स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ (ईशावास्य उपनिषद्/8)
Bhav: स  पर्यगात्: वह (परमात्मा) सब ओर व्याप्त है।शुक्रम्-अकायम्-अव्रणम्-अस्नाविरम्: वह तेजोमय, शरीर-रहित (निराकार), घाव-रहित (अखंड) और नसों से रहित है।
  • शुद्धम्-अपापविद्धम्: वह सर्वथा पवित्र और पाप से अलिप्त है।
  • कविः मनीषी परिभूः स्वयंभूः: वह सर्वदर्शी (क्रांतदर्शी), मन पर नियंत्रण रखने वाला (सर्वज्ञ), सबसे ऊपर विराजमान और स्वयं उत्पन्न (अनादि) है।
  • याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः: उसने अनादि काल से ही प्रजा (सभी जीवों) के लिए उनकी योग्यता के अनुसार कर्मफल और सृष्टि के नियमों का यथार्थ रूप से विधान किया है।