Tuesday, 30 June 2026

ज्ञान गंज

हिमालय की गोद में  'ज्ञान गंज' (सिद्धाश्रम) की अवधारणा

हिमालय की गोद में अदृश्य  ‘ज्ञान गंज’ (सिद्धाश्रम) की अवधारणा और इन उच्च साधनाओं के व्यावहारिक सूत्रों को समझना, भारतीय आध्यात्मिक चेतना की एक रोमांचक यात्रा है। यहाँ के  रहस्य और अभ्यास हमारी सांस्कृतिक विरासत को एक 'जीवंत विज्ञान' के रूप में स्थापित करते हैं।  
(1) ज्ञान गंज (सिद्धाश्रम): चेतना का अदृश्य केंद्र: भारतीय और तिब्बती परंपराओं में ‘ज्ञान गंज’ (तिब्बती में ‘शाम्भला’) को एक ऐसी भूमि माना जाता है जो भौतिक रूप से हिमालय में है, लेकिन केवल उच्च चेतना वाले साधकों को ही दिखाई देती है। (i) सांस्कृतिक थाती: इसे ‘सिद्धों की भूमि’ कहा जाता है। महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र और आधुनिक काल के महावतार बाबा जी जैसे ऋषियों का संबंध इसी केंद्र से माना जाता है। (ii) भौतिक एवं आध्यात्मिक सेतु: यह स्थान सिद्ध करता है कि भारत की ज्ञान परंपरा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि एक ‘निरंतर गुरु-शिष्य परंपरा’ के माध्यम से आज भी जीवित है। इसे ‘अध्यात्म का पावर हाउस’ माना जाता है जहाँ से विश्व की वैचारिक दिशा नियंत्रित होती है।
(2) अंतर्यात्रा और क्रिया योग का महासंगम:  हिमालय की बर्फीली चोटियों के मध्य स्थित ज्ञानगंज (शाम्भला) केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि उच्च चेतना का एक ‘विद्युत-केंद्र’ है। यहाँ की आंतरिक साधना, सिद्धों की यात्राएं और महावतार बाबा जी से लेकर लहिड़ी महाशय तक की 'क्रिया योग' परंपरा भारतीय आध्यात्मिक विज्ञान की वह अमूर्त विरासत है, जिसने आधुनिक विश्व को ‘आत्म-साक्षात्कार’ का मार्ग दिखाया है।
(3) सिद्धों और साध्वियों की दिव्य स्थली: ज्ञानगंज को ‘ज्ञान की नगरी’ कहा जाता है, जहाँ काल (Time) और स्थान (Space) के नियम बदल जाते हैं। यहाँ की आंतरिक साधना का स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म है: (i) साध्वियों और साधकों की यात्राएँ: पौराणिक कथाओं और आधुनिक संतों (जैसे गोपीनाथ कविराज और स्वामी विशुद्धानन्द) के वृत्तांत बताते हैं कि ज्ञानगंज में प्रवेश केवल स्थूल शरीर से नहीं, बल्कि 'सूक्ष्म शरीर' (Astral Body) से होता है। यहाँ योगी 'कायाकल्प' और 'सूर्य विज्ञान' (Solar Science) के माध्यम से पदार्थों को बदलने की क्षमता रखते हैं। (ii) आंतरिक अनुशासन: यहाँ की साधना का मुख्य उद्देश्य ‘चित्त-शुद्धि’ और ‘अद्वैत भाव’ है। यहाँ साधक अपनी इंद्रियों को पूरी तरह अंतर्मुखी कर ‘नाद’ (दिव्य ध्वनि) और ‘ज्योति’ (दिव्य प्रकाश) में लीन रहते हैं।
(4) महावतार बाबा जी: 'आदि गुरु' और अमर योगी: ज्ञानगंज की सत्ता और क्रिया योग के मूल स्तंभ महावतार बाबा जी ही हैं। उन्हें 'मृत्युंजय' और 'अमर' माना जाता है। (i) ऐतिहासिक संदर्भ: बाबा जी ने ही प्राचीन लुप्तप्राय 'क्रिया योग' को पुनः जीवित किया। वे किसी एक धर्म के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के 'आदि गुरु' के रूप में देखे जाते हैं।(ii) योग का सेतु: बाबा जी ने ही हिमालय की गुफाओं में लहिड़ी महाशय को क्रिया योग की दीक्षा दी, जिससे यह गुप्त विद्या हिमालय के शिखरों से उतरकर गृहस्थों और आधुनिक समाज तक पहुँची।
(5) लहिड़ी महाशय और क्रिया योग: गृहस्थ जीवन में समाधि: श्यामचरण लहिड़ी (लहिड़ी महाशय) ने यह सिद्ध किया कि हिमालयी ऋषियों की उच्च साधना के लिए संसार त्यागना अनिवार्य नहीं है।

(i) क्रिया योग का विज्ञान: यह एक 'मनो-शारीरिक' (Psychophysiological) पद्धति है। इसमें प्राणायाम की विशिष्ट क्रियाओं द्वारा रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड निकालकर उसे ऑक्सीजन से भर दिया जाता है, जिससे शरीर की कोशिकाएं 'अक्षय ऊर्जा' से भर जाती हैं।

 (ii) सांस्कृतिक विरासत: यह योग पद्धति पतंजलि के योग सूत्र और भगवद्गीता के 'प्राण-अपान' यज्ञ का ही प्रायोगिक स्वरूप है। 

लहिड़ी महाशय ने इसे 'योग का प्रजातंत्रीकरण' बना दिया, जहाँ हर व्यक्ति ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है।

(6) महातपा बाबा और हिमालयी सिद्ध परंपरा: हिमालयी परंपरा में 'महातपा बाबा' जैसे सिद्धों का नाम श्रद्धा से लिया जाता है, जिन्होंने सदियों तक केवल वायु या जल पर रहकर कठोर तपस्या (तप) की। 

(i) तप का उद्देश्य: इनकी साधना का केंद्र 'आत्म-विजय' है। महातपा बाबा जैसे गुरुओं ने यह सिखाया कि मानव शरीर में ही ब्रह्मांड की समस्त शक्तियाँ निहित हैं।

 (ii) क्रिया योग और आंतरिक रूपांतरण: क्रिया योग के माध्यम से साधक अपनी रीढ़ की हड्डी (सुषुम्ना नाड़ी) में स्थित छह चक्रों को जाग्रत करता है। यह 'मस्तिष्क का पुनर्गठन' (Brain Rewiring) करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है।

