यह सूत्र सनातन धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के 'वाक् सूक्त' (जिसे 'देवी सूक्त' भी कहा जाता है) से उद्धृत है। ऋग्वेद के 10वें मण्डल का यह 125वाँ सूक्त है, और यह इसका तीसरा मंत्र है।
पूरा मंत्र इस प्रकार है:
"अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥"
मंत्र की मुख्य बातें और संदर्भ
ऋषिका (मंत्र द्रष्टा): इस सूक्त की द्रष्टा महर्षि अम्भृण की पुत्री वाक् आम्भृणी हैं।
देवता: इस सूक्त का देवता 'आत्मा' या 'साक्षात् चित्-शक्ति (देवी)' है। ब्रह्मज्ञान से संपन्न होकर वाग्देवी परमात्मा (परम चेतना) से एकात्मता का अनुभव करते हुए स्वयं यह उद्घोष करती हैं।
सरल भावार्थ: "मैं ही पूरे ब्रह्मांड/जगत की अधीश्वरी (स्वामिनी) हूँ। मैं ही अपने उपासकों को धन और ऐश्वर्य प्राप्त कराने वाली हूँ। मैं ब्रह्म को अपनी आत्मा के रूप में जानने वाली परम ज्ञानी हूँ और यज्ञ के योग्य शक्तियों में मेरा स्थान सर्वप्रथम है"।
यह सूक्त भारतीय संस्कृति में राष्ट्र की आध्यात्मिक और एकात्म संकल्पना का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक आधार माना जाता है
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