Thursday, 30 July 2026

साधारण मनुष्यों हेतु कार्य-पद्धतियाँ

 

 साधारण मनुष्यों हेतु कार्य-पद्धतियाँ

१.विचार-प्रसारण (Thought Broadcasting): * विचार=रेडियो तरंगें। योगियों की शक्तिशाली विचार-तरंगें वैज्ञानिकों/विचारकों को प्रेरणा देती हैं। अनेक महान आविष्कार = दिव्य प्रेरणा का परिणाम।

२. सामूहिक कर्म-शमन (Collective Karma Mitigation): *तपशक्ति द्वारा युद्ध, आपदा और नकारात्मकता का संतुलन।

* शांति-तरंगें पृथ्वी हेतु “सुरक्षा कवच” बनती हैं।

३. सूक्ष्म सहायता (Astral Assistance): *सच्ची पुकार पर योगी सूक्ष्म शरीर से प्रकट होते हैं। *स्वप्न, संकेत या अज्ञात व्यक्ति के रूप में मार्गदर्शन। * संकट से रक्षा एवं आध्यात्मिक सहायता।

४. आध्यात्मिक रिले स्टेशन (Spiritual Relay Station):* योगी ब्रह्मांडीय ऊर्जा को ग्रहण कर सामान्य मानव हेतु अनुकूल बनाते हैं। *वे “ट्रांसफॉर्मर” की तरह दिव्य शक्ति को सहनीय रूप में प्रवाहित करते हैं।* परिणाम = संसार में शांति, भक्ति और संतुलन।

५. गुप्त शिष्यों द्वारा कार्य:* साधारण रूप में समाज के बीच रहकर सेवा। *डाक्टर, शिक्षक, मजदूर, कर्मचारी आदि रूपों में मानवता का मार्गदर्शन।*ज्ञानगंज के आचार्य अप्रत्यक्ष रूप से समाज-परिवर्तन कराते हैं।

"एक सच्चा गुरु कभी अपने शिष्य को अकेला नहीं छोड़ता। दूरी केवल शरीर की होती है, चेतना की नहीं।" - स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि

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                            होली साइंस’ (कैवल्य दर्शनम्) के अनुसार काल-गणना

१. युगांतर का गणित (Correct Yuga Cycle): * कलयुग = १२०० वर्ष। * कलयुग का अंधकारमय अंत = ई. स. ४९९।* सन् १७०० = चढ़ते हुए द्वापर युग का प्रारंभ। *आधुनिक विज्ञान, बिजली और ऊर्जा-विज्ञान का तीव्र विकास = द्वापर युग का प्रभाव।* मानव चेतना = पदार्थ से ऊर्जा की ओर अग्रसर।

२. ज्ञानगंज के योगियों का दृष्टिकोण:* महासिद्ध = युग -परिवर्तन के निरीक्षक (Overseers)* द्वापर त्रेता सत्ययुग = चेतना का क्रमिक उत्कर्ष।* भविष्य में टेलिपैथी और सूक्ष्म-दृष्टि का पुनर्जागरण।* भविष्य का विज्ञान = चेतना-आधारित विज्ञान।*संकल्प-शक्ति द्वारा ब्रह्मांडीय यात्रा संभव।* सत्ययुग = ज्ञानगंज और सामान्य मानव समाज के बीच का पर्दा समाप्त।*मानव और सिद्ध पुरुषों का सह-अस्तित्व।

३. परिवर्तन काल (Transition Period):* युग-परिवर्तन = पुरानी सोच और नई चेतना का संघर्ष।* ज्ञानगंज के योगी = वैश्विक ऊर्जा-संतुलनकर्ता।* शांति-केंद्र एवं आध्यात्मिक संस्थाएँ = उच्च ऊर्जा ग्रहण करने की तैयारी।* उद्देश्य = मानवता को विनाश से बचाकर चेतना-उत्कर्ष की ओर ले जाना।