(7) वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक समन्वय: एक वैश्विक थाती:  (i) महावतार बाबा जी: क्रिया योग का पुनरुद्धार। ‘सनातन धर्म’ को वैश्विक क्रियात्मक रूप देना।

(ii) लहिड़ी महाशय: गृहस्थ योग की स्थापना। योग को आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल बनाना।

 (iii) ज्ञानगंज की साधना: सूर्य विज्ञान एवं कायाकल्प।पदार्थ और ऊर्जा के अंतर्संबंध का प्राचीन ज्ञान। 

(iv) क्रिया योग : प्राण शक्ति का संवर्धन। न्यूरोप्लास्टिसिटी और दीर्घायु (Longevity) पर प्रभाव।

(8) स्वामी विशुद्धानन्द परमहंस और 'सूर्य विज्ञान' (Solar Science): स्वामी विशुद्धानन्द जी (जिन्हें 'गंध बाबा' के नाम से भी जाना जाता था) ज्ञानगंज की उस महान परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने भौतिक विज्ञान को अध्यात्म से जोड़ा।

 (i) ज्ञानगंज में प्रशिक्षण: स्वामी जी ने तिब्बत के ज्ञानगंज (शाम्भला) आश्रम में वर्षों रहकर वहां के महासिद्धों (जैसे महातपा बाबा) से 'सूर्य विज्ञान' की शिक्षा ली थी। 

(ii) पदार्थ का रूपांतरण (Transmutation): उन्होंने कई बार वैज्ञानिकों के सामने सूर्य की किरणों को एक विशेष लेंस के माध्यम से केंद्रित कर, साधारण कागज़ या फूल को अन्य वस्तुओं (जैसे इत्र, मिठाई या सोने) में बदल कर दिखाया। 

(iii) सांस्कृतिक विरासत: यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों को 'अणु-संरचना' (Molecular Structure) का पूरा ज्ञान था। वे जानते थे कि सृष्टि का आधार 'प्रकाश' (Photons) है और यदि प्रकाश के कंपन को बदला जाए, तो पदार्थ (Matter) को बदला जा सकता है।

(9) क्रिया योग का 'प्राण-विज्ञान': तकनीकी पक्ष: लहिड़ी महाशय द्वारा सिखाया गया क्रिया योग कोई साधारण प्राणायाम नहीं, बल्कि 'कोशिकीय पुनर्जागरण' (Cellular Regeneration) की विधि है।

 (i) ऊर्जा का चक्रण (The Spinal Circuit): क्रिया योग में प्राण वायु को रीढ़ की हड्डी के चारों ओर (सुषुम्ना नाड़ी में) एक विशिष्ट चक्र में घुमाया जाता है।विज्ञान: एक 'क्रिया' (सांस का एक चक्र) मनुष्य के प्राकृतिक विकास के एक वर्ष के बराबर मानसिक प्रगति प्रदान करती है।

(ii) रक्त का शुद्धिकरण (Decarbonization): तकनीकी रूप से, यह विधि रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को तेजी से हटाकर उसे शुद्ध ऑक्सीजन और 'प्राण ऊर्जा' से भर देती है। इससे साधक का शरीर ‘मृत्यु’ की प्रक्रिया (Decay) को धीमा कर देता है।

(iii) मस्तिष्क का परिवर्तन: यह सीधे ‘मेडुला ऑब्लांगटा’ और ‘पीनियल ग्रंथि’ (थर्ड आई) को सक्रिय करता है, जिससे साधक को 'कॉस्मिक कॉन्शियसनेस' (ब्रह्मांडीय चेतना) का अनुभव होता है।

(10) महातपा बाबा और ज्ञानगंज की आंतरिक संरचना : ज्ञानगंज के प्रमुख महातपा बाबा को योग परंपरा में एक 'अति-मानव' माना जाता है जिनकी आयु सैकड़ों वर्ष बताई गई है। 

(i) आंतरिक यात्रा का भूगोल: ज्ञानगंज में प्रवेश के लिए केवल इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं है, इसके लिए 'कुंडलिनी शक्ति' का एक विशेष स्तर पर होना अनिवार्य है। यहाँ के संत 'टेलीपैथी' और 'बायो-लोकेशन' (एक साथ दो स्थानों पर होना) जैसी विद्याओं में निपुण होते हैं। 

(ii) साध्वियों का योगदान: ज्ञानगंज की परंपरा में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि 'मा' जैसी उच्च कोटि की साध्वियाँ भी हैं, जो 'शक्ति' के साक्षात स्वरूप के रूप में वहाँ के आध्यात्मिक पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करती हैं।

          (11)  भारतीय विरासत के रूप में इसका महत्व:
 (एक़) (i) तत्व: सूर्य विज्ञान: (ii) वैज्ञानिक आधार (Scientific Base): फोटोनिक्स और ऊर्जा का द्रव्यमान में रूपांतरण (E=mc2) (iii) सांस्कृतिक मूल्य (Cultural Value): प्रकृति की शक्तियों पर विजय। 

(दो ) (i) तत्व: क्रिया योग: (ii) वैज्ञानिक आधार (Scientific Base): न्यूरोप्लास्टिसिटी और श्वसन जीवविज्ञान  (iii) सांस्कृतिक मूल्य (Cultural Value): स्वयं का रूपांतरण (Self-Transformation ।

 (तीन ) (i) तत्व: ज्ञानगंज  (ii) वैज्ञानिक आधार (Scientific Base): मल्टी-डायमेंशनल रियलिटी (बहुआयामी वास्तविकता)  (iii) सांस्कृतिक मूल्य (Cultural Value): अखंड भारत की ‘अदृश्य’ रक्षा पंक्ति।   

  (12) खेचरी मुद्रा: आकाश में विचरण की कला: ‘खेचरी’ शब्द का अर्थ है-'खे' (आकाश) और 'चरी' (विचरण करना)। यह क्रिया योग की सबसे महत्वपूर्ण और गुप्त मुद्राओं में से एक है। 

(i) तकनीकी पक्ष: इसमें जिह्वा (जीभ) को उलटकर तालु के पीछे स्थित 'कपाल कुहर' (Nasopharyngeal Cavity) में ले जाया जाता है। 

