Monday, 30 March 2026

नैमीषारण्य


नैमिषारण्य - भारतीय प्रज्ञा का चिरंतन केंद्र

नैमिषारण्य के ‘महासत्र’
नैमिषारण्य केवल उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में गोमती तट पर स्थित एक तीर्थ मात्र नहीं है, अपितु यह आर्यावर्त की उस प्रथम ‘बौद्धिक संसद’ का प्रतीक है, जहाँ भारतीय संस्कृति, इतिहास और दर्शन को लिपिबद्ध किया गया। युगों के संधिकाल में, जब कलियुग की पदचाप सुनाई देने लगी, तब महर्षि कुलपति शौनक के नेतृत्व में 88,000 ऋषियों ने एक ‘द्वादश वर्षीय महासत्र’ का संकल्प लिया।
 नैमिषारण्य का यह सत्र उस महान ‘योग्यता-आधारित’ समाज का उदाहरण है, जहाँ सूत जी जैसे प्रखर विद्वान को उनके ज्ञान के आधार पर व्यासपीठ पर आसीन किया गया। यहाँ जिज्ञासु (शौनक) और समाधानकर्ता (सूत) के बीच हुए संवादों ने न केवल कलियुग के लक्षणों की सटीक भविष्यवाणी की, अपितु मानवता के ‘आत्यंतिक कल्याण’ का मार्ग भी प्रशस्त किया। नैमिषारण्य की इस महान चर्चा का समापन इस बोध के साथ होता है कि ‘ज्ञान ही वह नाव है’ जो हमें कलियुग के सागर से पार लगाती है। सूत जी ने ऋषियों को आश्वस्त किया कि जब तक ‘भागवत’ और ‘विष्णु पुराण’ जैसे ग्रंथ जीवंत हैं, तब तक मानवता का मार्ग पूरी तरह अंधकारमय नहीं होगा।
  एक प्रश्न उठाता है कि ऋषियों ने ‘द्वादश वर्षीय महासत्र’ के लिए नैमिषारण्य को ही क्यों चुना ? इसका उत्तर ‘चक्रतीर्थ’ की उत्पत्ति की कथा में छिपा है, जो अध्यात्म और विज्ञान का एक अनूठा संगम है।
                                 चक्रतीर्थ की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कथा
सूत जी ने शौनक आदि ऋषियों को बताया था कि जब कलियुग के आगमन की पदचाप सुनाई देने लगी, तब ऋषियों ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि हमें एक ऐसा ‘सुरक्षित क्षेत्र’ बताइये जहाँ कलि का प्रभाव न हो और हम निर्विघ्न तप कर सकें।
(1) चक्रतीर्थ की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कथा : ब्रह्मा जी ने अपने मन से एक ‘मनोमय चक्र’ उत्पन्न किया और ऋषियों से कहा: “हे ऋषियों! इस चक्र के पीछे-पीछे जाओ। जहाँ इस चक्र की ‘नेमि’ (बाहरी परिधि या धुरी) गिरकर खंडित हो जाएगी, वही स्थान कलि के प्रभाव से मुक्त और ब्रह्मांड का केंद्र होगा।” (i) चक्र का गिरना: वह चक्र संपूर्ण पृथ्वी का भ्रमण करते हुए उत्तरप्रदेश के इसी पावन क्षेत्र में गिरा। जहाँ उसकी ‘नेमि’ गिरी और भूमि में धँस गई, उसी स्थान को ‘नेमि-अरण्य’ (नैमिषारण्य) कहा गया। (ii) पाताल गंगा का प्रादुर्भाव: जैसे ही चक्र भूमि में धँसा, वहाँ से जल की एक प्रचंड धारा फूट पड़ी। वह धारा इतनी तीव्र थी कि उसे रोकने के लिए माता ललिता (शक्ति) को प्रकट होना पड़ा। आज वही स्थान ‘चक्रतीर्थ’ के नाम से जाना जाता है, जो एक गोलाकार जलकुंड है।
