Tuesday, 30 June 2026
ज्ञान गंज
Friday, 26 June 2026
ज्ञानगंज की “अदृश्य डाक”
ज्ञानगंज की “अदृश्य डाक”
स्वामी विशुद्धानंद परमहंस सूर्य सिद्धांत: (i) लाहिड़ी महाशय के परम शिष्य । (ii) “गंध बाबा” के नाम से प्रसिद्ध । (iii) ज्ञानगंज में “सूर्य विज्ञान” की शिक्षा प्राप्त ।
सूत्र रूप में-
१. सूर्य विज्ञान (Solar Science): (i) सूर्य की किरणों को लेंस द्वारा हथेली पर केंद्रित करना । (ii) योग शक्ति एवं मंत्रों द्वारा ऊर्जा का संयोजन । (iii) परमाणुओं का पुनर्गठन (Rearrangement) । (iv) शून्य से फूल, अंगूर, वस्त्र आदि प्रकट करना । मूल सिद्धांत: (i) “हर पदार्थ सूर्य रश्मियों के संयोजन से बना है।” (ii) ऊर्जा को पदार्थ में बदलना संभव ।
२. ज्ञानगंज की शक्तियों की भूमिका: आकाशीय मार्ग (Astral Channel)- (i) सूक्ष्म जगत से भौतिक जगत में वस्तुओं का स्थानांतरण । योगिनियाँ एवं सिद्ध: (i) ‘खेचरी विद्या’ में पारंगत । (ii) वस्तुओं के “टेलीपोर्ट” की क्षमता । (iii) साधक के संकल्प को कार्यरूप देना । मानसिक आदेश: (i) विशुद्धानंद जी के संकल्प पर वस्तुएँ प्रकट होना ।
३. प्रसिद्ध गुलाब घटना: (i) एक अंग्रेज ने परीक्षा ली । (ii) मौसम से बाहर का फूल माँगा । (iii) सूर्य किरणों के प्रयोग से ताजा गुलाब प्रकट । (iv) संकेत: फूल ज्ञानगंज के उद्यानों से आया ।
४. योग और विज्ञान का मेल: (i) इसे “चमत्कार” नहीं, “उच्च विज्ञान” कहा गया । (ii) आधुनिक 3D प्रिंटिंग जैसी अवधारणा से तुलना । (iii) ऊर्जा → पदार्थ परिवर्तन की प्रक्रिया । (iv) योगिनियाँ = ऊर्जा वाहक (Catalyst) ।
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ज्ञानगंज में प्रवेश के नियम
आध्यात्मिक पात्रता- (i) कुण्डलिनी जागरण आवश्यक । (ii) स्थूल से सूक्ष्म चेतना में प्रवेश । गुरु की अनुमति: (i) केवल गुरु/सिद्ध के आमंत्रण से प्रवेश । (ii) सामान्य व्यक्ति पहुँच नहीं सकता । शरीर शुद्धि: (i) कायाकल्प एवं योगिक शुद्धिकरण आवश्यक। (ii) उच्च कंपन (High Vibration) सहने की क्षमता चाहिए ।
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ज्ञानगंज की अवधारणा: (i) सामान्य भौगोलिक स्थान नहीं । (ii) एक “आध्यात्मिक आयाम” (Spiritual Dimension) । (iii) सिद्ध योगियों एवं योगिनियों का गुप्त केंद्र ।
प्रमुख कथन
(i) “जब मनुष्य स्वयं को ब्रह्मांड के साथ एक कर लेता है, तो हर मन एक ट्रांसमिटिंग स्टेशन बन जाता है।”- महावतार बाबाजी
(ii) “प्रकृति के गुप्त नियमों को जानने वाला व्यक्ति असंभव को भी संभव कर सकता है।” — विशुद्धानंद परमहंश
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योगियों की आयु और दीर्घायु का रहस्य (स्मरणीय बिंदु)
(i) ज्ञानगंज के योगियों की विशेषता: (i) ज्ञानगंज के योगियों के बारे में माना जाता है कि वे सैकड़ों से लेकर हज़ारों वर्षों तक जीवित रहते हैं। (ii) उनकी दीर्घायु का आधार साधारण शरीर विज्ञान नहीं, बल्कि उच्च योग-साधना मानी जाती है।
(ii) दीर्घायु के दो मुख्य रहस्य: 1. कायाकल्प विद्या: (i) योगी सूर्य विज्ञान और विशेष दिव्य जड़ी-बूटियों का उपयोग करते हैं। (ii) इन जड़ी-बूटियों को “अमृत तुल्य” माना जाता है। (iii) मान्यता है कि इससे शरीर की कोशिकाएँ (Cells) नष्ट नहीं होतीं। (iv) शरीर लंबे समय तक युवा और समर्थ बना रहता है।
