Wednesday, 11 March 2026

राष्ट्रीय 'स्व' और प्रतिबद्धता

 

राष्ट्रीय 'स्व' और प्रतिबद्धता

प्राचीन हो या नवीन, हम जिसको अपना रहे हैं वह हमारे राष्ट्रीय 'स्व' को आगे बढ़ाने में सहायक होना चाहिए, यही उस के ग्राह्य या अग्राह्य होने की कसौटी है। हमारी अनुसंधान-वृत्ति का काम है कि बह इस कसौटी का निरंतर उपयोग करे और हमारे द्वारा जिस का धनुकरण किया जा रहा है उस में से केवल उन्हीं तत्वों की स्वीकार करे जो हमारे राष्ट्रीय 'स्व' के लिये हितकर है और ऐसे तत्त्वों की सर्वथा त्याग दे जो देश-काल-पांत्रता के विचार से अहितकर सिद्ध हो रहे हों।

इस दृष्टि से निस्संदेह हमें अपने राष्ट्रीय ‘स्व’ से प्रतिबद्ध होना पड़ेगा और अपने अतीत तथा वर्तमान में ऐसे तत्त्वों का अनुसंधान करना पड़ेगा जो राष्ट्रीय ‘स्व’ को अमरता देने में अभी तक सहायक सिद्ध हुए हैं या आगे सिद्ध हो सकते हैं।

यह बात तीन प्रकार के लोगों को पसंद नहीं आयेगी। प्रथम तो वे बन्धु हैं, जिन्हें प्रतिबद्धता शब्द से ही चिढ़ है। दूसरे वे भाई हैं जो कहते हैं कि हमारा रराष्ट्रीय 'स्व' नाम की कोई वस्तु नहीं है और यदि है भी तो वह सर्वथा निन्य एवं त्याज्य है। तीसरे वे महानुभाव हैं, जो अंतर्रा-ष्ट्रीयता से प्रतिबद्ध हैं और इस लिए राष्ट्रीय 'स्व' से प्रतिबद्ध होने को वे एक संकीर्णता मानते हैं ।

इन सभी बन्धुओं से निवेदन है कि वे अपने दृष्टिकोण पर तनिक पुनर्विचार करें। क्या कभी यह संभव है कि याप सर्वथा अप्रतिवद्ध रह सकें ?

आप चाहे धर्म, सदाचार, शील, राष्ट्रीयता आदि से अप्रतिबद्ध होने का दावा करें, परन्तु निस्संदेह आप अपने 'स्व' से प्रतिबद्ध हैं, क्योंकि अन्यथा न आपको अपने तन की आवश्यकताओं का ज्ञान होता और न मन की - यहां तक कि आप अपने अप्रतिवद्धतावाद का आग्रह भी नहीं करते । वस्तुतः बच्चा अपने 'स्व' से प्रतिबद्ध हुआ ही जनमता है। जन्म से ही वह अपने तन-मन की 'भूख' मिटाने के लिए आतुर है और यह 'भूख' मिटाने के लिए उसे केवल मोजन ही नहीं चाहिए, अपितु वस्त्र, भाषा, विचार, भाव, श्राचार-व्यवहार भी चाहिए जो अपने परिवार, समाज या राष्ट्र के 'स्व' हो कर प्राप्त होते हैं। बच्चा पैदा होते हीराष्ट्र द्वारा प्रदत्त परिवेश से इंद्रिय-संनिकर्ष स्थापित करता है और उस के माध्यम से शनैः शनैः राष्ट्रीय 'स्व' से निरंतर प्रतिबद्ध होता जाता है।

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