तमिल संगम परंपरा
दक्षिण का सनातन सांस्कृतिक गौरव
तमिल संगम परंपरा: तमिल संगम परंपरा भारत की उस प्राचीन विचार परंपरा का प्रतीक है, जहाँ साहित्य, दर्शन और संस्कृति का मिलन होता था। यह केवल कवियों की सभा नहीं, बल्कि एक ‘साहित्यिक अकादमी’ थी जिसने उत्तर और दक्षिण के सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया।
(1) संगम काल: ऐतिहासिक एवं परंपरागत स्वरूप- संगम परंपरा को तीन चरणों में विभाजित किया गया है, जो दक्षिण भारत के क्रमिक विकास को दर्शाते हैं: (i) प्रथम संगम: 5000 ई.पू.- 1500 ई.पू., दक्षिण मदुरै (समुद्र में लुप्त), अगस्तियम (अप्राप्य) । (ii) द्वितीय संगम : 1500 ई.पू.-300 ई.पू., कपाटपुरम् (समुद्र में लुप्त), तोल्काप्पियम (व्याकरण)। (iii) तृतीय संगम : 300 ई.पू. - 300 ई., मदुरै , वर्तमान एट्टुतोकै, पट्टुपाट्टु।
(2) पाँच भौगोलिक परिदृश्य (Ainthinai) : संगम साहित्य की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि प्रेम के विभिन्न चरणों को पाँच विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों (Landscapes) से जोड़ा गया है। इन्हें ‘ऐंतिनै’ कहा जाता है संगम साहित्य में 'ऐंतिनै' (Ainthinai) भौगोलिक क्षेत्र की अवधारणा केवल भूगोल नहीं, बल्कि मानव भावनाओं और प्रकृति के बीच के गहरे संबंध को दर्शाती है। इन्हें जानने के लिए इनके क्षेत्र (Land), देवता (Deity), व्यवसाय (Occupation) और मनोदशा (Mood) के आधार पर समझना होगा। यहाँ इन बिंदुओं का स्पष्ट और व्यवस्थित विवरण दिया गया है: (i) तिनै (क्षेत्र): कुरुंजी, भौगोलिक विशेषता- पहाड़ और पर्वतीय क्षेत्र, मुख्य भाव (अगम) - मिलन (प्रेमी-प्रेमिका का मिलना), प्रतीकवाद - रात का समय, ठंडी हवा। (ii) तिनै (क्षेत्र) : मुल्लै (Mullai), भौगोलिक विशेषता- वन और चरागाह, मुख्य भाव (अगम) - प्रतीक्षा (धैर्यपूर्वक पति का इंतजार), प्रतीकवाद- वर्षा ऋतु, संध्या काल। (iii) तिनै (क्षेत्र): मरुतम (Marutam), भौगोलिक विशेषता- कृषि भूमि (मैदान) मुख्य भाव (अगम) - कलह (वैवाहिक असंतोष / मनमुटाव) प्रतीकवाद- सुबह का समय, जल। (iv) तिनै (क्षेत्र) : नेथल (Neithal), भौगोलिक विशेषता- समुद्र और तटीय क्षेत्र, मुख्य भाव (अगम) - शोक (विरह या दुख), प्रतीकवाद- सूर्यास्त, समुद्र की लहरें। (v) तिनै (क्षेत्र) : पालै (Palai), भौगोलिक विशेषता - रेगिस्तान या शुष्क भूमि, मुख्य भाव (अगम) - बिछड़ना (लंबी यात्रा या पृथक्करण), प्रतीकवाद- दोपहर की चिलचिलाती धूप।
(3) भौगोलिक (तिनै) क्षेत्रों का स्वभाव : संगम साहित्य में हर क्षेत्र का अपना एक ‘स्वभाव’ होता था: (i) कुरुंजी (पर्वत) : यहाँ का वातावरण ठंडा और रात का समय मिलन के लिए उपयुक्त माना जाता था। (ii) मुरुगन यहाँ के देवता हैं क्योंकि वे शौर्य और युवावस्था के प्रतीक हैं। मुरुगन (चेयोन - शहद इकट्ठा करना, शिकार करना, प्रेमी-प्रेमिका का गुप्त मिलन। (iii) मुल्लै (वन) : वर्षा ऋतु और संध्या का समय 'प्रतीक्षा' का प्रतीक है। (iv) मायोन / विष्णु चरागाहों और गायों के