Wednesday, 17 June 2026

साधक की चेतना

 

 

                                                           साधक की चेतना

*प्राण और अपान का संतुलन ही वह कुंजी है जिससे एक योगी अपने भौतिक शरीर को 'प्रकाश' में बदल देता है और महासमाधि प्राप्त करता है। * तब साधक की चेतना (प्रकाश) बाहरी दुनिया से हटकर रीढ़ के भीतर 'सुषुम्ना' मार्ग से होती हुई आज्ञा चक्र या 'कूटस्थ' पर केंद्रित हो जाती है। * यहाँ उस दिव्य प्रकाश और नाद (ध्वनि) का एक सिद्ध योगी अनुभव करता है:

 १. कूटस्थ चैतन्य की ज्योति (The Spiritual Eye : जब साधक अपनी आँखें बंद कर दोनों भौहों के बीच एकाग्र होता है, तो उसे एक 'त्रिवर्ण' (तीन रंगों वाला) तारा दिखाई देता है, जिसे 'आध्यात्मिक नेत्र' कहा जाता है: (i) बाहरी सुनहरा घेरा (Golden Halo): यह 'ब्रह्मांडीय ऊर्जा' या पवित्र आत्मा (Holy Ghost) का प्रतीक है। (ii) भीतरी गहरा नीला गोला (Opal Blue): यह 'कृष्ण चेतना' या 'ईश्वर के पुत्र' (Christ Consciousness) का प्रतीक है, जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। (iii) केंद्र में सफेद तारा (Five-pointed Silver Star): यह 'परमेश्वर' या 'पिता' (Cosmic Consciousness) का द्वार है। योगिराज लाहिड़ी महाशय कहते थे कि इस तारे के भीतर प्रवेश करना ही वास्तविक 'पुनर्जन्म' है।

२. अनाहत नाद (The Cosmic Sounds): जैसे-जैसे ध्यान गहरा होता है, साधक को केवल प्रकाश ही नहीं, बल्कि विशिष्ट ध्वनियाँ भी सुनाई देती हैं। ये ध्वनियाँ ब्रह्मांड के विभिन्न स्तरों (चक्रों) के कंपन हैं: (i) मूलाधार- भौंरे की गुंजन (Humming of a Bee), पृथ्वी तत्व की ऊर्जा। (ii) स्वाधिठान: बासुरी की तान (flute), जल तत्व का स्पंदन । (iii) मणिपुरक - वीणा या हार्व की ध्वनि (Harp), अग्नि तत्व का तेज (iv) अनाहत : घंटे की गूंज (Bell or Gong), वायु तत्व की व्यापकता (v) विशुद्द :समुद्र की गर्जना , आकाश तत्व की अनंता . अंत में, ये सभी ध्वनियाँ मिलकर एक भव्य 'ओम्' (AUM) की ध्वनि में विलीन हो जाती हैं, जिसे बाइबल में 'आमीन' या 'शब्दा' कहा गया है।

३. 'कूटस्थ' दर्शन का वैज्ञानिक प्रभाव: जब साधक कूटस्थ के इस प्रकाश को देखता है, तो उसके मस्तिष्क की कोशिकाएं (Cells) दिव्य ऊर्जा से नहा जाती हैं। (i) भ्रम का नाश: इस ज्योति को देखने के बाद साधक को यह प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि 'प्रकाश' है।(ii) सर्वव्यापकता: नीले गोले के माध्यम से योगी अपनी चेतना को पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ महसूस करता है। वह चींटी से लेकर तारों तक, हर जगह खुद को ही देखता है।

४. "यदि तुम्हारी आँख एक हो...": ईसा मसीह ने बाइबल में कहा था: "If thine eye be single, thy whole body shall be full of light." (यदि तुम्हारी आँख एक हो, तो तुम्हारा पूरा शरीर प्रकाश से भर जाएगा)। श्री युक्तेश्वर जी ने स्पष्ट किया कि यहाँ 'एक आँख' का अर्थ वही 'कूटस्थ' या तीसरी आँख है, जहाँ दो भौतिक आँखों की दृष्टि मिलकर एक दिव्य अंतर्दृष्टि बन जाती है।

"यह तारा वह द्वार है जिससे होकर हर साधक को गुजरना पड़ता है ताकि वह अंधकार से निकलकर अनंत प्रकाश के साम्राज्य में प्रवेश कर सके।" परमहंस योगानंद

यह अनुभव साधना की परिपक्वता का प्रमाण है और साधक के भीतर के भय और मृत्यु के बोध को हमेशा के लिए समाप्त कर देता है।

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