(ii) अमृत का स्राव (Somarasa): योगियों का मानना है कि मस्तिष्क के ऊपरी हिस्से (बिंदु विसर्ग) से निरंतर एक दिव्य द्रव्य गिरता है, जिसे 'सोमरस' या 'अमृत' कहते हैं। सामान्यतः यह जठराग्नि में जल जाता है, लेकिन खेचरी मुद्रा के माध्यम से योगी इस अमृत का पान करते हैं, जिससे शरीर का क्षय रुक जाता है और वृद्धावस्था पर विजय प्राप्त होती है। 

(iii) वैज्ञानिक आधार: आधुनिक दृष्टि से देखें तो जीभ का अग्रभाग जब तालु के उस विशिष्ट संवेदनशील हिस्से को छूता है, तो वह 'पिट्यूटरी' (Pituitary) और 'पीनियल' (Pineal) ग्रंथियों को उत्तेजित करता है। यह अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) को संतुलित कर गहन शांति और 'आनंद' (Bliss) की स्थिति उत्पन्न करता है।

(13) ज्ञानगंज की योगिनी साधना: शक्ति का दिव्य स्वरूप: ज्ञानगंज (सिद्धाश्रम) केवल पुरुष ऋषियों का स्थान नहीं है। वहाँ 'योगिनियों' का एक अत्यंत शक्तिशाली और गुप्त मंडल है, जो सृष्टि की 'इच्छाशक्ति' को संचालित करता है। 

(i) दिव्य स्त्रित्व (Divine Feminine): यहाँ की योगिनियाँ 'प्राण-विद्या' में इतनी निपुण होती हैं कि वे प्रकृति के पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) पर पूर्ण नियंत्रण रखती हैं।

 (ii) साधना का स्वरूप: योगिनी साधना में 'श्रीविद्या' और 'ललिता सहस्रनाम' के सूक्ष्म अर्थों का प्रयोग होता है। यह साधना हृदय चक्र (अनाहत) और आज्ञा चक्र के मिलन पर आधारित है।

 (iii) सांस्कृतिक प्रभाव: ज्ञानगंज की ये योगिनियाँ ही भारत के विभिन्न शक्तिपीठों की ऊर्जा को जीवंत रखती हैं। स्वामी विशुद्धानन्द जी ने अपने संस्मरणों में 'कुमाऊँ की योगिनी' और 'ज्ञानगंज की भैरवियों' का उल्लेख किया है, जो पलक झपकते ही अदृश्य होने या सूक्ष्म शरीर से यात्रा करने में सक्षम थीं।

(14) क्रिया योग और सूक्ष्म शरीर (Astral Body) का विज्ञान: महावतार बाबा जी ने सिखाया कि मनुष्य के भीतर तीन शरीर हैं: स्थूल, सूक्ष्म और कारण। 

(i) चक्र भेदन: क्रिया योग के माध्यम से जब ऊर्जा 'सुषुम्ना' में प्रवाहित होती है, तो साधक अपने सूक्ष्म शरीर से बाहर निकलना सीख जाता है। इसे 'एस्ट्रल प्रोजेक्शन' कहा जाता है।

 (ii) अदृश्य सहायक: ज्ञानगंज के साधक इसी विधि से विश्व के कल्याण के लिए अदृश्य रूप में कार्य करते हैं। लहिड़ी महोदय ने कई बार एक ही समय में दो अलग-अलग स्थानों पर उपस्थित होकर (Bi-location) अपने शिष्यों की रक्षा की थी।

(15) सांस्कृतिक विरासत और ‘सिद्ध’ परंपरा : (i) खेचरी मुद्रा : समय और मृत्यु पर विजय, हठयोग प्रदीपिका और घेरण्ड संहिता का मूल आधार।

(ii) योगिनी साधना : ब्रह्मांडीय शक्ति से तादात्म्य, भारत के 64 योगिनी मंदिरों की जीवंत परंपरा। 

(iii) क्रिया योग: आत्म-साक्षात्कार, वेदों के ‘प्राण-विद्या’ का आधुनिक वैज्ञानिक स्वरूप।

(16)  अध्याय का निष्कर्ष:  हिमालयी ऋषि और वैश्विक चेतना: ज्ञानगंज की आंतरिक साधना, महावतार बाबा जी का मार्गदर्शन और लहिड़ी महाशय द्वारा प्रचारित क्रिया योग—ये सभी भारतीय सांस्कृतिक विरासत के वे उज्ज्वल रत्न हैं जो सिद्ध करते हैं कि भारत 'चेतना के अनुसंधान' में विश्व का अग्रणी रहा है।

तिब्बती लामाओं के 'तंत्र' और हिमालयी ऋषियों के 'योग' का यह संगम ही वास्तव में 'अखंड ज्ञान' है। 

यह विरासत हमें सिखाती है कि शांति बाहर नहीं, बल्कि भीतर की गहराइयों में है, जिसे क्रिया योग और ध्यान के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

निश्चित रूप से, इन विस्मयकारी संतों और क्रिया योग के सूक्ष्म विज्ञान पर चर्चा करना भारतीय आध्यात्मिक 'लैबोरेटरी' के रहस्यों को खोलने जैसा है।

 यह केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि प्राचीन न्यूरो-साइंस और क्वांटम फिजिक्स का अद्भुत मेल है।

आइए, इसे स्वामी विशुद्धानन्द परमहंस, ज्ञानगंज के 'सूर्य विज्ञान' और क्रिया योग के प्राण-तकनीकी पक्ष के माध्यम से समझते हैं:

हिमालयी ऋषियों, महावतार बाबा जी और लहिड़ी महाशय की यह विरासत सिद्ध करती है कि भारत ने कभी भी विज्ञान और अध्यात्म को अलग नहीं माना। ज्ञानगंज वह प्रयोगशाला है जहाँ 'पदार्थ' और 'चेतना' के बीच की दूरी मिट जाती है।

 स्वामी विशुद्धानन्द जी जैसे संतों के संस्मरण हमें याद दिलाते हैं कि जिसे हम आज 'चमत्कार' कहते हैं, वह वास्तव में 'उन्नत विज्ञान' है जिसे हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं।

निश्चित रूप से, 'खेचरी मुद्रा' और 'योगिनी साधना' भारतीय योग विज्ञान के वे गुप्त शिखर हैं, जहाँ शरीर का भौतिक विज्ञान सीधे ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness) से जुड़ जाता है।