रक्षक के रूप में यहाँ पूजे जाते थे। पशुपालन, दूध का व्यापार, प्रतीक्षा (विरह में धैर्य) (v) मरुतम (मैदान) : जल की बहुतायत और सुबह का समय। (vi) इंद्र (वेन्दन) वर्षा के देवता हैं जो कृषि के लिए जरूरी हैं। यहाँ संपन्नता के कारण प्रणय कलह (दाम्पत्य विवाद) । (vii) को मुख्य भाव माना गया। (viii) नेथल (तट) : सूर्यास्त और समुद्र की लहरें मन में उदासी पैदा करती हैं। इसलिए यहाँ का भाव 'शोक' है। वरुण जल के देवता के रूप में यहाँ प्रमुख थे। मछली पकड़ना, नमक बनाना,वियोग और शोक (लम्बी जुदाई) (ix) पालै (रेगिस्तान) : यह कोई स्थायी क्षेत्र नहीं था; जब कुरुंजी और मुल्लै सूख जाते थे, तो वे 'पालै' बन जाते थे। चिलचिलाती धूप और कठिन रास्ता 'अलगाव' को दर्शाता है। (x) कोट्टवै (शक्ति/दुर्गा) यहाँ की देवी थीं। डकैती, मार्ग-रक्षा, वीरता लंबी यात्रा या अलगाव।
(4) यह वर्गीकरण क्यों महत्वपूर्ण है: (i) प्रकृति और मानव का जुड़ाव: यह दिखाता है कि प्राचीन तमिल लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए आसपास के भूगोल का उपयोग करते थे। (ii) सामाजिक संरचना: यह उन क्षेत्रों के लोगों के व्यवसाय (जैसे नमक बनाना या शिकार) और उनकी जीवन शैली को समझने में मदद करता है। (iii) काव्य परंपरा: संगम कवियों के लिए यह एक नियम था कि यदि वे ‘मिलन’ के बारे में लिख रहे हैं, तो उन्हें ‘पहाड़’ का ही वर्णन करना होगा।
(5) कुरुंजी (पर्वत) और मरुतम (मैदान) : संगम काल के दो सबसे विपरीत लेकिन महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र थे। कुरुंजी जहाँ प्रकृति की दुर्गमता और रोमांच का प्रतीक था, वहीं मरुतम सभ्यता, कृषि और स्थायित्व का। इन दोनों क्षेत्रों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का तुलनात्मक विस्तार इस प्रकार है-
(1) कुरुंजी (Kurunji) - पर्वतीय जीवन : यह क्षेत्र रोमांच और प्रकृति के साथ सीधे संघर्ष का प्रतीक था। (i) निवासी (लोग) : यहाँ के निवासियों को ‘कुरुवर’ या ‘वेतन’ कहा जाता था। ये लोग साहसी और शारीरिक रूप से मजबूत माने जाते थे। (ii) सामाजिक जीवन और खान-पान : इनका मुख्य भोजन शिकार किया हुआ मांस, कंदमूल और पहाड़ों पर उगने वाला ‘तिनै’ (मोटा अनाज / बाजरा) था। ये लोग शहद इकट्ठा करने और उसे जंगल के अन्य उत्पादों के साथ बदलने में माहिर थे। (iii) सांस्कृतिक गतिविधियाँ : यहाँ के लोग ‘वेरयाट्टम’ नामक नृत्य करते थे, जो उनके देवता मुरुगन की आराधना का हिस्सा था। प्रेमी-प्रेमिका का चोरी-छिपे मिलना यहाँ की कविताओं का मुख्य विषय था। (iv) प्रतीकवाद: कुरुंजी का अर्थ एक विशेष फूल से भी है जो 12 साल में एक बार खिलता है। यह क्षेत्र ‘यौवन’ और ‘उत्साह’ को दर्शाता है।