४. वर्तमान समय का महत्व:* वर्तमान काल = “आध्यात्मिक फसल” का समय।* क्रियायोग जैसी वैज्ञानिक साधनाएँ = तीव्र आत्म-विकास का माध्यम।* ब्रह्मांडीय तरंगें = Evolution (उत्कर्ष) के पक्ष में सक्रिय।* साधना की गति = पूर्व युगों की तुलना में अधिक तीव्र।

 सूत्ररूप सार : कलियुग से द्वापर की ओर बढ़ती मानवता अब पदार्थ से ऊर्जा, और ऊर्जा से चेतना की यात्रा पर है; ज्ञानगंज के सिद्ध इस संक्रमण के मौन मार्गदर्शक हैं।”

"युग बदल रहे हैं, और उनके साथ मनुष्य की नियति भी। अब सोने का समय नहीं, बल्कि जागने और अपनी दिव्य शक्ति को पहचानने का समय है।" - परमहंस योगानंद

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                                                        क्रियायोग के ५ मुख्य सूत्र

१. “दोहरे जीवन” का अभ्यास (Double Life): * बाहर से सक्रिय, भीतर से मौन।* कार्य करते हुए भी श्वास एवं ‘हं-सौ’ पर सजगता। कर्म + ध्यान = थकान रहित ऊर्जा।

२. सुबह और रात का “सुनहरा समय”: *भोर का ध्यान=पूरे दिन का आध्यात्मिक कवच। रात्रि का क्रियायोग = तनाव-विसर्जन एवं योग-निद्रा। नियमित साधना = चेतना की स्थिरता।

३. “शांत रहकर काम करो” (निष्काम कर्म): 'युग-परिवर्तन' में आपकी भूमिका- क्रियायोग से भीतर जो शांति पैदा होती है, वह परिवार, कार्यक्षेत्र और अंततः पूरे ब्रह्मांड की तरंगों (Vibrations) को बदलती है। यही वह सूक्ष्म तरीका है जिससे एक साधारण गृहस्थ 'सत्ययुग' को पृथ्वी पर लाने में मदद करता है।

"संसार को छोड़ना समाधान नहीं है; संसार में रहकर संसार को अपने भीतर न आने देना ही असली योग है।" -लाहिड़ी महाशय

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'द होली साइंस' (कैवल्य दर्शनम) सूत्र रूप

मूल परिचय: रचयिता : स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरिरचना वर्ष : १८९४प्रेरणा : महावतार बाबाजी का आदेश उद्देश्य : पूर्व और पश्चिम के दर्शन का समन्वय

१. युग-चक्र सूत्र: युग चक्र = २४,००० वर्ष सौर मंडल = द्वितारा (Binary Star) प्रणाली का भाग वर्तमान काल = द्वापर युग द्वापर युग = ऊर्जा एवं विज्ञान का युग आधुनिक उन्नति = विद्युत + परमाणु शक्ति + अंतरिक्ष विज्ञान का परिणाम  

२. कैवल्य के चार सूत्र: (i) वेद सूत्र- सभी धर्म = एक सत्य की भिन्न अभिव्यक्ति गीता + बाइबल = एक ही आध्यात्मिक अनुभव (ii) अभिष्ट सूत्र: जीवन का लक्ष्य = दुःख निवृत्ति + आनंद प्राप्ति (iii) साधन सूत्र: क्रियायोग = आत्मोन्नति की वैज्ञानिक विधि आत्म-संयम = चेतना शुद्धि का साधन (iv) विभूति सूत्रल: उच्च साधना = सिद्धियाँ + आत्मप्रकाश अंतिम अवस्था = कैवल्य (मोक्ष)

३. तत्त्व एवं चेतना सूत्र: शरीर = २४ तत्त्वों का संयोजनचेतना प्रवाह : चित्त अहंकार बुद्धि इंद्रियाँ भौतिक जगत रीढ़ + मस्तिष्क = विद्युत-चुंबकीय यंत्रक्रियायोग = ब्रह्मांडीय चेतना ग्रहण करने की प्रक्रिया

४. बाबाजी उद्देश्य सूत्र: योग = विज्ञान + गणित + चेतना का अनुशासनकृष्ण + बुद्ध + ईसा = सार्वभौमिक सत्य के विभिन्न स्वर

