Wednesday, 11 March 2026

अन्य प्रमुख नास्तिक विचार धाराएं

(तीन) अन्य प्रमुख नास्तिक (अवैदिक) विचारधाराएँ : बुद्ध और महावीर के काल में प्रचलित अन्य महत्वपूर्ण विचार: (i) आजीवक संप्रदाय (मक्खलि गोशाल): * नियतिवाद: सब कुछ पहले से तय है। मनुष्य के कर्म का भाग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। **ऐतिहासिक साक्ष्य: मौर्य सम्राट बिंदुसार इसके अनुयायी थे; बराबर की गुफाएं इन्हीं के लिए बनी थीं। (ii) अज्ञान या अज्ञेयवाद (संजय बेलट्ठिपुत्त): मूल विचार: ईश्वर या मृत्यु के बाद के जीवन जैसे आध्यात्मिक प्रश्नों का निश्चित उत्तर जानना असंभव है। (iii) अक्रियवाद (पूरण कश्यप): * मूल विचार: कर्म का कोई फल नहीं होता। न पुण्य से लाभ होता है, न पाप से हानि। यह कर्म सिद्धांत का पूर्ण खंडन है। (iv) उच्छेदवाद / भौतिकवाद (अजित केशकंबली): मूल विचार: मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के साथ सब नष्ट हो जाता है। यह चार्वाक दर्शन का आधार बना। (V) अनिश्चयवाद (विक्षेपवाद): मूल विचार: किसी भी अंतिम सत्य पर पहुँचना संभव नहीं, इसलिए वाद-विवाद से बेहतर मौन रहना है।

निष्कर्ष : इन विचारधाराओं को मुख्यतः तीन वर्गों में रखा जा सकता है, आस्तिक, नास्तिक और अन्य अवैदिक धाराएँ। (i) आस्तिक दर्शनों ने वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के रूप में व्यवस्थित दार्शनिक परम्परा विकसित की। (ii) नास्तिक विचारधाराओं, विशेषतः चार्वाक या लोकायत ने प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हुए आत्मा, परलोक और कर्मफल का खंडन किया। (iii)  आजीवक, -नियतिवाद,अज्ञेयवाद, अक्रियवाद, उच्छेदवाद और अनिश्चयवाद जैसी अन्य विचारधाराएँ भी प्रचलित थीं, जिन्होंने नियति, ज्ञान, कर्म और जीवन-मरण के प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। (iv) स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही है, जहाँ एक ही मूल वैदिक पृष्ठभूमि से विविध दार्शनिक मतों का विकास हुआ और सत्य की खोज विभिन्न मार्गों से निरन्तर चलती रही।

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राष्ट्रीय 'स्व' और प्रतिबद्धता

 

राष्ट्रीय 'स्व' और प्रतिबद्धता

प्राचीन हो या नवीन, हम जिसको अपना रहे हैं वह हमारे राष्ट्रीय 'स्व' को आगे बढ़ाने में सहायक होना चाहिए, यही उस के ग्राह्य या अग्राह्य होने की कसौटी है। हमारी अनुसंधान-वृत्ति का काम है कि बह इस कसौटी का निरंतर उपयोग करे और हमारे द्वारा जिस का धनुकरण किया जा रहा है उस में से केवल उन्हीं तत्वों की स्वीकार करे जो हमारे राष्ट्रीय 'स्व' के लिये हितकर है और ऐसे तत्त्वों की सर्वथा त्याग दे जो देश-काल-पांत्रता के विचार से अहितकर सिद्ध हो रहे हों।

इस दृष्टि से निस्संदेह हमें अपने राष्ट्रीय ‘स्व’ से प्रतिबद्ध होना पड़ेगा और अपने अतीत तथा वर्तमान में ऐसे तत्त्वों का अनुसंधान करना पड़ेगा जो राष्ट्रीय ‘स्व’ को अमरता देने में अभी तक सहायक सिद्ध हुए हैं या आगे सिद्ध हो सकते हैं।

यह बात तीन प्रकार के लोगों को पसंद नहीं आयेगी। प्रथम तो वे बन्धु हैं, जिन्हें प्रतिबद्धता शब्द से ही चिढ़ है। दूसरे वे भाई हैं जो कहते हैं कि हमारा रराष्ट्रीय 'स्व' नाम की कोई वस्तु नहीं है और यदि है भी तो वह सर्वथा निन्य एवं त्याज्य है। तीसरे वे महानुभाव हैं, जो अंतर्रा-ष्ट्रीयता से प्रतिबद्ध हैं और इस लिए राष्ट्रीय 'स्व' से प्रतिबद्ध होने को वे एक संकीर्णता मानते हैं ।

इन सभी बन्धुओं से निवेदन है कि वे अपने दृष्टिकोण पर तनिक पुनर्विचार करें। क्या कभी यह संभव है कि याप सर्वथा अप्रतिवद्ध रह सकें ?

आप चाहे धर्म, सदाचार, शील, राष्ट्रीयता आदि से अप्रतिबद्ध होने का दावा करें, परन्तु निस्संदेह आप अपने 'स्व' से प्रतिबद्ध हैं, क्योंकि अन्यथा न आपको अपने तन की आवश्यकताओं का ज्ञान होता और न मन की - यहां तक कि आप अपने अप्रतिवद्धतावाद का आग्रह भी नहीं करते । वस्तुतः बच्चा अपने 'स्व' से प्रतिबद्ध हुआ ही जनमता है। जन्म से ही वह अपने तन-मन की 'भूख' मिटाने के लिए आतुर है और यह 'भूख' मिटाने के लिए उसे केवल मोजन ही नहीं चाहिए, अपितु वस्त्र, भाषा, विचार, भाव, श्राचार-व्यवहार भी चाहिए जो अपने परिवार, समाज या राष्ट्र के 'स्व' हो कर प्राप्त होते हैं। बच्चा पैदा होते हीराष्ट्र द्वारा प्रदत्त परिवेश से इंद्रिय-संनिकर्ष स्थापित करता है और उस के माध्यम से शनैः शनैः राष्ट्रीय 'स्व' से निरंतर प्रतिबद्ध होता जाता है।

‘संगम-साहित्य 1

 

मुझे साहित्यकारों के उस प्राचीन ‘संगम’ की याद आती है जिसकी स्मृति हमारी तमिल-परंपरा में अभी तक सुरक्षित है। 

कहा जाता है कि ई. पू. 9000 वर्ष से लेकर ईसवी संवत् की प्रारंभिक शताब्दियों तक कई संगमों में अनेक साहित्यकार एकत्र हुए । उन साहित्यकारों की रचनाओं का नमूना आज भी हमारे उस प्राचीन संग्रह में सुरक्षित है जिसे तमिल का ‘संगम-साहित्य’ कहते हैं। 

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित है, उन्हें तमिल परंपरा ‘अहम्’ और ‘इदम्’ नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैं, जो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक ‘संगम’ की याद दिलाते हैं, जिसमें व्यष्टि और समष्टि के साथ-साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उसको एक ‘भारतजन’ में परिणत करने वाली एक ऐसी ‘संगम-दृष्टि’ हमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय से, न केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थी, अपितु व्यष्टि एवं समष्टि के अन्तर्गत आने वाले देह और देही, स्त्री और पुरुष, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी, को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन ‘अहम्’ और ‘इदम्’ में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को ‘राष्ट्री’ तथा ‘संगमनी’ कहा गया है। यही हमारे बहुभाषा-भाषी भारतजन का ‘संगमन’ कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी ने, आसेतु हिमालय तक, इस महादेश को एक संस्कृति दी, एक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे ‘अद्भुत संगम’ का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकी, और न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

ऋग्वेद ने ‘संगच्छध्वं सवदध्वम्’ का जो महामंत्र इस राष्ट्र के कानों में फूंका था, वह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनों, आक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी ‘संगम’ जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

अनुकरण और अनुसंधान: आज हम उक्त भीतरी ‘संगम’ की सर्वथा उपेक्षा करके किसी न किसी बाह्य दिखावे की नकल करने में लगे हुए हैं। कुछ लोगों को नवीनता का मोह है, अतः बाहर से जो भी हवा चलती है, उसी के वे भक्त बन जाते है। विकासवाद हो या मार्क्सवाद, फायडवाद हो वा हिप्पीवाद, सभी का वे स्वागत करते हैं, आँख मूंदकर अनुकरण करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें प्राचीनता से मोह है। वे प्रत्येक नई धारा का बहिष्कार करते हैं और प्रत्येक पुरानी प्रथा का अंधानुकरण । वे लोग इस बात का भी विचार नहीं करते कि बाल-विवाह, छुआछूत जैसी कुप्रवृत्तियां, जो किसी परिस्थिति-विशेष में अपनाई गई थीं, आज की परि-स्थितियों में राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। इस प्रकार नवीनतावादी और परंपरावादी दोनों एकमात्र अनुकरण को ही राष्ट्र-रक्षा का अमोघ अस्त्र मान बैठे हैं।