2. श्वसन नियंत्रण (Breath Control): (i) क्रियायोग द्वारा वे अपनी श्वास को अत्यंत धीमा या स्थिर कर लेते हैं। (ii) सांसों की गति कम होने से शरीर की ऊर्जा क्षय भी कम होती है। (iii) माना जाता है कि समय का प्रभाव उन पर बहुत कम पड़ता है। (iv) उनके लिए समय सामान्य मनुष्यों की तरह “रैखिक” (Linear) नहीं माना जाता।
३. वर्तमान आचार्य और उनकी आयु: (१) महावतार बाबाजी: (i) ज्ञानगंज के सर्वोच्च मार्गदर्शक माने जाते हैं। (ii) क्रियायोग के मूल गुरु के रूप में प्रसिद्ध। (iii) परंपरा के अनुसार वे हजारों वर्षों से सशरीर विद्यमान माने जाते हैं। (iv) अनुमानित आयु: ५०००+ वर्ष (मान्यता अनुसार)। (२) स्वामी महातपस महाराज: (i) स्वामी विशुद्धानन्द के दीक्षा गुरु बताए जाते हैं। (ii) सूर्य विज्ञान के महान आचार्य माने जाते हैं। (iii) ज्ञानगंज के प्रमुख सिद्धों में गिने जाते हैं। (iv) अनुमानित आयु: हज़ारों वर्ष। (३) भृगुराम परमहंस: (i) ज्ञानगंज की गुप्त परिषद के प्रभावशाली सिद्ध बताए जाते हैं। (ii) उच्च योग और रहस्य विज्ञान के ज्ञाता माने जाते हैं। (iii) अनुमानित आयु: हज़ारों वर्ष।
४. वर्तमान संचालन: (i) मान्यता अनुसार ज्ञानगंज का संचालन आज भी महान सिद्धों के निर्देशन में होता है। (ii) मुख्य रूप से महातपस महाराज और भृगुराम जी का नाम लिया जाता है। (iii) इन्हें “कालजयी” (Beyond Time) माना जाता है। (iv) इसलिए उनके लिए सामान्य मनुष्यों जैसी “आयु” या “रिटायरमेंट” की अवधारणा लागू नहीं मानी जाती।
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ज्ञानगंज की आंतरिक व्यवस्था
१. ज्ञानगंज की आंतरिक व्यवस्था: (i) योगी केवल ध्यान नहीं करते, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखते हैं। (ii) ज्ञानगंज में “योगिनी चक्र” अत्यंत सक्रिय माना जाता है। (iii) योगिनियाँ प्रकृति की शक्तियों का संचालन और साधकों की रक्षा करती हैं। (iv) मान्यता अनुसार महान वैज्ञानिक आविष्कार “विचार-बीज” के रूप में प्रेरित किए जाते हैं। (v) वहाँ विज्ञान और अध्यात्म का भेद समाप्त होकर केवल “सत्य” शेष रहता है ।
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साधक की चेतना
साधक की चेतना
*प्राण और अपान का संतुलन ही वह कुंजी है जिससे एक योगी अपने भौतिक शरीर को 'प्रकाश' में बदल देता है और महासमाधि प्राप्त करता है।
* तब साधक की चेतना (प्रकाश) बाहरी दुनिया से हटकर रीढ़ के भीतर 'सुषुम्ना' मार्ग से होती हुई आज्ञा चक्र या 'कूटस्थ' पर केंद्रित हो जाती है।
* यहाँ उस दिव्य प्रकाश और नाद (ध्वनि) का एक सिद्ध योगी अनुभव करता है:
१. कूटस्थ चैतन्य की ज्योति (The Spiritual Eye : जब साधक अपनी आँखें बंद कर दोनों भौहों के बीच एकाग्र होता है, तो उसे एक 'त्रिवर्ण' (तीन रंगों वाला) तारा दिखाई देता है, जिसे 'आध्यात्मिक नेत्र' कहा जाता है:
(i) बाहरी सुनहरा घेरा (Golden Halo): यह 'ब्रह्मांडीय ऊर्जा' या पवित्र आत्मा (Holy Ghost) का प्रतीक है।
(ii) भीतरी गहरा नीला गोला (Opal Blue): यह 'कृष्ण चेतना' का प्रतीक है, जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है।
