Sunday, 20 September 2026

संघ साहित्य समग्र चिंतन प्रवाह

 

संघ साहित्य समग्र चिंतन प्रवाह

अखिल भारतीय साहित्य परिषद

(एक समीक्षात्मक दृष्टि )

प्रो उमेश कुमार सिंह

         अखिल भारतीय साहित्य परिषद् भारतीय भाषाओं का एक प्रमुख देशव्यापी वैचारिक और रचनात्मक संगठन ह।

## स्थापना कब और कैसे हुई?

* स्थापना की तिथि और स्थान: अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की स्थापना 27 अक्टूबर, 1966 को भारत की राजधानी दिल्ली में की गई थी। 1975 में तहस-नहस हो गया। 1986 में रजिस्ट्रेशन हुआ। और भारतीय साहित्य परिषद् से अखिल भारतीय साहित्य परिषद् बना। परंतु रजिस्ट्रेशन फिर दुबारा हुए लगभग 2000के आसपास।

* प्रारंभिक नाम व पहला अधिवेशन: शुरुआत में इसका नाम केवल 'भारतीय साहित्य परिषद्' रखा गया था, जिसे बाद में कार्य विस्तार होने पर 'अखिल भारतीय साहित्य परिषद्' कर दिया गया। इसकी स्थापना के वर्ष ही इसका प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन सुप्रसिद्ध हिन्दी विचारक और साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में संपन्न हुआ था। संगठन को धरातल पर खड़ा करने और इसके शुरुआती ढाँचे का दायित्व सरदार जीतसिंह 'जीत' को सौंपा गया था। 

स्थापना के पीछे का कारण क्या है?

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की स्थापना के पीछे मुख्य रूप से सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का व्यापक लक्ष्य था।

   भारतीय दृष्टिकोण का विकास: तत्कालीन समय में साहित्य जगत पर हावी हो रहे एकांगी और अभारतीय विचारों के प्रतिवाद में, शुद्ध भारतीय जीवन-मूल्यों, संस्कृति, दर्शन और लोक-चेतना पर आधारित साहित्यिक मंच की आवश्यकता थी। 

   कुसंस्कृति से समाज की रक्षा: समाज में फैल रही नकारात्मकता और कुसंस्कृति से भारतीय जीवन पद्धति को बचाना और साहित्य के माध्यम से देश में सकारात्मक चेतना जगाना इसका ध्येय था। 

   भाषाई एकता: भारत की सभी प्रांतीय और राष्ट्रीय भाषाओं के साहित्यकारों, समीक्षकों और विचारकों को एक मंच पर लाना, जिससे भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढे।

जैनेन्द्र कुमार जैन। माधवराव मुले।नाना जी देशमुख। रत्न सिंह शांडिल्य।आनंद असिद और जीत सिंह जीत।

यह संगठन वैचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की प्रेरणा और दृष्टि से अस्तित्व में आया। संघ के वरिष्ठ विचारकों और तत्कालीन नेतृत्व (विशेष रूप से परम पूजनीय श्री गुरुजी यानी माधव सदाशिवराव गोलवलकर) की यह तीव्र इच्छा और दूरगामी सोच थी कि राष्ट्र के वैचारिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए केवल राजनीतिक या सामाजिक मंच ही काफी नहीं हैं। साहित्य का समाज पर गहरा प्रभाव होता है, इसलिए साहित्य जगत में एक ऐसा राष्ट्रीय संगठन खड़ा होना चाहिए जो भारत के 'स्व' (स्वत्व) को जगा सके।

इसी राष्ट्रनिष्ठा की भावना से प्रेरित होकर जैनेन्द्र कुमार जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों, चिंतकों और प्रबुद्ध नागरिकों ने मिलकर इस संगठन की नींव रखी। 

          २७ आलेखों की पुस्तक अपने मुखपृष्ठ से ही पाठकों को सन्देश देती है-जिसमें संघ चिंतन प्रवाह और करणीय बिन्दुओं को समझने के लिए– शाखा, अनुशासित कार्यकर्ता, लक्ष्य को प्रेरित करती प्रार्थना, अनुशासन है। जीवन, समाज मन के संस्कारों को परिष्कृत करता प्रचारक । कर्तव्य और समर्पण की दिशा देते गीत, संस्कार के साथ सेवा, स्वदेशी, ‘स्व’ की पहचान कराता एकात्म मानव दर्शन का विचार प्रवाह। स्वतंत्रा का स्मरण करता गोवा आन्दोलन, अपनों द्वारा अपनों के लिए आपातकाल,   लोक मंगल की भावना से इन सब को लोक में प्रवाहित करता 'लोक साहित्य'। यह सब इस पुस्तक के आलेखों में समाहित हैं।