 ज्ञानगंज की परंपरा में इन्हें 'अमृतत्व' प्राप्त करने की चाबी माना जाता है।
यह ज्ञान सिद्ध करता है कि भारत की 'अमूर्त विरासत' (Intangible Heritage) किसी भी आधुनिक तकनीक से कहीं अधिक उन्नत थी। 

ज्ञानगंज के ये ऋषि और योगिनियाँ आज भी हमें यह संदेश देते हैं कि "मनुष्य की सीमाएं केवल उसके शरीर तक नहीं हैं, बल्कि वह अनंत का अंश है।" खेचरी मुद्रा से अमृत पान और क्रिया योग से प्राण का शोधन—यह सब 'स्वयं को जानने' का वह मार्ग है जो भारत ने पूरे विश्व को दिया है।
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Friday, 26 June 2026

ज्ञानगंज की “अदृश्य डाक”

 

ज्ञानगंज की “अदृश्य डाक”

स्वामी विशुद्धानंद परमहंस सूर्य सिद्धांत: (i) लाहिड़ी महाशय के परम शिष्य (ii) गंध बाबा” के नाम से प्रसिद्ध (iii) ज्ञानगंज में “सूर्य विज्ञान” की शिक्षा प्राप्त

 सूत्र रूप में-

१. सूर्य विज्ञान (Solar Science): (i) सूर्य की किरणों को लेंस द्वारा हथेली पर केंद्रित करना । (ii) योग शक्ति एवं मंत्रों द्वारा ऊर्जा का संयोजन । (iii) परमाणुओं का पुनर्गठन (Rearrangement) । (iv) शून्य से फूल, अंगूर, वस्त्र आदि प्रकट करना । मूल सिद्धांत: (i) हर पदार्थ सूर्य रश्मियों के संयोजन से बना है।” (ii) ऊर्जा को पदार्थ में बदलना संभव ।

२. ज्ञानगंज की शक्तियों की भूमिका: आकाशीय मार्ग (Astral Channel)- (i) सूक्ष्म जगत से भौतिक जगत में वस्तुओं का स्थानांतरण । योगिनियाँ एवं सिद्ध: (i) खेचरी विद्या’ में पारंगत । (ii) वस्तुओं के “टेलीपोर्ट” की क्षमता । (iii) साधक के संकल्प को कार्यरूप देना । मानसिक आदेश: (i) विशुद्धानंद जी के संकल्प पर वस्तुएँ प्रकट होना ।

३. प्रसिद्ध गुलाब घटना: (i) एक अंग्रेज ने परीक्षा ली । (ii) मौसम से बाहर का फूल माँगा । (iii) सूर्य किरणों के प्रयोग से ताजा गुलाब प्रकट । (iv) संकेत: फूल ज्ञानगंज के उद्यानों से आया ।

४. योग और विज्ञान का मेल: (i) इसे “चमत्कार” नहीं, “उच्च विज्ञान” कहा गया । (ii) आधुनिक 3D प्रिंटिंग जैसी अवधारणा से तुलना । (iii) ऊर्जा पदार्थ परिवर्तन की प्रक्रिया । (iv) योगिनियाँ = ऊर्जा वाहक (Catalyst)

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       ज्ञानगंज में प्रवेश के नियम

आध्यात्मिक पात्रता- (i) कुण्डलिनी जागरण आवश्यक । (ii) स्थूल से सूक्ष्म चेतना में प्रवेश । गुरु की अनुमति: (i) केवल गुरु/सिद्ध के आमंत्रण से प्रवेश । (ii) सामान्य व्यक्ति पहुँच नहीं सकता । शरीर शुद्धि: (i) कायाकल्प एवं योगिक शुद्धिकरण आवश्यक। (ii) उच्च कंपन (High Vibration) सहने की क्षमता चाहिए ।

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ज्ञानगंज की अवधारणा: (i) सामान्य भौगोलिक स्थान नहीं । (ii) एक “आध्यात्मिक आयाम” (Spiritual Dimension) । (iii) सिद्ध योगियों एवं योगिनियों का गुप्त केंद्र ।

प्रमुख कथन

(i) जब मनुष्य स्वयं को ब्रह्मांड के साथ एक कर लेता है, तो हर मन एक ट्रांसमिटिंग स्टेशन बन जाता है।”- महावतार बाबाजी

(ii) प्रकृति के गुप्त नियमों को जानने वाला व्यक्ति असंभव को भी संभव कर सकता है।” — विशुद्धानंद परमहंश

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  योगियों की आयु और दीर्घायु का रहस्य (स्मरणीय बिंदु)

(i) ज्ञानगंज के योगियों की विशेषता: (i) ज्ञानगंज के योगियों के बारे में माना जाता है कि वे सैकड़ों से लेकर हज़ारों वर्षों तक जीवित रहते हैं। (ii) उनकी दीर्घायु का आधार साधारण शरीर विज्ञान नहीं, बल्कि उच्च योग-साधना मानी जाती है।

(ii) दीर्घायु के दो मुख्य रहस्य: 1. कायाकल्प विद्या: (i) योगी सूर्य विज्ञान और विशेष दिव्य जड़ी-बूटियों का उपयोग करते हैं। (ii) इन जड़ी-बूटियों को “अमृत तुल्य” माना जाता है। (iii) मान्यता है कि इससे शरीर की कोशिकाएँ (Cells) नष्ट नहीं होतीं। (iv) शरीर लंबे समय तक युवा और समर्थ बना रहता है। 

 2. श्वसन नियंत्रण (Breath Control): (i) क्रियायोग द्वारा वे अपनी श्वास को अत्यंत धीमा या स्थिर कर लेते हैं। (ii) सांसों की गति कम होने से शरीर की ऊर्जा क्षय भी कम होती है। (iii) माना जाता है कि समय का प्रभाव उन पर बहुत कम पड़ता है। (iv) उनके लिए समय सामान्य मनुष्यों की तरह “रैखिक” (Linear) नहीं माना जाता।