(iii) केंद्र में सफेद तारा (Five-pointed Silver Star): यह 'परमेश्वर' या 'पिता' (Cosmic Consciousness) का द्वार है।
योगिराज लाहिड़ी महाशय कहते थे कि इस तारे के भीतर प्रवेश करना ही वास्तविक 'पुनर्जन्म' है।
२. अनाहत नाद (The Cosmic Sounds): जैसे-जैसे ध्यान गहरा होता है, साधक को केवल प्रकाश ही नहीं, बल्कि विशिष्ट ध्वनियाँ भी सुनाई देती हैं।
ये ध्वनियाँ ब्रह्मांड के विभिन्न स्तरों (चक्रों) के कंपन हैं:
(i) मूलाधार- भौंरे की गुंजन (Humming of a Bee), पृथ्वी तत्व की ऊर्जा।
(ii) स्वाधिठान: बासुरी की तान (flute), जल तत्व का स्पंदन ।
(iii) मणिपुरक - वीणा या हार्व की ध्वनि (Harp), अग्नि तत्व का तेज ।
(iv) अनाहत : घंटे की गूंज (Bell or Gong), वायु तत्व की व्यापकता ।
(v) विशुद्द : समुद्र की गर्जना , आकाश तत्व की अनंता ।
अंत में, ये सभी ध्वनियाँ मिलकर एक भव्य 'ओम्' (ॐ) की ध्वनि में विलीन हो जाती हैं।
३. 'कूटस्थ' दर्शन का वैज्ञानिक प्रभाव: जब साधक कूटस्थ के इस प्रकाश को देखता है, तो उसके मस्तिष्क की कोशिकाएं (Cells) दिव्य ऊर्जा से नहा जाती हैं।
परिणाम -(i) भ्रम का नाश: इस ज्योति को देखने के बाद साधक को यह प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि 'प्रकाश' है।
(ii) सर्वव्यापकता: नीले गोले के माध्यम से योगी अपनी चेतना को पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ महसूस करता है। वह चींटी से लेकर तारों तक, हर जगह खुद को ही देखता है।
४. "यदि तुम्हारी आँख एक हो...": 'कूटस्थ' या तीसरी आँख है, जहाँ दो भौतिक आँखों की दृष्टि मिलकर एक दिव्य अंतर्दृष्टि बन जाती है।
"यह तारा वह द्वार है जिससे होकर हर साधक को गुजरना पड़ता है ताकि वह अंधकार से निकलकर अनंत प्रकाश के साम्राज्य में प्रवेश कर सके।" — परमहंस योगानंद
यह अनुभव साधना की परिपक्वता का प्रमाण है और साधक के भीतर के भय और मृत्यु के बोध को हमेशा के लिए समाप्त कर देता है।
21/6/26 ..........................................
हमारी आध्यात्मिक यात्रा में कहाँ तक है
हमारी आध्यात्मिक यात्रा में कहाँ तक है
*'प्राण' और 'अपान' के संतुलन को केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक "न्यूरो-बायोलॉजिकल" (तंत्रिका-वैज्ञानिक) प्रक्रिया है।
* हमारा जीवन इन दो विपरीत ऊर्जाओं के बीच के संघर्ष पर टिका है। इसका वैज्ञानिक सार और प्रक्रिया इस प्रकार है:
१. प्राण और अपान का विज्ञान: शरीर में दो मुख्य चुंबकीय धाराएँ कार्य करती हैं:
(i) प्राण (Prana): यह 'अभिकेंद्रित' (Centripetal) शक्ति है जो बाहर से ऊर्जा को भीतर खींचती है और ऊपर की ओर गति करती है। इसका केंद्र कूटस्थ (दोनों भौहों के बीच) है।
(ii) अपान (Apana): यह 'अपकेंद्रित' (Centrifugal) शक्ति है जो ऊर्जा को नीचे की ओर और बाहर की ओर धकेलती है। इसका केंद्र मूलाधार (रीढ़ का निचला हिस्सा) है।
* समस्या: सामान्य मनुष्य में अपान वायु अधिक शक्तिशाली होती है, जो चेतना को इंद्रियों और काम-वासनाओं की ओर नीचे खींचती है। जब तक ये दोनों धाराएँ संतुलित नहीं होतीं, मन कभी स्थिर नहीं हो सकता।