(2) नैमिषारण्य : भौगोलिक और ऊर्जा केंद्र - ऋषियों द्वारा इस स्थान को चुनने के पीछे के ‘वैज्ञानिक’ तर्क इस प्रकार समझे जा सकते हैं:(i) पृथ्वी का केंद्र : पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नैमिषारण्य पृथ्वी का नाभि-केंद्र माना जाता है। यहाँ की चुंबकीय ऊर्जा ध्यान और मंत्र-जप के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। (ii) सुरक्षित अरण्य: गोमती नदी के तट पर स्थित यह वन क्षेत्र सामरिक और प्राकृतिक दृष्टि से सुरक्षित था, जहाँ जल, फल और कंदमूल की प्रचुरता थी, जो 12 वर्ष के लंबे सत्र के लिए आवश्यक थी। (iii) कलि-मुक्त क्षेत्र: वैज्ञानिक रूप से इसे एक ‘पॉजिटिव एनर्जी ज़ोन’ माना गया, जहाँ नकारात्मक तरंगों का प्रवेश न्यूनतम था। नैमिषारण्य की यह यात्रा हमें बताती है कि भारतीय संस्कृति में ‘ज्ञान’ और ‘स्थान’ दोनों का महत्व है। चक्रतीर्थ का वह चक्र वास्तव में ‘समय का चक्र’ और ‘ज्ञान का पहिया’ है। जब तक यह चक्र घूमता रहेगा, सत्य की खोज जारी रहेगी। नैमिषारण्य का सत्र आज भी समाप्त नहीं हुआ है; जब भी कोई जिज्ञासु शौनक सत्य को जानने के लिए किसी अनुभवी सूत जी के पास बैठता है, तो वहीं 'नैमिषारण्य' प्रकट हो जाता है। 




नैमिषारण्य: भारतीय ज्ञान-परंपरा की ‘वैचारिक संसद’
नैमिषारण्य भारतीय ज्ञान-परंपरा और पौराणिक वाङ्मय का ‘बौद्धिक केंद्र’ रहा है। नैमिषारण्य को भारत का प्रथम ‘विश्व विद्यालय’ कहा जा सकता है। नैमिषारण्य को ‘सत्रों की भूमि’ भी कहा जाता है। सत्र वह लंबी अवधि होती थी जहां ऋषि-मुनि एकत्रित होकर ब्रह्मांडीय रहस्यों, इतिहास और धर्म पर मंथन करते थे।
(1) ज्ञान साधान का केंद्र : नैमिषारण्य भारतीय परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ और ज्ञान-साधना का केंद्र रहा है। यहाँ अनेक ऋषि-मुनि एकत्र होकर धर्म, संस्कृति, राष्ट्र और लोकमंगल पर विचार करते थे। विशेषतः “सत्र” (दीर्घकालीन यज्ञ-सभा) में संतों का समूह एकत्र होता था। पुराणों में इसे पवित्र तपोभूमि और  ऋषियों की सभा-स्थली माना गया है । नैमिषारण्य में ऋषियों का एकत्र होना सामान्य सभा नहीं, बल्कि “सत्र” (दीर्घकालीन यज्ञ-सभा) था। ऋषि लगातार 12 वर्ष (द्वादश-वर्षीय सत्र) तक इस “महासत्र”  में एकत्र रहते थे । इसमें यज्ञ, शास्त्र-चर्चा और पुराणों का श्रवण होता था। इसका उल्लेख भागवत पुराण में मिलता है - 
“नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः।
सत्रंस्वर्गायलोकायसहस्रसममासते॥” (श्रीभा.म.पु./ 1.1.4)
नैमिषारण्य (अनिमिष क्षेत्र) में शौनक आदि ऋषि दीर्घकालीन सत्र (यज्ञ) के लिए एकत्र होकर बैठे थे। इससे स्पष्ट है सभा का उद्देश्य धर्म, ज्ञान और यज्ञ था। 
“नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकप्रमुखा:।
दीर्घसत्रेसमासीनाः…” (महाभारत (आदिपर्व)
नैमिषारण्य में सभा के प्रधान शौनक ऋषि थे। उनके साथ अनेक ऋषि-मुनि सहस्रों की संख्या में उपस्थित रहते थे। वक्ता के रूप में उग्रश्रवा सूत जी होते हैं। सभा श्रवण- प्रश्न- उत्तर पद्धति पर चलती थी। (भा.पु.1.1.5–6)। ऋषियों के सूत जी से (‘कालेर्नदोष निधेराजन्’)- धर्म, आचार, वेद-पुराण, कलियुग में कल्याण के उपायों, मोक्ष तथा ब्रहम आदि पर जिज्ञासा–समाधान होते थे। सभा का वातावरण-शांत, तपोमय और धार्मिक और निरंतर यज्ञ अग्नि से प्रज्वलित रहता था । सभी ऋषि संयमित और नियमपूर्वक बैठते थे । विष्णु पुराण में नैमिषारण्य को देवताओं द्वारा पवित्र किया गया क्षेत्र बताया गया है। 
