Tuesday, 10 March 2026

संगम साहित्य 2

 

संगम साहित्य दक्षिण भारत के प्राचीन तमिल साहित्य की अत्यन्त महत्वपूर्ण परम्परा है। परम्परा के अनुसार कहा जाता है कि लगभग ईसा-पूर्व 9000 वर्ष से लेकर ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों तक विद्वानों और कवियों की कई सभाएँ (संगम) आयोजित हुईं, जिनमें अनेक साहित्यकार एकत्र होकर साहित्य की रचना और समीक्षा करते थे।

संगमों की संक्षिप्त जानकारी:(i) प्रथम संगम: इसका आयोजन प्राचीन नगर Thenmadurai में माना जाता है। इसमें अनेक ऋषि-कवि शामिल हुए, परन्तु इस संगम का साहित्य अब उपलब्ध नहीं है।(ii) द्वितीय संगम :यह Kapatapuram में आयोजित माना जाता है। यहाँ भी कई कवियों ने रचनाएँ कीं, लेकिन इनका अधिकांश साहित्य नष्ट हो गया।(iii) तृतीय संगम: इसका केन्द्र Madurai था। इसी संगम का साहित्य आज उपलब्ध है, जिसे Sangam Literature कहा जाता है। इसमें प्रमुख ग्रंथ एट्टुत्तोकै (आठ संग्रह) और पट्टुपाट्टु (दस गीत) हैं।महत्व: संगम साहित्य में प्रेम, वीरता, प्रकृति, समाज और राजनीति का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। यह तमिल भाषा और संस्कृति के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित हैउन्हें तमिल परंपरा 'महम्और 'इदम्नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैंजो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक 'संगमकी याद दिलाते हैं जिस में व्यष्टि और समष्टि के साथ साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उस को एक 'भारतजनमें परिणत करने वाली एक ऐसी 'संगम-दृष्टिहमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय सेन केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थीअपितु व्यष्टि एवं समष्टि के न्तर्गत आने वाले देह और देहीस्त्री और पुरुषव्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

 

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन 'अहम्बोर 'इदम्में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

 

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को 'राष्ट्रीतथा 'संगमनीकहा गया है। यही हमारे बहुभाषाभाषी भारतजन का 'संगमनकराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी नेआसेतु हिमालय तकइस महादेश को एक संस्-कृति दीएक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे 'अद्भुत संगमका निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकीऔर न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

 

ऋग्वेद ने 'संगच्छध्वं सवदध्वम्का जो महामंत्र इस रराष्ट्र के कानों में फूंका थावह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनोंआक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी 'संगमजीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

No comments:

Post a Comment