वास्तविकता यह है कि अनुकरण एवं अनुसंधान नामक दोनों पैरों से मानव जाति प्रगति पथ पर बढ़ी है। अतः केवल अनुकरण से काम नहीं चलेगा । अनुकरणमात्र से मानव ‘सीताराम’ की रट लगाने वाला ‘तोता’ तो बन सकता है, परन्तु समस्त जग को ‘सियाराममय’ समझने बाला ‘तुलसी’ नहीं; ‘नकलची बंदर’ तो हो सकता है, परन्तु ‘जगदीश-चन्द्र बसु’ जैसा वैज्ञानिक नहीं। अनुकरण द्वारा प्राप्त ज्ञान तब तक प्रगति-विधायक नहीं हो सकता जब तक उस के साथ अनुसंधानवृत्ति भी संक्रिय न हो उठे, क्योंकि इस वृत्ति के बिना कोई बंदर नाई की नकल कर के छुरे से अपने को ही घायल कर सकता है ।

अनुकरण के साथ साथ देश, काल और पात्रता का विचार करने की प्रवृत्ति भी जागनी चाहिए, अन्यथा अनुकरण-जन्य ज्ञान हमारे भीतर ‘स्व’ का अंग नहीं बन सकता। देश, काल व पात्रता का विचार करने वाली प्रवृत्ति ही अनुसंधान-वृत्ति है। इसी के द्वारा कोई भी ज्ञान हमारे 'स्व' का अंग बनता है और हम आवश्यकतानुसार उस का उप-योग देश, काल और पात्र का विचार करते हुए विभिन्न ढंग से करने में समर्थ होते हैं।

साहित्य की विचारधारा प्रवोधन

 

साहित्य की विचारधारा

विषय व्यापक और गंभीर है । कुछ प्रश्न हैं , (i) भारतीय वांग्मय की विचारधाराएं ?  साहित्य की विचारधाराएं या हिंदी साहित्य की विचारधाराएं ? स्वतंत्रता के बाद के साहित्य की विचारधाराएं ? या स्वतंत्रता के पूर्व की विचारधाराएं ? (ii) साहित्य का काल-खंड कहाँ से देखा जाएं ? वैदिक काल से? रामायण को आधार बनाकर ? व्यास को, कालिदास या भवभूति को ? हिंदी साहित्य के काल विभाजन के आधार पर या दशकों के आधार पर ?

सृष्टि का स्वरूप : विचार कहाँ से आया ? किसको आया ? तब ध्यान श्रृष्टि की ओर जाता है ? तब वैदिक परम्परा कहती है , इसके प्रमाण में तीन ऋग्वेद के सूक्त मिलते हैं -

  (i) नासदीय सूक्त > (ऋग्वेद 10.129)सृष्टि से पहले की अद्वितीय रहस्यमय अवस्था – इस सूक्त में बताया गया है कि सृष्टि से पहले, *न सत् था, न असत्। **न आकाश था, न पृथ्वी। **केवल एक रहस्यमय सत्ता थी। उस समय क्या ढका हुआ था? कहाँ और किसके आश्रय में था? क्या वहाँ कोई गहरा और अगाध जल था? फिर काम (इच्छा) उत्पन्न हुई, जो सृष्टि का पहला बीज बनी। यह सूक्त सृष्टि के रहस्य पर दार्शनिक प्रश्न भी उठाता है। फिर क्या था तो उत्तर मिलता है ब्रह्म था ।

(ii) हिरण्यगर्भ सूक्त > (ऋग्वेद 10.121) – सृष्टि का प्रथम कारण यह (हिरण्यगर्भ सूक्त) का प्रथम मंत्र है। पूरा मंत्र इस प्रकार है- यह सूक्त सृष्टि के मूल कारण और परम सत्ता के बारे में गहन वैदिक चिंतन प्रस्तुत करता है। यहाँ कहा गया है कि प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ (स्वर्ण अंड/कॉस्मिक एम्ब्रियो) प्रकट हुआ। उसी से- *पृथ्वी और आकाश बने। ** सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति हुई। ***वही समस्त जगत का स्वामी है।

(iii) पुरुष सूक्त> (ऋग्वेद 10.90)  का मंत्र इस प्रकार है- उस विराट पुरुष (परमात्मा) के हजार सिर, हजार नेत्र और हजार चरण हैं। वह सम्पूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त करके उससे भी दस अंगुल ऊपर (अर्थात उससे परे) स्थित है। यह मंत्र विराट पुरुष (सर्वव्यापी ब्रह्म) की व्यापकता और सर्वव्यापक स्वरूप को प्रकट करता है। इसी एक महापुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष) से सम्पूर्ण सृष्टि बनी। उसके यज्ञ से- *देवता, प्राणी और प्रकृति बने। *समाज की चार वर्ण व्यवस्था का प्रतीकात्मक वर्णन भी मिलता है।

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अब प्रश्न उठाता है कि यह किसने किया ? उत्तर उसी विराट पुरुष ने / हिरण्यगर्भ या स्वर्ण पिंड ने या परम ब्रह्म ने ? फिर प्रश्न आया कि क्या ये  एक हैं ?  तब ऋग्वेद का ऋषि फिर कहता है , जी हाँ। कैसे ?

तो  ऋग्वेद (मण्डल 1, सूक्त 164, मंत्र 46) में कहा गया है- ज्ञानी लोग एक ही सत्य (परम तत्व) को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। कोई उसे इन्द्र, कोई मित्र, कोई वरुण, कोई अग्नि कहते हैं; उसी को कोई यम और कोई मातरिश्वा (वायु) कहता है।  यह वैदिक परम्परा का मूल दार्शनिक विचार माना जाता है कि ‘सृष्टि के पीछे एक ही परम सत्ता है’, भले ही उसे अलग-अलग रूपों में समझा जाए।* एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।

यह विचार किसे आया? वैदिक परम्परा के अनुसार यह विचार किसी एक मनुष्य द्वारा बनाया हुआ नहीं माना जाता। * वेद “अपौरुषेय” माने जाते हैं, अर्थात् वे किसी मनुष्य की रचना नहीं हैं। ** प्राचीन ऋषियों ने गहन ध्यान और तपस्या में इन सत्यताओं का “श्रवण” या “दर्शन” किया। **इसलिए उन्हें मन्त्रद्रष्टा ऋषि” कहा जाता है, रचयिता नहीं। उदाहरण के रूप में कई ऋषियों के नाम मिलते हैं, जैसे - ऋषि वशिष्ठ। ऋषि विश्वामित्र। ऋषि अत्रि। ऋषि भारद्वाज।    

संक्षेप में: वैदिक परम्परा का पहला विचार * “मैं एक हूँ अनेक होऊं” **‘एक परम सत्य ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति।’ इन तीनों सूक्तों को मिलाकर देखने पर वैदिक दर्शन यह बताता है कि-  (1) पहले अद्वैत अवस्था, फिर सृष्टि का मूल कारण, और अंत में जगत का विस्तार हुआ। (2) भारतीय साहित्य के मूल वैदिक विचार मैं एक हूँ, अनेक रूपों में प्रकट हो जाऊँ।”

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अब आइये विचारधारा पर विचार करें -

पहली विचारधारा है? * “भारतीय साहित्य के विचारधारा का आधार है (i)  विचार को पूर्णता में देखना! ”  वह (परमात्मा) पूर्ण है, यह (जगत) भी पूर्ण है। उस पूर्ण से यह पूर्ण उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। (ii) संपूर्ण विश्व उसी एक परम सत्य की अभिव्यक्ति है। “मैं एक हूँ अनेक होऊं” ।

  सृष्टि की रचना से साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है । भारतीय साहित्य ने काल का अध्ययन किया और काल को खंड -खंड में नहीं पूर्णता में पाया और ऋषियों ने कहा, * यह भारतीय साहित्य के विचारधारा का आधार है ।* सृष्टि की रचना से साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है । हम जैसे काल को पूर्णता में देखते हैं, उसी तरह प्रकृति और पुरुष को भी पूर्णता में देखते हैं । यह प्रकृति और पुरुष इस संसृति का कारक है ।

यहाँ से विचारधाराओं का जन्म होता है - भारतीय वाङ्मय की मुख्य विचारधाराओं को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है: आस्तिक , नास्तिक और अन्य ।

(1) आस्तिक- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त । 

(2) नास्तिक विचार धाराएं (वेदों की सत्ता को न मानने वाली): चार्वाक, बार्हस्पत्य (लोकायत)- (i) प्रत्यक्षमेव प्रमाणम् । (ii) देहवाद (iii) स्वभाववाद । (iv) परलोक खंडन  