५. मुक्ति सूत्र: मुक्ति शरीर की मृत्यु नहीं, अज्ञान की मृत्यु है।” * प्राणशक्ति नियंत्रण = काल और स्थान पर विजय * आत्मज्ञान = वास्तविक स्वतंत्रता। *चेतना विस्तार = ब्रह्मानुभूति

सार सूत्र: क्रियायोग द्वारा चेतना को शुद्ध कर मनुष्य अपनी दिव्य सत्ता का अनुभव करता है; यही कैवल्य है।”

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       द होली साइंस’ - बाइबल और वेदों का सूत्र-संगम

१. ॐ–आमीन सूत्र: ॐ = Amen = Word = ब्रह्मांडीय कंपन।आदि में शब्द था” = सृष्टि का मूल स्पंदन।  प्रणव (ॐ) = ईश्वर का ध्वनि-स्वरूप । ब्रह्मांड = कंपन से निर्मित चेतन ऊर्जा ।

वाक्य सूत्र: शब्द ही ईश्वर है, और ॐ उसी शब्द का अनुभव है।”

२. सात चर्च–सात चक्र सूत्र: Seven Churches = शरीर के सात चक्र । Seven Stars = चेतना के सात केंद्र । रीढ़ = आध्यात्मिक मार्ग । क्रियायोग = चक्र जागरण की प्रक्रिया । सहस्रार = स्वर्ग चेतना ।

चेतना प्रवाह :मूलाधार स्वाधिष्ठान मणिपुर अनाहत विशुद्ध आज्ञा सहस्रार।

३. पवित्र आत्मा–प्राण सूत्र: Holy Ghost = प्राण शक्ति । वास्तविक बपतिस्मा = आंतरिक चेतना जागरण। दिव्य अनुभव = प्राण के शुद्ध प्रवाह से । श्वास नियंत्रण = आत्मिक प्रकाश का द्वार ।

योग सूत्र: जहाँ प्राण स्थिर, वहाँ मन स्थिर; जहाँ मन स्थिर, वहाँ ईश्वर प्रकट।”

४. ज्ञान वृक्ष–मेरुदंड सूत्र: Garden of Eden = मानव चेतना । Tree of Knowledge = मस्तिष्क + मेरुदंड । सर्प = नीचे की ओर बहती जीवन ऊर्जा । पतन = चेतना का इंद्रियों में फँसना । उत्थान = ऊर्जा का ऊपर सहस्रार की ओर आरोहण।

क्रियायोग सूत्र: अधोगामी ऊर्जा = बंधन । ऊर्ध्वगामी ऊर्जा = मुक्ति ।

५. स्वर्ग राज्य सूत्र: “Kingdom of God is within you” = स्वर्ग भीतर की चेतना अवस्था । कूटस्थ (तीसरी आँख) = दिव्य द्वार । ध्यान = आंतरिक स्वर्ग का अनुभव । कैवल्य = आत्मा की परम स्वतंत्रता ।

 ६. सार्वभौमिक धर्म सूत्र: धर्म अनेक, सत्य एक । कृष्ण + बुद्ध + ईसा = एक ही चेतना के विभिन्न प्रकाश।  बाहरी मतभेद = आंतरिक एकता का आवरण।  विद्युत उपमा: तार अलग-अलग। धारा एक । धर्म अलग-अलग। दिव्य प्रकाश एक ।

सार सूत्र: *जब मनुष्य भीतर के शब्द, प्रकाश और प्राण को पहचान लेता है, तब उसे ज्ञात होता है कि सभी धर्म एक ही सनातन सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।” * "सत्य का कोई देश या धर्म नहीं होता; वह विज्ञान की तरह अटल है।" -स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि

कायाकल्प विज्ञान

 