२. संतुलन की प्रक्रिया: क्रियायोग का आधार: श्वास के माध्यम से हम इन दोनों धाराओं को एक "यज्ञ" (Internal Fire) में होम कर देते हैं। इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया के मुख्य चरण ये हैं:
क. श्वास का अंतरीकरण (Internalization of Breath) : जब हम गहरी और सजग श्वास लेते हैं, तो हम 'प्राण' को 'अपान' में और 'अपान' को 'प्राण' में विलीन करने का प्रयास करते हैं। इससे श्वास की गति धीमी हो जाती है।
ख. रीढ़ की हड्डी का दोलन (Spinal Polarization): क्रियायोग की मुख्य तकनीक में चेतना को रीढ़ की हड्डी (Sushumna) के माध्यम से ऊपर और नीचे घुमाया जाता है।
(i) आरोहण (Inhalation): अपान को ऊपर खींचकर प्राण के साथ मिलाना।
(ii) अवरोहण (Exhalation): प्राण को नीचे ले जाकर अपान को शांत करना।
ग. श्वास-हीन अवस्था (Breathless State): जब प्राण और अपान पूरी तरह संतुलित हो जाते हैं, तो हृदय और फेफड़ों की गति स्वतः रुक जाती है। इसे ही योग में 'कुम्भक' या 'मृत्युरहित अवस्था' कहा जाता है।
इस अवस्था में शरीर को ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि वह सीधे 'आकाश' (Ether) से ऊर्जा ग्रहण करने लगता है।
३. वैज्ञानिक लाभ: इस संतुलन से शरीर में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं:
(i) रक्त का शुद्धिकरण: फेफड़ों पर बोझ कम हो जाता है और रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड पूरी तरह समाप्त होकर वह 'प्राण-शक्ति' से भर जाता है।
(ii) मस्तिष्क का विकास: रीढ़ के माध्यम से जब ऊर्जा ऊपर उठती है, तो वह मस्तिष्क के उन सुप्त केंद्रों (Silent cells) को जागृत कर देती है जो सामान्यतः निष्क्रिय रहते हैं।
(iii) समय पर विजय: चूँकि उम्र श्वासों की संख्या पर निर्भर करती है, इसलिए जब योगी अपनी श्वास को स्थिर कर लेता है, तो वह समय के प्रभाव से मुक्त हो जाता है।
४. महत्वपूर्ण निर्देश: चेतावनी दी है कि: (i) "प्राण-अपान के संतुलन की वास्तविक 'क्रिया' केवल एक अधिकृत गुरु से ही सीखी जानी चाहिए। यह एक शक्तिशाली 'सर्जरी' की तरह है जिसे बिना मार्गदर्शन के करना खतरनाक हो सकता है।"
20/6/26
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Five pillars of spiritual life
Thursday, 25 June 2026
संगमनी
Sunday, 21 June 2026
श्री शिव कवच
पाँच क्लेश- सूत्र रूप
पाँच क्लेश- सूत्र रूप में :
(पतंजलि योगसूत्र की स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि द्वारा व्याख्या)
मूल क्लेश सूत्र: “अज्ञान ही वह पर्दा है जो आत्मा और परमात्मा के बीच खड़ा है।”
क्लेश श्रृंखला: अविद्या → अस्मिता → राग → द्वेष → अभिनिवेश ।
१. अविद्या सूत्र: अविद्या = आत्म-विस्मृति । शरीर को आत्मा मानना = मूल भ्रम । नश्वर को शाश्वत समझना = अज्ञान । समस्त दुःखों का मूल = अविद्या ।
चेतना सूत्र: “सपने को सत्य मान लेना ही अविद्या है।”
२. अस्मिता सूत्र: अविद्या से उत्पन्न = अहंकार । “मैं शरीर हूँ” = झूठी पहचान । आत्मा का बुद्धि और देह से तादात्म्य = अस्मिता । परिणाम = ब्रह्म चेतना से अलगाव ।
विज्ञान सूत्र: सीमित ‘मैं’ = अस्मिता । असीम ‘मैं’ = आत्मा ।