(2) मरुतम (Marutam) - कृषि प्रधान मैदानी जीवन : यह क्षेत्र सबसे समृद्ध और संगठित समाज का प्रतिनिधित्व करता था। (i) निवासी (लोग) : यहाँ के निवासियों को ‘उझावर’ (किसान) कहा जाता था। समाज में इनका स्थान बहुत ऊंचा था क्योंकि ये पूरी आबादी का पेट भरते थे। (ii) सामाजिक संरचना: यहाँ बस्तियाँ स्थायी थीं जिन्हें ‘ऊर’ कहा जाता था। यहाँ के लोग अधिक विलासी जीवन जीते थे। सिंचाई के लिए तालाबों और नहरों का जाल बिछा हुआ था। (iii) वैवाहिक जीवन और विवाद : मरुतम की कविताओं में अक्सर ‘परत्तियार’ (नर्तकियों या उप-पत्नियों) का उल्लेख मिलता है, जिसके कारण पति-पत्नी के बीच ‘ऊडल’ (मनमुटाव) होता था। यह इस क्षेत्र की संपन्नता और उसके साथ आने वाली सामाजिक जटिलताओं को दर्शाता है। (iv) उत्सव: यहाँ इंद्र (वेन्दन) के सम्मान में बड़े उत्सव मनाए जाते थे ताकि अच्छी फसल और वर्षा हो सके।
कुरुंज (पर्वत) और मरुतम (मैदान) का तुलनात्मक सारांश- (i) कुरुंजी (पर्वत): मुख्य आधार - शिकार और संग्रह, जीवन शैली- खानाबदोश औत साहसी, प्रमुख पशु-पक्षी- मयूर, और हाथी , सामाजिक केंद्र - कबीलाई (ट्राइबल) । (ii) मरुतम (मैदान) : मुख्य आधार- व्यवस्थित खेती, जीवनशैली- स्थायी और समृद्ध, प्रमुख पक्षी/पशु- सारस और भैंस सामाजिक केंद्र- ग्राम सभा।
(6) संगम साहित्य की ‘तिनै’ (क्षेत्र) परंपरा : (एक) ‘तिनै’ (क्षेत्र) परंपरा भारतीय साहित्य के सबसे सुंदर और व्यवस्थित वर्गीकरणों में से एक है। इसमें प्रेम और भावनाओं को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि भूगोल, समय और प्रकृति के बारीक प्रतीकों से जोड़ा गया है। संगम कवियों ने पाँच मुख्य भू-दृश्यों के लिए विशिष्ट पक्षी, फूल और वाद्ययंत्रों का निर्धारण किया था, जो उस क्षेत्र की ‘मनःस्थिति’ को दर्शाते थे। (दो) ‘तिनै’ और उनके विशिष्ट प्रतीक: (i) कुरुंजी (पहाड़): मिलन का भाव , कुरुंजी (कुरुन्जिन) फूल बारह साल में एकबार खिलता है। यहाँ के पशु-पक्षियों में -मोर, तोता, बन्दर, हाथी तथा यहाँ का वाद्ययंत्र -कुरुंजी यज्ह है। (ii) मुल्लै (जंगल): भाव-प्रतीक्षा है, यहाँ के पशु-पक्षियों में- गौरैया, जंगली मुर्गी, हिरन हैं, वाद्ययंत्र- मुलैयाल है। (iii) मरुतम (मैदान): भाव- कलह, ईर्ष्या है, फूल- कुमुद, कमल हैं, पशु-पक्षी – सारस, बगुला, बिलाव और भैंस है तथा वाद्ययंत्र- मरुतम याल है। (iv) नेथल (तट): भाव- विरह / शोक, फूल- नेथल, नीला जलकुमुद, पक्षी-पशु- समुद्री बगुला / मछली। (v) पालै (रेगिस्तान): भाव- अलगाव, फूल- पाथिरी, कल्ला (कैक्टस), पक्षी- पशु- चील, गिद्ध / दुबला कुत्ता, बाघ, वाद्ययंत्र- पालै याल।
(7) इन प्रतीकों का महत्व: (i) उलुपोरुल (Ulluporul): इन प्रतीकों का उपयोग केवल सजावट के लिए नहीं था। कवि इनका उपयोग ‘अंतर्निहित अर्थ’ देने के लिए करते थे। उदाहरण के लिए, यदि कविता में भैंस का वर्णन है, तो वह अक्सर नायक की बेवफाई या आलस्य की ओर इशारा करता था। (ii) संगीत (Yazh): हर क्षेत्र का अपना विशिष्ट वाद्य-यंत्र (याल) और राग (पन्न) होता था, जो उस क्षेत्र की भावनाओं के अनुकूल वातावरण तैयार करता था। (iii) प्रकृति के साथ जुड़ाव: यह दिखाता है कि प्राचीन तमिल समाज अपनी भावनाओं को प्रकृति से अलग नहीं देखता था। प्रेमी का इंतजार जंगल (मुल्लै) की शांति और चमेली की खुशबू से जुड़ा था।
तमिल संगम के प्रमुख साहित्यकार, ऋषि और उनके दार्शनिक विचार