    (3) अन्य प्रमुख नास्तिक (अवैदिक) विचारधाराएँ : बुद्ध और महावीर के काल में प्रचलित अन्य महत्वपूर्ण विचार: (i) आजीवक संप्रदाय -नियतिवाद । (ii) अज्ञान या अज्ञेयवाद । (iii) अक्रियवाद(iv) उच्छेदवाद / भौतिकवाद (V) अनिश्चयवाद (विक्षेपवाद)

निष्कर्ष : इन विचारधाराओं को मुख्यतः तीन वर्गों में रखा जा सकता है, आस्तिक, नास्तिक और अन्य अवैदिक धाराएँ। (i) आस्तिक दर्शनों ने वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार किया । (ii) नास्तिक विचारधाराओं ने आत्मा, परलोक और कर्मफल का खंडन किया। (iii)  आजीवक, अज्ञेयवाद, अक्रियवाद, उच्छेदवाद और अनिश्चयवाद जैसी अन्य विचारधाराओं ने नियति, ज्ञान, कर्म और जीवन-मरण के प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।

तात्पर्य भारतीय चिंतन परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही है, जहाँ एक ही मूल वैदिक पृष्ठभूमि से विविध दार्शनिक मतों का विकास हुआ और सत्य की खोज विभिन्न मार्गों से निरन्तर चलती रही।

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इस पर आगे बात करने के पूर्व संस्कृत बांग्मय से तमिल की ओर चलते हैं, क्योंकि वह भी भारतीय साहित्य की विचारधार है -

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 नास्तिक विचार धाराएं (वेदों की सत्ता को न मानने वाली): चार्वाक, बार्हस्पत्य (लोकायत)- (i) प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्-  चार्वाक दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष (इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान) ही एकमात्र प्रमाण है। अनुमान, उपमान या शब्द को वे प्रमाण नहीं मानते। (ii) देहवाद- चार्वाक के अनुसार देह ही आत्मा है शरीर से अलग कोई स्वतंत्र आत्मा नहीं मानी जाती। चेतना शरीर के तत्त्वों के संयोजन से उत्पन्न होती है। (iii) स्वभाववाद- संसार की उत्पत्ति और क्रियाएँ स्वभाव (प्राकृतिक गुणों) से होती हैं। किसी ईश्वर या अलौकिक शक्ति की आवश्यकता नहीं मानी जाती। (iv) परलोक खंडन- चार्वाक दर्शन परलोक, स्वर्ग-नरक और पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं करता। उनके अनुसार मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता। ।  निष्कर्ष: :ये सिद्धान्त भौतिकवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं, इसलिए इन्हें चार्वाक या लोकायत दर्शन का मूल आधार माना जाता है।‘लोकायत’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह केवल इसी ‘लोक’ (संसार) की सत्ता मानता है और जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय रहा।         

(3) अन्य प्रमुख नास्तिक (अवैदिक) विचारधाराएँ : बुद्ध और महावीर के काल में प्रचलित अन्य महत्वपूर्ण विचार: (i) आजीवक संप्रदाय (मक्खलि गोशाल): * नियतिवाद: सब कुछ पहले से तय है। मनुष्य के कर्म का भाग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। **ऐतिहासिक साक्ष्य: मौर्य सम्राट बिंदुसार इसके अनुयायी थे; बराबर की गुफाएं इन्हीं के लिए बनी थीं। (ii) अज्ञान या अज्ञेयवाद (संजय बेलट्ठिपुत्त): मूल विचार: ईश्वर या मृत्यु के बाद के जीवन जैसे आध्यात्मिक प्रश्नों का निश्चित उत्तर जानना असंभव है। (iii) अक्रियवाद (पूरण कश्यप): * मूल विचार: कर्म का कोई फल नहीं होता। न पुण्य से लाभ होता है, न पाप से हानि। यह कर्म सिद्धांत का पूर्ण खंडन है। (iv) उच्छेदवाद / भौतिकवाद (अजित केशकंबली): मूल विचार: मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के साथ सब नष्ट हो जाता है। यह चार्वाक दर्शन का आधार बना। (V) अनिश्चयवाद (विक्षेपवाद): मूल विचार: किसी भी अंतिम सत्य पर पहुँचना संभव नहीं, इसलिए वाद-विवाद से बेहतर मौन रहना है।

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माना जाता है कि ई. पू. 9000 वर्ष से (जब आस्तिक और नास्तिक के चार्वाक-लोकायत विचार धाराए तो थी , किन्तु बौद्ध और जैन का अस्तित्व नहीं था) लेकर ईसवी संवत् की प्रारंभिक शताब्दियों तक कई संगमों में अनेक साहित्यकार एकत्र हुए । उन साहित्यकारों की रचनाओं का नमूना आज भी हमारे उस प्राचीन संग्रह में सुरक्षित है जिसे तमिल का ‘संगम-साहित्य’ कहते हैं।

 संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित है, उन्हें तमिल परंपरा ‘अहम्’ और ‘इदम्’ कहते हैं । अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैं, जो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक ‘संगम’ की याद दिलाते हैं, जिसमें व्यष्टि और समष्टि के साथ-साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

 अब पूर्णता और समग्रता में विचारधाराओं के देंखे –

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषा-भाषी तथा नाना-धर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उसको एक ‘भारतजन’ में परिणत करने वाली एक ऐसी ‘संगम-दृष्टि’ हमारे पास थी जो ‘अहम्’ एवं ‘इदम्’ (अर्थात् व्यष्टि और समष्टि) के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय से, न केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थी, अपितु व्यष्टि एवं समष्टि के अन्तर्गत आने वाले देह और देही, स्त्री और पुरुष, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर अपेक्षित / अनपेक्षित उन सभी प्रश्नों पर भी विचार करती थी, जो युगों -योगों से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते चले आ रहे हैं।

जिस तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन ‘अहम्’ और ‘इदम्’ में हुआ उसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है। यहाँ एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि वह विचार ‘एकोह्म बहुश्याम:’ काल निरपेक्ष चलता आ रहा है ।

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को ‘राष्ट्री’ तथा ‘संगमनी’ कहा गया है। यही हमारे बहुभाषा-भाषी भारतजन का ‘संगमन’ कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई।

 और इसी ने, आसेतु हिमालय तक, इस महादेश को एक संस्कृति दी, एक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे ‘अद्भुत संगम’ का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकी, और न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

ऋग्वेद ने ‘संगच्छध्वं सवदध्वम्’ का जो महामंत्र इस राष्ट्र के कानों में फूंका था, वह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनों, आक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी ‘संगम’ जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

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  आज हम उक्त भीतरी ‘संगम’ की सर्वथा उपेक्षा करके किसी न किसी बाह्य दिखावे की नकल करने में लगे हुए हैं। कुछ लोगों को नवीनता का मोह है, अतः बाहर से जो भी हवा चलती है, उसीके वे भक्त बन जाते है। विकासवाद हो या मार्क्सवाद, फ्रायडवाद हो वा हिप्पीवाद, सभी का वे स्वागत करते हैं, आँख मूंदकर अनुकरण करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें प्राचीनता से मोह है।

          दूसरी ओर वे प्रत्येक नई धारा का बहिष्कार करते हैं और प्रत्येक पुरानी प्रथा का अंधानुकरण । इस प्रकार नवीनतावादी और परंपरावादी दोनों एकमात्र अनुकरण को ही राष्ट्र-रक्षा का अमोघ अस्त्र मान बैठे हैं। आज की परिस्थितियों में राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं।

वास्तविकता यह है कि अनुकरण एवं अनुसंधान हमारे विचारधारों के दो पैर रहे है । चाहे वैदिक परम्परा हो या तमिल संगम,   दोनों पैरों से मानव जाति प्रगति पथ पर बढ़ी है। अतः केवल अनुकरण से काम नहीं चलेगा । अनुकरणमात्र से मानव सरोवर के पास बैठ कर ‘पानी -पानी ’ की रट लगाने वाला ‘तोता’ तो बन सकता है, परन्तु न तो अपनी प्यास बुझा सकत औत न लोक की । वह विज्ञान कि तरह साहित्य का ‘नकलची बंदर’ तो हो सकता है, परन्तु  न तो ‘जगदीश-चन्द्र बसु’ जैसा वैज्ञानिक बन सकता औत न बाल्मीकि, व्यास, कालिदास । अनुकरण द्वारा प्राप्त ज्ञान तब तक प्रगति में साधक नहीं हो सकता जब तक उस के साथ अनुसंधानवृत्ति भी संक्रिय न हो उठे, क्योंकि इस वृत्ति के बिना कोई बंदर नाई की नकल करके छुरे से अपने को ही घायल कर सकता है । दूसरा विचारधाराओं का अनुकरण यदि बिना देश काल औत पात्रता के आधार पर ग्रहण किया तो वह अनुकरण-जन्य ज्ञान हमारे भीतर ‘स्व’ का अंग नहीं बन सकता।