 ३. वर्तमान आचार्य और उनकी आयु: () महावतार बाबाजी: (i) ज्ञानगंज के सर्वोच्च मार्गदर्शक माने जाते हैं। (ii) क्रियायोग के मूल गुरु के रूप में प्रसिद्ध। (iii) परंपरा के अनुसार वे हजारों वर्षों से सशरीर विद्यमान माने जाते हैं। (iv) अनुमानित आयु: ५०००+ वर्ष (मान्यता अनुसार)।  () स्वामी महातपस महाराज: (i)  स्वामी विशुद्धानन्द के दीक्षा गुरु बताए जाते हैं। (ii) सूर्य विज्ञान के महान आचार्य माने जाते हैं। (iii) ज्ञानगंज के प्रमुख सिद्धों में गिने जाते हैं। (iv) अनुमानित आयु: हज़ारों वर्ष। () भृगुराम परमहंस: (i) ज्ञानगंज की गुप्त परिषद के प्रभावशाली सिद्ध बताए जाते हैं। (ii) उच्च योग और रहस्य विज्ञान के ज्ञाता माने जाते हैं।  (iii) अनुमानित आयु: हज़ारों वर्ष।

४. वर्तमान संचालन: (i) मान्यता अनुसार ज्ञानगंज का संचालन आज भी महान सिद्धों के निर्देशन में होता है।  (ii) मुख्य रूप से महातपस महाराज और भृगुराम जी का नाम लिया जाता है।  (iii) इन्हें “कालजयी” (Beyond Time) माना जाता है। (iv) इसलिए उनके लिए सामान्य मनुष्यों जैसी “आयु” या “रिटायरमेंट” की अवधारणा लागू नहीं मानी जाती।

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                                          ज्ञानगंज की आंतरिक व्यवस्था

१. ज्ञानगंज की आंतरिक व्यवस्था: (i) योगी केवल ध्यान नहीं करते, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखते हैं।  (ii) ज्ञानगंज में “योगिनी चक्र” अत्यंत सक्रिय माना जाता है। (iii) योगिनियाँ प्रकृति की शक्तियों का संचालन और साधकों की रक्षा करती हैं।  (iv) मान्यता अनुसार महान वैज्ञानिक आविष्कार “विचार-बीज” के रूप में प्रेरित किए जाते हैं। (v) वहाँ विज्ञान और अध्यात्म का भेद समाप्त होकर केवल “सत्य” शेष रहता है ।

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साधक की चेतना

 

                                                           साधक की चेतना

*प्राण और अपान का संतुलन ही वह कुंजी है जिससे एक योगी अपने भौतिक शरीर को 'प्रकाश' में बदल देता है और महासमाधि प्राप्त करता है। 

* तब साधक की चेतना (प्रकाश) बाहरी दुनिया से हटकर रीढ़ के भीतर 'सुषुम्ना' मार्ग से होती हुई आज्ञा चक्र या 'कूटस्थ' पर केंद्रित हो जाती है। 

* यहाँ उस दिव्य प्रकाश और नाद (ध्वनि) का एक सिद्ध योगी अनुभव करता है:

 १. कूटस्थ चैतन्य की ज्योति (The Spiritual Eye : जब साधक अपनी आँखें बंद कर दोनों भौहों के बीच एकाग्र होता है, तो उसे एक 'त्रिवर्ण' (तीन रंगों वाला) तारा दिखाई देता है, जिसे 'आध्यात्मिक नेत्र' कहा जाता है: 

(i) बाहरी सुनहरा घेरा (Golden Halo): यह 'ब्रह्मांडीय ऊर्जा' या पवित्र आत्मा (Holy Ghost) का प्रतीक है।

(ii) भीतरी गहरा नीला गोला (Opal Blue): यह 'कृष्ण चेतनाका प्रतीक है, जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। 

(iii) केंद्र में सफेद तारा (Five-pointed Silver Star): यह 'परमेश्वर' या 'पिता' (Cosmic Consciousness) का द्वार है। 

योगिराज लाहिड़ी महाशय कहते थे कि इस तारे के भीतर प्रवेश करना ही वास्तविक 'पुनर्जन्म' है।

२. अनाहत नाद (The Cosmic Sounds): जैसे-जैसे ध्यान गहरा होता है, साधक को केवल प्रकाश ही नहीं, बल्कि विशिष्ट ध्वनियाँ भी सुनाई देती हैं। 


ये ध्वनियाँ ब्रह्मांड के विभिन्न स्तरों (चक्रों) के कंपन हैं: 

(i) मूलाधार- भौंरे की गुंजन (Humming of a Bee), पृथ्वी तत्व की ऊर्जा।

(ii) स्वाधिठान: बासुरी की तान (flute), जल तत्व का स्पंदन । 

(iii) मणिपुरक - वीणा या हार्व की ध्वनि (Harp), अग्नि तत्व का तेज ।

(iv) अनाहत : घंटे की गूंज (Bell or Gong), वायु तत्व की व्यापकता ।

(v) विशुद्द : समुद्र की गर्जना , आकाश तत्व की अनंता ।

अंत में, ये सभी ध्वनियाँ मिलकर एक भव्य 'ओम्' (ॐ) की ध्वनि में विलीन हो जाती हैं

३. 'कूटस्थ' दर्शन का वैज्ञानिक प्रभाव: जब साधक कूटस्थ के इस प्रकाश को देखता है, तो उसके मस्तिष्क की कोशिकाएं (Cells) दिव्य ऊर्जा से नहा जाती हैं। 

परिणाम -(i) भ्रम का नाश: इस ज्योति को देखने के बाद साधक को यह प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि 'प्रकाश' है।

(ii) सर्वव्यापकता: नीले गोले के माध्यम से योगी अपनी चेतना को पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ महसूस करता है। वह चींटी से लेकर तारों तक, हर जगह खुद को ही देखता है।

४. "यदि तुम्हारी आँख एक हो...":  'कूटस्थ' या तीसरी आँख है, जहाँ दो भौतिक आँखों की दृष्टि मिलकर एक दिव्य अंतर्दृष्टि बन जाती है।

"यह तारा वह द्वार है जिससे होकर हर साधक को गुजरना पड़ता है ताकि वह अंधकार से निकलकर अनंत प्रकाश के साम्राज्य में प्रवेश कर सके।" परमहंस योगानंद

यह अनुभव साधना की परिपक्वता का प्रमाण है और साधक के भीतर के भय और मृत्यु के बोध को हमेशा के लिए समाप्त कर देता है।

 21/6/26                                          ..........................................