कुरुंजी जहाँ मनुष्य की आदिम और स्वतंत्र प्रवृत्तियों को दर्शाता है, वहीं मरुतम मानव सभ्यता के विकास, अनुशासन और पारिवारिक जीवन के उतार-चढ़ाव को दिखाता है।
(1) प्रमुख साहित्यकार, ऋषि और उनके दार्शनिक विचार : संगम में भाग लेने वाले मनीषियों ने केवल कविताएँ नहीं लिखीं, बल्कि राष्ट्र, समाज और अध्यात्म का दर्शन प्रतिपादित किया : (i) ऋषि अगस्त्य (आद्य प्रवर्तक) : इन्हें उत्तर और दक्षिण भारत के सांस्कृतिक समन्वय का जनक माना जाता है। उन्होंने वैदिक संस्कृति को दक्षिण की स्थानीय परंपराओं के साथ जोड़कर 'राष्ट्रीय एकता' का आधार रखा। (ii) तोल्काप्पियर: इनके ग्रंथ 'तोल्काप्पियम' ने तमिल समाज को भाषाई और व्याकरणिक एकता दी। इन्होंने वर्ण, विवाह और सामाजिक आचार का व्यवस्थित वर्णन कर स्वत्व के बोध को जगाया। (iii) नक्कीरर: पांड्य दरबार के मुख्य कवि। इन्होंने 'नेदुनल्वाडै' के माध्यम से राजा और राज्य की मर्यादा, न्याय और नैतिकता पर बल दिया। इनका झुकाव शिव भक्ति की ओर था, जो धार्मिक समन्वय का प्रतीक है। (iv) कपिलर: संगम काल के महानतम स्वतंत्र विचारक । इन्होंने पर्यावरण चेतना और प्रकृति के साथ मानवीय मूल्यों के जुड़ाव पर अद्भुत काव्य रचा। स्त्री-सम्मान और करुणा इनके चिंतन के केंद्र में थे। (v) अव्वैयार: महान कवियत्री जिन्होंने लोकभाषा में नीति शिक्षा दी। इनका दर्शन 'लोकहित' और 'नैतिक राष्ट्र' के निर्माण पर आधारित था। इनकी सरल भक्ति (गणेश/मुरुगन) ने नागरिक कर्तव्यों को धर्म से जोड़ा।
(2) सामाजिक सरोकार और चेतना: संगम साहित्य के आधार पर उस काल के समाज का विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं में किया जा सकता है (i) सामाजिक समरसता: प्रारंभिक तमिल समाज में आधुनिक युग जैसी कठोर जाति-व्यवस्था या छुआछूत के प्रमाण नहीं मिलते। विभाजन ‘ पेशा-आधारित’ था, जैसे-कृषक, योद्धा और शिकारी। (ii) उत्तर-दक्षिण समन्वय: संगम परंपरा "उत्तर बनाम दक्षिण" के विवाद को नकारती है। अगस्त्य परंपरा यह सिद्ध करती है कि दोनों क्षेत्रों के बीच सहज सांस्कृतिक और दार्शनिक आदान-प्रदान था। (iii) चिति और स्वत्व: संगम साहित्य में 'अहम्' (व्यक्तिगत/व्यष्टि) और 'पुरम्' (सार्वजनिक/समष्टि) का अद्भुत संतुलन है, जो भारतीय चिति के मूल ‘स्व’ को परिभाषित करता है। (iv) समुद्री व्यापार (श्रीलंका / ईलम्): 'पत्तिनप्पालै' और 'मदुरैक्कांजी' जैसे ग्रंथों में 'ईलम्' (श्रीलंका) से व्यापारिक संबंधों का उल्लेख है। यह दर्शाता है कि तमिल संस्कृति का विस्तार और प्रभाव समुद्र पार तक था।
(3) संगम साहित्य के मूल स्तंभ: संगम साहित्य को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है जो जीवन के संपूर्ण आयामों को समेटते हैं: (i) अहम् : (आंतरिक भाव ): प्रेम, परिवार और मानवीय भावनाएं (व्यष्टि)। (ii) पुरम् : ( सांसारिक भाव ): वीरता, दान, राजनीति और सामाजिक उत्तरदायित्व (समष्टि)।
संगम काल के प्रमुख कवियों की शिक्षाएं