 इस दृष्टि से निस्संदेह हमें अपने राष्ट्रीय ‘स्व’ से प्रतिबद्ध होना पड़ेगा और अपने अतीत तथा वर्तमान में ऐसे तत्त्वों का अनुसंधान करना पड़ेगा जो राष्ट्रीय ‘स्व’ को अमरता देने में अभी तक सहायक सिद्ध हुए हैं या आगे सिद्ध हो सकते हैं।

आप चाहे धर्म, सदाचार, शील, राष्ट्रीयता आदि से अप्रतिबद्ध होने का दावा करें, परन्तु निस्संदेह आप अपने ‘स्व’ से प्रतिबद्ध हैं, क्योंकि अन्यथा न आपको अपने तन की आवश्यकताओं का ज्ञान होता और न मन की - यहां तक कि आप अपने अप्रतिवद्धतावाद का आग्रह भी नहीं करते । वस्तुतः बच्चा अपने 'स्व' से प्रतिबद्ध हुआ ही जनमता है। जन्म से ही वह अपने तन-मन की ‘भूख’ मिटाने के लिए आतुर है और यह ‘भूख’ मिटाने के लिए उसे केवल मोजन ही नहीं चाहिए, अपितु वस्त्र, भाषा, विचार, भाव, श्राचार-व्यवहार भी चाहिए जो अपने परिवार, समाज या राष्ट्र के 'स्व' हो कर प्राप्त होते हैं। बच्चा पैदा होते हीराष्ट्र द्वारा प्रदत्त परिवेश से इंद्रिय-संनिकर्ष स्थापित करता है और उस के माध्यम से शनैः शनैः राष्ट्रीय ‘स्व’ से निरंतर प्रतिबद्ध होता जाता है।

“विकासमान देश को अपने वर्तमान में स्वाभिमान से खड़े होने के लिए आवश्यक है कि वह अपना पिछला कदम दबा कर और अगले कदम को सम्भाल कर रखे। इस लिए प्रज्ञावान एवं प्रतिभाशाली लेखकों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वे भारतीय जन मानस में आलस्य व अधार्मिक वैरुप्य तथा आत्मग्लानि के स्थान पर प्रकाश की ज्योति उद्दीप्त करने में ही अपनी कलम का प्रयोग करेंगे।” - गोविन्द शंकर कुरुप- (मलयालम साहित्य के प्रमुख कवि)

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प्रथम विचार , विचारधारों के आधार , उत्तर दक्षिण के साहित्य की विचारधारों के संगमनी दृष्टि को वर्तमान परिप्रेक्ष में समझे -

 आस्तिक नास्तिक और बौद्ध , जैन औत संगमनी दृष्टि को  में से –

          पहले आस्तिक और संगमनी दृष्टि को समझे - तीन वर्गों में रखा जा सकता है, - आस्तिक से मुख्य तीन धाराएं निकलती हैं - आध्यात्मिक> सांस्कृतिक > राष्ट्रीय विचारधाराएं -  यह विचारधारा (आस्तिक दर्शनों ने) वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हुए सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के रूप में व्यवस्थित दार्शनिक परम्परा विकसित की।

(एक)  आध्यात्मिक (वेदान्त का प्रभाव)-  अद्वैत वेदान्त में प्रतिपादित ब्रह्म–आत्मा की एकता (सर्वात्मभाव) का प्रभाव आधुनिक हिंदी साहित्य के अनेक कवियों, लेखकों और आलोचकों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस विचार के अनुसार समस्त सृष्टि एक ही परम सत्ता (ब्रह्म) की अभिव्यक्ति है और आत्मा उसी का अंश है। हिंदी साहित्य में यह भावना एकात्मता, विश्व बंधुत्व, आत्मचेतना और आध्यात्मिक अनुभव के रूप में व्यक्त हुई है। प्रमुख साहित्यकारों पर इसका प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है- (1) भारतेंदु हरिश्चंद्र: रचना: भारत दुर्दशा- भारतेंदु के साहित्य में भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का प्रभाव दिखाई देता है। उनकी दृष्टि में समस्त समाज एक ही सांस्कृतिक चेतना का अंग है। यह विचार वेदान्त के सर्वात्मभाव से जुड़ा हुआ है। उनके लेखन में भारतीय संस्कृति की एकात्म दृष्टि दिखाई देती है। (2) महावीर प्रसाद द्विवेदी: रचना: कविता क्या है- द्विवेदी जी ने साहित्य को मानवता और नैतिक चेतना से जोड़ा। उनके विचारों में मनुष्य और समाज की एकता पर बल मिलता है, जो वेदान्तीय दृष्टि से जुड़ा है। वे साहित्य को मानव के आंतरिक विकास का साधन मानते थे। (3) मैथिलीशरण गुप्त:रचना: साकेत- गुप्त जी के काव्य में भारतीय दर्शन का प्रभाव स्पष्ट है। साकेत में राम का चरित्र मानव और ईश्वर के बीच एकात्म संबंध का प्रतीक है। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।” वेदान्त के स्वरूप को व्यक्त करती है। (4) जयशंकर प्रसाद- रचना: कामायनी- प्रसाद की काव्य-दृष्टि में अद्वैत वेदान्त का गहरा प्रभाव है। * कामायनी में मनुष्य के भीतर स्थित अनन्त चेतना का विचार मिलता है। *यह अद्वैत वेदान्त के ब्रह्म–आत्मा एकता के सिद्धान्त से संबंधित है। कामायनी में मनु और श्रद्धा के माध्यम से मनुष्य की आत्मचेतना और ब्रह्म से एकात्मता की भावना व्यक्त होती है। प्रसाद की दार्शनिक दृष्टि में मनुष्य, प्रकृति और ब्रह्म की एकता का भाव दिखाई देता है। (5) सुमित्रानंदन पंत: रचनाएँ: चिदम्बरा, लोकायतन-पंत के काव्य में वेदान्त का चेतनावाद और सर्वात्मभाव प्रमुख है। चिदम्बरा में उन्होंने ब्रह्म को सर्वव्यापी चेतना के रूप में स्वीकार किया। प्रकृति और मनुष्य के बीच अद्वैत संबंध को उन्होंने बार-बार व्यक्त किया। इनके काव्य में सर्वव्यापी चेतना और प्रकृति–मानव की एकता का भाव मिलता है। यह वेदान्त के सर्वात्मवाद से प्रेरित है।   (6) महादेवी वर्मा: रचना: यामा-महादेवी के काव्य में आत्मा और परमात्मा के मिलन की रहस्यवादी अनुभूति मिलती है। उनकी कविताओं में एक ऐसी अनन्त सत्ता की खोज है जो वेदान्तीय ब्रह्म की याद दिलाती है। उनकी संवेदना में आत्मा का परम सत्य से मिलन ही जीवन का लक्ष्य प्रतीत होता है। (7) सूर्यकांत त्रिपाठी निराला: रचनाएँ: राम की शक्ति पूजा, अनामिका-निराला की रचनाओं में अद्वैत की मानवतावादी व्याख्या दिखाई देती है। राम की शक्ति पूजा में शक्ति और चेतना का जो स्वरूप है, वह ब्रह्म की सार्वभौमिक शक्ति का रूप है। उनके काव्य में मनुष्य की आत्मशक्ति को ब्रह्म की शक्ति से जोड़ा गया है। यह वेदान्त के एक ही परम चेतना के विचार से संबंधित है। (8) प्रेमचंद: रचना: गोदान-  में सामाजिक यथार्थ के साथ मानव-एकता और करुणा की भावना मिलती है। गोदान में होरी का चरित्र यह दिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य मानवीय संवेदना में है।  (9) अज्ञेय: रचना: शेखर: एक जीवनी- शेखर: एक जीवनी में व्यक्ति अपने अस्तित्व के गहरे सत्य को खोजता है, जो वेदान्तीय आत्मचेतना से जुड़ा है। उनकी कविता और कथा साहित्य में अस्तित्व और चेतना की एकता का विचार मिलता है। (10) रामचंद्र शुक्ल (आलोचक): रचना: हिंदी साहित्य का इतिहास- शुक्ल जी ने भारतीय साहित्य की परम्परा में आध्यात्मिक और दार्शनिक चेतना को महत्त्व दिया। वेदान्तीय दृष्टि से उन्होंने साहित्य में मानवता और व्यापक चेतना के तत्व को रेखांकित किया।   इस प्रभाव के कारण साहित्य में मानव-एकता, आत्मचेतना, विश्वबंधुत्व और आध्यात्मिक मानवतावाद की भावना प्रकट होती है।  (11) रामविलास शर्मा:  निराला की साहित्य साधना- रामविलास शर्मा ने भारतीय दर्शन और साहित्य के संबंध पर गहरा विचार किया। उन्होंने निराला और भारतीय परम्परा की व्याख्या करते हुए भारतीय दार्शनिक चेतना को रेखांकित किया। उनके आलोचनात्मक लेखन में भारतीय ज्ञान परम्परा और वेदान्त की पृष्ठभूमि दिखाई देती है। (12) गजानन माधव मुक्तिबोध:   अँधेरे में- मुक्तिबोध की कविता में आत्मान्वेषण और चेतना की गहराई प्रमुख है। अँधेरे में कविता में कवि आत्मा के भीतर छिपे सत्य को खोजता है।  

