Sunday, 17 May 2026

विचार प्रवाह सूक्त

  

साहित्य का विचार-प्रवाह 

विचार” शब्द पूर्णतः भारतीय (संस्कृत) मूल का शब्द है।

(iशब्द की उत्पत्ति: विचार = वि + चर (धातु) । चर (धातु) का अर्थ है – चलनाघूमनामन में गमन करना। वि (उपसर्ग) है   विचार-  किसी विषय पर मन को विभिन्न दिशाओं में चलाकर गहराई से सोचना।

प्राचीन ग्रंथों में प्रयोग: यह शब्द अनेक भारतीय ग्रंथों में मिलता हैजैसे -उपनिषद- आत्मा और ब्रह्म के विषय में विचार। भगवद्गीता - ज्ञान और तत्त्व-चिन्तन। योगवासिष्ठ -विचार” को मुक्ति का साधन माना गया। उदाहरण (योगवासिष्ठ): विचार एव नित्यं श्रेयः” - अर्थात् सत्य की प्राप्ति के लिए निरन्तर विचार आवश्यक है।

 आधुनिक काल में इससे ही विचारधारा” और विचारक” जैसे शब्द बने।  विचारधारा” शब्द स्वयं ऋग्वेद या उपनिषदों में नहीं मिलता। परन्तु इन ग्रंथों में  विचारधाराएँ कि लिए दर्शन, ब्रह्मचिन्तन , तत्व चिंतन , मत आदि शब्द उपस्थित हैं   

(iiविचारधारा” शब्द अपेक्षाकृत आधुनिक है। भारत में 19वीं–20वीं शताब्दी में प्रारम्भ हुआ

 शब्द की उत्पत्ति: यूरोप में Ideology शब्द का प्रयोग सबसे पहले फ्रांसीसी दार्शनिक Antoine Destutt de Tracy एंटोइन ट्रेसी (18वीं सदी के अंत) ने किया था। इसका अर्थ था- विचारों का विज्ञान या विचारों की प्रणाली।

 हिंदी साहित्य में प्रचलन: हिंदी आलोचना और साहित्य में यह शब्द मुख्यतः आधुनिक काल (भारतेंदु युग के बाद) अधिक प्रचलित हुआ। उदाहरणतः रामचंद्र शुक्ल , रामविलास शर्मा , नामवर सिंह। इन आलोचकों ने साहित्य के अध्ययन में मार्क्सवादीराष्ट्रीयमानवीय आदि विचारधाराओं की चर्चा की।    

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विषय व्यापक और गंभीर है । कुछ प्रश्न हैं , (i) भारतीय वांग्मय की विचारधाराएं ?  साहित्य की विचारधाराएं या हिंदी साहित्य की विचारधाराएं ? स्वतंत्रता के बाद के साहित्य की विचारधाराएं ? या स्वतंत्रता के पूर्व की विचारधाराएं ? (ii) साहित्य का काल-खंड कहाँ से देखा जाएं ? वैदिक काल से? रामायण को आधार बनाकर ? व्यास को, कालिदास या भवभूति को ? हिंदी साहित्य के काल विभाजन के आधार पर या दशकों के आधार पर ?

सृष्टि का स्वरूप : विचार कहाँ से आया ? किसको आया ? तब ध्यान श्रृष्टि की ओर जाता है ? तब वैदिक परम्परा कहती है , इसके प्रमाण में तीन ऋग्वेद के सूक्त मिलते हैं -

  (i) नासदीय सूक्त > (ऋग्वेद 10.129) – सृष्टि से पहले की अद्वितीय रहस्यमय अवस्था – इस सूक्त में बताया गया है कि सृष्टि से पहले*न सत् थान असत्। **न आकाश थान पृथ्वी। **केवल एक रहस्यमय सत्ता थी।   फिर क्या था तो उत्तर मिलता है ब्रह्म था ।

(iiहिरण्यगर्भ सूक्त > (ऋग्वेद 10.121) – सृष्टि का प्रथम कारण यह (हिरण्यगर्भ सूक्त) का प्रथम मंत्र है।कहा गया है कि प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ (स्वर्ण अंड/कॉस्मिक एम्ब्रियो) प्रकट हुआ। उसी से- *पृथ्वी और आकाश बने। ** सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति हुई। ***वही समस्त जगत का स्वामी है।

(iiiपुरुष सूक्त> (ऋग्वेद 10.90)  का मंत्र इस प्रकार है- उस विराट पुरुष (परमात्मा) के हजार सिरहजार नेत्र और हजार चरण हैं।यह मंत्र विराट पुरुष (सर्वव्यापी ब्रह्म) की व्यापकता और सर्वव्यापक स्वरूप को प्रकट करता है। इसी एक महापुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष) से सम्पूर्ण सृष्टि बनी। 

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 अब प्रश्न उठाता है कि यह किसने किया ? उत्तर उसी विराट पुरुष ने / हिरण्यगर्भ या स्वर्ण पिंड ने या परम ब्रह्म ने ? तो ऋग्वेद (मण्डल 1, सूक्त 164 , मंत्र 46) में कहा गया है-

 कोई उसे इन्द्रकोई मित्रकोई वरुणकोई अग्नि कहते हैंउसी को कोई यम और कोई मातरिश्वा (वायु) कहता है।  यह वैदिक परम्परा का मूल दार्शनिक विचार माना जाता है कि ‘सृष्टि के पीछे एक ही परम सत्ता है’भले ही उसे अलग-अलग रूपों में समझा जाए।एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।

यह विचार किसे आया? वैदिक परम्परा के अनुसार यह विचार प्राचीन ऋषियों ने गहन ध्यान और तपस्या में इन सत्यताओं का “श्रवण” या “दर्शन” किया। उदाहरण के रूप में कई ऋषियों के नाम मिलते हैंजैसे - ऋषि वशिष्ठ। ऋषि विश्वामित्र। ऋषि अत्रि। ऋषि भारद्वाज।    

संक्षेप में: वैदिक परम्परा का पहला विचार * “मैं एक हूँ अनेक होऊं” **‘एक परम सत्य ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति।’ इन तीनों सूक्तों को मिलाकर देखने पर वैदिक दर्शन यह बताता है कि-  (1) पहले अद्वैत अवस्थाफिर सृष्टि का मूल कारणऔर अंत में जगत का विस्तार हुआ। (2) भारतीय साहित्य के मूल वैदिक विचार मैं एक हूँअनेक रूपों में प्रकट हो जाऊँ।”

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पहला  विचार-प्रवाह  है? * “भारतीय साहित्य के विचार-प्रवाह का आधार है (i विचार को पूर्णता में देखना! ”  वह (परमात्मा) पूर्ण हैयह (जगत) भी पूर्ण है। उस पूर्ण से यह पूर्ण उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। (ii) संपूर्ण विश्व उसी एक परम सत्य की अभिव्यक्ति है। “मैं एक हूँ अनेक होऊं” ।

  सृष्टि की रचना से साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है । भारतीय साहित्य ने काल का अध्ययन किया और काल को खंड -खंड में नहीं पूर्णता में पाया और ऋषियों ने कहा, * यह भारतीय साहित्य के विचार-प्रवाह  का आधार है ।* सृष्टि की रचना से साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है । यह प्रकृति और पुरुष इस संसृति का कारक है ।

यहाँ से विचारधाराओं का जन्म होता है - भारतीय वाङ्मय की मुख्य विचारधाराओं को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है: आस्तिक , नास्तिक और अन्य ।(1) आस्तिक- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त । (2) नास्तिक विचार धाराएं (वेदों की सत्ता को न मानने वाली): चार्वाक, बार्हस्पत्य (लोकायत)- (iप्रत्यक्षमेव प्रमाणम्-  चार्वाक दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष (इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान) ही एकमात्र प्रमाण है। अनुमानउपमान या शब्द को वे प्रमाण नहीं मानते। (iiदेहवाद- चार्वाक के अनुसार देह ही आत्मा है शरीर से अलग कोई स्वतंत्र आत्मा नहीं मानी जाती। चेतना शरीर के तत्त्वों के संयोजन से उत्पन्न होती है। (iiiस्वभाववाद- संसार की उत्पत्ति और क्रियाएँ स्वभाव (प्राकृतिक गुणों) से होती हैं। किसी ईश्वर या अलौकिक शक्ति की आवश्यकता नहीं मानी जाती। (ivपरलोक खंडन- चार्वाक दर्शन परलोकस्वर्ग-नरक और पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं करता। उनके अनुसार मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता। ।  निष्कर्ष: :ये सिद्धान्त भौतिकवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैंइसलिए इन्हें चार्वाक या लोकायत दर्शन का मूल आधार माना जाता है।‘लोकायत’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह केवल इसी ‘लोक’ (संसार) की सत्ता मानता है और जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय रहा।         