हमारी आध्यात्मिक यात्रा में कहाँ तक है

 

हमारी आध्यात्मिक यात्रा में कहाँ तक है

*'प्राण' और 'अपान' के संतुलन को केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक "न्यूरो-बायोलॉजिकल" (तंत्रिका-वैज्ञानिक) प्रक्रिया है।

 * हमारा जीवन इन दो विपरीत ऊर्जाओं के बीच के संघर्ष पर टिका है। इसका वैज्ञानिक सार और प्रक्रिया इस प्रकार है:

१. प्राण और अपान का विज्ञान: शरीर में दो मुख्य चुंबकीय धाराएँ कार्य करती हैं:

(i) प्राण (Prana): यह 'अभिकेंद्रित' (Centripetal) शक्ति है जो बाहर से ऊर्जा को भीतर खींचती है और ऊपर की ओर गति करती है। इसका केंद्र कूटस्थ (दोनों भौहों के बीच) है। 

(ii) अपान (Apana): यह 'अपकेंद्रित' (Centrifugal) शक्ति है जो ऊर्जा को नीचे की ओर और बाहर की ओर धकेलती है। इसका केंद्र मूलाधार (रीढ़ का निचला हिस्सा) है।

* समस्या: सामान्य मनुष्य में अपान वायु अधिक शक्तिशाली होती है, जो चेतना को इंद्रियों और काम-वासनाओं की ओर नीचे खींचती है। जब तक ये दोनों धाराएँ संतुलित नहीं होतीं, मन कभी स्थिर नहीं हो सकता।

२. संतुलन की प्रक्रिया: क्रियायोग का आधार: श्वास के माध्यम से हम इन दोनों धाराओं को एक "यज्ञ" (Internal Fire) में होम कर देते हैं। इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया के मुख्य चरण ये हैं: 

क. श्वास का अंतरीकरण (Internalization of Breath) : जब हम गहरी और सजग श्वास लेते हैं, तो हम 'प्राण' को 'अपान' में और 'अपान' को 'प्राण' में विलीन करने का प्रयास करते हैं। इससे श्वास की गति धीमी हो जाती है। 

ख. रीढ़ की हड्डी का दोलन (Spinal Polarization): क्रियायोग की मुख्य तकनीक में चेतना को रीढ़ की हड्डी (Sushumna) के माध्यम से ऊपर और नीचे घुमाया जाता है। 

(i) आरोहण (Inhalation): अपान को ऊपर खींचकर प्राण के साथ मिलाना।

(ii) अवरोहण (Exhalation): प्राण को नीचे ले जाकर अपान को शांत करना। 

ग. श्वास-हीन अवस्था (Breathless State): जब प्राण और अपान पूरी तरह संतुलित हो जाते हैं, तो हृदय और फेफड़ों की गति स्वतः रुक जाती है। इसे ही योग में 'कुम्भक' या 'मृत्युरहित अवस्था' कहा जाता है।

 इस अवस्था में शरीर को ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि वह सीधे 'आकाश' (Ether) से ऊर्जा ग्रहण करने लगता है।

३. वैज्ञानिक लाभ: इस संतुलन से शरीर में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं: 

(i) रक्त का शुद्धिकरण: फेफड़ों पर बोझ कम हो जाता है और रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड पूरी तरह समाप्त होकर वह 'प्राण-शक्ति' से भर जाता है। 

(ii) मस्तिष्क का विकास: रीढ़ के माध्यम से जब ऊर्जा ऊपर उठती है, तो वह मस्तिष्क के उन सुप्त केंद्रों (Silent cells) को जागृत कर देती है जो सामान्यतः निष्क्रिय रहते हैं। 

(iii) समय पर विजय: चूँकि उम्र श्वासों की संख्या पर निर्भर करती है, इसलिए जब योगी अपनी श्वास को स्थिर कर लेता है, तो वह समय के प्रभाव से मुक्त हो जाता है।

४. महत्वपूर्ण निर्देश: चेतावनी दी है कि: (i) "प्राण-अपान के संतुलन की वास्तविक 'क्रिया' केवल एक अधिकृत गुरु से ही सीखी जानी चाहिए। यह एक शक्तिशाली 'सर्जरी' की तरह है जिसे बिना मार्गदर्शन के करना खतरनाक हो सकता है।"

20/6/26

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Five pillars of spiritual life

Five pillars of spiritual life -

True religion and spirituality lay in '  less talk and more practice.

In the age of science ,we are proud to our progress and achievements yet, " we have not succeeded in obtaining that witch we desire the most, i.e. true joy and peace.

Only spirituality can lead us to the attainment of peace within ourselves, with one another help us live at peace with the world.

For this, the daily practice of silence was essential. Our day should be full of little turning towards God, in which ever way possible.



Thursday, 25 June 2026

संगमनी

यह सूत्र सनातन धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के 'वाक् सूक्त' (जिसे 'देवी सूक्त' भी कहा जाता है) से उद्धृत है। ऋग्वेद के 10वें मण्डल का यह 125वाँ सूक्त है, और यह इसका तीसरा मंत्र है। 

पूरा मंत्र इस प्रकार है:
"अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥" 


मंत्र की मुख्य बातें और संदर्भ
ऋषिका (मंत्र द्रष्टा): इस सूक्त की द्रष्टा महर्षि अम्भृण की पुत्री वाक् आम्भृणी हैं। 


देवता: इस सूक्त का देवता 'आत्मा' या 'साक्षात् चित्-शक्ति (देवी)' है। ब्रह्मज्ञान से संपन्न होकर वाग्देवी परमात्मा (परम चेतना) से एकात्मता का अनुभव करते हुए स्वयं यह उद्घोष करती हैं। 

सरल भावार्थ: "मैं ही पूरे ब्रह्मांड/जगत की अधीश्वरी (स्वामिनी) हूँ। मैं ही अपने उपासकों को धन और ऐश्वर्य प्राप्त कराने वाली हूँ। मैं ब्रह्म को अपनी आत्मा के रूप में जानने वाली परम ज्ञानी हूँ और यज्ञ के योग्य शक्तियों में मेरा स्थान सर्वप्रथम है"। 


यह सूक्त भारतीय संस्कृति में राष्ट्र की आध्यात्मिक और एकात्म संकल्पना का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक आधार माना जाता है

Sunday, 21 June 2026

श्री शिव कवच



ॐ सर्वाय क्षितिमूर्तये नमः। 
ॐ भवाय जलमूर्तये नमः। 
ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नमः। 
ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः।
 ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः। 
ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नमः। 
ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः।
 ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नमः।


विनियोगः
ॐ अस्य श्रीशिव-कवच-स्तोत्र-मंत्रस्य श्री ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टप् छन्दः।