कायाकल्प विज्ञान 

१. कायाकल्प का अर्थ: (i) काया” = शरीर । (ii)  कल्प” = परिवर्तन / नवीनीकरण । (iii) उद्देश्य: पुराने कोशों को हटाकर नए तेजस्वी कोशों का निर्माण। २. कायाकल्प की मुख्य विधियाँ: (क) कुटीप्रावेशिक विधि : (i) साधक ४०–९० दिन बंद कुटिया में रहता है। (ii) सूर्य प्रकाश और बाहरी वायु सीमित रहती है। (iii) विशेष जड़ी-बूटियों और औषधियों का सेवन कराया जाता है। (iv) परिणाम: *पुराने बाल झड़ना ,**दाँत पुनः उगना ,***त्वचा का नवयौवन जैसा होना । (ख) यौगिक एवं सौर विधि: (i) सूर्य विज्ञान और प्राण विद्या का प्रयोग। (ii) विशेष सूर्य रश्मियों को चक्रों पर केंद्रित किया जाता है। (iii) शरीर में सूक्ष्म ऊर्जा परिवर्तन उत्पन्न होते हैं। (iv) परंपरा अनुसार महावतार बाबाजी ने विशेष “अमृत” का प्रयोग कराया था।

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                                                           कायाकल्प के प्रमुख चरण

*शुद्धिकरण: शरीर के विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। * कायापलट: पुरानी त्वचा हटकर नई चमकदार त्वचा आती है।  * इंद्रिय शक्ति: दृष्टि और श्रवण अत्यंत तीव्र हो जाते हैं। * स्थिरता: श्वास और हृदय गति पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। उदहारण - * मदन मोहन मालवीय  द्वारा कायाकल्प प्रयोग का उल्लेख मिलता है। * अमरकंटक के बर्फानी बाबा के बारे में भी कहा जाता है कि उन्होंने कायाकल्प किया था । *कहा जाता है कि उनके बाल काले होने और तेज बढ़ने जैसे परिवर्तन दिखाई दिए।

 ज्ञानगंज के योगियों का “वज्र शरीर”: *शरीर को केवल “सेवा का वाहन” माना जाता है। *योग और औषधियों द्वारा शरीर का पुनर्नवीनीकरण किया जाता है। * उद्देश्य: दीर्घकाल तक मानवता की सेवा।

 सामान्य व्यक्ति के लिए सावधानी: *बिना सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन के प्रयास जोखिमपूर्ण माने जाते हैं। *ब्रह्मचर्य और मानसिक स्थिरता आवश्यक मानी जाती है। * तीव्र औषधियाँ और ऊर्जा साधारण शरीर सहन नहीं कर पाता।

 मुख्य सूत्र: * शरीर प्रकाश के परमाणुओं का संघनन है।” * प्रकाश नियंत्रण से आयु नियंत्रण संभव माना गया है।”

"शरीर केवल प्रकाश के परमाणुओं का संघनन है। यदि आप प्रकाश को नियंत्रित करना जानते हैं, तो आप शरीर की आयु को भी नियंत्रित कर सकते हैं।"- परमहंस योगानंद

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ज्ञानगंज का “अमृत कुंड”

अमृत कुंड का स्वरूप: *ज्ञानगंज के मध्य स्थित दिव्य जल स्रोत। * मानस सरोवर का सूक्ष्म रूप” माना जाता है। * जल साधारण नहीं, “तरल प्रकाश” (Liquid Light) जैसा वर्णित। * इसमें से दिव्य “अष्टगंध” सुगंध निकलती रहती है। * जल का रंग आध्यात्मिक ऊर्जा के अनुसार बदलता माना जाता है।

                                                    अमृत कुंड की विशेषताएँ

              (क) प्राण शक्ति का केंद्र: * इसमें प्राण शक्ति की अत्यधिक सांद्रता मानी जाती है। * इसे “अमृत” स्वरूप कहा गया है।  (ख) रोग निवारण: * असाध्य रोगों में लाभकारी माना जाता है। * जल का स्पर्श रुग्ण कोशों को पुनर्जीवित करने वाला बताया गया है। * शरीर में नई ऊर्जा और चेतना का संचार माना जाता है। मानसिक शांति: * जल की बूंदें मस्तक पर लगाने से मानसिक विक्षेप शांत होने की मान्यता। * साधक गहरे ध्यान की अवस्था में प्रवेश करता है।