 (3) अन्य प्रमुख नास्तिक (अवैदिक) विचारधाराएँ : बुद्ध और महावीर के काल में प्रचलित अन्य महत्वपूर्ण विचार: (iआजीवक संप्रदाय (मक्खलि गोशाल): * नियतिवाद: सब कुछ पहले से तय है। मनुष्य के कर्म का भाग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। **ऐतिहासिक साक्ष्य: मौर्य सम्राट बिंदुसार इसके अनुयायी थेबराबर की गुफाएं इन्हीं के लिए बनी थीं। (iiअज्ञान या अज्ञेयवाद (संजय बेलट्ठिपुत्त): मूल विचार: ईश्वर या मृत्यु के बाद के जीवन जैसे आध्यात्मिक प्रश्नों का निश्चित उत्तर जानना असंभव है। (iii) अक्रियवाद (पूरण कश्यप): * मूल विचार: कर्म का कोई फल नहीं होता। न पुण्य से लाभ होता हैन पाप से हानि। यह कर्म सिद्धांत का पूर्ण खंडन है। (iv) उच्छेदवाद / भौतिकवाद (अजित केशकंबली): मूल विचार: मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के साथ सब नष्ट हो जाता है। यह चार्वाक दर्शन का आधार बना। (V) अनिश्चयवाद (विक्षेपवाद): मूल विचार: किसी भी अंतिम सत्य पर पहुँचना संभव नहींइसलिए वाद-विवाद से बेहतर मौन रहना है।

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ईसा पूर्व लगभग 900 वर्ष से लेकर ईस्वी की प्रारम्भिक शताब्दियों तक दक्षिण भारत विशेषतः तमिलनाडु में तमिल संगम परम्परा का विकास माना जाता है। परम्परा के अनुसार तीन प्रमुख संगम हुएजिनमें अनेक कवि-साहित्यकारों ने भाग लिया। संगम साहित्य में लगभग 473 कवियों के नाम मिलते हैंजिनमें पुरुष और स्त्री दोनों कवि थे।संगम साहित्य की प्रमुख कृतियाँ-इन साहित्यकारों की रचनाएँ मुख्यतः इन ग्रंथों में संकलित हैं-एत्तुत्तोकै (आठ संग्रह),पट्टुपाट्टु (दस गीत),तोल्काप्पियम (व्याकरण ग्रंथ) । तमिल परम्परा के अनुसार तमिलनाडु में तीन संगम (साहित्यिक सभाएँ) मानी जाती हैं। इन संगमों में अनेक कवियों-साहित्यकारों ने भाग लिया। नीचे तीनों संगमों के प्रमुख साहित्यकार और उनकी कृतियाँ क्रमबद्ध रूप में दी जा रही हैं।1. प्रथम संगम (लगभग ई.पू. 900 – ई.पू. 500) इस संगम का केन्द्र दक्षिण मदुरै माना जाता है। परम्परा के अनुसार इसकी अध्यक्षता ऋषि अगस्त्य ने की।प्रमुख साहित्यकार-अगस्त्य,मुरुगवेल,कुबेरनार,परनर (परम्परागत उल्लेख) ।प्रमुख कृति-अगस्तियम -प्राचीन तमिल व्याकरण (अब उपलब्ध नहीं)

द्वितीय संगम (लगभग ई.पू. 500 – ई.पू. 100)-इसका केन्द्र कपटपुरम् बताया जाता है।प्रमुख साहित्यकार-तोल्काप्पियार,इरुंधैयूर करुंगोझि,मोसिकीरनार,वेल्लूर काप्पियन

प्रमुख कृति-तोल्काप्पियम – तमिल का प्राचीनतम उपलब्ध व्याकरण ग्रंथ।

 तृतीय संगम (लगभग ई.पू. 100 – ईस्वी प्रथम शताब्दी)यह संगम मदुरै में आयोजित माना जाता है।इसी काल का अधिकांश संगम साहित्य आज उपलब्ध है।प्रमुख साहित्यकार-नक्कीरर,कपिलर,अव्वैयार,कणियन पूंगुन्द्रनार,मांगुडी मरुदनार,कडियालूर उरुत्तिरंकन्ननार, परनर, मामूलनार। प्रमुख ग्रंथ (संगम साहित्य),एत्तुत्तोकै (आठ संकलन) पट्टुपाट्टु (दस गीत) ।

संक्षिप्त निष्कर्ष: तमिल संगम परम्परा में सैकड़ों कवियों ने भाग लियापरन्तु वर्तमान में उपलब्ध साहित्य मुख्यतः तृतीय संगम का है। इसमें प्रेमवीरतासमाज का चिंतन शामिल था।  संगम साहित्य के संकलन (Ettuttokai) और 10 गीत (Pattuppāṭṭu) हैं।

जिस तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन ‘अहम्’ और ‘इदम्’ में हुआ उसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है। यहाँ एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि वह विचार ‘एकोह्म बहुश्याम:’ काल निरपेक्ष चलता आ रहा है ।

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को ‘राष्ट्री’ तथा ‘संगमनी’ कहा गया है। यही हमारे बहुभाषा-भाषी भारतजन का ‘संगमन’ कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई।

 और इसी नेआसेतु हिमालय तकइस महादेश को एक संस्कृति दीएक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे ‘अद्भुत संगम’ का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकीऔर न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

ऋग्वेद ने ‘संगच्छध्वं सवदध्वम्’ का जो महामंत्र इस राष्ट्र के कानों में फूंका थावह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनोंआक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी ‘संगम’ जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

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  आज हम उक्त भीतरी ‘संगम’ की सर्वथा उपेक्षा करके किसी न किसी बाह्य दिखावे की नकल करने में लगे हुए हैं। कुछ लोगों को नवीनता का मोह हैअतः बाहर से जो भी हवा चलती हैउसीके वे भक्त बन जाते है। विकासवाद हो या मार्क्सवादफ्रायडवाद हो वा हिप्पीवादसभी का वे स्वागत करते हैंआँख मूंदकर अनुकरण करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें प्राचीनता से मोह है।

          दूसरी ओर वे प्रत्येक नई धारा का बहिष्कार करते हैं और प्रत्येक पुरानी प्रथा का अंधानुकरण । इस प्रकार नवीनतावादी और परंपरावादी दोनों एकमात्र अनुकरण को ही राष्ट्र-रक्षा का अमोघ अस्त्र मान बैठे हैं। आज की परिस्थितियों में राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं।

वास्तविकता यह है कि अनुकरण एवं अनुसंधान हमारे विचारधारों के दो पैर रहे है । चाहे वैदिक परम्परा हो या तमिल संगम,   दोनों पैरों से मानव जाति प्रगति पथ पर बढ़ी है। अतः केवल अनुकरण से काम नहीं चलेगा । अनुकरणमात्र से मानव सरोवर के पास बैठ कर ‘पानी -पानी ’ की रट लगाने वाला ‘तोता’ तो बन सकता हैपरन्तु न तो अपनी प्यास बुझा सकत औत न लोक की । वह विज्ञान कि तरह साहित्य का ‘नकलची बंदर’ तो हो सकता हैपरन्तु  न तो ‘जगदीश-चन्द्र बसु’ जैसा वैज्ञानिक बन सकता औत न बाल्मीकि, व्यास, कालिदास । अनुकरण द्वारा प्राप्त ज्ञान तब तक प्रगति में साधक नहीं हो सकता जब तक उस के साथ अनुसंधानवृत्ति भी संक्रिय न हो उठेक्योंकि इस वृत्ति के बिना कोई बंदर नाई की नकल करके छुरे से अपने को ही घायल कर सकता है । दूसरा विचारधाराओं का अनुकरण यदि बिना देश काल औत पात्रता के आधार पर ग्रहण किया तो वह अनुकरण-जन्य ज्ञान हमारे भीतर ‘स्व’ का अंग नहीं बन सकता।

 इस दृष्टि से निस्संदेह हमें अपने राष्ट्रीय ‘स्व’ से प्रतिबद्ध होना पड़ेगा और अपने अतीत तथा वर्तमान में ऐसे तत्त्वों का अनुसंधान करना पड़ेगा जो राष्ट्रीय ‘स्व’ को अमरता देने में अभी तक सहायक सिद्ध हुए हैं या आगे सिद्ध हो सकते हैं।