 (2) नैमिषारण्य का ‘प्रथम सत्र’ और वक्ता- (i) प्रारंभ: नैमिषारण्य का विधिवत सत्र द्वापर के अंत और कलियुग के प्रारंभ की संधि (लगभग 3102 ई.पू. पौराणिक गणना अनुसार, ऐतिहासिक रूप से 1000-800 ई.पू.) में माना जाता है । (ii) प्रमुख वक्ता: सबसे पहले लोमहर्षण सूत ने कथा कही, तदुपरांत उनके पुत्र उग्रश्रवा सूत ने शौनक आदि ऋषियों को महाभारत और पुराण सुनाए। जिसमें ऋषि शौनक (कुलपति), पैल, वैशम्पायन, जैमिनि, सुमन्तु और हजारों अन्य तपस्वी सम्मिलिति हुए । (iii) शौनक ऋषि की भूमिका: शौनक जो 10,000 से अधिक विद्यार्थियों के अन्नदाता और गुरु थे, इसलिए उन्हें ‘कुलपति’ कहा गया। । वे प्रमुख जिज्ञासु थे। (iv) नैमिषारण्य की संस्कृति: यह सर्व समावेशी थी। उस काल में यज्ञ और शास्त्रार्थ में महिलाओं की भागीदारी के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं- किसी भी ‘सत्र’ या ‘दीर्घ यज्ञ’ में ऋषि अपनी पत्नियों (जैसे वशिष्ठ के साथ अरुंधति) के साथ बैठते थे। उपनिषद काल की गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों का प्रभाव इन क्षेत्रों में था। यद्यपि मुख्य वक्ता सूत जी थे, किंतु सभा में ब्रह्मवादिनी स्त्रियों की उपस्थिति वर्जित नहीं थी। (v) पुराणों की विषय-वस्तु : नैमिषारण्य के इस ‘महासत्र’ में केवल धर्म ही नहीं, बल्कि प्रशासन (राजधर्म), भौतिकी (सृष्टि विज्ञान), आयुर्वेद और संगीत पर भी संवाद होता था। यह एक गहन ‘दार्शनिक और सामाजिक विमर्श’ था। यहाँ ‘एकतरफा प्रवचन’ नहीं, बल्कि ‘प्रश्न-उत्तर’ पद्धति थी। शौनक प्रश्न करते थे और सूत जी समाधान। जहाँ सूचनाओं का संकलन कर उन्हें ‘पुराण’ और ‘इतिहास’ का रूप दिया जाता था । इसमें विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है- 
(एक) विष्णु पुराण : इसका मूल उपदेश पराशर मुनि ने दिया। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, ध्रुव-प्रह्लाद कथा, वंशावली के साथ भूगोल, खगोल और राजवंशों (मौर्य वंश तक) का वर्णन है। यहाँ विष्णु ‘परमेश्वर’ हैं, जो सृष्टि के नियंता, रक्षक और सर्वशक्तिमान हैं। उनके ‘ऐश्वर्य’ (शक्ति और वैभव) पर बल है। विष्णु पुराण में ‘वैधी भक्ति’ मिलती है। इसमें वर्णाश्रम धर्म, नियमों का पालन और मर्यादा पर अधिक जोर है। मोक्ष पाने के लिए कर्तव्यों का पालन अनिवार्य माना गया है। विष्णु पुराण बताता है कि ‘महासत्र' में चर्चा के विषय -(i) सृष्टि विज्ञान प्राथमिक तत्वों (महत, अहंकार) और ब्रह्मांड की उत्पत्ति का क्रम। (ii) काल गणना सतयुग से कलियुग तक का सूक्ष्म विभाजन और मन्वन्तर। (iii) राजधर्म और राष्ट्र प्रियव्रत और उत्तानपाद के वंशजों के माध्यम से आदर्श शासन।(iv) भक्ति का स्वरूप कर्म और ज्ञान मिश्रित विष्णु-भक्ति। विष्णु पुराण सृष्टि को भगवान का ‘शक्ति-परिणाम’ मानता है। जैसे बीज से वृक्ष बनता है, वैसे ही विष्णु की शक्ति से जगत का विस्तार होता है। जगत सत्य है क्योंकि वह सत्य (विष्णु) का ही विस्तार है । विष्णु पुराण भविष्यवक्ता की तरह समाज के पतन, राजाओं की क्रूरता और धर्म के लोप की चेतावनी देता है। इसका समाधान ‘धर्म की रक्षा’ है।
