Tuesday, 10 March 2026

तमिल परंपरा 'महम्' और 'इदम्'

 

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित है, उन्हें तमिल परंपरा 'महम्' और 'इदम्' नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैं, जो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक 'संगम' की याद दिलाते हैं जिस में व्यष्टि और समष्टि के साथ साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उस को एक 'भारतजन' में परिणत करने वाली एक ऐसी 'संगम-दृष्टि' हमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय से, न केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थी, अपितु व्यष्टि एवं समष्टि के न्तर्गत आने वाले देह और देही, स्त्री और पुरुष, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

 

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन 'अहम्' बोर 'इदम्' में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

 

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को 'राष्ट्री' तथा 'संगमनी' कहा गया है। यही हमारे बहुभाषाभाषी भारतजन का 'संगमन' कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी ने, आसेतु हिमालय तक, इस महादेश को एक संस्-कृति दी, एक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे 'अद्भुत संगम' का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकी, और न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

 

ऋग्वेद ने 'संगच्छध्वं सवदध्वम्' का जो महामंत्र इस रराष्ट्र के कानों में फूंका था, वह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनों, आक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी 'संगम' जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

संगम साहित्य 2

 

संगम साहित्य दक्षिण भारत के प्राचीन तमिल साहित्य की अत्यन्त महत्वपूर्ण परम्परा है। परम्परा के अनुसार कहा जाता है कि लगभग ईसा-पूर्व 9000 वर्ष से लेकर ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों तक विद्वानों और कवियों की कई सभाएँ (संगम) आयोजित हुईं, जिनमें अनेक साहित्यकार एकत्र होकर साहित्य की रचना और समीक्षा करते थे।

संगमों की संक्षिप्त जानकारी:(i) प्रथम संगम: इसका आयोजन प्राचीन नगर Thenmadurai में माना जाता है। इसमें अनेक ऋषि-कवि शामिल हुए, परन्तु इस संगम का साहित्य अब उपलब्ध नहीं है।(ii) द्वितीय संगम :यह Kapatapuram में आयोजित माना जाता है। यहाँ भी कई कवियों ने रचनाएँ कीं, लेकिन इनका अधिकांश साहित्य नष्ट हो गया।(iii) तृतीय संगम: इसका केन्द्र Madurai था। इसी संगम का साहित्य आज उपलब्ध है, जिसे Sangam Literature कहा जाता है। इसमें प्रमुख ग्रंथ एट्टुत्तोकै (आठ संग्रह) और पट्टुपाट्टु (दस गीत) हैं।महत्व: संगम साहित्य में प्रेम, वीरता, प्रकृति, समाज और राजनीति का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। यह तमिल भाषा और संस्कृति के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित हैउन्हें तमिल परंपरा 'महम्और 'इदम्नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैंजो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक 'संगमकी याद दिलाते हैं जिस में व्यष्टि और समष्टि के साथ साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उस को एक 'भारतजनमें परिणत करने वाली एक ऐसी 'संगम-दृष्टिहमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय सेन केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थीअपितु व्यष्टि एवं समष्टि के न्तर्गत आने वाले देह और देहीस्त्री और पुरुषव्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

 

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन 'अहम्बोर 'इदम्में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

 

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को 'राष्ट्रीतथा 'संगमनीकहा गया है। यही हमारे बहुभाषाभाषी भारतजन का 'संगमनकराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी नेआसेतु हिमालय तकइस महादेश को एक संस्-कृति दीएक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे 'अद्भुत संगमका निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकीऔर न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

 

ऋग्वेद ने 'संगच्छध्वं सवदध्वम्का जो महामंत्र इस रराष्ट्र के कानों में फूंका थावह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनोंआक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी 'संगमजीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

कथन साहित्य कि विचारधाराएँ

 

  साहित्य कि विचारधाराएँ

 “पश्चिम का मानवतावाद आत्मकेंद्रित है किन्तु हिन्दू मानवतावाद कि स्थिति भिन्न है ।वह तो परम सत्य की उस अनुभूति से उपजा है कि “समूचा ब्रह्माण्ड अखंड इकाई है ।"-पूज्य श्रीगुरुजी

