कायाकल्प विज्ञान
१. कायाकल्प का अर्थ: (i) “काया” = शरीर । (ii) “कल्प” = परिवर्तन / नवीनीकरण ।
(iii)
उद्देश्य: पुराने कोशों को हटाकर नए तेजस्वी कोशों का
निर्माण। २. कायाकल्प की मुख्य विधियाँ: (क)
कुटीप्रावेशिक विधि : (i) साधक
४०–९० दिन बंद कुटिया में रहता है। (ii) सूर्य
प्रकाश और बाहरी वायु सीमित रहती है। (iii) विशेष
जड़ी-बूटियों और औषधियों का सेवन कराया जाता है। (iv) परिणाम: *पुराने बाल झड़ना ,**दाँत पुनः उगना ,***त्वचा का नवयौवन जैसा
होना । (ख) यौगिक एवं सौर विधि: (i) सूर्य विज्ञान और प्राण विद्या का प्रयोग। (ii) विशेष सूर्य रश्मियों को चक्रों पर केंद्रित किया जाता है। (iii)
शरीर में सूक्ष्म ऊर्जा परिवर्तन उत्पन्न होते हैं। (iv) परंपरा अनुसार महावतार बाबाजी ने विशेष “अमृत” का प्रयोग कराया था।
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कायाकल्प के प्रमुख चरण
*शुद्धिकरण: शरीर के विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। * कायापलट: पुरानी त्वचा हटकर नई
चमकदार त्वचा आती है। * इंद्रिय शक्ति:
दृष्टि और श्रवण अत्यंत तीव्र हो जाते हैं। * स्थिरता: श्वास और हृदय
गति पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। उदहारण - * मदन मोहन मालवीय द्वारा कायाकल्प प्रयोग का उल्लेख मिलता है। *
अमरकंटक के बर्फानी बाबा के बारे में भी कहा जाता है कि उन्होंने कायाकल्प किया था
। *कहा जाता है कि उनके बाल काले होने और तेज बढ़ने जैसे परिवर्तन दिखाई दिए।
ज्ञानगंज के योगियों का “वज्र शरीर”: *शरीर
को केवल “सेवा का वाहन” माना जाता है। *योग और औषधियों द्वारा शरीर का
पुनर्नवीनीकरण किया जाता है। * उद्देश्य: दीर्घकाल तक मानवता की सेवा।
सामान्य व्यक्ति के लिए सावधानी: *बिना
सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन के प्रयास जोखिमपूर्ण माने जाते हैं। *ब्रह्मचर्य और
मानसिक स्थिरता आवश्यक मानी जाती है। * तीव्र औषधियाँ और ऊर्जा साधारण शरीर सहन
नहीं कर पाता।
मुख्य सूत्र: * “शरीर प्रकाश के परमाणुओं का संघनन है।” * “प्रकाश
नियंत्रण से आयु नियंत्रण संभव माना गया है।”
"शरीर केवल प्रकाश के परमाणुओं का संघनन है। यदि आप प्रकाश को नियंत्रित करना
जानते हैं, तो
आप शरीर की आयु को भी नियंत्रित कर सकते हैं।"- परमहंस योगानंद
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ज्ञानगंज का “अमृत कुंड”
अमृत
कुंड का स्वरूप: *ज्ञानगंज के मध्य स्थित दिव्य जल
स्रोत। * “मानस सरोवर का सूक्ष्म रूप” माना जाता है। *
जल साधारण नहीं, “तरल प्रकाश” (Liquid Light) जैसा वर्णित। * इसमें से दिव्य “अष्टगंध” सुगंध निकलती रहती है। * जल का
रंग आध्यात्मिक ऊर्जा के अनुसार बदलता माना जाता है।
अमृत कुंड की विशेषताएँ
(क) प्राण शक्ति का केंद्र: *
इसमें प्राण शक्ति की अत्यधिक सांद्रता मानी जाती है। * इसे “अमृत” स्वरूप कहा गया
है। (ख) रोग निवारण: * असाध्य रोगों में
लाभकारी माना जाता है। * जल का स्पर्श रुग्ण कोशों को पुनर्जीवित करने वाला बताया
गया है। * शरीर में नई ऊर्जा और चेतना का संचार माना जाता है। मानसिक
शांति: * जल की बूंदें मस्तक पर लगाने से मानसिक विक्षेप शांत होने की
मान्यता। * साधक गहरे ध्यान की अवस्था में प्रवेश करता है।
अमृत
कुंड और चंद्र विज्ञान: *ज्ञानगंज में “चंद्र
विज्ञान” की साधना का उल्लेख मिलता है। * अमृत कुंड को चंद्र रश्मियों का संचयन
केंद्र माना जाता है। * पूर्णिमा की रात्रि में विशेष अनुष्ठान किए जाने की
मान्यता। * योगिनियाँ कुंड के चारों ओर साधना करती हैं। * इससे जल की औषधीय और
आध्यात्मिक शक्ति बढ़ने का विश्वास।
अमृत
कुंड का रहस्य: * यह केवल सामान्य भौतिक वस्तु नहीं