(दो) भागवत पुराण: यह व्यास जी की परिपक्व रचना मानी जाती है। इसका प्रचार शुकदेव जी के बाद सूत जी ने नैमिषारण्य में किया। इसमें (i) सृष्टि विज्ञान- विराट पुरुष के स्वरूप और भगवान की लीला-सृष्टि का वर्णन है । (ii) काल गणना- काल की सूक्ष्मता और प्रलय के विभिन्न प्रकार हैं । (iii) राजधर्म और राष्ट्र- राजा परीक्षित और प्रह्लाद के माध्यम से धर्म-निरपेक्ष न्याय की व्याख्या है । (iv) भक्ति का स्वरूप-‘अहैतुकी भक्ति’ (निस्वार्थ प्रेम) और शरणागति मूलक है । इसमें कृष्ण भक्ति की पराकाष्ठा, दशम स्कंध, वैराग्य और भक्ति का दार्शनिक समन्वय मिलता है । यहाँ विष्णु ‘कृष्ण’ के रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम हैं। यहाँ शक्ति से अधिक ‘माधुर्य’ (प्रेम और लीला) को प्रधानता दी गई है। भागवत का निष्कर्ष है- “कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” (कृष्ण ही साक्षात् भगवान हैं)। श्रीमद्भागवत 'रागानुगा भक्ति' (प्रेमपूर्ण) का शास्त्र है। यहाँ गोपियों और प्रह्लाद के उदाहरण से बताया गया कि यदि प्रेम प्रगाढ़ है, तो नियम और मर्यादाएं गौण हो सकती हैं। भागवत का दर्शन ‘हृदय के परिवर्तन’ पर केंद्रित है। (ii) श्रीमद्भागवत में ‘माया’ का सिद्धांत अधिक गहरा है। भागवत कहती है कि यह संसार स्वप्न के समान ‘प्रतीयमान’ है। यहाँ अद्वैत वेदांत की झलक अधिक है, जहाँ भक्त और भगवान अंततः एक ही चैतन्य के दो रूप हैं।(ii) श्रीमद्भागवत कलियुग को केवल दोषपूर्ण नहीं मानता, बल्कि उसे एक ‘अवसर’ मानता है। भागवत का निष्कर्ष है कि जो फल सतयुग में समाधि से मिलता था, वह कलियुग में केवल ‘हरि नाम’ से मिल जाता है।
(3) ऋषियों की भूमिका : (i) महर्षि अंगिरा: ऋग्वैदिक काल (1500 ई.पू. या उससे पूर्व) । ब्रह्मा के मानस पुत्र; अग्नि-विद्या के जनक। ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा। अग्नि और देवताओं की उपासना, वैदिक मंत्र और यज्ञकर्ता । (ii) महर्षि वशिष्ठ (काल लगभग 1500 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के बीच) सप्त ऋषियों में से एक; पराशर के पितामह (दादा) (iii) महर्षि पराशर: काल (1200-900 ई.पू.) वशिष्ठ के पौत्र । वेदव्यास के पिता। विष्णु पुराण के मूल उपदेष्टा और पराशर स्मृति और धर्मशास्त्र परंपरा के प्रवर्तक । विष्णुभक्त। राष्ट्र धर्म आधारित सामाजिक व्यवस्था, संस्कृति, वर्णाश्रम धर्म और आचार व्यवस्था का प्रतिपादन । (iv) महर्षि वेदव्यास : काल लगभग (1500-1000 ई.पू.।) पराशर के पुत्र; वेदों के संकलनकर्ता और महाभारत के रचयिता। भक्ति और ज्ञान का समन्वय। राष्ट्र धर्म के माध्यम से समाज-व्यवस्था, भारतीय संस्कृति का मूल आधार। लोक जागरण द्वारा सांस्कृतिक एकता । (v) शुकदेव जी: (900-850 ई.पू.) व्यास के पुत्र; राजा परीक्षित को ‘श्रीमद्भागवत’ सुनाने वाले। (vi) कण्व ऋषि: ऋग्वैदिक काल (1500–1200 ई.