अमृत कुंड और चंद्र विज्ञान: *ज्ञानगंज में “चंद्र विज्ञान” की साधना का उल्लेख मिलता है। * अमृत कुंड को चंद्र रश्मियों का संचयन केंद्र माना जाता है। * पूर्णिमा की रात्रि में विशेष अनुष्ठान किए जाने की मान्यता। * योगिनियाँ कुंड के चारों ओर साधना करती हैं। * इससे जल की औषधीय और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ने का विश्वास।

अमृत कुंड का रहस्य: * यह केवल सामान्य भौतिक वस्तु नहीं माना जाता। * विशेष चेतना स्तर पर ही इसके दर्शन संभव बताए गए हैं। * साधारण व्यक्ति को वहाँ केवल हिम, पत्थर या सामान्य दृश्य दिखाई दे सकते हैं। * इसे “आवृत्ति” (Frequency) और चेतना का रहस्य कहा गया है। *गुरु कृपा को इसके अनुभव की कुंजी माना गया है।

मुख्य सूत्र: *अमृत कुंड” = प्राण, प्रकाश और चेतना का संगम। *दर्शन वही कर सकता है जिसकी चेतना अनुकूल हो।”  *गुरु कृपा के बिना सूक्ष्म लोक का अनुभव कठिन माना गया है।”

               एक प्रसिद्ध घटना: विशुद्धानंद जी के जीवन से जुड़ी एक कथा है कि उन्होंने एक मरणासन्न व्यक्ति को ज्ञानगंज से लाए गए जल की कुछ बूंदों से पुनर्जीवित कर दिया था। जब उनसे पूछा गया कि क्या यह गंगाजल है, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा था, "यह उस गंगा का जल है जो अभी तक पृथ्वी के धरातल पर नहीं उतरीयह सिद्धाश्रम का मानस-अमृत है।"

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"अमृत कहीं बाहर नहीं, बल्कि आत्मा की उस अवस्था में है जहाँ मृत्यु का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। ज्ञानगंज का कुंड उसी अवस्था का भौतिक प्रतीक है।"

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                            'दिव्य पुस्तकालय ' या'विज्ञान भवन' या 'सिद्धाश्रम का अभिलेखागार'

              अकाशिक रिकॉर्ड्स (Akashic Records) का भौतिक रूप: इसे ब्रह्मांड का 'अक्षय भंडार' माना जाता है। योगियों का कहना है कि ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटा है, घट रहा है या घटने वाला है, वह सब 'आकाश' (Ether) में तरंगों के रूप में दर्ज होता है। ज्ञानगंज का यह पुस्तकालय उन सूक्ष्म तरंगों को 'पढ़ने योग्य' रूप में सुरक्षित रखता है।

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पुस्तकालय की अद्भुत विशेषताएँ: (i) जीवंत पुस्तकें: यहाँ की 'पुस्तके' कागज की नहीं बनी हैं। कहा जाता है कि वे एक विशेष प्रकार के 'प्रकाश पुंज' (Light Sheets) से निर्मित हैं। जब कोई योगी किसी विशेष कालखंड के बारे में जानना चाहता है, तो वह ज्ञान उसके सामने किसी चलचित्र (Movie) की तरह सजीव हो उठता है। (ii) लुप्त विद्याएँ: यहाँ वे सभी शास्त्र और विद्याएँ सुरक्षित हैं जो पृथ्वी पर समय के साथ लुप्त हो गईं (जैसे मूल ऋग्वेद की लुप्त शाखाएँ, अटलांटिस का विज्ञान, और प्राचीन विमान शास्त्र)। (iii) भविष्य का ज्ञान: इसमें केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि आने वाले युगों के 'संभावित घटनाक्रम' भी सुरक्षित हैं, जिन्हें पढ़कर महावतार बाबाजी जैसे सिद्ध महापुरुष भविष्यवाणियाँ करते हैं।