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“विकासमान देश को अपने वर्तमान में स्वाभिमान से खड़े होने के लिए आवश्यक है कि वह अपना पिछला कदम दबा कर और अगले कदम को सम्भाल कर रखे। इस लिए प्रज्ञावान एवं प्रतिभाशाली लेखकों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वे भारतीय जन मानस में आलस्य व अधार्मिक वैरुप्य तथा आत्मग्लानि के स्थान पर प्रकाश की ज्योति उद्दीप्त करने में ही अपनी कलम का प्रयोग करेंगे।” गोविन्द शंकर कुरुप

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“ आधुनिक (पश्चिमी) संस्कृति मानवता से प्रारम्भ होकर राष्ट्रीयता से होते हुए  पाशविकता तक पहुँच जाती है ।”  -डी-मेस्ट्रे

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कहां हिन्दू पुनर्जागरण, कहां यूरोपीय पुनर्जागरण

  कला के क्षेत्र में उन्होंने कहा है:

 "पश्चिमी मानस रूप तथा आकार के आकर्षण जाल में फंसा हुआ है। वह उससे चिपटा रहता है और उसके मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाता। वह रूप के अपने सौन्दर्य के कारण उसके प्रति आशक्त रहता है। वह उन भावनात्मक, बौद्धिक, सौंदर्यात्मक संवेदनाओं पर निर्भर करता है जो सीधे उसकी अति मूर्त भाषा से उपजती हैं। वह आत्मा को तन तक सीमित रखता है। अतः यह कहा जा सकता है कि इस मानस रूप के लिए वह आत्मा का सृजन करता है। अपने अस्तित्व तथा हर प्रकार की अभिव्यक्ति के लिए यह आत्मा रूप पर निर्भर करती है। -ऋषि अरविन्द 

 भारतीय दृष्टिकोण नितांत सर्वथा विपरीत है। भारतीय मानस की दृष्टि में रूप का कोई अलग अस्तित्व नहीं है। वह तो आत्मा का सृजन है और वह अपनी सम्पूर्ण सार्थकता तथा मूल्य आत्मा से ग्रहण करता है। हर रेखा, आकार-व्यवस्था, रंग, रूप, मुद्रा, हर शारीरिक हाव-भाव, चाहे वह कितने भी अनगिनत, कितने भी विविध, संकुल तथा प्रचुर हों, मूलतः और अन्ततः एक सुझाव, एक संकेत और बहुधा एक प्रतीक भर होते हैं।- ऋषि अरविन्द 

 उनका प्रमुख प्रयोजन होता है कि वह एक ऐसे आध्यात्मिक भाव, विचार, छवि के लिए आधार प्रस्तुत करें जो पुनः अपने से परे उस अल्प वर्चनीय आत्मा के कहीं अधिक सशक्त रूप से संवेदनीय भाव की वास्तविकता तक पहुंच जाए। इसी से सौन्दर्यपारखी मानस में गतिशीलता उत्पन्न होकर उन्हें विभिन्न आकार प्रदान कर देती है।"-ऋषि अरविन्द 

   ‘आध्यात्मिकता ने ही भारत की नियति के संकट की हर घड़ी में सदैव उसकी रक्षा की और वही उसके पुनर्जागरण का उद्गम स्रोत भी है। यदि ऐसे संकट किसी भी राष्ट्र के सम्मुख आए होते तो उसकी आत्मा और उसका शरीर कभी का नष्ट हो जाता।’-ऋषि अरविन्द 

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‘१८ वी तथा १९ वी शताब्दियों में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंची महान ‘अवनति’ का उल्लेख करते हुए  कहा है कि-

