संगम
साहित्य दक्षिण भारत के प्राचीन तमिल साहित्य
की अत्यन्त महत्वपूर्ण परम्परा है। परम्परा के अनुसार कहा जाता है कि लगभग ईसा-पूर्व
9000 वर्ष से लेकर ईसा की प्रारम्भिक
शताब्दियों तक विद्वानों और कवियों की
कई सभाएँ (संगम) आयोजित हुईं, जिनमें
अनेक साहित्यकार एकत्र होकर साहित्य की रचना और समीक्षा करते थे।
संगमों
की संक्षिप्त जानकारी:(i) प्रथम
संगम: इसका आयोजन प्राचीन नगर Thenmadurai में माना जाता है। इसमें अनेक ऋषि-कवि शामिल हुए, परन्तु
इस संगम का साहित्य अब उपलब्ध नहीं है।(ii) द्वितीय
संगम :यह Kapatapuram में
आयोजित माना जाता है। यहाँ भी कई कवियों ने रचनाएँ कीं, लेकिन
इनका अधिकांश साहित्य नष्ट हो गया।(iii) तृतीय
संगम: इसका केन्द्र Madurai था। इसी संगम का साहित्य आज उपलब्ध है, जिसे Sangam
Literature कहा जाता है। इसमें प्रमुख ग्रंथ एट्टुत्तोकै (आठ
संग्रह) और पट्टुपाट्टु (दस गीत) हैं।महत्व: संगम साहित्य में प्रेम,
वीरता, प्रकृति, समाज और
राजनीति का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। यह तमिल भाषा
और संस्कृति के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित है, उन्हें तमिल परंपरा 'महम्' और 'इदम्' नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैं, जो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक 'संगम' की याद दिलाते हैं जिस में व्यष्टि और समष्टि के साथ साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।
वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उस को एक 'भारतजन' में परिणत करने वाली एक ऐसी 'संगम-दृष्टि' हमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय से, न केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थी, अपितु व्यष्टि एवं समष्टि के न्तर्गत आने वाले देह और देही, स्त्री और पुरुष, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।
इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन 'अहम्' बोर 'इदम्' में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।
इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को 'राष्ट्री' तथा 'संगमनी' कहा गया है। यही हमारे बहुभाषाभाषी भारतजन का 'संगमन' कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी ने, आसेतु हिमालय तक, इस महादेश को एक संस्-कृति दी, एक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे 'अद्भुत संगम' का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकी, और न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।
ऋग्वेद ने 'संगच्छध्वं सवदध्वम्' का जो महामंत्र इस रराष्ट्र के कानों में फूंका था, वह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनों, आक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी 'संगम' जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?
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