंकर कुरुप) आधुनिक मलयालम साहित्य के प्रमुख कवि और भारतीय साहित्य के
महत्वपूर्ण साहित्यकार थे। पूरा नाम: गोविन्द शंकर कुरुपजन्म: 3
जून 1901,जन्म स्थान:
Nayathode, केरल,मृत्यु: 2 फरवरी 1978. साहित्यिक परिचय:वे मलयालम काव्य के आधुनिक युग के प्रमुख
कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति प्रेम,आध्यात्मिकता,मानवतावाद भारतीय
संस्कृति के तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उनकी रचनाओं में रहस्यवाद और
प्रतीकात्मकता का भी प्रभाव मिलता है।)
(i) जेम्स एच० कजेन्स (एक आयरिश (Ireland के) साहित्यकार, दार्शनिक और थियोसोफिस्ट थे। उन्होंने भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण पर महत्वपूर्ण लेखन किया।जन्म: 1873,मृत्यु: 1956, इस प्रकार उनका समय मुख्यतः 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के मध्य का है। वे भारत आए और यहाँ की थियोसोफिकल सोसाइटी (Theosophical Society) से जुड़े। उन्होंने भारतीय संस्कृति, कला और आध्यात्मिकता पर कई पुस्तकें लिखीं । अपनी कृति भारतीय पुनर्जागरण (द रेनेसां इन इंडिया) में यह प्रश्न उठाया है कि
(ii) ‘पुनर्जागरण’ (रेनेसां) : शब्द को भारतीयता के संदर्भ में समझा जाना चाहिये। यह सच है कि
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*डॉ मस्त्रे- (Joseph de Maistre “डी-मेस्ट्रे” फ्रांस / सावॉय, (आज का फ्रांस-इटली सीमा क्षेत्र) काल: 1753–1821 (18वीं–19वीं सदी), आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के आलोचक दार्शनिक।)– का कथन है कि ,वे एक राजनीतिक दार्शनिक, लेखक और राजनयिक थे।