आप चाहे धर्मसदाचारशीलराष्ट्रीयता आदि से अप्रतिबद्ध होने का दावा करेंपरन्तु निस्संदेह आप अपने ‘स्व’ से प्रतिबद्ध हैंक्योंकि अन्यथा न आपको अपने तन की आवश्यकताओं का ज्ञान होता और न मन की - यहां तक कि आप अपने अप्रतिवद्धतावाद का आग्रह भी नहीं करते । वस्तुतः बच्चा अपने 'स्वसे प्रतिबद्ध हुआ ही जनमता है। जन्म से ही वह अपने तन-मन की ‘भूख’ मिटाने के लिए आतुर है और यह ‘भूख’ मिटाने के लिए उसे केवल मोजन ही नहीं चाहिएअपितु वस्त्रभाषाविचारभावश्राचार-व्यवहार भी चाहिए जो अपने परिवारसमाज या राष्ट्र के 'स्वहो कर प्राप्त होते हैं। बच्चा पैदा होते ही राष्ट्र द्वारा प्रदत्त परिवेश से इंद्रिय-संनिकर्ष स्थापित करता है और उस के माध्यम से शनैः शनैः राष्ट्रीय ‘स्व’ से निरंतर प्रतिबद्ध होता जाता है।

“विकासमान देश को अपने वर्तमान में स्वाभिमान से खड़े होने के लिए आवश्यक है कि वह अपना पिछला कदम दबा कर और अगले कदम को सम्भाल कर रखे। इस लिए प्रज्ञावान एवं प्रतिभाशाली लेखकों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वे भारतीय जन मानस में आलस्य व अधार्मिक वैरुप्य तथा आत्मग्लानि के स्थान पर प्रकाश की ज्योति उद्दीप्त करने में ही अपनी कलम का प्रयोग करेंगे।” गोविन्द शंकर कुरुप- (मलयालम साहित्य के प्रमुख कवि)

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प्रथम विचार , विचारधारों के आधार , उत्तर दक्षिण के साहित्य की विचारधारों के संगमनी दृष्टि को वर्तमान परिप्रेक्ष में समझे - आस्तिक नास्तिक और बौद्ध , जैन औत संगमनी दृष्टि को  में से –

          पहले आस्तिक और संगमनी दृष्टि को समझे - तीन वर्गों में रखा जा सकता है, - आस्तिक से मुख्य तीन धाराएं निकलती हैं - आध्यात्मिक> सांस्कृतिक > राष्ट्रीय विचारधाराएं -  यह विचारधारा (आस्तिक दर्शनों ने) वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए सांख्ययोगन्यायवैशेषिकमीमांसा और वेदान्त के रूप में व्यवस्थित दार्शनिक परम्परा विकसित की।

(एक)  आध्यात्मिक (वेदान्त का प्रभाव)-  अद्वैत वेदान्त में प्रतिपादित ब्रह्म–आत्मा की एकता (सर्वात्मभाव) का प्रभाव आधुनिक हिंदी साहित्य के अनेक कवियोंलेखकों और आलोचकों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस विचार के अनुसार समस्त सृष्टि एक ही परम सत्ता (ब्रह्म) की अभिव्यक्ति है और आत्मा उसी का अंश है। हिंदी साहित्य में यह भावना एकात्मताविश्व बंधुत्वआत्मचेतना और आध्यात्मिक अनुभव के रूप में व्यक्त हुई है। प्रमुख साहित्यकारों पर इसका प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है- (1) भारतेंदु हरिश्चंद्र: रचना: भारत दुर्दशा- भारतेंदु के साहित्य में भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का प्रभाव दिखाई देता है। उनकी दृष्टि में समस्त समाज एक ही सांस्कृतिक चेतना का अंग है। यह विचार वेदान्त के सर्वात्मभाव से जुड़ा हुआ है। उनके लेखन में भारतीय संस्कृति की एकात्म दृष्टि दिखाई देती है। (2) महावीर प्रसाद द्विवेदी: रचना: कविता क्या है- द्विवेदी जी ने साहित्य को मानवता और नैतिक चेतना से जोड़ा। उनके विचारों में मनुष्य और समाज की एकता पर बल मिलता हैजो वेदान्तीय दृष्टि से जुड़ा है। वे साहित्य को मानव के आंतरिक विकास का साधन मानते थे। (3) मैथिलीशरण गुप्त:रचना: साकेत- गुप्त जी के काव्य में भारतीय दर्शन का प्रभाव स्पष्ट है। साकेत में राम का चरित्र मानव और ईश्वर के बीच एकात्म संबंध का प्रतीक है। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति – वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।” – वेदान्त के स्वरूप को व्यक्त करती है। (4) जयशंकर प्रसाद- रचना: कामायनी- प्रसाद की काव्य-दृष्टि में अद्वैत वेदान्त का गहरा प्रभाव है। * कामायनी में मनुष्य के भीतर स्थित अनन्त चेतना का विचार मिलता है। *यह अद्वैत वेदान्त के ब्रह्म–आत्मा एकता के सिद्धान्त से संबंधित है। कामायनी में मनु और श्रद्धा के माध्यम से मनुष्य की आत्मचेतना और ब्रह्म से एकात्मता की भावना व्यक्त होती है। प्रसाद की दार्शनिक दृष्टि में मनुष्यप्रकृति और ब्रह्म की एकता का भाव दिखाई देता है। (5) सुमित्रानंदन पंत: रचनाएँ: चिदम्बरा, लोकायतन-पंत के काव्य में वेदान्त का चेतनावाद और सर्वात्मभाव प्रमुख है। चिदम्बरा में उन्होंने ब्रह्म को सर्वव्यापी चेतना के रूप में स्वीकार किया। प्रकृति और मनुष्य के बीच अद्वैत संबंध को उन्होंने बार-बार व्यक्त किया। इनके काव्य में सर्वव्यापी चेतना और प्रकृति–मानव की एकता का भाव मिलता है। यह वेदान्त के सर्वात्मवाद से प्रेरित है।   (6) महादेवी वर्मा: रचना: यामा-महादेवी के काव्य में आत्मा और परमात्मा के मिलन की रहस्यवादी अनुभूति मिलती है। उनकी कविताओं में एक ऐसी अनन्त सत्ता की खोज है जो वेदान्तीय ब्रह्म की याद दिलाती है। उनकी संवेदना में आत्मा का परम सत्य से मिलन ही जीवन का लक्ष्य प्रतीत होता है। (7) सूर्यकांत त्रिपाठी निराला: रचनाएँ: राम की शक्ति पूजा, अनामिका-निराला की रचनाओं में अद्वैत की मानवतावादी व्याख्या दिखाई देती है। राम की शक्ति पूजा में शक्ति और चेतना का जो स्वरूप हैवह ब्रह्म की सार्वभौमिक शक्ति का रूप है। उनके काव्य में मनुष्य की आत्मशक्ति को ब्रह्म की शक्ति से जोड़ा गया है। यह वेदान्त के एक ही परम चेतना के विचार से संबंधित है। (8) प्रेमचंद: रचना: गोदान-  में सामाजिक यथार्थ के साथ मानव-एकता और करुणा की भावना मिलती है। गोदान में होरी का चरित्र यह दिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य मानवीय संवेदना में है।  (9) अज्ञेय: रचना: शेखर: एक जीवनी- शेखर: एक जीवनी में व्यक्ति अपने अस्तित्व के गहरे सत्य को खोजता हैजो वेदान्तीय आत्मचेतना से जुड़ा है। उनकी कविता और कथा साहित्य में अस्तित्व और चेतना की एकता का विचार मिलता है। (10) रामचंद्र शुक्ल (आलोचक): रचना: हिंदी साहित्य का इतिहास- शुक्ल जी ने भारतीय साहित्य की परम्परा में आध्यात्मिक और दार्शनिक चेतना को महत्त्व दिया। वेदान्तीय दृष्टि से उन्होंने साहित्य में मानवता और व्यापक चेतना के तत्व को रेखांकित किया।   इस प्रभाव के कारण साहित्य में मानव-एकताआत्मचेतनाविश्वबंधुत्व और आध्यात्मिक मानवतावाद की भावना प्रकट होती है।  (11) रामविलास शर्मा:  निराला की साहित्य साधना- रामविलास शर्मा ने भारतीय दर्शन और साहित्य के संबंध पर गहरा विचार किया। उन्होंने निराला और भारतीय परम्परा की व्याख्या करते हुए भारतीय दार्शनिक चेतना को रेखांकित किया। उनके आलोचनात्मक लेखन में भारतीय ज्ञान परम्परा और वेदान्त की पृष्ठभूमि दिखाई देती है। (12) गजानन माधव मुक्तिबोध:   अँधेरे में- मुक्तिबोध की कविता में आत्मान्वेषण और चेतना की गहराई प्रमुख है। अँधेरे में कविता में कवि आत्मा के भीतर छिपे सत्य को खोजता है।