 “वह तो सान्ध्य काल है जहां से कालचक्र की भारतीय धारणा के अनुसार एक नव-युग का श्रीगणेश होना है।”  वह कहते हैं “ यही वह घड़ी थी जब ऊपर से थोपी गई यूरोपीय संस्कृति के भार ने पुनर्जागरण को अनिवार्य बना दिया।” श्री अरविन्द का कहना हैः “जब भारत का पुनर्जागरण पूर्ण हो जायेगा तब निश्चय ही उसमें एक ऐसी चेतना आएगी जो निश्चित रूप से जर्मन की चेतना जैसी क्रूर नहीं होगी. बल्कि वह तो भारत की आत्मा की वास्तविक प्रकृति तथा क्षमता के अनुरूप होगी।”-ऋषि अरविन्द 
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  “संगीत शैली में परिवर्तन संस्कृति में मूल परिवर्तन में प्रतिबिम्बित होता है”-अफलातून (प्लेटो) 

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*“ हिन्दू पुनर्जागरण की प्रकृति यूरोपीय पुनर्जागरण की प्रकृति से पूर्णरूपेण भिन्न है ।यह शब्द हमें यूरोपीय संस्कृति के उस संक्रमण-बिन्दु का स्मरण कराता है जिसके संदर्भ में पहले-पहल इसका प्रयोग किया गया था वस्तुतः वह उतना पुनर्जागरण नहीं थाजितना कि वह अतीत की ओर लौटना था। वह तो ईसाइयतट्यूटानियत और सामन्तवादी यूरोपीय स्थिति से ऊबकर फिर से यूनानी-लैटिन भावना और ज्ञान की ओर मुड़ जाना था और उससे होने वाले परिणामों से प्रभावित होना था। अतः वह पुनर्जागरण निश्चित रूप से उस प्रकार का नहीं है जो भारत में कभी संभव हो।”--जेम्स एच० कजेन्स

** “क्या भारत के संदर्भ में ‘पुनर्जागरण’ शब्द की कोई सार्थकता है भीक्योंकि भारत तो सदा-सर्वदा जाग्रत रहा है और उसे पुनर्जागरण की तो कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी।”-जेम्स एच० कजेन्स

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  French Revolution के बाद पश्चिमी आधुनिकताअति-तर्कवाद और अनियंत्रित व्यक्तिवाद की आलोचना की। उनका विचार था कि 

"केवल भौतिक प्रगति पर आधारित आधुनिक पश्चिमी सभ्यता अंततः मानवता से हटकर शक्ति और संघर्ष की प्रवृत्ति की ओर जा सकती है।"-डी-मेस्ट्रे”

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तात्पर्य: यह कि जैसे भारत के लिए राष्ट्रवाद शब्द अनुवाद है जो पूर्ण अर्थ देने में सक्षम नहीं है , उसी प्रकार ‘पुनर्जागरण’ भी  निहितार्थ से दूर है , क्योंकि हम आज भी कहते हैं, “ वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। यह मंत्र (ऋग्वेद के 9.23.2) में मिलता है। हम इस राष्ट्र में सदैव जागरूक रहने वाले पुरोहित (मार्गदर्शक) बनें।”

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 **(गोविन्द शंकर कुरुप) आधुनिक मलयालम साहित्य के प्रमुख कवि और भारतीय साहित्य के महत्वपूर्ण साहित्यकार थे। पूरा नाम: गोविन्द शंकर कुरुपजन्म: 3 जून 1901,जन्म स्थान: Nayathode, केरल,मृत्यु: 2 फरवरी 1978. साहित्यिक परिचय:वे मलयालम काव्य के आधुनिक युग के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति प्रेम,आध्यात्मिकता,मानवतावाद भारतीय संस्कृति के तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उनकी रचनाओं में रहस्यवाद और प्रतीकात्मकता का भी प्रभाव मिलता है।)

(i) जेम्स एच० कजेन्स (एक आयरिश (Ireland के) साहित्यकारदार्शनिक और थियोसोफिस्ट थे। उन्होंने भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण पर महत्वपूर्ण लेखन किया।जन्म: 1873,मृत्यु: 1956, इस प्रकार उनका समय मुख्यतः 19वीं सदी के अंत और 20वीं  सदी के मध्य का है। वे भारत आए और यहाँ की थियोसोफिकल सोसाइटी (Theosophical Society) से जुड़े। उन्होंने भारतीय संस्कृतिकला और आध्यात्मिकता पर कई पुस्तकें लिखीं ।  अपनी कृति भारतीय पुनर्जागरण (द रेनेसां इन इंडिया) में यह प्रश्न उठाया है कि 