निष्कर्ष: हिंदी साहित्य में वेदान्त का प्रभाव केवल आध्यात्मिक काव्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रयता, मानवता और आलोचनात्मक साहित्य में भी दिखाई देता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर गजानन माधव मुक्तिबोध तक अनेक साहित्यकारों ने अपने-अपने ढंग से आत्मचेतना, मानव-एकता और सार्वभौमिक चेतना के विचार को व्यक्त किया।  मीमांसा का प्रभाव: मीमांसा के कर्म और कर्तव्य के सिद्धांत का प्रभाव - रामधारी सिंह दिनकर की कृति कुरुक्षेत्र में कर्म, धर्म और कर्तव्य का गहन विवेचन मिलता है। इस प्रकार आस्तिक दर्शनों ने आधुनिक हिंदी साहित्य को आध्यात्मिक गहराई, नैतिक चेतना, प्रकृति–मानव संबंध और आत्मचिन्तन की समृद्ध परंपरा प्रदान की, जिसके कारण साहित्य केवल मनोरंजन न रहकर जीवन-दर्शन का माध्यम बन गया।

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(दो) वैदिक एवं दार्शनिक विचारधारा (पुनर्जागरण काल): हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण काल सामान्यतः 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक माना जाता है।  

“क्या भारत के संदर्भ में ‘पुनर्जागरण’ शब्द की कोई सार्थकता है भी, क्योंकि भारत तो सदा-सर्वदा जाग्रत रहा है और उसे पुनर्जागरण की तो कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी।” - जेम्स एच० कजेन्स (एक आयरिश )

 

19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय वाङ्मय की प्राचीन जड़ों की ओर लौटने का आह्वान हुआ। (i) आर्य समाज और दयानंद सरस्वती: इन्होंने ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया। इसका प्रभाव भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग पर स्पष्ट दिखता है। साहित्य में अंधविश्वास का विरोध और तर्कसंगत वैदिक मूल्यों की स्थापना हुई।  (ii) अद्वैत वेदांत और रामकृष्ण-विवेकानंद: स्वामी विवेकानंद के विचारों ने साहित्यकारों में ‘आत्मगौरव’ और ‘राष्ट्रीयता’ का भाव भरा। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य में वेदांत का ‘अद्वैत’ तत्व (मनुष्य और ईश्वर की एकता) स्पष्ट झलकता है।  (iii)  अनेक दक्षिण भारतीय साहित्यकारों ने भारतीय वाङ्मय, वेद, उपनिषद् और भक्ति परम्परा की ओर लौटने का आह्वान किया। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं- * सुब्रमणम भारती  (तमिल):भारती ने अपनी कविताओं में वेदों, उपनिषदों और भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का गौरव गाया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और राष्ट्रवाद को जोड़ते हुए प्राचीन वैदिक आदर्शों की पुनर्स्थापना का आह्वान किया। उनकी कविताओं में आध्यात्मिक स्वतंत्रता और मानव समानता का संदेश मिलता है। ** बंकिमचन्द्र  का प्रभाव दक्षिण भारत में: यद्यपि वे बंगाल के थे, पर उनकी रचनाएँ दक्षिण भारत के साहित्यकारों को भी प्रेरित करती रहीं। “वन्दे मातरम्” के माध्यम से उन्होंने भारतमाता और वैदिक-पौराणिक परम्परा की महिमा का पुनरुत्थान किया, जिसका प्रभाव तमिल, तेलुगु और कन्नड़ लेखकों पर पड़ा।  *** श्री अर्विन्दों (पुदुचेरी से सम्बद्ध): उन्होंने वेदों और उपनिषदों की आधुनिक व्याख्या की। उनकी कृतियाँ जैसे The Life Divine और Essays on the Gita में भारतीय दार्शनिक परम्परा को आधुनिक दृष्टि से पुनर्जीवित करने का प्रयास मिलता है। * तेलुगु साहित्य से – *कन्द्कुरी वीरेसालिंगम - समाज सुधार के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक परम्परा और शास्त्रीय ज्ञान की पुनर्स्थापना का प्रयास किया।  **यू एस स्वामीनाथन ऐय्यर - इन्होंने प्राचीन तमिल ग्रंथों को खोजकर प्रकाशित किया और दक्षिण भारत की प्राचीन साहित्यिक परम्परा को पुनर्जीवित किया। ***विश्वनाथ सत्यानारायाना - इनकी रचनाओं में पुराण, वेद और भारतीय दार्शनिक दृष्टि का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। ** कन्नड़ साहित्य- *कुप्पालि वेंकटप्पा पुत्ताप्पा : कुवेम्पु ने अपनी रचनाओं में भारतीय आध्यात्मिक परम्परा, वेद-उपनिषद के विचार और मानवतावाद को महत्व दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़े साहित्य के निर्माण पर बल दिया। **डी .ह्वी. गुंडप्पा - उनकी कृति मंकुतिम्मना कग्गा में उपनिषद और भारतीय दर्शन की गहन झलक मिलती है।  मलयालम साहित्य- *कुमारन असन उनकी कविताओं में आध्यात्मिकता, वेदान्त और सामाजिक समता का विचार मिलता है। वल्लाथोल नारायनाना मेनन -उन्होंने भारतीय संस्कृति, पुराण और संस्कृत परम्परा को अपने काव्य में पुनर्जीवित किया।

  (तीन) सांस्कृतिक एवं मानवतावादी विचारधारा: पूज्य श्रीगुरुजी कहते थे , “पश्चिम का मानवतावाद आत्मकेंद्रित है । किन्तु हिन्दू मानवतावाद कि स्थिति भिन्न है ।वह तो परम सत्य की उस अनुभूति से उपजा है कि “समूचा ब्रह्माण्ड अखंड इकाई है । यह विचारधारा मध्यकालीन भक्ति और आधुनिक नैतिकता का मिश्रण थी। (i) गांधीवाद : वस्तुतः जिसे हम गांधीवाद कहते हैं वह वैदिक विचारधाराओं के कुछ अंशों का आग्रह है - यथा, सत्य , अहिंसा, अपरिग्रह आदि। यह वैसा ही है जैसे - कठोपनिषद् (प्रथम अध्याय, तृतीय वल्ली, श्लोक 14) का प्रसिद्ध मंत्र स्वामी विवेकानंद ने इसे ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए’ के रूप में लोकप्रिय बनाया था।

मूल संस्कृत श्लोक है, “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ (उत्तिष्ठत: उठो -मोह-रूपी निद्रा से।,जाग्रत: जागो -अज्ञान के अंधकार से बाहर आओ। प्राप्य वरान्निबोधत: श्रेष्ठ महापुरुषों (गुरुओं) के पास जाकर उस परम ज्ञान को प्राप्त करो। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया: यह मार्ग छुरे की पैनी धार के समान कठिन है। दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति: बुद्धिमान लोग इस आत्मज्ञान के मार्ग को अत्यंत दुर्गम (कठिन) बताते हैं।)

यथार्थ तो यह है की गांधीवाद कोई वाद या विचारधारा नहीं है यह वैदिक अनुभूतिओं को जीवन में उतारने का  सन्देश है ।  स्वतंत्रता के पूर्व के साहित्य (प्रेमचंद युग) पर इसका सबसे गहरा प्रभाव था। सत्य, अहिंसा, हृदय-परिवर्तन और अछूतोद्धार जैसे विषयों को प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों (जैसे गोदान, रंगभूमि) में पिरोया। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ और’भारत-भारती’ भी इन मूल्यों से ओत-प्रोत हैं। अब इसे भारतीय दृष्टि जिसे सम्पूर्णता की दृष्टि कहते है तो यहाँ प्रेमचंद आप को वैदिक विचार के अनुगामी दिखाते हैं या मार्क्सवाद /प्रगतिवाद के ? (ii) रवींद्रनाथ टैगोर का मानवतावाद: टैगोर के ‘विश्व-मानव’ और ‘प्रकृति-प्रेम’ के विचार ने छायावाद को जन्म देने में बड़ी भूमिका निभाई। यहाँ व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों को प्रधानता दी गई। किन्तु चिंतन का पक्ष यह है कि क्या यह भी रवींद्रनाथ टैगोर का कोई नया मानवतावाद है ? क्या हमें यहाँ ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ वैदिक विचारधारा नहीं है। (iii) भक्ति कालीन पुनरुत्थान: साहित्यकारों ने तुलसी और कबीर के सामाजिक समरसता वाले विचारों को आधुनिक संदर्भ में फिर से परिभाषित किया।