३. राग सूत्र : सुख की स्मृति = आसक्ति । इंद्रिय सुख = बंधन का कारण । “मुझे यह चाहिए” = राग का स्वरूप । राग = संसार चक्र की जंजीर । मन सूत्र: “जहाँ आकर्षण है, वहाँ बंधन है।”
४. द्वेष सूत्र: दुःखद अनुभव = घृणा । सुख की चाह + दुःख से भागना = मानसिक अशांति । राग और द्वेष = मन के दो झूले । संतुलन सूत्र: आकर्षण और विकर्षण से ऊपर उठना = योग ।
५. अभिनिवेश सूत्र: मृत्यु का भय = देह आसक्ति । आत्मा को शरीर मानना = भय का कारण । = भय का अंत ।
अमरत्व सूत्र: “जो स्वयं को आत्मा जान लेता है, उसके लिए मृत्यु केवल परिवर्तन है।”
क्लेश-निवारण सूत्र: विवेक = अविद्या का नाश । ध्यान = अहंकार का शमन। वैराग्य = राग-द्वेष से मुक्ति। आत्मज्ञान = मृत्यु भय का अंत । क्रियायोग = चेतना शुद्धि का विज्ञान।
सार सूत्र: “जब मनुष्य स्वयं को शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना अनुभव करता है, तब पाँचों क्लेश स्वतः नष्ट हो जाते हैं और कैवल्य का प्रकाश प्रकट होता है।”
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पाँच क्लेशों से मुक्ति का मार्ग :
सयम और क्रियायोग।
* हृदय का शुद्धिकरण: जब हृदय की भावनाएँ शुद्ध होती हैं, तो 'राग' और 'द्वेष' शांत हो जाते हैं।
* बुद्धि का जागरण: जब बुद्धि जागृत होती है, तो 'अस्मिता' (झूठा अहंकार) गल जाता है।
* कैवल्य: जब ये पाँचों क्लेश मिट जाते हैं, तो साधक 'कैवल्य' (परम मुक्ति) की अवस्था में पहुँच जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि साक्षात् चैतन्य है।
"जब तक मन इन पाँच क्लेशों के प्रभाव में है, वह एक गंदे दर्पण की तरह है जिसमें ईश्वर का प्रतिबिंब साफ नहीं दिखता। क्रियायोग इस दर्पण को साफ करने की प्रक्रिया है।"- स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि
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• क्षिप्त — रजोगुणी, चंचल और इच्छाओं-क्रोध से व्याकुल मन।
• मूढ़ — तमोगुणी, आलस्य, अज्ञान और जड़ता से भरा मन।
• विक्षिप्त — कभी एकाग्र, कभी भटकता; साधना का प्रारम्भिक स्तर।
• एकाग्र — सत्त्वप्रधान, मन एक ध्येय पर स्थिर; समाधि का आरम्भ।
• निरुद्ध — चित्तवृत्तियों का पूर्ण शांत होना; कैवल्य या परम समाधि।
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श्री युक्तेश्वर जी का समाधान: क्रियायोग द्वारा प्राण को स्थिर कर मन को क्षिप्त-मूढ़ अवस्था से उठाकर एकाग्र और अंततः निरुद्ध अवस्था तक पहुँचाया जाता है। “चित्त का निरोध ही योग है; मन शांत होने पर आत्मा अपना वास्तविक स्वरूप देखती है।” —
* इन पाँच अवस्थाओं को जानकर हम अपनी साधना का आत्म-विश्लेषण (Self-analysis) कर सकते हैं।
* स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि जी ने 'द होली साइंस' में "हृदय के चार चरणों" (Four Stages of the Heart) का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है।
* चित्त की अवस्थाओं को बदलने के लिए हृदय का शुद्ध होना अनिवार्य है, क्योंकि जब तक हृदय में भावनात्मक गंदगी (मल) है, तब तक बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती।
* इन चार चरणों को पार करके ही एक साधक 'कैवल्य' या पूर्ण मुक्ति तक पहुँचता है:
