हमारी आध्यात्मिक यात्रा में कहाँ तक है
*'प्राण' और 'अपान' के संतुलन को केवल एक
धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक "न्यूरो-बायोलॉजिकल" (तंत्रिका-वैज्ञानिक)
प्रक्रिया है। * हमारा जीवन इन दो विपरीत ऊर्जाओं के बीच के संघर्ष पर टिका है।
इसका वैज्ञानिक सार और प्रक्रिया इस प्रकार है:
१. प्राण और अपान का
विज्ञान: शरीर
में दो मुख्य चुंबकीय धाराएँ कार्य करती हैं: (i) प्राण (Prana): यह 'अभिकेंद्रित' (Centripetal) शक्ति
है जो बाहर से ऊर्जा को भीतर खींचती है और ऊपर की ओर गति करती है। इसका केंद्र कूटस्थ (दोनों भौहों के बीच) है। (ii) अपान (Apana): यह 'अपकेंद्रित' (Centrifugal) शक्ति
है जो ऊर्जा को नीचे की ओर और बाहर की ओर धकेलती है। इसका केंद्र मूलाधार (रीढ़ का निचला हिस्सा) है।
* समस्या: सामान्य मनुष्य में अपान
वायु अधिक शक्तिशाली होती है,
जो चेतना को इंद्रियों और काम-वासनाओं की ओर नीचे खींचती
है। जब तक ये दोनों धाराएँ संतुलित नहीं होतीं, मन कभी स्थिर नहीं हो
सकता।
२. संतुलन की प्रक्रिया:
क्रियायोग का आधार: श्वास के माध्यम से हम इन दोनों
धाराओं को एक "यज्ञ" (Internal
Fire) में होम कर देते हैं। इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया के मुख्य
चरण ये हैं: क.
श्वास का अंतरीकरण (Internalization
of Breath) जब हम गहरी और सजग श्वास लेते हैं, तो हम 'प्राण' को 'अपान' में और 'अपान' को 'प्राण' में विलीन करने का प्रयास
करते हैं। इससे श्वास की गति धीमी हो जाती है। ख. रीढ़ की हड्डी का दोलन
(Spinal Polarization): क्रियायोग की मुख्य तकनीक
में चेतना को रीढ़ की हड्डी (Sushumna)
के माध्यम से ऊपर और नीचे घुमाया जाता है। (i) आरोहण (Inhalation): अपान को ऊपर खींचकर प्राण
के साथ मिलाना। (ii) अवरोहण (Exhalation): प्राण को नीचे ले जाकर
अपान को शांत करना। ग. श्वास-हीन अवस्था (Breathless State): जब प्राण और अपान पूरी तरह
संतुलित हो जाते हैं, तो हृदय और फेफड़ों की गति स्वतः रुक जाती है। इसे ही योग में 'कुम्भक' या 'मृत्युरहित अवस्था' कहा जाता है। इस अवस्था
में शरीर को ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि वह सीधे 'आकाश' (Ether) से ऊर्जा ग्रहण करने लगता
है।
३. वैज्ञानिक लाभ: इस संतुलन से शरीर में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं: (i) रक्त का शुद्धिकरण: फेफड़ों पर बोझ कम हो जाता है और रक्त में कार्बन
डाइऑक्साइड पूरी तरह समाप्त होकर वह 'प्राण-शक्ति'
से भर जाता है। (ii) मस्तिष्क का विकास: रीढ़ के माध्यम से जब
ऊर्जा ऊपर उठती है, तो वह मस्तिष्क के उन सुप्त केंद्रों (Silent cells) को जागृत कर देती है जो
सामान्यतः निष्क्रिय रहते हैं। (iii) समय पर विजय: चूँकि उम्र श्वासों की
संख्या पर निर्भर करती है,
इसलिए जब योगी अपनी श्वास को स्थिर कर लेता है, तो वह समय के प्रभाव से
मुक्त हो जाता है।
४. महत्वपूर्ण निर्देश: चेतावनी दी है कि: (i) "प्राण-अपान के संतुलन की
वास्तविक 'क्रिया' केवल एक अधिकृत गुरु से ही
सीखी जानी चाहिए। यह एक शक्तिशाली 'सर्जरी' की
तरह है जिसे बिना मार्गदर्शन के करना खतरनाक हो सकता है।"
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