यहाँ आस्तिक को छोड़ते हैं।

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अब नास्तिक औत भौतिक विचारधाराओं को जिन्हें राजनीतिक , आर्थिक विचारधारा कहना ही उचित होगा को समझे –( नोट : पहली एवं दूसरी को संतातन विचारधारा कहा गया जबकि तीसरी को राजनीतिक, आर्थिक विचारधारा माना जा सकता है ।)

(i) नास्तिक विचारधाराएं - विशेषतः चार्वाक या लोकायत ने प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हुए आत्मा, परलोक और कर्मफल का खंडन किया।  इनसे भौतिक एवं बौधिक विचारधाराएँ जन्मी। (ii) भौतिक एवं राजनीतिक विचारधाराएँ - आजीवक, अज्ञेयवाद, अक्रियवाद, उच्छेदवाद और अनिश्चयवाद जैसी अन्य विचारधाराएँ भी प्रचलित थीं, जिन्होंने नियति, ज्ञान, कर्म और जीवन-मरण के प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। (iv)  स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परम्परा अत्यन्त व्यापक और उदार रही है, जहाँ एक ही मूल वैदिक पृष्ठभूमि से विविध दार्शनिक मतों का विकास हुआ और सत्य की खोज विभिन्न मार्गों से निरन्तर चलती रही।  

 

 

1. साहित्य प्रभाव (1850 - 1947)-  (एक)- (i) भारतेंदु युग> नवजागरण, राष्ट्रवाद> देश-दशा का वर्णन, कुरीतियों का विरोध।(ii) द्विवेदी युग: आदर्शवाद, नैतिकता, वैदिक गौरव> भाषा परिमार्जन, देशभक्ति, पौराणिक आख्यान।(iii) छायावाद> अध्यात्म, मानवतावाद, व्यक्तिवाद> प्रकृति का मानवीकरण, सूक्ष्म अनुभूतियाँ। (iv) प्रगतिवाद>  किसान-मजदूर की व्यथा, सामाजिक क्रांति। (v) प्रयोगवाद > व्यक्तिवाद, मनोविश्लेषण > नए प्रतीक, नए बिंब और निजी कुंठाओं की अभिव्यक्ति।  

2. स्वतंत्रता के तुरंत बाद का दौर (1947 - 1960): इस काल में उत्साह और मोहभंग का मिला-जुला असर था। समाजवाद और प्रगतिवाद: नेहरूवादी समाजवाद का प्रभाव साहित्य पर गहरा था। 'योजनाबद्ध विकास' और 'नए भारत' के निर्माण की ललक साहित्य में दिखी। यशपाल और भीष्म साहनी जैसे लेखकों ने सामाजिक विषमता पर प्रहार जारी रखा।** प्रयोगवाद और नई कविता: अज्ञेय के नेतृत्व में ‘तार सप्तक’ के माध्यम से कविता ने व्यक्ति की निजता और मध्यमवर्गीय जीवन के अंतर्विरोधों को स्वर दिया। यहाँ समाज से ज्यादा 'व्यक्ति के सत्य' को महत्व मिला।*** आंचलिकता फणीश्वरनाथ 'रेणु' के उपन्यास मैला आँचल ने साहित्य का ध्यान महानगरों से हटाकर धूल-धूसरित गाँवों की ओर मोड़ा। यह अपनी जड़ों को खोजने की एक नई विचारधारा थी। 2. मोहभंग और आक्रोश का दौर

3. (1960 - 1990): युद्ध (1962, 1965, 1971), आपातकाल   और बेरोजगारी ने साहित्य में एक तीखा स्वर पैदा किया।*अकविता और साठोत्तरी कविता: व्यवस्था के प्रति गहरा आक्रोश और मोहभंग इस दौर की पहचान थी। धूमिल (सुदामा पांडेय) की कविताएँ "संसद से सड़क तक" इसी कड़वे यथार्थ को दर्शाती हैं।*नई कहानी आंदोलन: मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव ने शहरी जीवन की ऊब, अकेलेपन और रिश्तों के टूटने को अपनी कहानियों का केंद्र बनाया।*जनवादी विचारधारा: 1970 के दशक में मार्क्सवाद का एक नया रूप 'जनवाद' के रूप में उभरा। राजेश जोशी और रघुवीर सहाय जैसे कवियों ने आम आदमी के लोकतांत्रिक अधिकारों और दमन के विरुद्ध आवाज़ उठाई।

 4. उत्तर-आधुनिकता और अस्मितामूलक विमर्श (1990 - 2023): भूमंडलीकरण और सूचना क्रांति के दौर ने साहित्य में नए ‘विमर्श’ पैदा किए। *स्त्री विमर्श महिलाओं ने स्वयं की पहचान और पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध खुलकर लिखा। मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती से लेकर समकालीन लेखिकाओं तक, स्त्री की देह और मन के स्वतंत्र अस्तित्व की बात प्रमुख हुई। *दलित विमर्श: ओमप्रकाश वाल्मीकि (जूठन) और तुलसीराम (मुर्दहिया) जैसे लेखकों ने सदियों के शोषण और अपमान की गाथा को 'स्वयं की अनुभूति' के साथ पेश किया। इसने हिंदी साहित्य के सौंदर्यशास्त्र को बदल दिया। *आदिवासी विमर्श: हाल के वर्षों में जल, जंगल और जमीन की लड़ाई तथा आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की विचारधारा साहित्य में एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरी है। *उत्तर-आधुनिकता और तकनीकी बोध: इंटरनेट, सोशल मीडिया और कृत्रिम मेधा (AI) के युग में साहित्य अब 'ग्लोबल' हो गया है। आज का साहित्य विस्थापन, पर्यावरण संकट और बाजारवाद के खतरों पर बात कर रहा है।

 

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(5) सन् 2014 से 2026 तक का कालखंड हिंदी साहित्य के इतिहास में 'संक्रमण' और 'तकनीकी विस्तार' का समय रहा है। इस दौर में पुरानी विचारधाराओं का स्वरूप बदला है और कुछ नई प्रवृत्तियों ने जन्म लिया है। इस काल में साहित्य 'किताबों के पन्नों' से निकलकर 'स्क्रीन' तक पहुँचा है।

यहाँ इस कालखंड की प्रमुख विचारधाराएँ और प्रवृत्तियाँ दी गई हैं जिन्होंने साहित्य को नई दिशा दी: 1. राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक चेतना : 2014 के बाद भारतीय राजनीति और समाज में एक बड़ा बदलाव आया, जिसका सीधा असर साहित्य पर पड़ा।*स्वत्व की खोज: अपनी जड़ों, अपनी विरासत और भारतीयता पर गर्व करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐतिहासिक उपन्यासों और कथाओं में भारतीय नायकों को नए सिरे से परिभाषित किया गया। ** वि-औपनिवेशीकरण (De-colonization): पश्चिमी चश्मे से भारतीय समाज को देखने की विचारधारा का विरोध बढ़ा और 'भारतीय दृष्टि' से इतिहास और समाज को समझने पर जोर दिया गया। 2. डिजिटल यथार्थवाद : यह इस युग की सबसे अनूठी विचारधारा है। 2014 से 2026 के बीच साहित्य के सृजन और उपभोग का माध्यम बदल गया। *सोशल मीडिया साहित्य: फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (X) पर 'नवांकुर' साहित्यकारों की पूरी पीढ़ी तैयार हुई। माइक्रो-फिक्शन, नैनो-कविताएँ और 'सोशल मीडिया नैरेटिव' ने जन्म लिया। ** ई-साहित्य और ऑडियो बुक्स: किंडल, प्रतिलिपि और पॉकेट एफएम जैसे माध्यमों ने साहित्य की पहुँच जन-जन तक पहुँचा दी। इसने 'बाजारवाद' और 'साहित्य' के बीच के फासले को कम किया। 3. अस्मितामूलक विमर्श का विस्तार : पहले जो विमर्श केवल 'स्त्री' या 'दलित' तक सीमित थे, अब वे अधिक सूक्ष्म और व्यापक हो गए हैं। **आदिवासी और घुमंतू विमर्श: जल-जंगल-जमीन की लड़ाई के साथ-साथ आदिवासियों की जीवन-दृष्टि को मुख्यधारा के साहित्य में मजबूती से जगह मिली। **एलजीबीटीक्यू+ (LGBTQ+) विमर्श: हिंदी साहित्य में जेंडर की विविधता और समलैंगिक अधिकारों पर विमर्श ने तेजी पकड़ी है। अब यह केवल 'निषिद्ध' विषय नहीं रहा। ***दिव्यांग विमर्श: शारीरिक अक्षमता और उसके साथ जीने के संघर्ष को लेकर भी एक नई संवेदनशीलता साहित्य में उभरी है। 4. पर्यावरणवाद और पारिस्थितिकी : जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और प्रदूषण जैसे संकटों ने हिंदी साहित्यकारों को प्रकृति के प्रति नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया। *प्रकृति बनाम विकास: अब साहित्य केवल प्रकृति चित्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'पारिस्थितिकी तंत्र' को बचाने की एक राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा बन गई है। 5. महामारी के बाद का साहित्य (Post-Pandemic Literature): 2020-2022 की वैश्विक महामारी (COVID-19) ने साहित्यकारों की सोच में गहरा बदलाव लाया। * मृत्यु बोध और एकांत: महामारी के दौरान उपजे अकेलेपन, अनिश्चितता और मानवीय रिश्तों की परीक्षा को साहित्य में प्रमुखता मिली। 'अस्तित्ववाद' का एक नया और अधिक करुणामय रूप यहाँ उभरकर आया।