(ii) ‘पुनर्जागरण’ (रेनेसां) : शब्द को भारतीयता के संदर्भ में समझा जाना चाहिये। यह सच है कि 

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*डॉ मस्त्रे- (Joseph de Maistre “डी-मेस्ट्रे” फ्रांस / सावॉय, (आज का फ्रांस-इटली सीमा क्षेत्र) काल: 1753–1821 (18वीं–19वीं सदी), आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के आलोचक दार्शनिक।)–  का कथन है कि ,वे एक राजनीतिक दार्शनिकलेखक और राजनयिक थे। 

राष्ट्रीय 'स्व' और प्रतिबद्धता

 

राष्ट्रीय 'स्व' और प्रतिबद्धता

 

प्राचीन हो या नवीन, हम जिसको अपना रहे हैं वह हमारे राष्ट्रीय 'स्व' को आगे बढ़ाने में सहायक होना चाहिए, यही उस के ग्राह्य या अग्राह्य होने की कसौटी है। हमारी अनुसंधान-वृत्ति का काम है कि बह इस कसौटी का निरंतर उपयोग करे और हमारे द्वारा जिस का धनुकरण किया जा रहा है उस में से केवल उन्हीं तत्वों की स्वीकार करे जो हमारे राष्ट्रीय 'स्व' के लिये हितकर है और ऐसे तत्त्वों की सर्वथा त्याग दे जो देश-काल-पांत्रता के विचार से अहितकर सिद्ध हो रहे हों।

इस दृष्टि से निस्संदेह हमें अपने राष्ट्रीय ‘स्व’ से प्रतिबद्ध होना पड़ेगा और अपने अतीत तथा वर्तमान में ऐसे तत्त्वों का अनुसंधान करना पड़ेगा जो राष्ट्रीय ‘स्व’ को अमरता देने में अभी तक सहायक सिद्ध हुए हैं या आगे सिद्ध हो सकते हैं।

 

यह बात तीन प्रकार के लोगों को पसंद नहीं आयेगी। प्रथम तो वे बन्धु हैं, जिन्हें प्रतिबद्धता शब्द से ही चिढ़ है। दूसरे वे भाई हैं जो कहते हैं कि हमारा रराष्ट्रीय 'स्व' नाम की कोई वस्तु नहीं है और यदि है भी तो वह सर्वथा निन्य एवं त्याज्य है। तीसरे वे महानुभाव हैं, जो अंतर्रा-ष्ट्रीयता से प्रतिबद्ध हैं और इस लिए राष्ट्रीय 'स्व' से प्रतिबद्ध होने को वे एक संकीर्णता मानते हैं ।

 

इन सभी बन्धुओं से निवेदन है कि वे अपने दृष्टिकोण पर तनिक पुनर्विचार करें। क्या कभी यह संभव है कि याप सर्वथा अप्रतिवद्ध रह सकें ?

 

आप चाहे धर्म, सदाचार, शील, राष्ट्रीयता आदि से अप्रतिबद्ध होने का दावा करें, परन्तु निस्संदेह आप अपने 'स्व' से प्रतिबद्ध हैं, क्योंकि अन्यथा न आपको अपने तन की आवश्यकताओं का ज्ञान होता और न मन की - यहां तक कि आप अपने अप्रतिवद्धतावाद का आग्रह भी नहीं करते । वस्तुतः बच्चा अपने 'स्व' से प्रतिबद्ध हुआ ही जनमता है। जन्म से ही वह अपने तन-मन की 'भूख' मिटाने के लिए आतुर है और यह 'भूख' मिटाने के लिए उसे केवल मोजन ही नहीं चाहिए, अपितु वस्त्र, भाषा, विचार, भाव, श्राचार-व्यवहार भी चाहिए जो अपने परिवार, समाज या राष्ट्र के 'स्व' हो कर प्राप्त होते हैं। बच्चा पैदा होते हीराष्ट्र द्वारा प्रदत्त परिवेश से इंद्रिय-संनिकर्ष स्थापित करता है और उस के माध्यम से शनैः शनैः राष्ट्रीय 'स्व' से निरंतर प्रतिबद्ध होता जाता है।

