Thursday, 9 July 2026

सूर्य और राशि



अस्यै कालयज्ञाय नमः।

हम कालकी नाना रूपोंमें उपासना करते हैं। कालने हमें चारों ओरसे आवृत कर रखा है। ऐसे कालकी उपासना हम भला क्यों न करें ? यह मन्त्र है-

ऋतून् यज ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान् । समाः संवत्सरान् मासान् भूतस्य पतये यजे ॥

(अथर्व० ३।१०।९)
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ऋतून् यज (यजे) मैं ऋतुओंका यजन करता हूँ यजु ऋतुओं के अनुकूल खान-पान, आचार-विचार रखता है करता तथा ऋतुओंके अनुकूल नियत कर्मोंका सम्पादन करता है। दो-दो मास की एक ऋतु होती है। बारह मासका एक वर्ष होता है।

 इसलिये एक वर्षमें छः ऋतुएँ होती हैं। छः ऋतुओंका एक चक्र होता है। इस चक्रके कारण वर्षको षडानन, षडास्य, षण्मुख (छः मुखों, मासोंवाला देवता) कहते हैं।

 ऋतुओंका जनक सूर्य है। सूर्यकी राशि स्थिति के अनुसार ऋतुओं का प्रवर्तन होता है। 

मीन एवं मेष राशिका सूर्य वसन्त ऋतु का कारक है। 

इसी प्रकार सूर्य के वृष-मिथुन में रहने से ग्रीष्म ऋतु।

कर्क-सिंह में विचरण करने से वर्षा-
ऋतु।

कन्या-तुला को आक्रान्त करने से शरद्-ऋतु।

 वृश्चिक-धनु में गमन करने से हेमन्त ऋतु।

 तथा मकर-कुम्भका भोग करनेसे शिशिर ऋतु होती है। 

ऋतवे षण्मुखाय नमः ।

ऋतुपतीन् यजे - ऋतुपतियोंकी मैं उपासना करता हूँ। सूर्यको ऋतुपति कहते हैं। सूर्यके द्वादश स्वरूप हैं।

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