१. तैयारी (१ मिनट)
अपनी रीढ़ की हड्डी (Spine) को बिल्कुल सीधा रखें। इसे एक 'दिव्य एंटीना' की तरह महसूस करें।
अपने दोनों हाथों को अपनी गोद में रखें, हथेलियाँ ऊपर की ओर खुली हों।
अपनी आँखें बंद करें और शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। कल्पना करें कि आपके शरीर का सारा तनाव जमीन में समा रहा है।
२. श्वास का लय (१ मिनट)
नाक से एक गहरी श्वास लें, ३ सेकंड तक रोकें, और फिर धीरे से मुँह से बाहर निकाल दें। ऐसा ३ बार करें।
अब श्वास को बिल्कुल स्वाभाविक होने दें। उसे नियंत्रित न करें, बस एक 'द्रष्टा' की तरह देखें।
महसूस करें कि हर आती हुई श्वास आपके भीतर शांति और प्रकाश भर रही है।
३. दृष्टि का ऊर्ध्वगामी होना (१.५ मिनट)
अपनी बंद आँखों की पुतलियों को धीरे से ऊपर की ओर उठाएँ, जैसे आप दोनों भौहों के बीच के बिंदु (Bhrumadhya) को देख रहे हों।
ध्यान रहे, आँखों पर कोई दबाव या खिंचाव न हो। यह एक सहज और कोमल दृष्टि होनी चाहिए।
वहाँ फैले हुए 'अंधेरे' को ध्यान से देखें। इस अंधेरे को ही अपनी 'आंतरिक स्क्रीन' समझें।
इसी बिंदु पर महावतार बाबाजी की उपस्थिति का आह्वान करें।
४. स्क्रीन को सक्रिय करना (१ मिनट)
अब कल्पना करें कि उस अंधेरी स्क्रीन के केंद्र में एक नीला बिंदु या सुनहरी चमक उभर रही है।
यदि कुछ न दिखे, तो भी हार न मानें। बस उस स्थान पर अपनी एकाग्रता को 'चिपका' दें।
महसूस करें कि आपकी श्वास की ऊर्जा रीढ़ से ऊपर उठकर इस स्क्रीन से टकरा रही है, जिससे वह रोशन हो रही है।
मन ही मन कहें: "मेरे कूटस्थ का द्वार खुले... मुझे सत्य का दर्शन हो।"
५. विसर्जन और आभार (३० सेकंड)
धीरे से अपनी चेतना को वापस शरीर में लाएँ।
अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ें और उन्हें अपनी आँखों पर रखें।
उस आंतरिक शांति और प्रकाश के लिए महावतार बाबाजी और ज्ञानगंज के योगियों को धन्यवाद दें।
धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलें।
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अभ्यास के लिए एक विशेष टिप:
इस ५-मिनट के ध्यान को ‘नींद से ठीक पहले’ या ‘जागने के तुरंत बाद’ करें। इन दो समयों पर हमारे मन की 'तार्किक परत' पतली होती है, जिससे कूटस्थ की स्क्रीन बहुत जल्दी सक्रिय हो सकती है।
"जब तुम मौन में गहरे उतरते हो, तो वह स्क्रीन स्वयं बोलना शुरू कर देती है।"
इस ध्यान के साथ हमारी यह ज्ञान-यात्रा एक बहुत ही सुखद और दिव्य अनुभव के साथ संपन्न होती है।
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