पू. लगभग) प्रमुख योगदान: ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा (कण्व शाखा), शकुंतला के पालक । गुरुकुल प्रणाली आधारित आश्रम परंपरा, शिक्षा व्यवस्था। राष्ट्रीय दृष्टि -शिक्षित समाज की स्थापना। भक्ति- देवताओं (विशेषतः इन्द्र, अग्नि) की उपासना । (vii) शौनक ऋषि: वैदिकोत्तर काल / (लगभग 1200–800 ई.पू. -अनुमानित) । नैमिषारण्य के प्रमुख आचार्य, 88,000 ऋषियों के नेता । भक्ति- यज्ञ, श्रुति और स्मृति के माध्यम से ईश्वर-भक्ति । धर्म-संगठन और वैदिक व्यवस्था का संरक्षण । संस्कृति: वैदिक परंपरा, यज्ञीय जीवन, गुरु-शिष्य परंपरा । (viii) लोमहर्षण: महाभारत-उत्तर काल (लगभग 1000–800 ई.पू.) पुराणों के प्रथम व्यवस्थित व्याख्याकार । विचारधारा: भक्ति,वेद-पुराण आधारित ईश्वर-चिंतन । संस्कृति: ज्ञान के संरक्षण और प्रसार । ये शुकदेव जी और व्यास जी के शिष्य थे। इनका काल द्वापर की समाप्ति और कलियुग के संधि काल का है। (ix) याज्ञवल्क्य: लगभग 900-700 ई.पू.। ग्रंथ: शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक उपनिषद्। विचारधारा: भक्ति-आत्मा-ब्रह्म का ज्ञान। संस्कृति-उपनिषदिक दर्शन, ज्ञानमार्ग। (x) उग्रश्रवाः(सूतजी): (लगभग 800-500 ई.पू.) (पौराणिक परंपरा)। नैमिषारण्य सत्र के मुख्य वक्ता। जन्म: सूत कुल- लोमहर्षण के पुत्र । भूमिका: नैमिषारण्य में ऋषियों को पुराणों का कथन (विशेषतः भागवत पुराण) । विचारधारा: भक्ति- विष्णु-भक्ति, कथा-श्रवण का महत्व । अग्नि-विद्या और यज्ञ पर विशेष बल । संस्कृति: यज्ञ परंपरा और वैदिक ज्ञान । राष्ट्र: धार्मिक एकता और वैदिक व्यवस्था । ये सभी ऋषि, जो परंपरा से नैमिषारण्य जैसी तपोभूमि से जुड़े माने जाते हैं। 
                                          ‘महासत्र’ मानव शरीर, ब्रह्मांड और चेतना के गहरे रहस्य 
‘महासत्र’ में प्रयुक्त संख्याएं और प्रतीक केवल भौतिक आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे मानव शरीर, ब्रह्मांड और चेतना के गहरे रहस्यों को दर्शाते हैं। भारतीय मनीषा में ‘अंक विज्ञान’ और ‘रूपक’ का बहुत महत्व रहा है। नैमिषारण्य से जुड़े गूढ़ रहस्यों का अनावरण करते हैं: (1) ‘88,000’ ऋषियों का रहस्य : अक्सर प्रश्न उठता है कि एक साथ 88,000 ऋषि एक ही स्थान पर कैसे बैठ सकते थे? इसका आध्यात्मिक अर्थ अत्यंत गहरा है: (i) प्राणिक शक्ति : योग शास्त्र के अनुसार, मनुष्य के शरीर में 72,000 नाड़ियाँ मुख्य मानी गई हैं, लेकिन सूक्ष्म स्तर पर इनकी संख्या और भी अधिक है। '88,000' की संख्या उन ‘दिव्य विचारों और प्राणिक शक्तियों ’ का प्रतीक है जो हमारे भीतर निरंतर प्रवाहित होती हैं। (ii) भाव यह की जब व्यक्ति ध्यान में बैठता है, तो उसकी हज़ारों वृत्तियाँ (विचार) एक केंद्र (नैमिषारण्य/हृदय) पर एकत्रित होती हैं। अतः, 88,000 ऋषियों का एकत्र होना, मनुष्य की ‘समस्त चेतना का एक लक्ष्य (परमात्मा) पर एकाग्र होना’ भी प्रतीक रूप में समझने का विषय है। (2) ‘12 वर्ष’ का सत्र ही क्यों? : ऋषियों ने 12 वर्ष के ‘महासत्र’ का ही संकल्प क्यों लिया? (i) खगोलीय