    (दो) वैदिक एवं दार्शनिक विचारधारा (पुनर्जागरण काल): हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण काल सामान्यतः 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक माना जाता है।  

“क्या भारत के संदर्भ में ‘पुनर्जागरण’ शब्द की कोई सार्थकता है भीक्योंकि भारत तो सदा-सर्वदा जाग्रत रहा है और उसे पुनर्जागरण की तो कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी।” - जेम्स एच० कजेन्स (एक आयरिश )

 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय वाङ्मय की प्राचीन जड़ों की ओर लौटने का आह्वान हुआ। (i) आर्य समाज और दयानंद सरस्वती: इन्होंने ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया। इसका प्रभाव भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग पर स्पष्ट दिखता है। साहित्य में अंधविश्वास का विरोध और तर्कसंगत वैदिक मूल्यों की स्थापना हुई।  (ii) अद्वैत वेदांत और रामकृष्ण-विवेकानंद: स्वामी विवेकानंद के विचारों ने साहित्यकारों में ‘आत्मगौरव’ और ‘राष्ट्रीयता’ का भाव भरा। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य में वेदांत का ‘अद्वैत’ तत्व (मनुष्य और ईश्वर की एकता) स्पष्ट झलकता है।  (iii अनेक दक्षिण भारतीय साहित्यकारों ने भारतीय वाङ्मयवेदउपनिषद् और भक्ति परम्परा की ओर लौटने का आह्वान किया। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं- * सुब्रमणम भारती  (तमिल):भारती ने अपनी कविताओं में वेदोंउपनिषदों और भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का गौरव गाया। उन्होंने भारतीय संस्कृतिआध्यात्मिकता और राष्ट्रवाद को जोड़ते हुए प्राचीन वैदिक आदर्शों की पुनर्स्थापना का आह्वान किया। उनकी कविताओं में आध्यात्मिक स्वतंत्रता और मानव समानता का संदेश मिलता है। ** बंकिमचन्द्र  का प्रभाव दक्षिण भारत में: यद्यपि वे बंगाल के थेपर उनकी रचनाएँ दक्षिण भारत के साहित्यकारों को भी प्रेरित करती रहीं। “वन्दे मातरम्” के माध्यम से उन्होंने भारतमाता और वैदिक-पौराणिक परम्परा की महिमा का पुनरुत्थान कियाजिसका प्रभाव तमिलतेलुगु और कन्नड़ लेखकों पर पड़ा।  *** श्री अर्विन्दों (पुदुचेरी से सम्बद्ध): उन्होंने वेदों और उपनिषदों की आधुनिक व्याख्या की। उनकी कृतियाँ जैसे The Life Divine और Essays on the Gita में भारतीय दार्शनिक परम्परा को आधुनिक दृष्टि से पुनर्जीवित करने का प्रयास मिलता है। * तेलुगु साहित्य से – *कन्द्कुरी वीरेसालिंगम - समाज सुधार के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक परम्परा और शास्त्रीय ज्ञान की पुनर्स्थापना का प्रयास किया।  **यू एस स्वामीनाथन ऐय्यर - इन्होंने प्राचीन तमिल ग्रंथों को खोजकर प्रकाशित किया और दक्षिण भारत की प्राचीन साहित्यिक परम्परा को पुनर्जीवित किया। ***विश्वनाथ सत्यानारायाना - इनकी रचनाओं में पुराणवेद और भारतीय दार्शनिक दृष्टि का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। ** कन्नड़ साहित्य- *कुप्पालि वेंकटप्पा पुत्ताप्पा : कुवेम्पु ने अपनी रचनाओं में भारतीय आध्यात्मिक परम्परावेद-उपनिषद के विचार और मानवतावाद को महत्व दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़े साहित्य के निर्माण पर बल दिया। **डी .ह्वी. गुंडप्पा - उनकी कृति मंकुतिम्मना कग्गा में उपनिषद और भारतीय दर्शन की गहन झलक मिलती है।  मलयालम साहित्य- *कुमारन असन उनकी कविताओं में आध्यात्मिकतावेदान्त और सामाजिक समता का विचार मिलता है। वल्लाथोल नारायनाना मेनन -उन्होंने भारतीय संस्कृतिपुराण और संस्कृत परम्परा को अपने काव्य में पुनर्जीवित किया।

  (तीन) सांस्कृतिक एवं मानवतावादी विचारधारा: पूज्य श्रीगुरुजी कहते थे , “पश्चिम का मानवतावाद आत्मकेंद्रित है । किन्तु हिन्दू मानवतावाद कि स्थिति भिन्न है ।वह तो परम सत्य की उस अनुभूति से उपजा है कि “समूचा ब्रह्माण्ड अखंड इकाई है । यह विचारधारा मध्यकालीन भक्ति और आधुनिक नैतिकता का मिश्रण थी। (i) गांधीवाद : वस्तुतः जिसे हम गांधीवाद कहते हैं वह वैदिक विचारधाराओं के कुछ अंशों का आग्रह है - यथा, सत्य , अहिंसा, अपरिग्रह आदि। यह वैसा ही है जैसे - कठोपनिषद् (प्रथम अध्यायतृतीय वल्लीश्लोक 14) का प्रसिद्ध मंत्र स्वामी विवेकानंद ने इसे ‘उठोजागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए’ के रूप में लोकप्रिय बनाया था।

मूल संस्कृत श्लोक है, “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ (उत्तिष्ठत: उठो -मोह-रूपी निद्रा से।,जाग्रत: जागो -अज्ञान के अंधकार से बाहर आओ। प्राप्य वरान्निबोधत: श्रेष्ठ महापुरुषों (गुरुओं) के पास जाकर उस परम ज्ञान को प्राप्त करो। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया: यह मार्ग छुरे की पैनी धार के समान कठिन है। दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति: बुद्धिमान लोग इस आत्मज्ञान के मार्ग को अत्यंत दुर्गम (कठिन) बताते हैं।)

यथार्थ तो यह है की गांधीवाद कोई वाद या विचारधारा नहीं है यह वैदिक अनुभूतिओं को जीवन में उतारने का  सन्देश है ।  स्वतंत्रता के पूर्व के साहित्य (प्रेमचंद युग) पर इसका सबसे गहरा प्रभाव था। सत्यअहिंसाहृदय-परिवर्तन और अछूतोद्धार जैसे विषयों को प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों (जैसे गोदानरंगभूमिमें पिरोया। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ और’भारत-भारती’ भी इन मूल्यों से ओत-प्रोत हैं। अब इसे भारतीय दृष्टि जिसे सम्पूर्णता की दृष्टि कहते है तो यहाँ प्रेमचंद आप को वैदिक विचार के अनुगामी दिखाते हैं या मार्क्सवाद /प्रगतिवाद के ? (ii) रवींद्रनाथ टैगोर का मानवतावाद: टैगोर के ‘विश्व-मानव’ और ‘प्रकृति-प्रेम’ के विचार ने छायावाद को जन्म देने में बड़ी भूमिका निभाई। यहाँ व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों को प्रधानता दी गई। किन्तु चिंतन का पक्ष यह है कि क्या यह भी रवींद्रनाथ टैगोर का कोई नया मानवतावाद है ? क्या हमें यहाँ ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ वैदिक विचारधारा नहीं है। (iii) भक्ति कालीन पुनरुत्थान: साहित्यकारों ने तुलसी और कबीर के सामाजिक समरसता वाले विचारों को आधुनिक संदर्भ में फिर से परिभाषित किया।

यहाँ आस्तिक को छोड़ते हैं।

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अब नास्तिक और भौतिक विचारधाराओं को जिन्हें राजनीतिक , आर्थिक विचारधारा कहना ही उचित होगा को समझे –( नोट : पहली एवं दूसरी को संतातन विचारधारा कहा गया जबकि तीसरी को राजनीतिक, आर्थिक विचारधारा माना जा सकता है ।)

(i) नास्तिक विचारधाराएं - विशेषतः चार्वाक या लोकायत ने प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हुए आत्मापरलोक और कर्मफल का खंडन किया।  इनसे भौतिक एवं बौधिक विचारधाराएँ जन्मी। (ii) भौतिक एवं राजनीतिक विचारधाराएँ - आजीवकअज्ञेयवादअक्रियवादउच्छेदवाद और अनिश्चयवाद जैसी अन्य विचारधाराएँ भी प्रचलित थींजिन्होंने नियतिज्ञानकर्म और जीवन-मरण के प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। (iv)  स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही हैजहाँ एक ही मूल वैदिक पृष्ठभूमि से विविध दार्शनिक मतों का विकास हुआ और सत्य की खोज विभिन्न मार्गों से निरन्तर चलती रही। 