माना जाता। * विशेष चेतना स्तर पर ही इसके दर्शन संभव बताए गए हैं। * साधारण
व्यक्ति को वहाँ केवल हिम, पत्थर या सामान्य दृश्य दिखाई दे सकते हैं।
* इसे “आवृत्ति” (Frequency) और चेतना का रहस्य कहा गया है। *गुरु
कृपा को इसके अनुभव की कुंजी माना गया है।
मुख्य
सूत्र: *“अमृत कुंड” = प्राण, प्रकाश
और चेतना का संगम। *“दर्शन वही कर सकता है जिसकी चेतना
अनुकूल हो।” *“गुरु
कृपा के बिना सूक्ष्म लोक का अनुभव कठिन माना गया है।”
एक प्रसिद्ध घटना: विशुद्धानंद जी के जीवन से
जुड़ी एक कथा है कि उन्होंने एक मरणासन्न व्यक्ति को ज्ञानगंज से लाए गए जल की कुछ
बूंदों से पुनर्जीवित कर दिया था। जब उनसे पूछा गया कि क्या यह गंगाजल है, तो उन्होंने मुस्कुराकर
कहा था, "यह
उस गंगा का जल है जो अभी तक पृथ्वी के धरातल पर नहीं उतरी—यह सिद्धाश्रम का मानस-अमृत है।"
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"अमृत कहीं बाहर नहीं,
बल्कि आत्मा की उस अवस्था में है जहाँ मृत्यु का अस्तित्व
समाप्त हो जाता है। ज्ञानगंज का कुंड उसी अवस्था का भौतिक प्रतीक है।"
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'दिव्य पुस्तकालय ' या'विज्ञान
भवन' या
'सिद्धाश्रम
का अभिलेखागार'
अकाशिक रिकॉर्ड्स (Akashic Records) का
भौतिक रूप: इसे
ब्रह्मांड का 'अक्षय
भंडार' माना
जाता है। योगियों का कहना है कि ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटा है, घट रहा है या घटने वाला है, वह सब 'आकाश' (Ether) में तरंगों के रूप में
दर्ज होता है। ज्ञानगंज का यह पुस्तकालय उन सूक्ष्म तरंगों को 'पढ़ने योग्य' रूप में सुरक्षित रखता है।
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पुस्तकालय
की अद्भुत विशेषताएँ: (i) जीवंत पुस्तकें: यहाँ की 'पुस्तके' कागज की नहीं बनी हैं। कहा
जाता है कि वे एक विशेष प्रकार के 'प्रकाश पुंज' (Light Sheets) से निर्मित हैं। जब कोई योगी किसी
विशेष कालखंड के बारे में जानना चाहता है, तो वह ज्ञान उसके सामने
किसी चलचित्र (Movie) की
तरह सजीव हो उठता है। (ii) लुप्त विद्याएँ: यहाँ वे सभी शास्त्र और
विद्याएँ सुरक्षित हैं जो पृथ्वी पर समय के साथ लुप्त हो गईं (जैसे मूल ऋग्वेद की
लुप्त शाखाएँ, अटलांटिस
का विज्ञान, और
प्राचीन विमान शास्त्र)। (iii) भविष्य का ज्ञान: इसमें केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि आने वाले युगों के 'संभावित घटनाक्रम' भी सुरक्षित हैं, जिन्हें पढ़कर महावतार
बाबाजी जैसे सिद्ध महापुरुष भविष्यवाणियाँ करते हैं।
भाषा का रहस्य: * पुस्तकालय में किसी भाषा का बंधन नहीं है। * यहाँ ज्ञान 'भाव-लिपि'
(Thought-script) में है। *
एक साधक जिस भी भाषा का ज्ञाता हो,
उसे वह ज्ञान उसी भाषा में समझ आने लगता है। यह सीधे आत्मा
से संवाद करने वाली तकनीक है।
पुस्तकालय के संरक्षक: पुस्तकालय की सुरक्षा का कार्य 'ज्ञान अधिकारिणी' योगिनियों और उच्च ऋषियों के अधीन
है। *
यहाँ प्रवेश केवल उन सिद्धों को मिलता है जो 'त्रिकालदर्शी' होने की क्षमता रखते हैं।
* 'सूर्य
विज्ञान' के
कई जटिल सूत्र इसी दिव्य पुस्तकालय से प्राप्त हुए थे।
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ज्ञानगंज = अध्यात्म + परा-विज्ञान का दिव्य विज्ञान-केंद्र।
ग्रह-ऊर्जा शोध = मानव जीवन पर ब्रह्मांडीय प्रभावों का अध्ययन।
ज्ञान = नष्ट नहीं होता, केवल ओझल होता है; पात्रता
पर गुरु उसकी कुंजी देते हैं।
ज्ञानगंज = पृथ्वी का “आध्यात्मिक उपग्रह”, जो युगों
से मानवता का मार्गदर्शन करता है।
सिद्ध योगी = मानवता के लिए “अदृश्य सरकार” समान कार्यरत।
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