‘संगम-साहित्य 1

 

मुझे साहित्यकारों के उस प्राचीन ‘संगम’ की याद आती है जिसकी स्मृति हमारी तमिल-परंपरा में अभी तक सुरक्षित है। 

कहा जाता है कि ई. पू. 9000 वर्ष से लेकर ईसवी संवत् की प्रारंभिक शताब्दियों तक कई संगमों में अनेक साहित्यकार एकत्र हुए । उन साहित्यकारों की रचनाओं का नमूना आज भी हमारे उस प्राचीन संग्रह में सुरक्षित है जिसे तमिल का ‘संगम-साहित्य’ कहते हैं। 

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित है, उन्हें तमिल परंपरा ‘अहम्’ और ‘इदम्’ नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैं, जो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक ‘संगम’ की याद दिलाते हैं, जिसमें व्यष्टि और समष्टि के साथ-साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उसको एक ‘भारतजन’ में परिणत करने वाली एक ऐसी ‘संगम-दृष्टि’ हमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय से, न केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थी, अपितु व्यष्टि एवं समष्टि के अन्तर्गत आने वाले देह और देही, स्त्री और पुरुष, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी, को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन ‘अहम्’ और ‘इदम्’ में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को ‘राष्ट्री’ तथा ‘संगमनी’ कहा गया है। यही हमारे बहुभाषा-भाषी भारतजन का ‘संगमन’ कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी ने, आसेतु हिमालय तक, इस महादेश को एक संस्कृति दी, एक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे ‘अद्भुत संगम’ का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकी, और न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

ऋग्वेद ने ‘संगच्छध्वं सवदध्वम्’ का जो महामंत्र इस राष्ट्र के कानों में फूंका था, वह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनों, आक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी ‘संगम’ जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

अनुकरण और अनुसंधान: आज हम उक्त भीतरी ‘संगम’ की सर्वथा उपेक्षा करके किसी न किसी बाह्य दिखावे की नकल करने में लगे हुए हैं। कुछ लोगों को नवीनता का मोह है, अतः बाहर से जो भी हवा चलती है, उसी के वे भक्त बन जाते है। विकासवाद हो या मार्क्सवाद, फायडवाद हो वा हिप्पीवाद, सभी का वे स्वागत करते हैं, आँख मूंदकर अनुकरण करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें प्राचीनता से मोह है। वे प्रत्येक नई धारा का बहिष्कार करते हैं और प्रत्येक पुरानी प्रथा का अंधानुकरण । वे लोग इस बात का भी विचार नहीं करते कि बाल-विवाह, छुआछूत जैसी कुप्रवृत्तियां, जो किसी परिस्थिति-विशेष में अपनाई गई थीं, आज की परि-स्थितियों में राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। इस प्रकार नवीनतावादी और परंपरावादी दोनों एकमात्र अनुकरण को ही राष्ट्र-रक्षा का अमोघ अस्त्र मान बैठे हैं।

वास्तविकता यह है कि अनुकरण एवं अनुसंधान नामक दोनों पैरों से मानव जाति प्रगति पथ पर बढ़ी है। अतः केवल अनुकरण से काम नहीं चलेगा । अनुकरणमात्र से मानव ‘सीताराम’ की रट लगाने वाला ‘तोता’ तो बन सकता है, परन्तु समस्त जग को ‘सियाराममय’ समझने बाला ‘तुलसी’ नहीं; ‘नकलची बंदर’ तो हो सकता है, परन्तु ‘जगदीश-चन्द्र बसु’ जैसा वैज्ञानिक नहीं। अनुकरण द्वारा प्राप्त ज्ञान तब तक प्रगति-विधायक नहीं हो सकता जब तक उस के साथ अनुसंधानवृत्ति भी संक्रिय न हो उठे, क्योंकि इस वृत्ति के बिना कोई बंदर नाई की नकल कर के छुरे से अपने को ही घायल कर सकता है ।