सारांश : (i) राष्ट्र बोध > इतिहास का पुनर्लेखन, सांस्कृतिक गौरव> मुद्रित पुस्तकें, ऐतिहासिक शोध। (ii) डिजिटल यथार्थवाद> भाषा का सरलीकरण, लघु विधाएँ> सोशल मीडिया, पॉडकास्ट।(iii) अस्मिता विमर्श> हाशिए के समाज का सशक्तिकरण> आत्मकथाएँ, लघु कहानियाँ।(i)  पारिस्थितिकी> पर्यावरण चेतना, भविष्यवाद> कविताएँ, व्यंग्य।(iv) 2014 से 2026 तक का हिंदी साहित्यलोकतांत्रकीकरणकी प्रक्रिया से गुजर रहा है। अब साहित्य केवल अकादमिक बौद्धिकों का नहीं, बल्कि स्मार्टफोन रखने वाले हर व्यक्ति का हिस्सा बन गया है। विचारधाराएं अब कट्टरपंथके बजाय अनुभवोंऔर अस्मिताओंके इर्द-गिर्द घूम रही हैं।

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संगम साहित्य 2

 

संगम साहित्य दक्षिण भारत के प्राचीन तमिल साहित्य की अत्यन्त महत्वपूर्ण परम्परा है। परम्परा के अनुसार कहा जाता है कि लगभग ईसा-पूर्व 9000 वर्ष से लेकर ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों तक विद्वानों और कवियों की कई सभाएँ (संगम) आयोजित हुईं, जिनमें अनेक साहित्यकार एकत्र होकर साहित्य की रचना और समीक्षा करते थे।

संगमों की संक्षिप्त जानकारी:(i) प्रथम संगम: इसका आयोजन प्राचीन नगर Thenmadurai में माना जाता है। इसमें अनेक ऋषि-कवि शामिल हुए, परन्तु इस संगम का साहित्य अब उपलब्ध नहीं है।(ii) द्वितीय संगम :यह Kapatapuram में आयोजित माना जाता है। यहाँ भी कई कवियों ने रचनाएँ कीं, लेकिन इनका अधिकांश साहित्य नष्ट हो गया।(iii) तृतीय संगम: इसका केन्द्र Madurai था। इसी संगम का साहित्य आज उपलब्ध है, जिसे Sangam Literature कहा जाता है। इसमें प्रमुख ग्रंथ एट्टुत्तोकै (आठ संग्रह) और पट्टुपाट्टु (दस गीत) हैं।महत्व: संगम साहित्य में प्रेम, वीरता, प्रकृति, समाज और राजनीति का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। यह तमिल भाषा और संस्कृति के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित हैउन्हें तमिल परंपरा 'महम्और 'इदम्नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैंजो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक 'संगमकी याद दिलाते हैं जिस में व्यष्टि और समष्टि के साथ साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उस को एक 'भारतजनमें परिणत करने वाली एक ऐसी 'संगम-दृष्टिहमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय सेन केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थीअपितु व्यष्टि एवं समष्टि के न्तर्गत आने वाले देह और देहीस्त्री और पुरुषव्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

 

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन 'अहम्बोर 'इदम्में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

 

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को 'राष्ट्रीतथा 'संगमनीकहा गया है। यही हमारे बहुभाषाभाषी भारतजन का 'संगमनकराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी नेआसेतु हिमालय तकइस महादेश को एक संस्-कृति दीएक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे 'अद्भुत संगमका निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकीऔर न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

 

ऋग्वेद ने 'संगच्छध्वं सवदध्वम्का जो महामंत्र इस रराष्ट्र के कानों में फूंका थावह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनोंआक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी 'संगमजीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?

कथन साहित्य कि विचारधाराएँ

 

  साहित्य कि विचारधाराएँ

 “पश्चिम का मानवतावाद आत्मकेंद्रित है किन्तु हिन्दू मानवतावाद कि स्थिति भिन्न है ।वह तो परम सत्य की उस अनुभूति से उपजा है कि “समूचा ब्रह्माण्ड अखंड इकाई है ।"-पूज्य श्रीगुरुजी

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“विकासमान देश को अपने वर्तमान में स्वाभिमान से खड़े होने के लिए आवश्यक है कि वह अपना पिछला कदम दबा कर और अगले कदम को सम्भाल कर रखे। इस लिए प्रज्ञावान एवं प्रतिभाशाली लेखकों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वे भारतीय जन मानस में आलस्य व अधार्मिक वैरुप्य तथा आत्मग्लानि के स्थान पर प्रकाश की ज्योति उद्दीप्त करने में ही अपनी कलम का प्रयोग करेंगे।” गोविन्द शंकर कुरुप

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“ आधुनिक (पश्चिमी) संस्कृति मानवता से प्रारम्भ होकर राष्ट्रीयता से होते हुए  पाशविकता तक पहुँच जाती है ।”  -डी-मेस्ट्रे

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कहां हिन्दू पुनर्जागरण, कहां यूरोपीय पुनर्जागरण

  कला के क्षेत्र में उन्होंने कहा है:

"पश्चिमी मानस रूप तथा आकार के आकर्षण जाल में फंसा हुआ है। वह उससे चिपटा रहता है और उसके मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाता। वह रूप के अपने सौन्दर्य के कारण उसके प्रति आशक्त रहता है। वह उन भावनात्मक, बौद्धिक, सौंदर्यात्मक संवेदनाओं पर निर्भर करता है जो सीधे उसकी अति मूर्त भाषा से उपजती हैं। वह आत्मा को तन तक सीमित रखता है। अतः यह कहा जा सकता है कि इस मानस रूप के लिए वह आत्मा का सृजन करता है। अपने अस्तित्व तथा हर प्रकार की अभिव्यक्ति के लिए यह आत्मा रूप पर निर्भर करती है। -ऋषि अरविन्द 

 भारतीय दृष्टिकोण नितांत सर्वथा विपरीत है। भारतीय मानस की दृष्टि में रूप का कोई अलग अस्तित्व नहीं है। वह तो आत्मा का सृजन है और वह अपनी सम्पूर्ण सार्थकता तथा मूल्य आत्मा से ग्रहण करता है। हर रेखा, आकार-व्यवस्था, रंग, रूप, मुद्रा, हर शारीरिक हाव-भाव, चाहे वह कितने भी अनगिनत, कितने भी विविध, संकुल तथा प्रचुर हों, मूलतः और अन्ततः एक सुझाव, एक संकेत और बहुधा एक प्रतीक भर होते हैं।- ऋषि अरविन्द 

 उनका प्रमुख प्रयोजन होता है कि वह एक ऐसे आध्यात्मिक भाव, विचार, छवि के लिए आधार प्रस्तुत करें जो पुनः अपने से परे उस अल्प वर्चनीय आत्मा के कहीं अधिक सशक्त रूप से संवेदनीय भाव की वास्तविकता तक पहुंच जाए। इसी से सौन्दर्यपारखी मानस में गतिशीलता उत्पन्न होकर उन्हें विभिन्न आकार प्रदान कर देती है।"-ऋषि अरविन्द 