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  1. साहित्य प्रभाव (1850 - 1947) (एक)- (i) भारतेंदु युग> नवजागरणराष्ट्रवाद> देश-दशा का वर्णनकुरीतियों का विरोध।(ii) द्विवेदी युग: आदर्शवादनैतिकतावैदिक गौरव> भाषा परिमार्जनदेशभक्तिपौराणिक आख्यान।(iii) छायावाद> अध्यात्ममानवतावादव्यक्तिवाद>मार्क्सवाद  प्रकृति का मानवीकरणसूक्ष्म अनुभूतियाँ। (iv) प्रगतिवाद>  किसान-मजदूर की व्यथासामाजिक क्रांति। (vप्रयोगवाद > व्यक्तिवादमनोविश्लेषण > नए प्रतीकनए बिंब और निजी कुंठाओं की अभिव्यक्ति।  

2. स्वतंत्रता के तुरंत बाद का दौर (1947 - 1960)इस काल में उत्साह और मोहभंग का मिला-जुला असर था। समाजवाद और प्रगतिवाद: नेहरूवादी समाजवाद का प्रभाव साहित्य पर गहरा था। 'योजनाबद्ध विकासऔर 'नए भारतके निर्माण की ललक साहित्य में दिखी। यशपाल और भीष्म साहनी जैसे लेखकों ने सामाजिक विषमता पर प्रहार जारी रखा।** प्रयोगवाद और नई कविता: अज्ञेय के नेतृत्व में ‘तार सप्तक’ के माध्यम से कविता ने व्यक्ति की निजता और मध्यमवर्गीय जीवन के अंतर्विरोधों को स्वर दिया। यहाँ समाज से ज्यादा 'व्यक्ति के सत्यको महत्व मिला।*** आंचलिकता फणीश्वरनाथ 'रेणुके उपन्यास मैला आँचल ने साहित्य का ध्यान महानगरों से हटाकर धूल-धूसरित गाँवों की ओर मोड़ा। यह अपनी जड़ों को खोजने की एक नई विचारधारा थी। 2. मोहभंग और आक्रोश का दौर

3. (1960 - 1990)युद्ध (1962, 1965, 1971), आपातकाल   और बेरोजगारी ने साहित्य में एक तीखा स्वर पैदा किया।*अकविता और साठोत्तरी कविता: व्यवस्था के प्रति गहरा आक्रोश और मोहभंग इस दौर की पहचान थी। धूमिल (सुदामा पांडेय) की कविताएँ "संसद से सड़क तक" इसी कड़वे यथार्थ को दर्शाती हैं।*नई कहानी आंदोलन: मोहन राकेशकमलेश्वर और राजेंद्र यादव ने शहरी जीवन की ऊबअकेलेपन और रिश्तों के टूटने को अपनी कहानियों का केंद्र बनाया।*जनवादी विचारधारा: 1970 के दशक में मार्क्सवाद का एक नया रूप 'जनवादके रूप में उभरा। राजेश जोशी और रघुवीर सहाय जैसे कवियों ने आम आदमी के लोकतांत्रिक अधिकारों और दमन के विरुद्ध आवाज़ उठाई।

 4उत्तर-आधुनिकता और अस्मितामूलक विमर्श (1990 - 2023)भूमंडलीकरण और सूचना क्रांति के दौर ने साहित्य में नए ‘विमर्श’ पैदा किए। *स्त्री विमर्श महिलाओं ने स्वयं की पहचान और पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध खुलकर लिखा। मन्नू भंडारीकृष्णा सोबती से लेकर समकालीन लेखिकाओं तकस्त्री की देह और मन के स्वतंत्र अस्तित्व की बात प्रमुख हुई। *दलित विमर्श: ओमप्रकाश वाल्मीकि (जूठनऔर तुलसीराम (मुर्दहियाजैसे लेखकों ने सदियों के शोषण और अपमान की गाथा को 'स्वयं की अनुभूतिके साथ पेश किया। इसने हिंदी साहित्य के सौंदर्यशास्त्र को बदल दिया। *आदिवासी विमर्श: हाल के वर्षों में जलजंगल और जमीन की लड़ाई तथा आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की विचारधारा साहित्य में एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरी है। *उत्तर-आधुनिकता और तकनीकी बोध: इंटरनेटसोशल मीडिया और कृत्रिम मेधा (AI) के युग में साहित्य अब 'ग्लोबलहो गया है। आज का साहित्य विस्थापनपर्यावरण संकट और बाजारवाद के खतरों पर बात कर रहा है।

 

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(5) सन् 2014 से 2026 तक का कालखंड हिंदी साहित्य के इतिहास में 'संक्रमणऔर 'तकनीकी विस्तारका समय रहा है। इस दौर में पुरानी विचारधाराओं का स्वरूप बदला है और कुछ नई प्रवृत्तियों ने जन्म लिया है। इस काल में साहित्य 'किताबों के पन्नोंसे निकलकर 'स्क्रीनतक पहुँचा है।

यहाँ इस कालखंड की प्रमुख विचारधाराएँ और प्रवृत्तियाँ दी गई हैं जिन्होंने साहित्य को नई दिशा दी: 1. राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक चेतना : 2014 के बाद भारतीय राजनीति और समाज में एक बड़ा बदलाव आयाजिसका सीधा असर साहित्य पर पड़ा।*स्वत्व की खोज: अपनी जड़ोंअपनी विरासत और भारतीयता पर गर्व करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐतिहासिक उपन्यासों और कथाओं में भारतीय नायकों को नए सिरे से परिभाषित किया गया। ** वि-औपनिवेशीकरण (De-colonization): पश्चिमी चश्मे से भारतीय समाज को देखने की विचारधारा का विरोध बढ़ा और 'भारतीय दृष्टिसे इतिहास और समाज को समझने पर जोर दिया गया। 2. डिजिटल यथार्थवाद : यह इस युग की सबसे अनूठी विचारधारा है। 2014 से 2026 के बीच साहित्य के सृजन और उपभोग का माध्यम बदल गया। *सोशल मीडिया साहित्य: फेसबुकइंस्टाग्राम और एक्स (X) पर 'नवांकुरसाहित्यकारों की पूरी पीढ़ी तैयार हुई। माइक्रो-फिक्शननैनो-कविताएँ और 'सोशल मीडिया नैरेटिवने जन्म लिया। ** ई-साहित्य और ऑडियो बुक्स: किंडलप्रतिलिपि और पॉकेट एफएम जैसे माध्यमों ने साहित्य की पहुँच जन-जन तक पहुँचा दी। इसने 'बाजारवादऔर 'साहित्यके बीच के फासले को कम किया। 3. अस्मितामूलक विमर्श का विस्तार : पहले जो विमर्श केवल 'स्त्रीया 'दलिततक सीमित थेअब वे अधिक सूक्ष्म और व्यापक हो गए हैं। **आदिवासी और घुमंतू विमर्श: जल-जंगल-जमीन की लड़ाई के साथ-साथ आदिवासियों की जीवन-दृष्टि को मुख्यधारा के साहित्य में मजबूती से जगह मिली। **एलजीबीटीक्यू+ (LGBTQ+) विमर्श: हिंदी साहित्य में जेंडर की विविधता और समलैंगिक अधिकारों पर विमर्श ने तेजी पकड़ी है। अब यह केवल 'निषिद्धविषय नहीं रहा। ***दिव्यांग विमर्श: शारीरिक अक्षमता और उसके साथ जीने के संघर्ष को लेकर भी एक नई संवेदनशीलता साहित्य में उभरी है। 4. पर्यावरणवाद और पारिस्थितिकी : जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और प्रदूषण जैसे संकटों ने हिंदी साहित्यकारों को प्रकृति के प्रति नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया। *प्रकृति बनाम विकास: अब साहित्य केवल प्रकृति चित्रण तक सीमित नहीं हैबल्कि यह 'पारिस्थितिकी तंत्रको बचाने की एक राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा बन गई है। 5. महामारी के बाद का साहित्य (Post-Pandemic Literature)2020-2022 की वैश्विक महामारी (COVID-19) ने साहित्यकारों की सोच में गहरा बदलाव लाया। * मृत्यु बोध और एकांत: महामारी के दौरान उपजे अकेलेपनअनिश्चितता और मानवीय रिश्तों की परीक्षा को साहित्य में प्रमुखता मिली। 'अस्तित्ववादका एक नया और अधिक करुणामय रूप यहाँ उभरकर आया।