 

अनुकरण के साथ साथ देश, काल और पात्रता का विचार करने की प्रवृत्ति भी जागनी चाहिए, अन्यथा अनुकरण-जन्य ज्ञान हमारे भीतर ‘स्व’ का अंग नहीं बन सकता। देश, काल व पात्रता का विचार करने वाली प्रवृत्ति ही अनुसंधान-वृत्ति है। इसी के द्वारा कोई भी ज्ञान हमारे 'स्व' का अंग बनता है और हम आवश्यकतानुसार उस का उप-योग देश, काल और पात्र का विचार करते हुए विभिन्न ढंग से करने में समर्थ होते हैं।

संस्कृति की प्रकृति

 

संस्कृति की प्रकृति

 

हमें न तो कल्चर, ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ शब्दों के गुणार्थ के बारे में पांडित्यपूर्ण चर्चा करनी है और न ही इस दृष्टिकोण का अनुमोदन करना है कि ‘संस्कृति’ की भांति 'कल्चर’ के बारे में सार्वदेशिक स्वरूप की धारणा होनी चाहिये। हमें तो इस तथ्य को स्वीकार करना है कि बोलचाल की भाषा में ‘कल्चर’ किसी समाज के मानस पर पड़ने वाले प्रभावों की ऐसी प्रवृत्ति का द्योतक है जो विशेष रूप से उसकी अपनी होती है और पुनः जो उनके समूचे इतिहास में उसके भावों, उद्वेगों, विचार, वाणी और कर्म को संचयी रूप से प्रभावित करती है।

 अतः प्रत्येक संस्कृति का मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र पर अपना विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। यह ठीक ही कहा गया है कि -

सांस्कृतिक विभिन्नताएं उस रीति से उपजती हैं जिस रीति से सामाजिक अनुभव का विश्लेषण और विवेचन होता है और जो संकल्पनाओं, प्रतीकों, मूल्यों तथा भाव मुद्राओं या दृष्टिकोणों के रूप में स्पष्ट रूप से सुनायी पड़ती है। 

‘संस्कृति’ विशिष्ट सामाजिक आत्म चेतना है। यथा, इस तथ्य के होते हुए भी कि पाश्चात्य संगीत में लयबद्धता (हार्मनी) के उपयोग से बहुत पहले वैदिक ऋचाओं का ‘लयबद्धता गान’ भारत के ऋषि-मुनियों के आश्रमों में गूंजता था, यह स्वीकार करना ही होगा कि भारतीय संगीत पाश्चात्य संगीत से इस दृष्टि से भिन्न है कि उसमें लयबद्धता के लिए कोई स्थान नहीं है जबकि लयबद्धता पाश्चात्य संगीत का अनिवार्य अंग है।

 भारतीय संगीत का स्वरूप सुरीला रागात्मक होता है  और वह भाव की सहज भाषा को व्यक्त करता है। लयबद्धता राग को गहनता प्रदान करके उसे सजाती-संवारती है और उसमें चार चांद लगा देती है। एक विशेषज्ञ के अनुसार ‘पाश्चात्य संगीत में समरसता के भाव तथा भारतीय संगीत में उसके अभाव का कारण इन भागों में रहने वाले लोगों के स्वभाव के ही कारण हो सकता है।’

भारतीय को अपने पड़ोसी की अपेक्षा अनन्त से नाता जोड़ना अधिक सरल लगता है। भारतीय संगीत का प्रयोजन है, आत्मा को शुद्ध किय जाए, तन पर अनुशासन का अंकुश लगाया जाए, अपने भीतर स्थित अनन्त के प्रति  राग पैदा की जाए अपने सास की डोर को अंतरिक्ष के स्वास की डोर से और अपने स्पन्दन की चिन्ता करते हैं। इन सब कारणों से भारतीय संगीतज्ञ अपेक्षाकृत एकल वादक होता है कि दसते के स्यन्दनों से जोड़ा जाए। प्रायः भारतीय बाह्य समूहों की अपेक्षा अपने परिवार के बारे में अधि खोटे-छोटे समूह करते हैं। मुख्यतः एकल वादक होने के नाते कला मर्मज्ञ की एक विशेषता होती है के साथ मिलकर संगत करने वाला वादक जैसा कि पाश्चात्य संगीत के बड़े-बड़ेवादी के स्वर, संगीत प्रदर्शन का अपूर्व कौशल।