श्रीसदा-शिव-रुद्रो देवता। ह्रीं शक्तिः। रं कीलकम्। श्रीं ह्री क्लीं बीजम्।

 श्रीसदा-शिव-प्रीत्यर्थे शिव-कवच-स्तोत्र-पाठे विनियोगः।
 
ऋष्यादि-न्यासः
श्री ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टप् छन्दभ्यो नमः मुखे । श्रीसदा-शिव-रुद्रो देवतायै नमः हृदि । ह्रीं शक्तये नमः नाभौ । रं कीलकाय नमः पादयो । श्रीं ह्री क्लीं बीजाय नमः गुह्ये । 

श्रीसदा-शिव-प्रीत्यर्थे शिव कवच-स्तोत्र-पाठे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे

कर-न्यासः –
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ ह्लां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ नं रिं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जनीभ्यां नमः ।

 ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ मं रुं अनादि-शक्‍ति-धाम्ने अघोरात्मने मध्यामाभ्यां नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ शिं रैं स्वतंत्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने अनामिकाभ्यां नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो जातात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।

अङ्ग-न्यासः -
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ ह्लां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने हृदयाय नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ नं रिं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने शिरसे स्वाहा । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ मं रुं अनादि-शक्‍ति-धाम्ने अघोरात्मने शिखायै वषट् । 

 ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ शिं रैं स्वतंत्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने कवचाय हुं ।  

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो जातात्मने नेत्र-त्रयाय वौषट् । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट् ।  

              ॥ अथ ध्यानम् ॥

वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं काल कण्ठमरिन्दमम् ।
 सहस्र-करमत्युग्रं वंदे शंभुमुमा-पतिम् ॥ 
               ।। मूल-पाठ ।।  

मां पातु देवोऽखिल-देवतात्मा, 
संसार-कूपे पतितं गंभीरे । 
तन्नाम-दिव्यं वर-मंत्र-मूलं, 
धुनोतु मे सर्वमघं ह्रदिस्थम् ॥ १ ॥

 सर्वत्र मां रक्षतु विश्‍व-मूर्ति
र्ज्योतिर्मयानन्द-घनश्‍चिदात्मा । 
अणोरणीयानुरु-शक्‍तिरेकः, 
स ईश्‍वरः पातु भयादशेषात् ॥ २ ॥

यो भू-स्वरूपेण बिभात विश्‍वं, 
पायात् स भूमेर्गिरिशोऽष्ट-मूर्तिः ।
 योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति, 
सञ्जीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥ ३ ॥

कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा, 
सर्वाणि यो नृत्यति भूरि-लीलः ।
 स काल-रुद्रोऽवतु मां दवाग्नेर्वात्यादि-भीतेरखिलाच्च तापात् ॥ ४ ॥

 प्रदीप्त-विद्युत् कनकावभासो, 
विद्या-वराभीति-कुठार-पाणिः । चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः, 
प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम् ॥ ५ ॥

कुठार-खेटांकुश-पाश-शूल-कपाल-ढक्काक्ष-गुणान् दधानः ।
 चतुर्मुखो नील-रुचिस्त्रिनेत्रः, 
पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥ ६ ॥

कुन्देन्दु-शङ्ख-स्फटिकावभासो, 
वेदाक्ष-माला वरदाभयांङ्कः । 
त्र्यक्षश्‍चतुर्वक्त्र उरु-प्रभावः, सद्योऽधिजातोऽवस्तु मां प्रतीच्याम् ॥ ७ ॥

वराक्ष-माला-भय-टङ्क-हस्तः, 
सरोज-किञ्जल्क-समान-वर्णः । 
त्रिलोचनश्‍चारु-चतुर्मुखो मां, 
पायादुदीच्या दिशि वाम-देवः ॥ ८ ॥

वेदाभ्येष्टांकुश-पाश-टङ्क-कपाल-ढक्काक्षक-शूल-पाणिः । 
सित-द्युतिः पञ्चमुखोऽवताम् 
मामीशान-ऊर्ध्वं परम-प्रकाशः ॥ ९ ॥

मूर्धानमव्यान् मम चंद्र-मौलिर्भालं ममाव्यादथ भाल-नेत्रः ।
 नेत्रे ममाव्याद् भग-नेत्र-हारी, 
नासां सदा रक्षतु विश्‍व-नाथः ॥ १० ॥

पायाच्छ्रुती मे श्रुति-गीत-कीर्तिः, कपोलमव्यात् सततं कपाली ।
 वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो, 
जिह्वां सदा रक्षतु वेद-जिह्वः ॥ ११ ॥ 

कण्ठं गिरीशोऽवतु नील-कण्ठः, 
पाणि-द्वयं पातु पिनाक-पाणिः । 
दोर्मूलमव्यान्मम धर्म-बाहुर्वक्ष-
स्थलं दक्ष-मखान्तकोऽव्यात् ॥ १२ ॥

ममोदरं पातु गिरीन्द्र-धन्वा, 
मध्यं ममाव्यान्मदनान्त-कारी ।
 हेरम्ब-तातो मम पातु नाभिं, 
पायात् कटिं धूर्जटिरीश्‍वरो मे ॥ १३ ॥

ऊरु-द्वयं पातु कुबेर-मित्रो,
 जानु-द्वयं मे जगदीश्‍वरोऽव्यात् । 
जङ्घा-युगं पुङ्गव-केतुरव्यात्, 
पादौ ममाव्यात् सुर-वन्द्य-पादः ॥ १४ ॥

महेश्‍वरः पातु दिनादि-यामे,
 मां मध्य-यामेऽवतु वाम-देवः । 
त्र्यम्बकः पातु तृतीय-यामे,
 वृष-ध्वजः पातु दिनांत्य-यामे ॥ १५ ॥

पायान्निशादौ शशि-शेखरो मां,
 गङ्गा-धरो रक्षतु मां निशीथे । 
गौरी-पतिः पातु निशावसाने, 
मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्व-कालम् ॥ १६ ॥

अन्तःस्थितं रक्षतु शङ्करो मां,
 स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थित माम् ।
 तदन्तरे पातु पतिः पशूनां,
 सदा-शिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥ १७ ॥

तिष्ठन्तमव्याद् ‍भुवनैकनाथः, 
पायाद्‍ व्रजन्तं प्रथमाधि-नाथः । 
वेदान्त-वेद्योऽवतु मां निषण्णं,
 मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥ १८ ॥