सारांश : (i) राष्ट्र बोध।इतिहास का पुनर्लेखन। सांस्कृतिक गौरव। मुद्रित पुस्तकें। ऐतिहासिक शोध। (ii) डिजिटल यथार्थवाद- भाषा का सरलीकरण। लघु विधाएँ- सोशल मीडियापॉडकास्ट।(iii) अस्मिता विमर्श- हाशिए के समाज का सशक्तिकरण। आत्मकथाएँ। लघु कहानियाँ।(i पारिस्थितिकी- पर्यावरण चेतना। भविष्यवाद। कविताएँव्यंग्य। (iv2014 से 2026 तक का हिंदी साहित्य ‘लोकतांत्रकीकरण’ की प्रक्रिया से गुजर रहा है। अब साहित्य केवल अकादमिक बौद्धिकों का नहींबल्कि स्मार्टफोन रखने वाले हर व्यक्ति का हिस्सा बन गया है। विचार प्रवाह अब कट्टरपंथ’ के बजाय अनुभवोंऔर अस्मिताओं’ के इर्द-गिर्द घूम रही हैं।

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वन्देमातरम और पंच परिवर्तन

एक मां के चार बेटे हैं। एक गरीब है, नित्य कमाता और परिवार चलाता है, दूसरा व्यवसाय करता है ठीक ठाक आर्थिक क्षमता है। तीसरा प्रशासन में है सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा है। चौथा राजनेता है। सामाजिक, राजनीति, आर्थिक प्रतिष्ठा का धनी है।
चारों मां के प्यार और स्नेह और आशीर्वाद के भाजन हैं। मां के लिए समान हैं। किंतु सामाजिक दृष्टि में एक ग़रीब है, वंचित है तो क्या मां यह नहीं चाहेगी कि अन्य तीनों बेटे उस चौथे के भी अपने समान आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध करायें और सहयोग दें। -यह तीन के स्वर की चौथे के साथ समता, और चौथे का तीन से मिलने वाला स्वर  समरसता का स्वर कोटि -कोटि कंठ का निनाद है। वन्देमातरम है।

* एक नारा उभरा ' हम दो हमारे दो ' क्यों देश की जनसंख्या बढ़ रही है। संसाधन की तुलना में उपभोक्ता बढ़ेंगे तो आर्थिक संतुलन बिगड़ेगा। यह नारा हम दो हमारे दो से हम दो हमारे एक में आ गया। हम और ज्यादा प्रगतिशील हुए और हम दो ही पर टिक गया। एक परिवर्तन क्या भारत माता के हित में था? क्या कभी विचार किया यह नेरेटिव किन देशों से आया? और देश की सरकार जैसा उसका स्वभाव है मानस को बिना परखे अत्याचार के  हद तक जा कर हिंदुओं को ग्रस लिया। हमें यह महसूस करा दिया गया कि सुख एक संतान,दो संतान और नि: संतान में है। और उन्हें जिन्हें सत्तर पूत और बहत्तर नाती की कामना है, छोड़ दिया गया क्योंकि यह उनके मत-पंथ को स्वीकार्य नहीं।
दो बातें विचारणीय हैं- क्या सत्तर पूतों को पैदा करने वाला इस भू-भाग के संसाधनों को शोषण नहीं कर रहा। क्या उन सपूतों के हक को नहीं छीन रहा जो इस भय से ग्रसित हैं कि दो या तीन संतानों का पालन-पोषण कैसे होगा? क्या भारत माता के कोटि कंठ वाले स्वर को धारण करने वाले द्वि कोटि भुजाएं मिल पायेंगी? फिर मां की सुरक्षा का क्या होगा? निर्बल मां को क्या यह जगत वंदन करेगा। क्या हमारे वंदे मातरम् का निहितार्थ पूर्ण होगा।
* सुजलाम, सुफलाम क्या संसाधनों को शोषण से सुरक्षित रहेगा? पवित्र नदियां, पुण्य सलिला, हिमाद्रि श्रृंग क्या सुरक्षित रहेंगे? क्या नैमिषारण्य का यज्ञ पूर्ण होगा? इसके लिए पर्यावरण को कौन सुरक्षित रखेगा? क्या वंदेमातरम की सार्थकता होगी?
* आखिर हमें अतीत को देखना, सिंहावलोकन करना होगा कि नहीं? हम कौन थे क्या हो गये - चिंतन में, व्यवहार में,आचार में, संस्कार में। हम अपने विश्वगुरु के परिचय को भूल कर सिंह शावक की तरह आत्मविस्मृत में शियार के झुंड में तो नहीं जीने लगे। पुरखों के तप का बल,तेज ओज हमारा कहा गया? आत्म मुग्धता और विदेशी नैरेटिव में हम मुर्दों की तरह धार में बहे जा रहे हैं, धारा के विपरीत चलने का सामर्थ्य क्या हम खो चुके हैं, हमें विचार करना होगा।

राम का चारित्रिक वैशिष्ट्य

 

                                    (4)

         राम का चारित्रिक वैशिष्ट्य

        वाल्मीकि रामयण में महर्षि वाल्मीकि ने नारद जी से प्रश्न किया कि ‘इस समय सारे भूमण्डल और नव द्वीपों में ऐसा कौन सा अपूर्व मेधावी, विद्वान, परोपकारी, ज्ञान-विज्ञान में पारंगत, धर्मात्मा तथा समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति है ? जो मनुष्य मात्र का ही नहीं, चर-अचर और प्राणि मात्र का कल्याण करने के लिये सदैव तत्पर रहता हो? जिसने अपने पराक्रम और त्याग से संपूर्ण इन्द्रियों, विषय-वासनाओं एवं मन को वश में कर लिया हो, जो कभी क्रोध, अहंकार जैसी दुष्प्रवृतियों के वशीभूत न होता हो? यदि ऐसा कोई महापुरुष आपकी दृष्टि में आया हो तो कृपया संपूर्ण वृतान्त मुझे सांगोपांग सुनाइये ।

              प्रश्न के उत्तर में महर्षि नारद कहते हैं - हे मुनिराज! ऐसी महान विभूति का नाम रामचन्द्र है। उन्होंने वैवस्वत मनु के वंश में महाराजा इक्ष्वाकु के कुल में जन्म लिया है। वे अत्यंत वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करनेवाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादा पुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत वत्सल, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं।’

अब ज़रा राम के संपूर्ण चारित्रिक वैशिष्ट्य को जो बाल्मीकि-नारद संवाद में रामायण में आया है, कुबेरनाथ जी के शब्दों में समझें - ‘रामकथा सविता-कथा है। इसकी प्रकृति सूर्यात्मक है और यह द्यु-मण्डल का काव्य है जो सगुण सृष्टि के विकास का ‘आदि’ रूप है। इसी से यह ‘आदिकाव्य’ कहा जाता है। इसका अधिदेवता है विष्णु का सवितारूप जो सोम और अग्नि के ‘विस्तार’ रूपों का आदि बिन्दु है। क्रियाशक्ति-प्रधान होने से यह ‘गार्हस्थ्य’ का महाकाव्य है।

  यह बात धनुषभंग के अवसर पर ही स्पष्ट हो जाती है। रामचन्द्र ने जब धनुष तोड़ा तो उसके तीन खण्ड हो गये। वह शिव-पिनाक त्रिगुणात्मक प्रकृति का प्रतीक था जो शिव के वाम भाग में रहती है। ऊपरवाला खण्ड ज्ञान-खण्ड था जो व्योम में चला गया। नीचेवाला खण्ड इच्छा-खण्ड था जो पाताल में प्रवेश कर गया। रह गया मध्य-खण्ड जो क्रिया-खण्ड था। उसे ही राम ने धरती पर रख दिया।

रामावतार में ज्ञान और इच्छा यवनिका के पीछे ठेल दिए जाते हैं। रंगमंच पर क्रियाशक्ति ही खेलती है। इस काव्य का आदर्श ही है ‘अनासक्त पुरुषार्थ-योग’।’ जिसे राम के चरित्र में पाते हैं ।

राम के क्रिया योग में गृहस्थ धर्म और नागरिक धर्म का अत्यधिक महत्व है। इसलिए रामकथा में गृहस्थ जीवन का सम्पूर्ण वृत्त उतर आया है। राम कथा का आधार मानवीय धरातल है। इसमें गृहस्थ और नागरिक शील है।

कुबेरनाथ जी कहते हैं, ‘कथा के अन्दर अर्थ का त्रिपुर है। मानवीय धरातल पर यह कथा है पारिवारिक शील के आदर्शों की। अधिदैवी धरातल पर यह कथा है देवासुर-द्वन्द्व की, जिसमें राम प्रच्छन्न ‘इन्द्र’ हैं। परन्तु शाश्वत तल पर यह कथा है द्यु-मण्डल के सविता की। राम द्यु-मण्डल के सविता (सगुण परमात्मा), अन्तरिक्ष के इन्द्र तथा पार्थिव-मण्डल के राजा राम तीनों के प्रतीक हैं।