निश्चित रूप से, ‘तोल्काप्पियम’ में वर्णित ‘तिनै’ (Tinai) की अवधारणा भारतीय इतिहास में ‘पारिस्थितिक, ‘समाजशास्त्र’ का सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक उदाहरण है। तोल्काप्पियर ने न केवल व्याकरण लिखा, बल्कि यह भी बताया कि मनुष्य का स्वभाव, उसका प्रेम और उसकी सामाजिक संरचना उसकी भौगोलिक स्थिति (पर्यावरण) से कैसे निर्धारित होती है।
(1) ‘तिनै’ की अवधारणा: तोल्काप्पियम के ‘पोरुलअधिकारम्’ (विषय-वस्तु खंड) उनके पर्यावरणीय चिंतन और सामाजिक श्रेणियों को स्पष्ट करती है। तमिल संगम साहित्य की ‘तिनै’ (Tinai) अवधारणा प्राचीन भारतीय साहित्य के सबसे व्यवस्थित और वैज्ञानिक वर्गीकरणों में से एक है। सरल शब्दों में, यह केवल काव्य का वर्गीकरण नहीं है, बल्कि मनुष्य के आंतरिक भावों और बाहरी परिवेश-पारिस्थितिकी के बीच के अटूट संबंध का दर्शन है।
(2) तिनै का अर्थ और विभाजन : ‘तिनै’ शब्द का शाब्दिक अर्थ- ‘स्थान’, ‘प्रकार’ या ‘अनुशासन’ है । संगम कवियों ने जीवन और काव्य को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया था: (i) अगम (Akam): इसका संबंध मनुष्य के आंतरिक जीवन, विशेषकर ‘प्रेम’ से है। यह व्यक्तिगत और भावनात्मक होता है। (ii) पुरम (Puram): इसका संबंध बाहरी जीवन जैसे युद्ध, वीरता, नैतिकता, राजाओं के दान और सामाजिक जीवन से है।
(3) तिनै के तीन आधारभूत तत्व: किसी भी तिनै कविता की रचना तीन तत्वों के आधार पर की जाती थी: (i) मुतल पोरुल (Mutal Porul) : स्थान (भूमि) और समय (ऋतु / घड़ी) । (ii) करु पोरुल (Karu Porul) : उस क्षेत्र की विशिष्ट वस्तुएँ- जैसे वहाँ के देवता, पक्षी, पशु, फूल, भोजन और संगीत के वाद्ययंत्र। (iii) उरी पोरुल (Uri Porul) : वह मानवीय भावना या क्रिया (जैसे मिलन या विरह) जो उस क्षेत्र के लिए निर्धारित है।
(4) तिनै की प्रासंगिकता और निरंतरता: तिनै की अवधारणा यह दर्शाती है कि प्राचीन तमिल समाज प्रकृति के साथ गहरे तालमेल में रहता था। यह केवल साहित्य नहीं, बल्कि एक ‘पारिस्थितिक दर्शन’ है। (i) निरंतरता: आज भी दक्षिण भारतीय कला, विशेषकर ‘भरतनाट्यम’ और शास्त्रीय संगीत में इन भावों और क्षेत्रों का प्रभाव देखा जा सकता है। (ii) वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह वर्गीकरण बताता है कि वातावरण और जलवायु मनुष्य के मनोविज्ञान और व्यवहार को कैसे प्रभावित करते हैं।
वर्गीकरण का दार्शनिक और राष्ट्रीय महत्व:
(i) पर्यावरण और चिति का समन्वय: तोल्काप्पियर का यह चिंतन दर्शाता है कि उस काल में 'प्रकृति' को समाज से अलग नहीं देखा जाता था। मनुष्य का ईश्वर, उसका काम और यहाँ तक कि उसकी भावनाएँ भी उसके पर्यावरण के अनुरूप थीं। यह आज की 'सस्टेनेबल लिविंग' (Sustainable Living) का प्राचीन आधार है। (ii) धार्मिक समन्वय का प्रमाण: इस तालिका से स्पष्ट है कि संगम काल में उत्तर भारतीय वैदिक देवताओं (विष्णु, इंद्र, वरुण) और दक्षिण के स्थानीय देवताओं (मुरुगन, कोट्टवै) का पूर्ण समन्वय हो चुका था। यह उत्तर-दक्षिण के सांस्कृतिक एकीकरण का सबसे ठोस साहित्यिक प्रमाण है। (iii) नागरिक