     प्रक्रिया में वह अपनी स्वाधीनता का बलिदान करने को तत्पर रहता है। इसे उसके जीवन में स्पष्ट रूप इसके विपरीत यूरोपवासी की इच्छा रही है कि व्यक्तियों को समुदायों में परिणित किया जाए। इस संगीत का जहां वाद्य-वृन्दों की प्रधानता रहती है। वाद्य-वृन्दों या गायन बन्दों में हर साज या आवाज मे देखा जा सकता है. फिर चाहे वह पूजा-अर्चना का क्षेत्र हो या कार्य-व्यापार का सामाजिकता या को एक हद तक ही अपनी आजादी होती है लेकिन उसे अन्य आवाजों की उपस्थिति को ध्यान में रखना पडता है और अपने सर को समूह के अन्य सुरों से मिलाना होता है।

     भारतीय संगीत में वर्ग के अन्दर भी एकल वादन बना रहता है और वह कभी भी सुसंगत रूप में एकाकार नहीं हो पाता। अतः आर्केस्ट्रा भारतीय संगीत की प्रकृति के प्रतिकूल है।

 संस्कृति का अर्थ तथा उसकी - प्रक्रिया (द मीनिंग एंड प्रोसेस ऑफ कल्चर) में प्रो० जी० सी० पांडे ने कहा है, “भारत का सामाजिक इतिहास पश्चिम के इतिहास से भित्र है। भारतीय इतिहास का एक नितान्त भिन्न लय और ताल है। 

पश्चिमी में सामाजिक परिवर्तन अधिक द्रुतगति से हुए हैं और कभी-कभी तो क्रान्तिकारी ढंग से हुए हैं। सामाजिक जीवन के विकास में राज्य ने अहं भूमिका निभायी है और सत्ता के लिए संघर्ष अधिक तीखा और अधिक व्यापक रहा है। वैचारिक प्रतिबद्धता को पराकाष्ठा रही है और मतभेद तथा विरोध के प्रति सहिष्णुता अल्पतम।

 तर्क संगतता के अपने पागलपन में पश्चिमी विचारधारा ने चित्तियों तथा वृत्तियों की असंगतियों को ऐसे असाध्य अन्तर्विरोधी का रूप दे दिया है जो निरंकुश चयन की अपेक्षा करते हैं। 

दूसरी ओर भारतीय मानस ने प्रयास किया है कि सामाजिक संबंधों का विनियमन अमूर्त कारण से नहीं अपितु सहज ज्ञान तथा सहानुभूति से किया जाए। नई चुनौतियों का सामना करने के लिए उसने पुराने समाधानों में संशोधन-परिवर्द्धन किए हैं, उसे अस्वीकार नहीं किया है। (अवोधगम्य ३४९)

 “पश्चिमी मानवतावाद ने प्रकृति पर मानव की विजय और उसकी सत्ता पर बल दिया है और उसे अपनी इच्छा पूर्ति का साधन बनाया है। भारतीय मानवतावाद ने ‘जिओ और जीने दो’ का सहिष्णु दर्शन अपनाया है। प्रकृति पर विजय के अभियान के स्थान पर उसने एक स्तर पर प्रकृति के साथ सामजस्य बताने और फिर उससे मुक्ति पाने के आदर्श की मान्यता दी है। 

शक्ति के माध्यम से मुक्ति के स्थान पर उसने आत्म-नियंत्रण के माध्यम से मुक्ति का प्रयास किया है।

 पश्चिम में धर्म को संगठित संस्थागत सिद्धान्त के मत के रूप में मान्यता दी गयी है जो समुदाय व्यवस्था के अनुरूप है। आमाजिक परम्परा पर वहां के शहरी जीवन तथा सभ्यता की तकनीकी व्यवस्था' का प्रभुत्व रहा है। 