चार चरण -
१. शुद्ध (Sudra/The Servant Stage): यह हृदय की वह प्राथमिक अवस्था है जहाँ व्यक्ति केवल अपनी भौतिक इंद्रियों और शरीर के सुखों की सेवा करता है।
(i) लक्षण: इस चरण में मनुष्य बाहरी दुनिया के आकर्षणों का दास होता है। उसका हृदय 'अंधकार' में होता है और वह केवल भौतिक लाभ-हानि को समझता है।
(ii) साधना: यहाँ व्यक्ति को केवल 'अनुशासन' और 'सेवा' के माध्यम से ऊपर उठने की प्रेरणा दी जाती है।
२. क्षत्रिय (Kshatriya/The Warrior Stage): जब साधक अपने भीतर के विकारों (काम, क्रोध, लोभ) से लड़ना शुरू करता है, तो वह 'क्षत्रिय' अवस्था में आता है।
(i) लक्षण: यहाँ हृदय में संघर्ष होता है। साधक अपनी बुरी आदतों को छोड़ने का प्रयास करता है। वह अब केवल शरीर नहीं, बल्कि 'ऊर्जा' और 'इच्छाशक्ति' के स्तर पर सक्रिय होता है।
(ii) साधना: यहाँ 'धैर्य' और 'साहस' की आवश्यकता होती है।
३. वैश्य (Vaisya/The Cultivator Stage): इस चरण में साधक आध्यात्मिक अनुभवों का "संग्रह" करना शुरू करता है।
(i) लक्षण: यहाँ हृदय अधिक सूक्ष्म हो जाता है। साधक यह समझने लगता है कि आंतरिक शांति और ईश्वरीय आनंद ही वास्तविक संपत्ति है। वह संसार और अध्यात्म के बीच तुलना करना सीख जाता है।
(ii) साधना: यहाँ 'एकाग्रता' और 'ज्ञान' का संचय मुख्य उद्देश्य होता है।
४. ब्राह्मण (Brahmin/The Knower Stage): यह हृदय की उच्चतम अवस्था है जहाँ साधक 'ब्रह्म' (परमात्मा) को जानने के योग्य हो जाता है।
(i) लक्षण: यहाँ हृदय के सारे विकार (राग-द्वेष) समाप्त हो जाते हैं। हृदय दर्पण की तरह स्वच्छ हो जाता है जिसमें परमात्मा का प्रकाश साफ़ दिखता है। यहाँ साधक को अनुभव होता है कि "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ)।
(ii) साधना: यहाँ केवल 'समर्पण' और 'समाधि' शेष रहती है।
श्री युक्तेश्वर जी का निष्कर्ष: * ये चार चरण जन्म आधारित 'जाति' नहीं हैं, बल्कि हृदय के विकास के स्तर हैं।
एक व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण हो सकता है, लेकिन यदि उसका हृदय केवल भौतिक सुखों में लगा है, तो वह आध्यात्मिक रूप से 'शुद्ध' (सेवक) स्तर पर ही है।
* "जब हृदय इन चार चरणों को पार कर लेता है, तब वह 'परमहंस' की अवस्था प्राप्त करता है—जहाँ संसार और ईश्वर का भेद मिट जाता है।" -स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि
Wednesday, 17 June 2026
क्रिया योग
सूत्र रूप संक्षेप :
क्रियायोग एवं कुण्डलिनी तत्त्व- *निर्माण सूत्र-शुक्र + अंडाणु → डिम्ब →
कशेरुकाएँ → सम्पूर्ण शरीर। *मूलाधार सूत्र- कंद के ऊपर स्वयम्भू लिंग स्थित; उसके
चारों ओर कुण्डलिनी शक्ति सर्पाकार लिपटी रहती है।
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चक्र
सिद्धांत-शरीर के शक्ति-बिंदु = चक्र; प्राण
वायु द्वारा अग्नितत्त्व मूलाधार से सहस्रार तक प्रवाहित होता है। *चक्र क्रम
एवं शक्ति-मूलाधार →
स्वाधिष्ठान → मणिपूर → अनाहत → विशुद्ध → आज्ञा → सहस्रार। *दल एवं सामर्थ्य :मूलाधार : 2
दल ,स्वाधिष्ठान : 4 दल ,मणिपूरक : 6 दल ,अनाहत : 8 दल ,आनंद/हृदय : 12 दल ,विशुद्ध : 16 दल।
*प्राण–अपान सिद्धांत-प्राण वायु शक्ति