कर्तव्य और स्वत्व: प्रत्येक 'तिनै' के निवासियों के अपने विशिष्ट कर्तव्य थे। उदाहरण के लिए, ‘मरुतम’ के किसानों का कर्तव्य पूरे समाज का पेट भरना था, जबकि ‘कुरुंजी’ के शिकारियों का कार्य रक्षा और संसाधन जुटाना था। यह व्यवस्था किसी ऊँच-नीच पर नहीं, बल्कि 'पारस्परिक निर्भरता' पर टिकी थी। (iv) वैश्विक दृष्टि: पालै (रेगिस्तान) के चित्रण में कवियों ने जीवन की कठोरता और ‘त्याग’ की महिमा बताई है, जो भारतीय दर्शन के वैराग्य और वीरता के भाव को पुष्ट करती है।
संगम कालीन विदुषियां और उनकी वीरतापरक चेतना
(1) संगम कालीन विदुषियाँ: (संख्या और प्रभाव) संगम साहित्य के संकलनों में लगभग तीस से अधिक महिला कवयित्रियों का उल्लेख मिलता है। यह उस काल के 'स्वत्व' और 'बौद्धिक स्वतंत्रता' का अनुपम उदाहरण है। इनमें प्रमुख नाम हैं: (i) अव्वैयार: सबसे प्रभावशाली कवयित्री। (ii) वेल्लि वीथियार: प्रेम और विरह की गहन दार्शनिक। (iii) नच्चेल्लैयार: वीरता और सैन्य गौरव की व्याख्याता। (iv) ओक्कूर मासत्तियार: माता की वीरता का चित्रण करने वाली।
(2) ‘पुरम्’ (वीरता) और महिलाओं की राष्ट्र-चेतना : संगम साहित्य के ‘पुरनानूरु’ (Purananuru) में महिलाओं द्वारा रचित ऐसी कविताएँ हैं जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं। यहाँ ‘वीर माता’ (Veerathayi) की संकल्पना मिलती है: (i) पुत्र का बलिदान और माँ का गौरव: एक प्रसिद्ध कविता (ओक्कूर मासत्तियार द्वारा रचित) में वर्णन है कि एक माँ ने अपने पिता को युद्ध में खोया, फिर पति को, और अंत में अपने एकमात्र किशोर पुत्र को भी युद्ध के लिए तैयार कर रणक्षेत्र में भेज दिया। यह ‘राष्ट्र प्रथम’ की उस चेतना को दर्शाता है जो दक्षिण के कण-कण में रची-बसी थी। (ii) नागरिक कर्तव्य: कवयित्री 'नच्चेल्लैयार' ने राजा को युद्ध के नियमों और धर्म की याद दिलाई। उनके अनुसार, युद्ध केवल भूमि जीतना नहीं, बल्कि ‘अधर्म’ का विनाश करना था।
(3) अव्वैयार: कूटनीति और दार्शनिक सरोकार: अव्वैयार केवल एक कवयित्री नहीं थीं, बल्कि वे अदियमान (Adiyaman) जैसे राजाओं की मुख्य सलाहकार और दूत (Ambassador) भी थीं। (i) युद्ध निवारण: एक बार उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से दो शक्तिशाली राजाओं के बीच होने वाले संभावित भीषण युद्ध को टाल दिया था। उन्होंने हथियारों के शस्त्रागार की तुलना 'पवित्र मंदिर' से करते हुए शांति का मार्ग दिखाया। (ii) धार्मिक और सामाजिक समन्वय: अव्वैयार ने शिव, गणेश और मुरुगन की स्तुति के माध्यम से दक्षिण की भक्ति धारा को उत्तर के वैदिक दर्शन से जोड़ा। उन्होंने कहा- “सच्चा दान वह है जो बिना फल की इच्छा के किया जाए” जो प्रत्यक्ष रूप से गीता के ‘निष्काम कर्म’ का ही तमिल रूपांतरण था।