सविता सूर्य का आदिरूप है। इन्द्र भी बारह आदित्यों में से एक है। राघव राम सूर्यवंशी हैं। अतः तीनों स्तर पर राम सूर्य-प्रतीक से जुड़े हैं। कथा में राम को विष्णु का अवतार कहा गया है। विष्णु आदित्य है। विष्णु ही नारायणरूप सविता तथा सहस्रशीर्षा परमात्मा भी है।’ राम सूर्य की ही तरह ‘शरण्यं सर्वभूतानां’ - पुरुष हैं। 

सूर्य ‘ऋत’ का नियामक और ऋत का अनुगामी रहता है। उसके ‘ऋत’ (विधान या नियमचक्र) का छन्द कभी पतित नहीं होता, कभी टूटता नहीं। मनुष्य जीवन में ‘शील’ ही ऋतरूप है। राम के शील का छन्द कभी पतित नहीं होता। वे ऋत-मार्ग से कभी भ्रष्ट नहीं होते। इसी से उन्हें ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ कहा गया है।

 ऋत की मर्यादा का शत-प्रतिशत निर्वाह सूर्य की ही तरह वे भी करते हैं। रावण इस ऋत को अस्वीकार करता है। फलतः वह ‘अनृत’ का प्रतीक बन जाता है।’

 आइये ‘ऋत’ की स्वीकारोक्ति के साथ ‘अनृत’ के प्रतीकों को राम-धाम-पधारने / दर्शन करने का आमंत्रण दें, अन्यथा राम का बुलावा तो सब को एक न एक दिन आयेगा ही क्योंकि राम का शील ही उनका ऋत है !

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Thursday, 14 May 2026

आदरणीय यह लिख किसके लिए है

आदरणीय यह लिख किसके लिए रहे हैं। परिस्थितियों में परास्त होना भारतीय मेधा का काम नहीं।
करुणा ही अरुणा की जननी है। सूर्य तप कर प्रकाश देता है। ब्राह्मण भिक्षु बन जीवन को सार्थक करते हुए ही जगत की निस्सारत को इंगित करता है।
शूद्र और दलित जाति नहीं हमारी सामूहिक आकांक्षा के रौंदें गये वह पिंड हैं जहां ब्रम्ह और ब्रह्मांड बसता है।
विद्या संतुलन का नाम है। संतोष संत की पह चान है। परोपकार और धैर्य संस्कृति का अभिषेक है।
नेतृत्व पर विश्वास अटल होगा जब, पापों का घट फूटेगा तब।
अब राम, कृष्ण,बुद्ध, महावीर, कपिल,कणाद नहीं आने वाले हैं।
रामकृष्ण, विवेकानंद, महर्षि अरविन्द भी नहीं। 
संदेश साफ है, रास्ता हमारे आत्मविश्वास, राष्ट्र की आकांक्षा,, और आत्मवत् सर्वभूतेषु के बोध, से होकर जाता है।

नकारात्मकता तो सर्वत्र अंधेरा बन फैली है, अरुणोदय बन निशा तिमिर बेधन करें।
पूरब की लाली दक्षिण तक बिखेर दें।
सब कुछ अपनी आंखों के सामने तो ऋषि, तपस्वी,साधक भी नहीं देख सके। 
सुप्रभातम्

Friday, 8 May 2026

पंच परिवर्तन और उच्च शिक्षा

पंच परिवर्तन और उच्च शिक्षा 

पंच परिवर्तन एक महत्वपूर्ण और मूल्यपरक अवधारणा है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को केवल ज्ञान तक सीमित न रखकर उसे व्यवहार, समाज और जिम्मेदारी से जोड़ना है। 

लेकिन मध्यप्रदेश के महाविद्यालयों में यह अभी पूरी तरह से व्यवस्थित रूप में लागू नहीं हो पाया है।

 यह अधिकतर कार्यक्रमों, व्याख्यानों और औपचारिक गतिविधियों तक सीमित है, न कि नियमित पाठ्यक्रम और मूल्यांकन का हिस्सा।


सबसे बड़ी समस्या यह है कि पंच परिवर्तन के लिए न तो स्पष्ट सिलेबस है और न ही कोई ठोस मूल्यांकन व्यवस्था। इसी कारण छात्र और कई बार शिक्षक भी इसे गंभीरता से नहीं लेते। 

इसके पाँचों आयाम—पर्यावरण, नागरिक कर्तव्य, समरसता, कुटुंब और स्व—अधिकतर सैद्धांतिक स्तर पर ही रह जाते हैं, जबकि व्यवहारिक गतिविधियों का अभाव बना रहता है।

 इस स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक है कि पंच परिवर्तन को पाठ्यक्रम, गतिविधियों और मूल्यांकन से जोड़ा जाए।

 जब तक यह “सिर्फ जागरूकता” से आगे बढ़कर “व्यवहारिक अभ्यास” का हिस्सा नहीं बनेगा, तब तक इसका वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा।

पाठ्यक्रम की स्थिति 
* पर्यावरण -  पर्यावरण राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने से पहले आधार पाठ्यक्रम के अंतर्गत सेकंड ईयर में शामिल था।  

* NEP में फर्स्ट ईयर में आ गया था।
2025 - 26 के सत्र से पर्यावरण फर्स्ट ईयर से भी हटा दिया गया है।

* इस समय आधार पाठ्यक्रम के अंतर्गत पर्यावरण किसी कक्षा में नहीं लागू है। जिसको सभी विद्यार्थी पढ़ सकें।

*  द्वितीय वर्ष में उद्यमिता एवं स्टार्टअप तथा महिला सशक्तीकरण नामक दो विषय आधार पाठ्यक्रम के अंतर्गत इस वर्ष संचालित हैं।

* सत्र 2025 - 26 में प्रथम वर्ष के सिलेबस तथा विषयों में बड़े परिवर्तन हुए थे। आधार पाठ्यक्रम को हटा ही दिया गया। इसी के स्थान पर मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम शामिल किया गया। 

*  इसी श्रृंखला के अंतर्गत सत्र 2026-27 में सेकंड ईयर के सिलेबस में परिवर्तन होंगे।

* आधार पाठ्यक्रम के स्थान पर अंग्रेजी में प्रथम वर्ष में Ability Enhancement Course में स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण को शामिल किया गया है ।

* सत्र 2024-25 तक प्रथम वर्ष के आधार पाठ्यक्रम के अंतर्गत योग और ध्यान जैसा एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण और सार्थक विषय अस्तित्व में रहा. सत्र 2025-26 से उसे हटा दिया गया।
 इसे पुनः प्रारम्भ किया जाना चाहिए। 

* पर्यावरण अध्यन का पाठ्यक्रम बनाते समय पर्यावरण एवं वानिकी विभाग के अधिकारियों से चर्चा कर के सुझाव लिए जा सकते हैं ताकि पाठ्यक्रम का व्यावहारिक पक्ष सुदृढ़ हो सके।
इससे पाठ्यक्रम रोजगारोन्मुखी भी हो सकेगा ।

*  Waste Management और Recycling के क्षेत्र में २०३० तक रोजगार के अवसरों की अपार संभावनाएं हैं । इस दिशा में विचार किया जा सकता है ।

*  Best out of waste par भी विचार कर सकते हैं क्यों कि इसमें रोज़गार के अवसर की सम्भावनाएँ हैं इसके साथ ही इससे पर्यावरण संरक्षण भी किया जा सकता है।

* भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक समाज में जैव विविधता संरक्षण की अवधारणा।

 * खान-पान संबंधी ऋतुओं और बदलते मौसम के अनुकूल लोकोक्तियां, कहावतों का मानवीय स्वास्थ्य से संबंध और वैज्ञानिकता।

*  ज्ञान परम्परा सामाजिक प्रथा ,मुहावरों, लोकोक्तियों, लोककथाओं, लोकगीतों, साहित्य में समाहित है। इनमें व्याप्त विज्ञान को समझना चाहिए। पुरातन पंथी कहना या आधुनिकता के नाम पर तिरस्कार करना और उपहास करना छोड़ना होगा।


*  भारत बोध विषय प्रथम वर्ष के इतिहास में मेजर विषय के प्रथम प्रश्न पत्र का पाठ्यक्रम है। इसका अध्ययन केवल वही विद्यार्थी करते हैं, जिन्होंने इतिहास को मेजर विषय के रूप में चुना है।

