(दो) वैदिक एवं दार्शनिक विचारधारा (पुनर्जागरण काल):19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय वाङ्मय की प्राचीन जड़ों की ओर लौटने का आह्वान हुआ।(i) आर्य समाज और दयानंद सरस्वती: इन्होंने ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया। इसका प्रभाव भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग पर स्पष्ट दिखता है। साहित्य में अंधविश्वास का विरोध और तर्कसंगत वैदिक मूल्यों की स्थापना हुई। (ii) अद्वैत वेदांत और रामकृष्ण-विवेकानंद: स्वामी विवेकानंद के विचारों ने साहित्यकारों में ‘आत्मगौरव’ और ‘राष्ट्रीयता’ का भाव भरा। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य में वेदांत का ‘अद्वैत’ तत्व (मनुष्य और ईश्वर की एकता) स्पष्ट झलकता है। (iii) अनेक दक्षिण भारतीय साहित्यकारों ने भारतीय वाङ्मय, वेद, उपनिषद् और भक्ति परम्परा की ओर लौटने का आह्वान किया। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं- * सुब्रमणम भारती (तमिल):भारती ने अपनी कविताओं में वेदों, उपनिषदों और भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का गौरव गाया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और राष्ट्रवाद को जोड़ते हुए प्राचीन वैदिक आदर्शों की पुनर्स्थापना का आह्वान किया। उनकी कविताओं में आध्यात्मिक स्वतंत्रता और मानव समानता का संदेश मिलता है। ** बंकिमचन्द्र का प्रभाव दक्षिण भारत में: यद्यपि वे बंगाल के थे, पर उनकी रचनाएँ दक्षिण भारत के साहित्यकारों को भी प्रेरित करती रहीं। “वन्दे मातरम्” के माध्यम से उन्होंने भारतमाता और वैदिक-पौराणिक परम्परा की महिमा का पुनरुत्थान किया, जिसका प्रभाव तमिल, तेलुगु और कन्नड़ लेखकों पर पड़ा। *** श्री अर्विन्दों (पुदुचेरी से सम्बद्ध): उन्होंने वेदों और उपनिषदों की आधुनिक व्याख्या की। उनकी कृतियाँ जैसे The Life Divine और Essays on the Gita में भारतीय दार्शनिक परम्परा को आधुनिक दृष्टि से पुनर्जीवित करने का प्रयास मिलता है। * तेलुगु साहित्य से – *कन्द्कुरी वीरेसालिंगम - समाज सुधार के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक परम्परा और शास्त्रीय ज्ञान की पुनर्स्थापना का प्रयास किया। **यू एस स्वामीनाथन ऐय्यर - इन्होंने प्राचीन तमिल ग्रंथों को खोजकर प्रकाशित किया और दक्षिण भारत की प्राचीन साहित्यिक परम्परा को पुनर्जीवित किया। ***विश्वनाथ सत्यानारायाना - इनकी रचनाओं में पुराण, वेद और भारतीय दार्शनिक दृष्टि का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। ** कन्नड़ साहित्य- *कुप्पालि वेंकटप्पा पुत्ताप्पा : कुवेम्पु ने अपनी रचनाओं में भारतीय आध्यात्मिक परम्परा, वेद-उपनिषद के विचार और मानवतावाद को महत्व दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़े साहित्य के निर्माण पर बल दिया। **डी .ह्वी. गुंडप्पा - उनकी कृति मंकुतिम्मना कग्गा में उपनिषद और भारतीय दर्शन की गहन झलक मिलती है। मलयालम साहित्य- *कुमारन असन उनकी कविताओं में आध्यात्मिकता, वेदान्त और सामाजिक समता का विचार मिलता है। वल्लाथोल नारायनाना मेनन -उन्होंने भारतीय संस्कृति, पुराण और संस्कृत परम्परा को अपने काव्य में पुनर्जीवित किया।
निष्कर्ष: इस प्रकार सम्पूर्ण भारत के अनेक साहित्यकारों ने 19वीं–20वीं सदी के पुनर्जागरण काल में वेद, उपनिषद, भक्ति और भारतीय दार्शनिक परम्परा को पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। उनके साहित्य में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की ओर लौटने की स्पष्ट प्रेरणा दिखाई देती है।
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