(4) सामाजिक एवं नागरिक स्वतंत्रता: संगम कालीन समाज में महिलाओं की स्थिति के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु: (i) शिक्षा का अधिकार : महिलाओं को काव्य, संगीत और शास्त्रों की शिक्षा दी जाती थी। वे राजदरबारों में कवियों के साथ शास्त्रार्थ करती थीं। (ii) विवाह और स्वत्व: 'अहम्' साहित्य के अनुसार, महिलाओं को अपना जीवनसाथी चुनने की पर्याप्त स्वतंत्रता (गंधर्व विवाह के समान) थी, जिसे ‘कलवु’ (Kalavu) कहा जाता था। (iii) सती प्रथा का अभाव : प्रारंभिक संगम साहित्य में सती प्रथा जैसे कठोर सामाजिक बंधनों के व्यापक प्रमाण नहीं मिलते। विधवाओं के सम्मानजनक जीवन के संकेत मिलते हैं।
शेष भारत के साथ तमिल संगम का संबंध
उत्तर भारत और शेष भारत के साथ संबंध : संगम साहित्य के प्रमुख ग्रंथों जैसे 'पुरनानूरु', 'अकनानूरु' और 'शिलप्पादिकारम' में उत्तर भारत के प्रति गहरा सम्मान और भौगोलिक ज्ञान झलकता है: (i) हिमालय और गंगा की पवित्रता: 'पुरनानूरु' (कविता-2) में चेर राजाओं की प्रशंसा में कहा गया है कि उनका यश हिमालय की चोटियों जैसा अटल और गंगा की जलधारा जैसा पवित्र है। यह दर्शाता है कि संगम कवियों के लिए हिमालय केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक गौरव' का प्रतीक था। (ii) मौर्य और नंद वंश का उल्लेख: 'अकनानूरु' (कविता 251 और 281) में मगध के नंद राजाओं के अपार धन और मौर्यों (मोरियर) के दक्षिण अभियान का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह सिद्ध करता है कि दक्षिण के साहित्यकार उत्तर भारत की राजनीतिक हलचलों से पूर्णतः परिचित थे। (iii) वाराणसी और प्रयाग: संगम साहित्य में ‘कासी’ (वाराणसी) को ज्ञान के केंद्र के रूप में और 'प्रयाग' के संगम को मोक्षदायिनी माना गया है। कवियों ने उत्तर की नदियों और दक्षिण की कावेरी के बीच एक आध्यात्मिक संबंध स्थापित किया। (i) वैदिक ऋषियों का आगमन: ऋषि अगस्त्य के अतिरिक्त, कौंडिन्य (गौतम गोत्र) जैसे कई उत्तर भारतीय ब्राह्मणों का उल्लेख मिलता है जो संगम सभाओं में भाग लेते थे और जिन्हें पांड्य राजाओं द्वारा ‘सम्मानित अतिथि’ के रूप में स्वर्ण दान दिया जाता था। (ii) दार्शनिक समन्वय: संगम साहित्य में 'धर्म, अर्थ, काम' (अराम, पोरुल, इनबम) की त्रिवेणी का वर्णन है, जो सीधे तौर पर भारतीय पुरुषार्थ चतुष्टय का प्रतिबिंब है।
तमिल संगम : भारत की सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय एकता का अक्षय स्रोत
तमिल संगम परंपरा प्राचीन भारत की उस बौद्धिक चेतना का प्रतीक है, जहाँ साहित्य, दर्शन और राष्ट्र-नीति का अभूतपूर्व संगम हुआ। यह केवल दक्षिण की क्षेत्रीय पहचान नहीं, बल्कि संपूर्ण 'भारतवर्ष' की एकात्मकता का साहित्यिक साक्ष्य है। ऋषि अगस्त्य से लेकर अव्वैयार तक, इन मनीषियों ने एक ऐसे समाज की कल्पना की जो नैतिक, वीर और समन्वयवादी था। मुख्य बिंदु एवं वैचारिक विश्लेषण:
(1) ऐतिहासिक एवं कालजयी स्वरूप: संगम परंपरा तीन चरणों (प्रथम, द्वितीय, तृतीय) में विकसित हुई। जहाँ प्रथम संगम ऋषि अगस्त्य के नेतृत्व में देवताओं और ऋषियों की सभा थी, वहीं तृतीय संगम (300 ई.पू.-300 ई.) ने एट्टुतोकै और पट्टुपाट्टु जैसे ग्रंथों के माध्यम से भारतीय साहित्य को ‘अहम्’ (व्यष्टि) और ‘पुरम्’ (समष्टि) का संतुलित दर्शन दिया।