भारत में धर्म को सदैव व्यक्तिगत एवं समाज से ऊपर मानने की सशक्त परम्परा रही है। 

पश्चिम का इतिहास एथेन्स तथा सिकन्दरिया रोम तथा कुन्स्तुन्तुनिया, पेरिस तथा लंदन का इतिहास है। उसमें सामाजिक तथा राजनीतिक रूप में संक्रमण का एक सुचिन्हित कालक्रम रहा है। अतः उसका सहज काल विभाजन किया जा सकता है। 

दूसरी ओर भारत की सामाजिक तथा सांस्कृतिक परम्परा में प्राचीन तथा नवीन व्यवस्थाएं साथ-साथ चलती रही हैं और यह निरन्तरता प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। अनुदारवाद के साथ-साथ अतीत की पुनरव्याख्या करने की तत्परता ने यहां क्रांतियां नहीं होने दी और जाति-व्यवस्था ने वर्ग-वैमनस्यों तथा वर्ग संघर्षों को पनपने नहीं दिया है। 

भारतीय समाज के इतिहास को और आधिक सहज रूप से परस्परव्यापी सुस्पष्ट कालखंडों में विभाजित किया जा सकता है। वह सम्पूर्ण प्रगति तथा एकता की परिधि में आश्चर्यजनक अविच्छिनता एवं विषमता का कौतुक उपस्थित प्रस्तुत करता है।"

 

 

अन्य प्रमुख नास्तिक विचार धाराएं

(तीन) अन्य प्रमुख नास्तिक (अवैदिक) विचारधाराएँ : बुद्ध और महावीर के काल में प्रचलित अन्य महत्वपूर्ण विचार: (i) आजीवक संप्रदाय (मक्खलि गोशाल): * नियतिवाद: सब कुछ पहले से तय है। मनुष्य के कर्म का भाग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। **ऐतिहासिक साक्ष्य: मौर्य सम्राट बिंदुसार इसके अनुयायी थे; बराबर की गुफाएं इन्हीं के लिए बनी थीं। (ii) अज्ञान या अज्ञेयवाद (संजय बेलट्ठिपुत्त): मूल विचार: ईश्वर या मृत्यु के बाद के जीवन जैसे आध्यात्मिक प्रश्नों का निश्चित उत्तर जानना असंभव है। (iii) अक्रियवाद (पूरण कश्यप): * मूल विचार: कर्म का कोई फल नहीं होता। न पुण्य से लाभ होता है, न पाप से हानि। यह कर्म सिद्धांत का पूर्ण खंडन है। (iv) उच्छेदवाद / भौतिकवाद (अजित केशकंबली): मूल विचार: मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के साथ सब नष्ट हो जाता है। यह चार्वाक दर्शन का आधार बना। (V) अनिश्चयवाद (विक्षेपवाद): मूल विचार: किसी भी अंतिम सत्य पर पहुँचना संभव नहीं, इसलिए वाद-विवाद से बेहतर मौन रहना है।

निष्कर्ष : इन विचारधाराओं को मुख्यतः तीन वर्गों में रखा जा सकता है, आस्तिक, नास्तिक और अन्य अवैदिक धाराएँ। (i) आस्तिक दर्शनों ने वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के रूप में व्यवस्थित दार्शनिक परम्परा विकसित की। (ii) नास्तिक विचारधाराओं, विशेषतः चार्वाक या लोकायत ने प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हुए आत्मा, परलोक और कर्मफल का खंडन किया। (iii)  आजीवक, -नियतिवाद,अज्ञेयवाद, अक्रियवाद, उच्छेदवाद और अनिश्चयवाद जैसी अन्य विचारधाराएँ भी प्रचलित थीं, जिन्होंने नियति, ज्ञान, कर्म और जीवन-मरण के प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। (iv) स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही है, जहाँ एक ही मूल वैदिक पृष्ठभूमि से विविध दार्शनिक मतों का विकास हुआ और सत्य की खोज विभिन्न मार्गों से निरन्तर चलती रही।

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