 भाषा का रहस्य: * पुस्तकालय में किसी भाषा का बंधन नहीं है। * यहाँ ज्ञान 'भाव-लिपि' (Thought-script) में है। * एक साधक जिस भी भाषा का ज्ञाता हो, उसे वह ज्ञान उसी भाषा में समझ आने लगता है। यह सीधे आत्मा से संवाद करने वाली तकनीक है।

पुस्तकालय के संरक्षक: पुस्तकालय की सुरक्षा का कार्य 'ज्ञान अधिकारिणी' योगिनियों और उच्च ऋषियों के अधीन है। * यहाँ प्रवेश केवल उन सिद्धों को मिलता है जो 'त्रिकालदर्शी' होने की क्षमता रखते हैं। * 'सूर्य विज्ञान' के कई जटिल सूत्र इसी दिव्य पुस्तकालय से प्राप्त हुए थे।

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ज्ञानगंज = अध्यात्म + परा-विज्ञान का दिव्य विज्ञान-केंद्र।

ग्रह-ऊर्जा शोध = मानव जीवन पर ब्रह्मांडीय प्रभावों का अध्ययन।

ज्ञान = नष्ट नहीं होता, केवल ओझल होता है; पात्रता पर गुरु उसकी कुंजी देते हैं।

ज्ञानगंज = पृथ्वी का “आध्यात्मिक उपग्रह”, जो युगों से मानवता का मार्गदर्शन करता है।

सिद्ध योगी = मानवता के लिए “अदृश्य सरकार” समान कार्यरत।

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श्रीनवग्रहस्तोत्रम्




जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
 तमोऽरि सर्वपापध्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १।।

दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥ २॥

 धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् । 
कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥

कुमारं प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
 सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥

देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसंनिभम् । 
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥

नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् । छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥

अर्धकायं महावीर्य चन्द्रादित्यविमर्दनम्। सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥

पलाशपुष्यसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९॥

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः । 
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥ १०॥

नरनारीनृपाणां च भवेद्दुः स्वप्ननाशनम् । 
ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥ ११॥

॥ महर्षिव्यासविरचितं नवग्रहस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

प्रार्थना

            
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

शुचिता मन्त्र-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्ग तोऽपिवा । 
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तरः शुचिः ॥ 

ॐ सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्त्यादि हेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नमः ।।

ईशावास्योपनिषद

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

केनोपनिषद्
छंदोपनिषद 

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राण श्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि।
सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत् अनिराकरणमस्त्व निराकरणं मेऽस्तु । 
 तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु 
 धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 


प्रश्नोपनिषद् 
मुण्डकोपनिषद्
माण्डूक्योपनिषद् 

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । 
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम
 देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ 
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

ऐतरेयोपनिषद्

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। 
वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः ।
अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधामृत्यं वदिष्यामि।  सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु ।  अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ 
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!


तैत्तिरीयोपनिषद

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम्  ।
ॐ शान्तिः । शान्तिः शान्तिः ।

श्वेताश्वतरोपनिषद्

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
 सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। 
ॐ शान्तिः शान्तिः ॥ शान्तिः !!!


बृहदारण्यकोपनिषद् -

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। 
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः शान्ति:

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 हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। 
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।।15 ॥

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पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मिन्समूह  तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि  योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ||16||
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 वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम् ।
 ॐ क्रतो स्मर कृतः स्मर क्रतो स्मर कृतः स्मर ॥ 17॥
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अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । 
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥१८॥
ऐ…….....

 शिवमानसपूजा

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं 
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्। 
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा 
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥
 सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं 
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम्। 
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं 
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु।।
छत्रै चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं  निर्मलं 
वीणाभेरिमृदंङ्गकाहलकला गीतं च नित्यं तथा।
 साष्टांग प्रणति: स्तुतिर्बहुविधा होतत्समस्तं मया।।
 सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ 
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।
 पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । 
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वागिरो ।।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ 
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् । 
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व 
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥
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                  अथ ध्यानम् 

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् । वामाङ्कारूढ़सीतामुखकमलमिलल्लोचनंनीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥
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ध्यानम्