(2) सामाजिक सरोकार और 'चिति' का बोध: (i) पर्यावरणीय चेतना: तोल्काप्पियम की 'पंच-तिनै' व्यवस्था (कुरुंजी, मुल्लै आदि) यह सिद्ध करती है कि प्राचीन समाज प्रकृति-आधारित था। मनुष्य का स्वभाव और उसका व्यवसाय उसके भूगोल से अनुशासित था। (ii) सामाजिक समरसता: संगम समाज में जाति-आधारित कठोरता के स्थान पर कर्म-आधारित विभाजन था। यहाँ छुआछूत का अभाव और ‘शिक्षा’ की सर्वव्यापकता (महिलाओं सहित) दिखाई देती है। (iii) नागरिक कर्तव्य: अव्वैयार और कपिलर जैसे कवियों ने ‘नैतिक राष्ट्र’ पर बल दिया, जहाँ राजा का धर्म प्रजा-रंजन और प्रजा का धर्म राष्ट्र-रक्षा था।
(3) राष्ट्रीय समन्वय: उत्तर और दक्षिण का सेतु: तथ्य प्रमाणित करते हैं कि संगम कालीन साहित्यकार उत्तर भारत के भूगोल (हिमालय, गंगा), राजनीति (नंद, मौर्य) और अध्यात्म (वैदिक यज्ञ, पुरुषार्थ) से गहराई से जुड़े थे। ऋषि अगस्त्य को उत्तर से दक्षिण में सनातन संस्कृति लाने वाला 'समन्वय पुरुष' माना गया है, जो 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की नींव है।
(4) स्वत्व और गौरव (श्रीलंका एवं समुद्र पार संबंध) : ‘पत्तिनप्पालै’ जैसे ग्रंथों में ‘ईलम्’ (श्रीलंका) के साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों का वर्णन है। यह दर्शाता है कि तमिल संगम की चेतना समुद्र पार तक फैली थी, जहाँ ‘स्वत्व’ का बोध व्यापार और संस्कृति के माध्यम से वैश्विक था।
संपूर्ण अध्याय का निष्कर्ष
(1) सर्वसमावेशी सांस्कृतिक धारा : तमिल संगम भारत की प्राचीनतम और श्रेष्ठतम सर्वसमावेशी सांस्कृतिक परम्परा का प्रमाण है। यह परंपरा सिद्ध करती है कि: (i) सांस्कृतिक राष्ट्र: भारत भौगोलिक रूप से विविध होते हुए भी वैचारिक और आध्यात्मिक रूप से एक था। उत्तर के ‘वैदिक’ और दक्षिण के ‘द्रविड़’ तत्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक थे। (ii) धार्मिक चेतना: यहाँ स्थानीय देवताओं (जैसे मुरुगन) और वैदिक देवताओं (इंद्र, वरुण, शिव) की उपासना का सुंदर समन्वय मिलता है। (iii) नागरिक बोध: संगम कवियों ने राजा को न्यायप्रिय और प्रजा को कर्तव्यनिष्ठ होने की शिक्षा दी, जो आज के नागरिक कर्तव्यों की नींव है। अतः संगम साहित्य केवल दक्षिण का गौरव नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की ‘चिति’ का अभिन्न अंग है, जो प्रकृति, भक्ति और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा का संदेश देता है।
(2) ‘तिनै’ व्यवस्था: ‘तोल्काप्पियम’ की यह ‘तिनै’ व्यवस्था सिद्ध करती है कि प्राचीन तमिल मनीषी जानते थे कि राष्ट्र की समृद्धि उसकी भूमि और उसके पर्यावरण के संरक्षण में निहित है। उन्होंने भूगोल को केवल मिट्टी नहीं माना, बल्कि उसे एक ‘जीवंत देवता’ के रूप में प्रतिष्ठित किया।
(3) नारी शक्ति और संगम की विरासत: (i) संगम कालीन समाज में महिलाओं की स्थिति और उनकी ‘वीरतापरक’ (Puram) रचनाओं का उल्लेख मिलता है । वहाँ स्त्रियाँ केवल ‘अहम्’ (प्रेम)
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