Tuesday, 24 March 2026

वन्देमातरम और पंच परिवर्तन

एक मां के चार बेटे हैं। एक गरीब है, नित्य कमाता और परिवार चलाता है, दूसरा व्यवसाय करता है ठीक ठाक आर्थिक क्षमता है। तीसरा प्रशासन में है सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा है। चौथा राजनेता है। सामाजिक, राजनीति, आर्थिक प्रतिष्ठा का धनी है।
चारों मां के प्यार और स्नेह और आशीर्वाद के भाजन हैं। मां के लिए समान हैं। किंतु सामाजिक दृष्टि में एक ग़रीब है, वंचित है तो क्या मां यह नहीं चाहेगी कि अन्य तीनों बेटे उस चौथे के भी अपने समान आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध करायें और सहयोग दें। -यह तीन के स्वर की चौथे के साथ समता, और चौथे का तीन से मिलने वाला स्वर  समरसता का स्वर कोटि -कोटि कंठ का निनाद है। वन्देमातरम है।

* एक नारा उभरा ' हम दो हमारे दो ' क्यों देश की जनसंख्या बढ़ रही है। संसाधन की तुलना में उपभोक्ता बढ़ेंगे तो आर्थिक संतुलन बिगड़ेगा। यह नारा हम दो हमारे दो से हम दो हमारे एक में आ गया। हम और ज्यादा प्रगतिशील हुए और हम दो ही पर टिक गया। एक परिवर्तन क्या भारत माता के हित में था? क्या कभी विचार किया यह नेरेटिव किन देशों से आया? और देश की सरकार जैसा उसका स्वभाव है मानस को बिना परखे अत्याचार के  हद तक जा कर हिंदुओं को ग्रस लिया। हमें यह महसूस करा दिया गया कि सुख एक संतान,दो संतान और नि: संतान में है। और उन्हें जिन्हें सत्तर पूत और बहत्तर नाती की कामना है, छोड़ दिया गया क्योंकि यह उनके मत-पंथ को स्वीकार्य नहीं।
दो बातें विचारणीय हैं- क्या सत्तर पूतों को पैदा करने वाला इस भू-भाग के संसाधनों को शोषण नहीं कर रहा। क्या उन सपूतों के हक को नहीं छीन रहा जो इस भय से ग्रसित हैं कि दो या तीन संतानों का पालन-पोषण कैसे होगा? क्या भारत माता के कोटि कंठ वाले स्वर को धारण करने वाले द्वि कोटि भुजाएं मिल पायेंगी? फिर मां की सुरक्षा का क्या होगा? निर्बल मां को क्या यह जगत वंदन करेगा। क्या हमारे वंदे मातरम् का निहितार्थ पूर्ण होगा।
* सुजलाम, सुफलाम क्या संसाधनों को शोषण से सुरक्षित रहेगा? पवित्र नदियां, पुण्य सलिला, हिमाद्रि श्रृंग क्या सुरक्षित रहेंगे? क्या नैमिषारण्य का यज्ञ पूर्ण होगा? इसके लिए पर्यावरण को कौन सुरक्षित रखेगा? क्या वंदेमातरम की सार्थकता होगी?
* आखिर हमें अतीत को देखना, सिंहावलोकन करना होगा कि नहीं? हम कौन थे क्या हो गये - चिंतन में, व्यवहार में,आचार में, संस्कार में। हम अपने विश्वगुरु के परिचय को भूल कर सिंह शावक की तरह आत्मविस्मृत में शियार के झुंड में तो नहीं जीने लगे। पुरखों के तप का बल,तेज ओज हमारा कहा गया? आत्म मुग्धता और विदेशी नैरेटिव में हम मुर्दों की तरह धार में बहे जा रहे हैं, धारा के विपरीत चलने का सामर्थ्य क्या हम खो चुके हैं, हमें विचार करना होगा।

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