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं
 चारुचन्द्रावतंसं
 रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं 
परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।
 पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं 
वसानं
 विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं 
पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥

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मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ॥ 
पद्मनाभं सहस्राक्षं वनमालिं हलायुधम्
गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥
विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।
दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्गं गरुडध्वजम् ॥
अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम्।।
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अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
 शिवं केवल भासकं भासकानाम् ।
 तुरीयं तमः पारमाद्यन्तहीनं
 प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥ ७ ॥ 

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते 
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते । 
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
 नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥ ८ ॥ 

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ 
महादेव शम्भो महेशं त्रिनेत्र ।
 शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
 त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥ ९॥

शंम्भो महेशं करुणामय शूलपाणें 
गौरीपते पशुपते  पशुपाशनाशिन् । 
काशीपते करुणया जगदेतदेक -
स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ।। १० ।।

 त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे 
त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृण विश्वनाथ।
 त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥ ११॥
             .............

                बालकाण्ड

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।1।।

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्तः स्थमीश्वरम्।।2।।

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।3।।

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ।।4।।

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।5।।

यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।6।।

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-
भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7


अयोध्या काण्ड 

 यस्याड्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके 
भाले बालविद्युर्गले च गरलं यश्योरसि व्यालराट् । 
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा
 शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभिः श्रीशङ्करः पातुमाम् ॥ 

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा च मम्ले वनवासदु:खतः ।
 मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंञ्जुल मलमङ्गलप्रदा ॥

 नीलाम्बुजश्यामलकोमलांङ्गं सीतासमारोपितवामभागम् ।
 पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ॥


अरण्य काण्ड 
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं
वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।

मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं 
वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम् ॥
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं
पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् ।

राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभित
सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥ 


किष्किन्धाकाण्ड

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ 
शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ ।

 मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ
सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ।

 ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं 
चाव्ययं 
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा ।

 संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं 
धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् ।

सुंदर काण्ड
 शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
 ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । 
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १ ॥

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । 
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे 
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
 सकलगुणनिधान वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभघक्तं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥

लंकाकांड 
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
 योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् । 
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं
 वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम् ॥ १ ॥

 शंङ्खेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं
कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम् ।
 काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं 
नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम् ॥ २ ॥

यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम् ।
 खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे ॥ ३ ॥

उत्तरकांड 
 केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं
 शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। 

पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं 
बन्धुना सेव्यमानं
नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम् ।। १ ।।

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ ।
 जानकी करसरोजलालितो चिन्तकस्य मनभृङ्गसंङ्गिनौ ॥ २ ॥

कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्। 
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम् ॥ ३ ॥

….....................

अथ सप्तश्लोकी दुर्गा

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।
कलौ  हि कार्य सिद्धयर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ।

श्रुणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥

 ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः , अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थ सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । 
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १ ॥ 

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । 
दारिद्रधदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ २ ॥

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥३॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४॥

सर्वस्वरूपे  सर्वेशे  सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥५॥

रोगानशेषानपहंसि  तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां  विपन्नराणां
 त्वामाश्रिता  ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ ६ ॥

सर्वाबाधाप्रशमनं   त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ७ ॥

॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा ॥

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सिद्ध कुंजिका स्तोत्र -

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय 
ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।

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तत्त्व शुद्धि -
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । 
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा ॥ 
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्व तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाह।।

 भगवती का ध्यान पञ्चोपचार-

ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । 
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम् ॥ 

ध्यात्वा देवीं पञ्चपूजां कृत्वा योन्या प्रणम्य च।
 आधारं स्थाप्य मूलेन स्थापयेत्तत्र पुस्तकम् ॥

(1) शापोद्धार - करें-

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिका देव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा । 

 इक्कीस इक्कीस बार उत्कीलन हेतु जप करें-

“ ॐ श्रीं क्लीं ह्वीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।"

 (3) मृत संजीवनी विद्या का जप - पुनः मृत सञ्जीवनी विद्या का जप मूल सात-सात बार - निम्नाङ्कित मन्त्र से करें-

'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसञ्जीवन विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।”

- 4 ) सप्तशती - शाप - विमोचन मन्त्र - एक सौ आठ बार जप करने का विधान है-

'ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूँ ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।

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श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र – संस्कृत श्लोक

॥ ॐ श्री दुर्गायै नमः ॥

॥ईश्वर उवाच॥

शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने॥
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भव मोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥३॥

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥४॥

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥५॥

 अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥६॥

 अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥७॥

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥८॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥९॥

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥१०॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥१२

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥१३॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥१४॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥१५॥
…............