को ऊपर उठाती है; अपान वायु स्थिरता और विस्तार देती है। *कोष निर्माण सूत्र-शक्ति–प्रकाश से
अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनंदमय कोष निर्मित होते हैं।
*क्रियायोग
परिभाषा-क्रियायोग = प्राण नियंत्रण द्वारा आत्म-साक्षात्कार की
वैज्ञानिक साधना। * लहडी महाशय का सिद्धांत-“श्वास शांत ⇒ मन स्थिर ⇒ ईश्वर में लय।” *योगानंद सिद्धांत- क्रियायोग =
चेतना-विकास का “विमान मार्ग”; रीढ़ के छह चक्रों में
प्राण संचरण। *क्रिया गणित-आधा
मिनट की एक क्रिया ≈ एक वर्ष का प्राकृतिक आध्यात्मिक
विकास। *सुषुम्ना नाड़ी सूत्र-रीढ़
की सूक्ष्म मध्य नाड़ी ही चेतना का राजमार्ग है। *हं-सौ साधना-“हं” (श्वास भीतर) + “सौ” (श्वास बाहर) = “मैं वही ब्रह्म हूँ।” *ओम् साधना-बाह्य इंद्रियों का निरोध → आंतरिक नाद श्रवण → ब्रह्मांडीय चेतना का अनुभव। *महामुद्रा
एवं ज्योति मुद्रामहामुद्रा →
क्रिया की तैयारी; ज्योति मुद्रा → आंतरिक प्रकाश का दर्शन। *ऊर्जा प्रवाह सिद्धांत- सामान्य ऊर्जा
बाहर बहती है; क्रियायोग उसे रीढ़ मार्ग से मस्तिष्क की
ओर मोड़ता है। *छः चेतना केंद्र: मूलाधार
(सुरक्षा), स्वाधिष्ठान (सृजन), मणिपूर
(शक्ति), अनाहत (प्रेम), विशुद्ध
(शांति), आज्ञा (अंतर्ज्ञान)। *कूटस्थ चैतन्य\आज्ञा
चक्र में नीला प्रकाश + स्वर्ण घेरा + श्वेत तारा = ईश्वरीय द्वार। *कर्म दहन सिद्धांत- चक्रों में संचित
संस्कार क्रियायोग से शीघ्र नष्ट होते हैं। *अंतिम लक्ष्य: प्राण स्थिरता → मन शून्यता →
आत्म-साक्षात्कार → ब्रह्मानुभूति।
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क्रियायोग एवं
चक्र - स्मरणीय सूत्र (Mnemonic)
1. चक्र क्रम याद रखने का सूत्र: “मू-स्व-मणि-अना-विशु-आज्ञा-सह” 2.
चक्रों के कार्य याद रखने का सूत्र- मूलाधार-सुरक्षा।
स्वाधिष्ठान-सृजन। मणिपूर-शक्ति।
अनाहत-प्रेम।
विशुद्ध-शांति। आज्ञा-अंतर्ज्ञान। सहस्रार-समाधि। (“सुर-सृ-श-प्रे-शां-अं-सम”) 3. दल
(पंखुड़ी) संख्या याद रखने का सूत्र- “2-4-6-8-12-16” याद सूत्र: “दो
चार छः आठ, बारह
सोलह ” । 4.
पंचकोष सूत्र- “अन्न-प्राण-मन-विज्ञान-आनंद” स्मरण सूत्र:“अप्रमविआ”(अ = अन्नमय, प्र = प्राणमय, म = मनोमय, वि = विज्ञानमय, आ = आनंदमय) । 5.
क्रियायोग का मूल सिद्धांत: “श्वास
शांत → मन शांत → ईश्वर प्राप्ति ” । 6.
हं-सौ साधना सूत्र; “हं
भीतर, सौ
बाहर” । “मैं
वही ब्रह्म हूँ।” 7.
ओम् साधना सूत्र: “नाद
से ब्रह्म तक” । 8.
प्राण यात्रा सूत्र: “मूल
से सहस्रार तक” । 9. योगानंद क्रिया गणित सूत्र: “आधा
मिनट क्रिया = एक वर्ष विकास” । 10.
कूटस्थ सूत्र-“नीला
प्रकाश + स्वर्ण घेरा + श्वेत तारा” ।11.
सम्पूर्ण क्रियायोग सूत्र- “प्राण
नियंत्रण → चक्र जागरण → कर्म दहन →
आत्मबोध” ।
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स्मरणीय सूत्र (Mnemonic)- बाबाजी, ज्ञानगंज और क्रियायोग । 1. गुरु-परंपरा सूत्र: “बा-ला-यो”- बा = महावतार बाबाजी, ला = लहड़ी महोदय , यो = परमहंश योगानंद, तात्पर्य : स्रोत-बा
→ सेतु-ला → विश्वदूत-यो 2.
बाबाजी का मिशन सूत्र- “गृहस्थ–विश्व–विज्ञान” । तात्पर्य : गृहस्थों हेतु योग । विश्वशांति हेतु प्रसार ।
वैज्ञानिक युग हेतु साधना । 3.