   ‘आध्यात्मिकता ने ही भारत की नियति के संकट की हर घड़ी में सदैव उसकी रक्षा की और वही उसके पुनर्जागरण का उद्गम स्रोत भी है। यदि ऐसे संकट किसी भी राष्ट्र के सम्मुख आए होते तो उसकी आत्मा और उसका शरीर कभी का नष्ट हो जाता।’-ऋषि अरविन्द 

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‘१८ वी तथा १९ वी शताब्दियों में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंची महान ‘अवनति’ का उल्लेख करते हुए  कहा है कि-

 “वह तो सान्ध्य काल है जहां से कालचक्र की भारतीय धारणा के अनुसार एक नव-युग का श्रीगणेश होना है।”  वह कहते हैं “ यही वह घड़ी थी जब ऊपर से थोपी गई यूरोपीय संस्कृति के भार ने पुनर्जागरण को अनिवार्य बना दिया।” श्री अरविन्द का कहना हैः “जब भारत का पुनर्जागरण पूर्ण हो जायेगा तब निश्चय ही उसमें एक ऐसी चेतना आएगी जो निश्चित रूप से जर्मन की चेतना जैसी क्रूर नहीं होगी. बल्कि वह तो भारत की आत्मा की वास्तविक प्रकृति तथा क्षमता के अनुरूप होगी।”-ऋषि अरविन्द 
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  “संगीत शैली में परिवर्तन संस्कृति में मूल परिवर्तन में प्रतिबिम्बित होता है”-अफलातून (प्लेटो) 

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*“ हिन्दू पुनर्जागरण की प्रकृति यूरोपीय पुनर्जागरण की प्रकृति से पूर्णरूपेण भिन्न है ।यह शब्द हमें यूरोपीय संस्कृति के उस संक्रमण-बिन्दु का स्मरण कराता है जिसके संदर्भ में पहले-पहल इसका प्रयोग किया गया था वस्तुतः वह उतना पुनर्जागरण नहीं थाजितना कि वह अतीत की ओर लौटना था। वह तो ईसाइयतट्यूटानियत और सामन्तवादी यूरोपीय स्थिति से ऊबकर फिर से यूनानी-लैटिन भावना और ज्ञान की ओर मुड़ जाना था और उससे होने वाले परिणामों से प्रभावित होना था। अतः वह पुनर्जागरण निश्चित रूप से उस प्रकार का नहीं है जो भारत में कभी संभव हो।”--जेम्स एच० कजेन्स

** “क्या भारत के संदर्भ में ‘पुनर्जागरण’ शब्द की कोई सार्थकता है भीक्योंकि भारत तो सदा-सर्वदा जाग्रत रहा है और उसे पुनर्जागरण की तो कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी।”-जेम्स एच० कजेन्स

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  French Revolution के बाद पश्चिमी आधुनिकताअति-तर्कवाद और अनियंत्रित व्यक्तिवाद की आलोचना की। उनका विचार था कि 

"केवल भौतिक प्रगति पर आधारित आधुनिक पश्चिमी सभ्यता अंततः मानवता से हटकर शक्ति और संघर्ष की प्रवृत्ति की ओर जा सकती है।"-डी-मेस्ट्रे”

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तात्पर्य: यह कि जैसे भारत के लिए राष्ट्रवाद शब्द अनुवाद है जो पूर्ण अर्थ देने में सक्षम नहीं है , उसी प्रकार ‘पुनर्जागरण’ भी  निहितार्थ से दूर है , क्योंकि हम आज भी कहते हैं, “ वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। यह मंत्र (ऋग्वेद के 9.23.2) में मिलता है। हम इस राष्ट्र में सदैव जागरूक रहने वाले पुरोहित (मार्गदर्शक) बनें।”

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 **(गोविन्द शंकर कुरुप) आधुनिक मलयालम साहित्य के प्रमुख कवि और भारतीय साहित्य के महत्वपूर्ण साहित्यकार थे। पूरा नाम: गोविन्द शंकर कुरुपजन्म: 3 जून 1901,जन्म स्थान: Nayathode, केरल,मृत्यु: 2 फरवरी 1978. साहित्यिक परिचय:वे मलयालम काव्य के आधुनिक युग के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति प्रेम,आध्यात्मिकता,मानवतावाद भारतीय संस्कृति के तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उनकी रचनाओं में रहस्यवाद और प्रतीकात्मकता का भी प्रभाव मिलता है।)

(i) जेम्स एच० कजेन्स (एक आयरिश (Ireland के) साहित्यकारदार्शनिक और थियोसोफिस्ट थे। उन्होंने भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण पर महत्वपूर्ण लेखन किया।जन्म: 1873,मृत्यु: 1956, इस प्रकार उनका समय मुख्यतः 19वीं सदी के अंत और 20वीं  सदी के मध्य का है। वे भारत आए और यहाँ की थियोसोफिकल सोसाइटी (Theosophical Society) से जुड़े। उन्होंने भारतीय संस्कृतिकला और आध्यात्मिकता पर कई पुस्तकें लिखीं ।  अपनी कृति भारतीय पुनर्जागरण (द रेनेसां इन इंडिया) में यह प्रश्न उठाया है कि 

(ii) ‘पुनर्जागरण’ (रेनेसां) : शब्द को भारतीयता के संदर्भ में समझा जाना चाहिये। यह सच है कि 

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*डॉ मस्त्रे- (Joseph de Maistre “डी-मेस्ट्रे” फ्रांस / सावॉय, (आज का फ्रांस-इटली सीमा क्षेत्र) काल: 1753–1821 (18वीं–19वीं सदी), आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के आलोचक दार्शनिक।)–  का कथन है कि ,वे एक राजनीतिक दार्शनिकलेखक और राजनयिक थे। 

Tuesday, 10 March 2026

तमिल परंपरा 'महम्' और 'इदम्'

 

संगम-साहित्य का संग्रह जिन दो वर्गों में विभाजित है, उन्हें तमिल परंपरा 'महम्' और 'इदम्' नाम से जानती है। अहम् और इदम् संस्कृत शब्द हैं, जो क्रमशः व्यष्टि एवं समष्टि के सूचक हैं तथा उस वैदिक 'संगम' की याद दिलाते हैं जिस में व्यष्टि और समष्टि के साथ साथ मित्र एवं अमित्र अथवा देव एवं अदैव के समन्वय का लक्ष्य रहता था ।

वैदिक काल में भी हमारा राष्ट्रजन बहुभाषाभाषी तथा नानाधर्मी (नानाधर्माणं बहुधा विवाचसं) था और उस को एक 'भारतजन' में परिणत करने वाली एक ऐसी 'संगम-दृष्टि' हमारे पास थी जो अहम् एवं इदम् के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करने के ध्येय से, न केवल राष्ट्रजन की एकता का ध्यान रखती थी, अपितु व्यष्टि एवं समष्टि के न्तर्गत आने वाले देह और देही, स्त्री और पुरुष, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति का मनुष्य और मनुष्येतर प्राणी के सम्बन्धों पर याचित उन सभी प्रश्नों पर भी विकार करती थी को युग-युग से मानव-मस्तिष्क को उद्वेलित करते लाये हैं।

 

इसी दृष्टि से तमिल के संगभ-साहित्य का विभाजन 'अहम्' बोर 'इदम्' में हुआ और इसी के द्वारा वैदिक ऋषियों ने हमारी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है।

 

इसी संगम-दृष्टि से वैदिक ऋषियों को एक ऐसी शक्ति का पता चला जो व्यष्टि एवं समष्टि के समस्त कार्य-कलाप की सूत्रधारिणी है। ऋग्वेद में इसी को 'राष्ट्री' तथा 'संगमनी' कहा गया है। यही हमारे बहुभाषाभाषी भारतजन का 'संगमन' कराने वाली संस्कृत भाषा के रूप में आई और इसी ने, आसेतु हिमालय तक, इस महादेश को एक संस्-कृति दी, एक सुसंगठित समाज दिया और एक राष्ट्र होने का अभिमान दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक ऐसे 'अद्भुत संगम' का निर्माण हुआ जिस में तत्कालीन भौगोलिक कठिनाइयां बाधक नहीं हो सकी, और न राजनीतिक एवं ऐतिहासिक बाधाएं ही उस को तोड़ने में समर्थ हो सकीं ।

 

ऋग्वेद ने 'संगच्छध्वं सवदध्वम्' का जो महामंत्र इस रराष्ट्र के कानों में फूंका था, वह अब भी हमारे व्यक्तित्व के किसी गहरे स्तर पर जमा बैठा है। यही कारण है कि विखण्डनों, आक्रमणों एवं शोषणों के लाखों आघात लग चुकने पर भी हमारा भीतरी 'संगम' जीवित रहने के लिए उत्सुक दिनाई पड़ता है। क्या हमारे वर्तमान पुननिर्माण में अतीत की इस अद्भुत जिजीविषा की कोई उपयोगिता नहीं ?