सूर्य और राशि



अस्यै कालयज्ञाय नमः।

हम कालकी नाना रूपोंमें उपासना करते हैं। कालने हमें चारों ओरसे आवृत कर रखा है। ऐसे कालकी उपासना हम भला क्यों न करें ? यह मन्त्र है-

ऋतून् यज ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान् । समाः संवत्सरान् मासान् भूतस्य पतये यजे ॥

(अथर्व० ३।१०।९)
              …...........

ऋतून् यज (यजे) मैं ऋतुओंका यजन करता हूँ यजु ऋतुओं के अनुकूल खान-पान, आचार-विचार रखता है करता तथा ऋतुओंके अनुकूल नियत कर्मोंका सम्पादन करता है। दो-दो मास की एक ऋतु होती है। बारह मासका एक वर्ष होता है।

 इसलिये एक वर्षमें छः ऋतुएँ होती हैं। छः ऋतुओंका एक चक्र होता है। इस चक्रके कारण वर्षको षडानन, षडास्य, षण्मुख (छः मुखों, मासोंवाला देवता) कहते हैं।

 ऋतुओंका जनक सूर्य है। सूर्यकी राशि स्थिति के अनुसार ऋतुओं का प्रवर्तन होता है। 

मीन एवं मेष राशिका सूर्य वसन्त ऋतु का कारक है। 

इसी प्रकार सूर्य के वृष-मिथुन में रहने से ग्रीष्म ऋतु।

कर्क-सिंह में विचरण करने से वर्षा-
ऋतु।

कन्या-तुला को आक्रान्त करने से शरद्-ऋतु।

 वृश्चिक-धनु में गमन करने से हेमन्त ऋतु।

 तथा मकर-कुम्भका भोग करनेसे शिशिर ऋतु होती है। 

ऋतवे षण्मुखाय नमः ।

ऋतुपतीन् यजे - ऋतुपतियों की मैं उपासना करता हूँ। सूर्यको ऋतुपति कहते हैं। सूर्यके द्वादश स्वरूप हैं।

कल्याण

सत्यं शौर्यंतपः क्षमाऽमृतवचोऽहिंसाश्च श्रद्धालुतां प्रीतिं भूतदयां जनेऽपि सकले सौहार्दमापादयन् । 
भक्ति कल्मषनाशिनीं भगवतीमानन्ददां वर्धयन् कल्याणं वितनोतु नोऽभयकरः 'कल्याण' रूपो हरिः ॥
..........
सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये 
ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्यां
'तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये'।।

[ श्रीमदाद्यशंकराचार्यकृत द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्रम् ]

अर्थात् जो अपनी भक्ति प्रदान करने के लिये अत्यन्त रमणीय तथा निर्मल सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़, गुजरात) में भक्तजनों के दुःखों का विध्वंस करने की इच्छा से अवतीर्ण हुए हैं, चन्द्रमा की कला जिनके मस्तक का आभूषण है, ओषधीश सोम के द्वारा समाराधित उन ज्योतिर्लिंगस्वरूप भगवान् श्रीसोमनाथ की शरणमें मैं जाता हूँ।
….......

Tuesday, 21 July 2026

हनुमानाष्टक

॥ हनुमानाष्टक ॥

बाल समय रवि भक्ष्य लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ि दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥

अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।
हेरी थके तट सिन्धु सबै तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥

रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कहि सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥

बाण लग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सुत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दई तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥

रावन युद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥

बंधु समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाय सहाय भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥

काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होय हमारो ॥ ८ ॥

॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ॥