*  मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम के अंतर्गत है तथा इसका अध्ययन सभी संकायों के प्रथम वर्ष के सभी विद्यार्थियों के लिए  अनिवार्य किया जाना चाहिए।

*  पंच परिवर्तन को ऐसे किसी प्रश्नपत्र में शामिल किया जाना चाहिए, जो सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य हो।

*  राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नए पाठ्यक्रम की गतिविधियों को  शिक्षकों के द्वारा गंभीरता से क्रियान्वित किए जाने पर सकारात्मक परिणाम प्राप्त किया जा सकते हैं। 

* उदाहरण के तौर पर फर्स्ट ईयर में मेजर विषय इतिहास के सेकंड पेपर में कक्षा संगोष्ठी नामक एक गतिविधि है।
1 मई को बड़वानी कालेज में भगवान बुद्ध के जीवनवृत्त और उनके योगदान विषय पर कक्षा संगोष्ठी का आयोजन  किया गया। अवकाश के बावजूद बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित हुए। 
इस संगोष्ठी के लिए भगवान बुद्ध से संबंधित 21 टॉपिक निर्धारित किए गए।
विद्यार्थियों ने आलेख तैयार किए। विद्यार्थियों ने ही प्रेजेंटेशन किए। यहां तक कि इसका समन्वय और संचालन भी विद्यार्थियों के द्वारा ही किया गया।

प्रचलित पाठ्यक्रम में पंच परिवर्तन कहां- कहां कैसे समायोजित हो एक सुन्दर पाठ्यक्रम तीनों वर्ष के ऐसे पाठ्यक्रम में जुड़े जो सभी विद्यार्थियों को पढ़ना हो।

*नागरिक अधिकार तो संविधान प्रावधान है किन्तु नागरिक कर्तव्य का पालन आत्मानुशासन का व्यवहारिक प्रकटीकरण है।

* भारत की परिवार व्यवस्था पर पाठ्यक्रम हो।

*  भारतीय दृष्टि जीवन को खंडों में नहीं, बल्कि एक समग्र रूप में देखती है—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का संतुलन। इसी तरह कुछ English texts भी जीवन की जटिलता और संपूर्णता को पकड़ने की कोशिश करते हैं, जैसे Middlemarch, जहाँ व्यक्तिगत, सामाजिक और नैतिक स्तर एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं।

*  पंच परिवर्तन” भाषा को एक जीवित, विकसित होती हुई सत्ता के रूप में समझने के विकल्प और सामूहिकता की दृष्टि से।

 स्व का बोध : Selfhood । स्वदेशी । सभी पाठ्यक्रमों में स्कूल कॉलेज में एक चैप्टर । IPR इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स पर होने से यह जानकारी सभी को हो जाएगी की हम नए innovations करके उनको Patent करा सकते हे और उनका कमर्शियलाइज़ेशन करके एक नया बिज़नेस खड़ा कर सकते हे और हमारे लघु उद्योगों को पुनः इस्थापित कर सकते हैं ।

* भारत सरकार ने भी अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के द्वारा ७५० करोड़ रुपए तक की फंडिंग का प्रबधन रखा हे । जिस से हम स्वदेशी आविष्कार कर सके और अपना import बड़ा सकें ।

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संक्षेप में ये विषय किन-किन रूपों में पाठ्यक्रम का हिस्सा बने हैं:
1. सामाजिक समरसता (Social Harmony)
NEP के तहत इसे समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञानऔर दर्शन शास्त्र जैसे विषयों में गहराई से जोड़ा गया है।
• किस रूप में:इसे 'मूल्य-आधारित शिक्षा' (Value-based Education) के अंतर्गत रखा गया है।
• कहाँ:यह 'भारतीय ज्ञान परंपरा' (IKS) के अनिवार्य क्रेडिट कोर्स के रूप में पढ़ाया जा रहा है, जिसमें विविधता में एकता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर जोर है।
2. स्वबोध (Self-Awareness / Self-Discovery)
स्वबोध को केवल दर्शन तक सीमित न रखकर इसे आधुनिक मनोविज्ञान और कौशल विकास (Skill Development) से जोड़ा गया है।
• किस रूप में: 'जीवन कौशल' (Life Skills) और 'योग' को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया है।
• कहाँ:यह फाउंडेशन कोर्सेज और व्यक्तित्व विकास (Personality Development) कार्यक्रमों में 'मानसिक स्वास्थ्य' और'आध्यात्मिकबुद्धि' (SQ) के रूप में शामिल है।
3. पर्यावरण (Environment)
इसे अब केवल एक अध्याय नहीं, बल्कि एक अनिवार्य जीवन पद्धति के रूप में पेश किया गया है।
• किस रूप में: 'पर्यावरण शिक्षा' (Environmental Education) को सभी संकायों (कला, विज्ञान, वाणिज्य) के लिए अनिवार्य क्रेडिट कोर्स बनाया गया है।
• कहाँ:इसमें जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ' प्राचीन भारतीय पर्यावरण संरक्षण पद्धतियों' को भी पढ़ाया जा रहा है।
4. कुटुम्ब प्रबोधन (Family Values / Family Awakening)
NEP में परिवार को समाज की मूल इकाई मानते हुए इसे सामाजिक विज्ञान के कोर्सेज में विशेष स्थान दिया गया है।
• किस रूप में: 'भारतीय समाज और संस्कृति' (Indian Society and Culture) के अंतर्गत संयुक्त परिवार प्रणाली का महत्व और पारिवारिक नैतिकता को जोड़ा गया है।
• कहाँ:गृहविज्ञान (Home Science), समाजशास्त्र और सामुदायिकसेवा (Community Engagement) के प्रोजेक्ट्स में इसे शामिल किया गया है।
5. नागरिक कर्तव्य (Civic Duties)
अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों पर जोर देना NEP की मुख्य विशेषता है।
• किस रूप में: इसे 'संवैधानिक मूल्यों' (Constitutional Values) के अनिवार्य मॉड्यूल के रूप में पढ़ाया जा रहा है।
• कहाँ: स्नातक स्तर पर 'भारतीय संविधान और मौलिक कर्तव्य' नाम से एक अनिवार्य पेपर (General Elective/Foundation) जोड़ा गया है।
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प्रमुख क्रियान्वयन क्षेत्र (Implementation Areas)
इन विषयों को मुख्य रूप से निम्नलिखित माध्यमों से लागू किया जा रहा है:
• IKS (Indian Knowledge Systems): प्राचीन भारतीय दृष्टि से इन पांचों विषयों का एकीकरण।
• VAC (Value Addition Courses): स्नातक प्रथम और द्वितीय वर्ष में अनिवार्य 'क्रेडिटआधारित' पाठ्यक्रम।
• सामुदायिक आउटरीच: छात्रों को गांवों या मोहल्लों में जाकर इन विषयों पर व्यावहारिक कार्य करना होता है।
• बहुविषयक दृष्टिकोण: एक विज्ञान का छात्र भी' सामाजिक समरसता' या' स्वबोध' का विकल्प चुन सकता है।
विशेष: यूजीसी (UGC) ने इन विषयों के लिए 'जीवन कौशल' (Jeevan Kaushal) और 'मूल्यप्रवाह' (Mulya Pravah) जैसे दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जो विश्वविद्यालयों द्वारा अपनाए जा रहे हैं।
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विशेष -

* प्रदेश स्तर पर एक उच्च शिक्षा के क्रियान्वयन और मूल्यांकन के लिए आयोग/समिति बननी चाहिए।
* दो - पंच परिवर्तन इंजीनियरिंग, पालीटेक्निक, नर्सिंग, मेडिकल, पैरामेडिकल में कैसे लागू हो इस पर शासन के साथ बैठ कर रूपरेखा तैयार होनी चाहिए।
* अभी जो टास्कफोर्स बना है वह मेडिकल, तकनीकी शिक्षा को नहीं देखता है।

* इन सब कार्यों के लिए शासन की ओर से एक संयोजक बनाया जाना चाहिए।
जब प्रदेश में रा शिक्षा नीति बनी थी तो मैंने सारे विषयों के पाठ्यक्रम रिवाइज कराने शिक्षकों का चयन कर एक कार्यशाला कराई थी। 
* अब स्थिति यह है कि अधिनियम के अन्तर्गत गठित अध्ययन मंडल पाठ्यक्रम बनाते हैं, जिन्हें न तो ज्ञान परम्परा से मतलब है न पंच परिवर्तन से।
* आपने बहुत ही गंभीर विषय क्रियान्वयन के लिए उठाया है, साधुवाद।
8/5/26
उमेश कुमार सिंह