क्रियायोग प्रवाह सूत्र: “हिमालय → लाहिड़ी → संसार” 4. बाबाजी भविष्यवाणी सूत्र: “पूर्व का योग + पश्चिम का विज्ञान = विश्व संतुलन” । 5.
ज्ञानगंज सूत्र- “अदृश्य सिद्धभूमि” । सूत्र: “ज्ञा = ज्ञान, गंज = भंडार” = “ज्ञान का दिव्य भंडार” । 6.
स्वर्ण महल सूत्र- “इच्छा भोग → कर्म दहन → मुक्ति” । 7. पदार्थ-ऊर्जा
सिद्धांत-
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1. जीवन सूत्र- “काम में हाथ, ईश्वर में मन” = कर्मयोग + ध्यानयोग का संतुलन। 2.
गृहस्थ योग सूत्र- “घर
में योग, मन
में संयोग” । भाव
: गृहस्थ रहकर भी आत्मसाक्षात्कार संभव। 3.
“पेंशनर योगी”
सूत्र- “दफ्तर बाहर, ध्यान भीतर”
। 4. क्रियायोग
लोकतंत्र सूत्र- “योग सबके लिए”
। स्मरण सूत्र: “साधु नहीं, साधना जरूरी।” 5.
धर्मसमन्वय सूत्र- “धर्म अनेक, प्राण एक” । 6.
स्थितप्रज्ञ सूत्र- “खुली
आँखें, भीतर
समाधि” । (शाम्भवी
मुद्रा) । 7.
तनाव मुक्ति सूत्र- “शांत
श्वास = शांत तंत्रिका तंत्र = शांत मन”
। 8. चमत्कार सूत्र- “मन-विजय ही महाचमत्कार”
। 9. आसक्ति
त्याग सूत्र-“वस्तु
नहीं, आसक्ति
छोड़ो” ।.10. महासमाधि सूत्र- “मृत्यु नहीं, प्रकाश में विलय”
। 11. अंतिम योग क्रिया सूत्र-
“प्राण
ऊपर, चेतना
मुक्त” । 12.
तीन बार घूमने का सूत्र- “चक्र
जागरण→ ब्रह्मरंध्र प्रवेश”
। 13. गुरु
दर्शन सूत्र- “गुरु
शरीर से नहीं, चेतना
से जुड़े हैं” । 14.
क्रियायोग का अंतिम संदेश- “नियमित
क्रिया = निर्भय मृत्यु” । 15. सम्पूर्ण जीवन सूत्र-
“कर्तव्य
+ क्रिया + स्थिरत्व = मुक्ति” । 16.
लाहिड़ी महाशय का महावाक्य-“संसार
में रहो, पर
संसार को भीतर मत रहने दो।” 17.
सम्पूर्ण सार-सूत्र-“साधारण
जीवन, असाधारण
चेतना” ।
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"मृत्यु क्या है?
यह केवल उस प्रकाश में विलीन होना है ,जिससे हम आए
थे।" -लाहिड़ी
महाशय
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1. आध्यात्मिक
परंपरा का दृष्टिकोण: क्रियायोग और सिद्धयोग की
परंपरा में “महासमाधि”, “सूक्ष्म यात्रा”, “टेलिपैथिक
संचार”, “प्रकटीकरण” आदि को उच्च योग-सिद्धियाँ माना जाता
है। (i) गुरु-शिष्य
के बीच मानसिक संचार। (ii) समाधि में सूक्ष्म लोकों का अनुभव।
(iii) सिद्धाश्रम/ज्ञानगंज जैसी अवधारणाएँ । (iv) मृत्यु के बाद शरीर का लंबे समय तक सुरक्षित रहना।
2. योगिक
प्रतीकवाद की सम्भावना: कई विद्वान इन कथाओं को
प्रतीकात्मक या आंतरिक आध्यात्मिक अवस्थाओं का रूपक भी मानते हैं। उदाहरण: *“ज्ञानगंज” = चेतना की उच्च अवस्था ।
*“सूक्ष्म यात्रा” = गहन ध्यानावस्था में चेतना का
विस्तार । *“मानसिक
प्रसारण” = अत्यंत संवेदनशील अंतर्ज्ञान । *“प्रकटिकरण” =
साधक की चेतना में दिव्य अनुभूति ।
भारतीय योग परंपरा में
बाहरी घटना से अधिक महत्व “अनुभव” और “चेतना-परिवर्तन” है।
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