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सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये
ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।न
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्यां
'तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये'।।
[ श्रीमदाद्यशंकराचार्यकृत द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्रम् ]
अर्थात् जो अपनी भक्ति प्रदान करने के लिये अत्यन्त रमणीय तथा निर्मल सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़, गुजरात) में भक्तजनों के दुःखों का विध्वंस करने की इच्छा से अवतीर्ण हुए हैं, चन्द्रमा की कला जिनके मस्तक का आभूषण है, ओषधीश सोम के द्वारा समाराधित उन ज्योतिर्लिंगस्वरूप भगवान् श्रीसोमनाथ की शरणमें मैं जाता हूँ।
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