चक्र: बृहस्पति अपना एक राशि चक्र लगभग 12 वर्ष में पूरा करता है। भारतीय ज्योतिष में इसे एक ‘पुष्कर’ काल माना जाता है। (ii) जैविक परिवर्तन: आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि लगभग 7 से 12 वर्षों में मनुष्य के शरीर की कोशिकाएं पूरी तरह बदल जाती हैं। (iii) सार: 12 वर्ष का सत्र इस बात का प्रतीक है कि ‘पूर्ण वैचारिक और आध्यात्मिक पुनर्जन्म’ के लिए इतना समय अनिवार्य है। (3) ‘चक्रतीर्थ’ का केंद्र: नाभि रहस्य : नैमिषारण्य को पृथ्वी की ‘नाभि’ कहा गया है। (i) प्रतीक: जैसे माता के गर्भ में शिशु को पोषण ‘नाभि’ से मिलता है, वैसे ही आध्यात्मिक पोषण के लिए नैमिषारण्य को संपूर्ण पृथ्वी का ‘ऊर्जा केंद्र’ माना गया। (ii) चक्र की नेमि: ‘नेमि’ का अर्थ है ‘सीमा’। जहाँ बुद्धि की सीमा समाप्त होती है और अंतर्ज्ञान शुरू होता है, वही ‘नैमिष’ है। (4) ‘सूत’ और ‘शौनक’: बुद्धि और जिज्ञासा का संवाद - (i) शौनक : ‘शौनक’ का अर्थ है-जिसने अपनी इंद्रियों को पवित्र कर लिया है। यह हमारे ‘शुद्ध मन’ का प्रतीक है। (ii) सूत : ‘सूत’ का अर्थ धागा भी होता है। सूत जी वह ‘सूत्र’ हैं जो बिखरे हुए ज्ञान को एक धागे में पिरोकर माला (पुराण) बनाते हैं। (iii) रहस्य: यह संवाद हमारे भीतर की ‘जिज्ञासा और प्रज्ञा’ का मिलन है। (5) ‘अमिष’ रहित अरण्य: नैमिष - ‘निमिष’ का अर्थ होता है पलक झपकने का समय। इसका गूढ़ अर्थ है, वह स्थान जहाँ माया (पलक झपकने की क्रिया) का प्रभाव रुक जाए और व्यक्ति ‘अनिमिष’ (बिना पलक झपकाए/जागृत) होकर सत्य को देख सके। यहाँ ‘अमिष’ (हिंसा/स्वार्थ) का लेश भी नहीं है। 
शौनक ऋषि के 6 जिज्ञासा पूर्ण प्रश्न
श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध के प्रथम अध्याय में ये प्रश्न आते हैं: (1)जिज्ञासा : मानवता का परम कल्याण (श्रेय) क्या है? संसार में अनगिनत शास्त्र और मत हैं। आम मनुष्य के पास इतना समय नहीं कि वह सबको पढ़े। अतः, वह एक निश्चित मार्ग क्या है जिससे प्राणी का ‘आत्यंतिक कल्याण’ हो? (2) जिज्ञासा : समस्त शास्त्रों का सार क्या है? वेदों, उपनिषदों और पुराणों का विशाल भंडार है। आप हमें उन सबका निचोड़ बताइये जिसे धारण करना सरल हो। (3) जिज्ञासा : भगवान ने देवकी के गर्भ से अवतार क्यों लिया ? उस अजन्मा परमात्मा को अवतार लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी? उनके इस विशेष अवतार का प्रयोजन क्या था?(4) जिज्ञासा: भगवान के विभिन्न अवतारों की कथाएँ क्या हैं? सृष्टि की रचना और पालन के लिए भगवान ने जो विविध ‘लीला अवतार’ (जैसे मत्स्य, कूर्म, वराह आदि) धारण किए, उनका वृत्तांत क्या है? (5) जिज्ञासा : भगवान के परम पावन चरित्र और उनके कार्यों का विस्तार क्या है ? विशेषकर नारद, व्यास और अन्य ऋषियों के साथ उनके संबंध और उनकी उदारता की कथाएँ हमें सुनाइये। (6) जिज्ञासा : धर्म ने अब किसकी शरण ली है? जब भगवान कृष्ण अपनी लीला समाप्त कर स्वधाम (वैकुंठ) पधार गए, तब ‘धर्म’ (जो कृष्ण के आश्रित था) अब किसकी शरण में गया है? कलियुग के अंधकार में लोग सत्य को कहाँ खोजें?