 मार्गेषु मां रक्षतु नील-कंठः, 
शैलादि-दुर्गेषु पुर-त्रयारिः । 
अरण्य-वासादि-महा-प्रवासे, 
पायान्मृग-व्याध उदार-शक्तिः ॥ १९ ॥

 कल्पान्तकाटोप-पटु-प्रकोप-
स्फुटाट्ट-हासोच्चलिताण्ड-कोशः ।
 घोरारि-सेनार्णव-दुर्निवार-
महा-भयाद् रक्षतु वीर-भद्रः ॥ २० ॥

 पत्त्यश्‍व-मातङ्ग-रथावरूथ-
सहस्र-लक्षायुत-कोटि-भीषणम् । 
अक्षौहिणीनां शतमाततायिनाश्छिन्द्यान्मृडो घोर-कुठार-धारया ॥ २१ ॥

निहन्तु दस्यून् प्रलयानिलार्च्चिर्ज्ज्वलन् त्रिशूलं त्रिपुरांतकस्य ।
 शार्दूल-सिंहर्क्ष-वृकादि-हिंस्रान् सन्त्रासयत्वीश-धनुः पिनाकः ॥ २२ ॥

दुःस्वप्न-दुःशकुन-दुर्गति-दौर्मनस्य-
दुर्भिक्ष-दुर्व्यसन-दुःसह-दुर्यशांसि ।
 उत्पात-ताप-विष-भीतिमसद्‍-गुहार्ति-व्याधींश्‍च नाशयतु मे जगतामधीशः ॥ २३ ॥

        अमोघ शिव कवच 
             (संस्कृत में)

ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय ,सकल-तत्त्वात्मकायसर्व-मन्त्र-स्वरूपाय ,सर्व-यंत्राधिष्ठितायसर्व-तंत्र-स्वरूपाय,
 सर्व-तत्त्व-विदूराय ।

ब्रह्म-रुद्रावतारिणे , नील-कण्ठायपार्वती-मनोहर-प्रियायसोम-सूर्याग्नि-लोचनाय भस्मोद्‍-धूलित-विग्रहाय ।

महा-मणि-मुकुट-धारणाय, माणिक्य-भूषणाय ,सृष्टि-स्थिति-प्रलय-काल
-रौद्रावताराय , दक्षाध्वर-ध्वंसकाय ।

महा-काल-भेदनायमूलाधारैक-निलयाय , तत्त्वातीताय, गंगा-धराय ,सर्व-देवाधि-देवायषडाश्रयाय, वेदान्त-साराय ।

त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-
कोटि- ब्रह्माण्ड- नायकायानन्त-
वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्‍ख-
कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-
महा-नाग-कुल-भूषणाय।

 प्रणव-स्वरूपाय, चिदाकाशाय ,
आकाश-दिक्स्वरूपाय,
 ग्रह-नक्षत्र-मालिने सकलाय ।

कलङ्क-रहितायसकल-लोकैक कर्त्रे ,
सकल-लोकैक-भर्त्रे सकल-लोकैक-संहर्त्रे 

सकल-लोकैक-गुरवे ,सकल-लोकैक-साक्षिणे ,सकल-लोकैक-वर-प्रदाय,
 सकल-लोकैक-शङ्कराय।

 शशाङ्क-शेखराय ,शाश्‍वत-निजावासाय ,
निराभासाय ,निरामयाय ,निर्मलाय, निर्लोभाय।

 निर्मदाय, निश्‍चिन्ताय,निरहङ्काराय निरंकुशाय निष्कलंकाय, निर्गुणाय ,
निष्कामाय, निरुपप्लवाय ।

निरवद्याय ,निरन्तराय निष्कारणाय, निरातङ्काय , निष्प्रपंचाय, निःसङ्गायनिर्द्वन्द्वाय , निराधाराय ।

निरोगाय, निष्क्रोधाय निर्मलाय, निष्पापाय ,
निर्भयाय, निर्विकल्पाय ,निर्भेदाय, निष्क्रियाय ।

निस्तुलाय, निःसंशाय ,
निरञ्जनाय , निरुपम-विभवाय,
 नित्य-शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय, परम-शान्त-स्वरूपाय ,
तेजोरूपाय, तेजोमयाय ।

जय जय रुद्र महा-रौद्र ,महावतार महा-भैरव काल-भैरव ,कपाल-माला-धर, खट्वाङ्ग-खङ्ग-चर्म- पाशाङ्कुश-डमरु-शूल- चाप-बाण-गदा-शक्ति- भिन्दिपाल-तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ- भुशुण्डी-शतघ्नी-चक्राद्यायुध ।

भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-
कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-
विस्फारित, ब्रह्माण्ड-मंडल ,नागेन्द्र-
कुण्डल, नागेन्द्र-वलय ,नागेन्द्र-चर्म-धर, मृत्युञ्जय, त्र्यम्बक, त्रिपुरान्तक, विश्‍व-रूप, विरूपाक्ष ,विश्‍वेश्वर ,वृषभ-वाहन, विश्वतोमुख !

सर्वतो रक्ष, रक्ष । मा ज्वल ज्वल । महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय- ! 
चोर-भय-मुत्सादयोत्सादय । 
विष-सर्प-भयं शमय शमय । 

चोरान् मारय मारय । 
मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय । 
त्रिशूलेन विदारय विदारय ।
 कुठारेण भिन्धि भिन्धि । 
खड्‌गेन छिन्धि छिन्धि । 

खट्‍वांगेन विपोथय विपोथय । 
मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय । 
वाणैः सन्ताडय सन्ताडय । 
रक्षांसि भीषय भीषय । 

अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय । कूष्माण्ड-वेताल-मारीच-गण-ब्रह्म-
राक्षस-गणान्‌ संत्रासय संत्रासय । 
ममाभयं कुरु कुरु वित्रस्तं मामाश्‍वासयाश्‍वासय । 

नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर 
सञ्जीवय सञ्जीवय क्षुत्तृड्‌भ्यां मामाप्याययाप्याय दुःखातुरं मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय मृत्युञ्जय 
त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते नमस्ते ।

  ।। इति श्रीस्कंदपुराणे एकाशीतिसाहस्रयां तृतीये ब्रह्मोत्तरकखण्डे अमोघ-शिव-कवचं समाप्तम् ।।