Monday, 9 March 2026

तीन-सांस्कृतिक एवं मानवीय विचार धारा

तीन) सांस्कृतिक एवं मानवीय विचारधारा: यह विचारधारा मध्यकालीन भक्ति और आधुनिक नैतिकता का मिश्रण थी। (i) गांधीवाद : वस्तुतः जिसे हम गांधीवाद कहते हैं वह वैदिक विचारधाराओं के कुछ अंशों का आग्रह है - यथा, सत्य , अहिंसा, अपरिग्रह आदि। यह वैसा ही है जैसे - कठोपनिषद् (प्रथम अध्याय, तृतीय वल्ली, श्लोक 14) का प्रसिद्ध मंत्र स्वामी विवेकानंद ने इसे ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए’ के रूप में लोकप्रिय बनाया था।

मूल संस्कृत श्लोक है, “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ (उत्तिष्ठत: उठो -मोह-रूपी निद्रा से।,जाग्रत: जागो -अज्ञान के अंधकार से बाहर आओ। प्राप्य वरान्निबोधत: श्रेष्ठ महापुरुषों (गुरुओं) के पास जाकर उस परम ज्ञान को प्राप्त करो। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया: यह मार्ग छुरे की पैनी धार के समान कठिन है। दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति: बुद्धिमान लोग इस आत्मज्ञान के मार्ग को अत्यंत दुर्गम (कठिन) बताते हैं।)

यथार्थ तो यह है की गांधीवाद कोई वाद या विचारधारा नहीं है यह वैदिक अनुभूतिओं को जीवन में उतारने का सन्देश है । स्वतंत्रता के पूर्व के साहित्य (प्रेमचंद युग) पर इसका सबसे गहरा प्रभाव था। सत्य, अहिंसा, हृदय-परिवर्तन और अछूतोद्धार जैसे विषयों को प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों (जैसे गोदान, रंगभूमि) में पिरोया। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ और’भारत-भारती’ भी इन मूल्यों से ओत-प्रोत हैं। अब इसे भारतीय दृष्टि जिसे सम्पूर्णता की दृष्टि कहते है तो यहाँ प्रेमचंद आप को वैदिक विचार के अनुगामी दिखाते हैं या मार्क्सवाद /प्रगतिवाद के ? (ii) रवींद्रनाथ टैगोर का मानवतावाद: टैगोर के ‘विश्व-मानव’ और ‘प्रकृति-प्रेम’ के विचार ने छायावाद को जन्म देने में बड़ी भूमिका निभाई। यहाँ व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों को प्रधानता दी गई। किन्तु चिंतन का पक्ष यह है कि क्या यह भी रवींद्रनाथ टैगोर का कोई नया मानवतावाद है ? क्या हमें यहाँ ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ वैदिक विचारधारा नहीं है। (iii) भक्ति कालीन पुनरुत्थान: साहित्यकारों ने तुलसी और कबीर के सामाजिक समरसता वाले विचारों को आधुनिक संदर्भ में फिर से परिभाषित किया।


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