                                                     आज के संदर्भ में इन प्रश्नों की प्रासंगिकता
नैमिषारण्य के ये प्रश्न आधुनिक युग की ‘सूचना विस्फोट’ की समस्या का सटीक समाधान देते हैं: 
(i) विकल्पों का भ्रम: जैसे शौनक ने ‘शास्त्रों के सार’ की बात की, आज हमें भी हज़ारों विचारधाराओं के बीच एक ‘मूल सत्य’ की तलाश है। 
(ii) मानसिक शांति: ‘परम श्रेय’ का प्रश्न आज के ‘डिप्रेशन और तनाव’ के दौर में आत्मिक शांति खोजने के समान है। 
(iii) नैतिक आश्रय: कृष्ण के जाने के बाद ‘धर्म’ कहाँ है? यह प्रश्न आज के नैतिक पतन के दौर में हमें ‘भागवत’ (ग्रंथ) के रूप में एक मार्गदर्शक रोशनी देता है। 
(iv) सूत जी का उत्तर: सूत जी ने इन 6 प्रश्नों के उत्तर में पूरी श्रीमद्भागवत कथा सुना दी। उन्होंने छठे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा: (i) “कृष्ण के जाने के बाद धर्म, ज्ञान और वैराग्य के साथ इस ‘भागवत पुराण’ में प्रविष्ट हो गया है। जो इसे सुनता या पढ़ता है, उसे साक्षात् कृष्ण की शरण प्राप्त होती है। (ii) ‘यह प्रसंग वास्तव में नैमिषारण्य के इतिहास का सबसे ज्वलंत और प्रेरणादायक अध्याय है। यह प्राचीन भारत की ‘योग्यता-आधारित’ और ‘ज्ञान-प्रधान’ संस्कृति का जीवंत प्रमाण है। नैमिषारण्य की उस पावन सभा में ‘सूत जी’ का व्यास पीठ पर बैठना केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक ‘सांस्कृतिक संदेश’ था। 
 (v) पौराणिक शब्दावली में ‘सूत’ शब्द का अर्थ एक विशेष कुल से है (जो ब्राह्मण पिता और क्षत्रिय माता की संतान माने जाते थे)। परंपरा के अनुसार, सूत जी का मुख्य कार्य राजाओं की वंशावली और इतिहास को सुरक्षित रखना था। 
(vi) रोमहर्षण और उग्रश्रवा: नैमिषारण्य में दो प्रमुख सूत वक्ताओं का उल्लेख मिलता है। उग्रश्रवा जी (जो रोमहर्षण के पुत्र थे) ने अपनी मेधा और स्मृति शक्ति से 18 पुराणों और महाभारत को आत्मसात किया था। 
(vii) व्यास का वरदान: (i) महर्षि वेदव्यास ने अपने चार शिष्यों को चार वेद दिए, लेकिन पुराणों और इतिहास की धरोहर उन्होंने ‘सूत जी’ को सौंपी। व्यास जी जानते थे कि सूत जी के पास वह ‘वाक्-चातुर्य’ और ‘स्मृति’ है जो इस ज्ञान को लोक-कथाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुँचा सकती है। (ii) जब शौनक जी ने सूत जी का स्वागत किया, तो उन्होंने जन्म या जाति नहीं, बल्कि ‘ज्ञान’ को आधार बनाया। उन्होंने कहा- “सूत! तुम धन्य हो, क्योंकि तुमने व्यास और शुकदेव जैसे महापुरुषों से ज्ञान प्राप्त किया है।” 
(viii) नैमिषारण्य: एक ‘लोकतांत्रिक’ बौद्धिक केंद्र : नैमिषारण्य की सभा का स्वरूप आज की ‘संसद’ या ‘विश्वविद्यालय’ जैसा था: (i) प्रश्नोत्तर की स्वतंत्रता: यहाँ कोई प्रतिबन्ध नहीं था। एक ‘सूत’ कुल के वक्ता से ब्राह्मण ऋषि अत्यंत विनम्रता और जिज्ञासा के साथ प्रश्न पूछते थे। यह बौद्धिक लोकतंत्र का चरमोत्कर्ष था। (ii) ज्ञान का विकेंद्रीकरण: यहाँ का ज्ञान केवल हिमालय की गुफाओं तक सीमित नहीं रहा। सूत जी ने उसे ‘कथा’ का रूप दिया ताकि समाज का अंतिम व्यक्ति (जो वेदों के कठिन मंत्र नहीं पढ़ सकता) वह भी जीवन के दर्शन को समझ सके। 
