Monday, 9 March 2026

पहला विचार

एक) पहली विचारधारा है?

 * “भारतीय साहित्य के विचारधारा का आधार है , विचार को पूर्णता में देखना! ”

 भारतीय साहित्य ने काल का अध्ययन किया और काल को खंड -खंड में नहीं पूर्णता में पाया और ऋषियों ने कहा ,

“ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

  वह (परमात्मा) पूर्ण है, यह (जगत) भी पूर्ण है। उस पूर्ण से यह पूर्ण उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। ** यह भारतीय साहित्य के विचारधारा का आधार है । 

हम जैसे काल को पूर्णता में देखते हैं, उसी तरह प्रकृति और पुरुष को भी पूर्णता में देखते हैं । यह प्रकृति और पुरुष इस संसृति का कारक है । *** सृष्टि की रचना से साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है ।      

(दो) यहाँ से विचारधाराओं का जन्म होता है - भारतीय वाङ्मय की मुख्य विचारधाराओं को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है: आस्तिक , नास्तिक और अन्य । (1) आस्तिक- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त । (2) नास्तिक विचार धाराएं (वेदों की सत्ता को न मानने वाली): चार्वाक, बार्हस्पत्य (लोकायत)- (i) प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्- चार्वाक दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष (इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान) ही एकमात्र प्रमाण है। अनुमान, उपमान या शब्द को वे प्रमाण नहीं मानते। (ii) देहवाद- चार्वाक के अनुसार देह ही आत्मा है। शरीर से अलग कोई स्वतंत्र आत्मा नहीं मानी जाती। चेतना शरीर के तत्त्वों के संयोजन से उत्पन्न होती है। (iii) स्वभाववाद- संसार की उत्पत्ति और क्रियाएँ स्वभाव (प्राकृतिक गुणों) से होती हैं। किसी ईश्वर या अलौकिक शक्ति की आवश्यकता नहीं मानी जाती। (iv) परलोक खंडन- चार्वाक दर्शन परलोक, स्वर्ग-नरक और पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं करता। उनके अनुसार मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता। ।  

निष्कर्ष: :ये सिद्धान्त भौतिकवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं, इसलिए इन्हें चार्वाक या लोकायत दर्शन का मूल आधार माना जाता है।‘लोकायत’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह केवल इसी ‘लोक’ (संसार) की सत्ता मानता है और जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय रहा।         


 

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