(ix) आधुनिक युग के लिए संदेश : नैमिषारण्य का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि: (i) कौशल का सम्मान : ज्ञान किसी एक वर्ग की संपत्ति नहीं है। (ii) सुनने की कला: 88,000 महान विद्वानों का एक वक्ता को ध्यान से सुनना यह दर्शाता है कि सीखने के लिए ‘अहंकार’ का त्याग अनिवार्य है। (iii) समरसता: जब ज्ञान का आदान-प्रदान होता है, तो सामाजिक दूरियाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

                                           सूत जी की भविष्यवाणियां: कलियुग (आज के) सत्य 
  सूत जी द्वारा कलयुग के लक्षणों की भविष्यवाणियां: श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध के द्वितीय अध्याय में वर्णित कलयुग के लक्षणों का बहुत ही सटीक विश्लेषण किया है। सूत जी ने राजा परीक्षित को शुकदेव गोस्वामी द्वारा सुनाए गए इन भविष्यवाणियों का विस्तार से वर्णन किया है।
(1) धन और शक्ति का वर्चस्व : श्रीमद्भागवत के अनुसार, “वित्तमेव कलौनृणां जन्माचारगुणोदयः। धर्मन्यायव्यवस्थायां कारणं बलमेव हि ॥” (श्रीमद्भागवत, 12.2.2) कलियुग में केवल धन ही मनुष्य के अच्छे जन्म, अच्छे आचरण और गुणों का आधार होगा। जिसके पास धन है, वही गुणी माना जाएगा। न्याय और धर्म की व्यवस्था केवल ‘शक्ति’ के आधार पर होगी।
(2) विवाह और पारिवारिक संबंधों का विघटन : “ दाम्पत्ये अभिरुचिर्हेतुर्मायैव व्याहारिके। स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिर्विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥” (श्रीमद्भागवत, 12.2.3) पति-पत्नी के बीच केवल ‘अभिरुचि’ ही संबंध का कारण होगी। व्यापार और व्यवहार में छल ही सफलता का आधार होगा। विवाह का आधार आध्यात्मिक मिलन के बजाय केवल आकर्षण और समझौता रह जाएगा।।
 (3) पाखंड और बाहरी दिखावा : “लिङ्गमेवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम्। अवृत्त्या न्यायदौर्बल्ये पाण्डित्ये चपलं वचः ॥ ”(श्रीमद्भागवत, 12.2.4) बाहरी प्रतीक (जैसे जटा, तिलक या विशेष वस्त्र) ही आध्यात्मिकता एवं किसी आश्रम या विद्वत्ता की पहचान होंगे। जो बहुत चतुराई से बात कर पाएगा और शब्द-जाल बुनेगा, उसे ही ‘पंडित’ या ‘विद्वान’ माना जाएगा।
(4) शारीरिक और प्राकृतिक क्षरण : (आयु): “ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया। कालेन बलिना राजन् नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः ॥”(श्रीमद्भागवत, 12.2.1) (प्रकृति): “अस्वच्छान्नाद्यपानाश्च वृथावासाश्च मानवाः। अल्पप्राणा ह्यल्पसत्त्वा अल्पवीर्या अल्पायुषः ॥” (विष्णु पुराण, 4.24)- (समान संदर्भ भागवत में भी है) समय के प्रभाव से धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरण शक्ति-सबका क्षय होगा। अन्न स्वादहीन हो जाएगा और पृथ्वी अपनी उर्वरता खो देगी।
(5) वाणी और सत्य का लोप : “दूरे वार्ययनं तीर्थं लावण्यं केशनधारणम्। उदरम्भरता स्वार्थः प्रगल्भ्यं सत्यभाषणम् ॥” (श्रीमद्भागवत, 12.2.6) पेट भरना ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य (स्वार्थ) बन जाएगा। जो व्यक्ति जितना ढीठ और चतुर होगा, उसे ही ‘सत्यवादी’ और ‘विद्वान्’ समझा जाएगा।
उक्त श्लोक 

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