            आलेखों की बात करें तो संघ की पुस्तकों पर समीक्षात्मक सात आलेख हैं। दो आलेख 'संघ गीत' पर हैं। एक आलेख 'एकात्मता स्तोत्र' पर है। एक-एक आलेख गोवा आन्दोलन और संघ, आपातकाल और संघ तथा सेवा पर आधारित हैं। एक आलेख एकनाथ रानडे-विवेकानद शिला स्मारक को लेकर है। एक आलेख 'एकात्म मानवदर्शन' पर है। एक आलेख और होना चाहिए था संघ की प्रतिज्ञा पर जो संघ के चिंतन प्रवाह का मुख्य आयाम है 

            कथ्य पर विचार करे तों द्त्तोपंत ठेंगड़ी की पुस्तक 'संकेत रेखा ' पर श्री गुरुजी के जीवन के सभी पक्ष, राष्ट्र की चिति, शिक्षा आदि पर आधारित है। पूज्य श्री गुरु जी कहते हैं, भारत राष्ट्र सांस्कृतिक राष्ट्र है और यह धरती हमारी माता है । संघ प्रार्थना में स्वयंसेवक कहता है,'हे वत्सला मातृभूमि तू ही हिन्दुभूमि है, तू महामंगलकारी और पुण्यमयी है। 

सेक्युलर शब्द को पंथ निरपेक्ष के अर्थ में माना गया है। ईसाई और मुसलमानों की पूजा पद्धति अलग होगी किन्तु जो इस देश में हैं, उनके पुरखें एक हैं। 

अत: प्रत्येक अभारतीय दृष्टि को, यूरो सेंट्रिक दृष्टि को भारतीय और प्रत्येक भारतीयता से सम्पन्न  जन को राष्ट्रीय विचार प्रवाह से जोड़ना है । 

भारत का स्वरूप श्वेतबाराह कल्पे, भरतखंडे, आर्यावर्ते से सनातन परंपरा के साथ आते-आते आज हिन्दू, हिंदुस्तान, भारत और भारतवर्ष नामों से जाना जाता है ।

     आलेख की यात्रा सुरेश सोनी जी की पुस्तक 'भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा' का परिचय कराती है । भारत कैसे विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय करता है । आलेख स्पष्ट करता है भारत में वह सब कुछ है जो मानुषी के कल्याण के लिए आवश्यक है ।

   आज संघ को समझने के लिए उसके साहित्य को पढ़ा जाता है किन्तु महत्व दृष्टि को समझना होगा। जैसे लेख में आया कि संघ की स्थापना 27 सितंबर,1925 को विजया दशमी के दिन हुई। यह लेख की परम्परा अभारतीय है। तब भारतीय क्या है?

उत्तर है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना विजयादशमी के दिन हुई थी । उस दिन,उस वर्ष की तारीख 27 सितम्बर, 1925 थी। 

आज भी संघ का स्थापना दिवस 27 सितंबर को नहीं, विजयादशमी की तिथि को मनाते हैं। यह संघ को, भारतीय परम्परा को समझने की दृष्टि है।

प्रारम्भिक काल में संघ का अधिकांश काम मौखिक संवाद, बैठकों और शाखाओं के माध्यम से होता था। संघ के वैचारिक और संगठनात्मक स्वरूप को लिखित रूप में सामने लाने का शुरुआती श्रेय गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) के लेखों और उनकी वर्ष 1939 में प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तक वी, ऑर नेशनहुड डिफाइंड’ (We, Our Nationhood Defined) को जाता है, हालांकि यह मुख्य रूप से राष्ट्रीयता और संघ के वैचारिक दर्शन को परिभाषित करती है। इसके अलावा, संघ के इतिहास और कार्यपद्धति का 

आधिकारिक एवं प्रामाणिक परिचय देने वाली शुरुआती पुस्तकों में संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी के भाषणों का संग्रह विचार नवनीत’ (Bunch of Thoughts) भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की सबसे पहली और प्रामाणिक जीवनियों में से एक डा. हेडगेवार चरित्र नाम से श्रीकृष्ण दामोदर सातवलेकर द्वारा लिखी गई थी, जो उनके जीवनकाल के तुरंत बाद वर्ष 1941 में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद संघ के प्रचारक चक्रधर राव भिशीकर द्वारा लिखित जीवनी केशव: संघ निर्माता भी ऐतिहासिक रूप से बेहद प्रामाणिक और प्रसिद्ध है।

            प्रार्थना: संघ की प्रसिद्ध प्रार्थनानमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे...की रचना वर्ष 1939 में प्रोफेसर नरहरि नारायण भिड़े द्वारा संस्कृत में की गई थी। इसे सबसे पहले सार्वजनिक रूप से 18 मई, 1940 को नागपुर के संघ शिक्षा वर्ग में गाया गया था, जिसे कुछ परिवर्तन के साथ 1940 के दशक में ही आधिकारिक प्रार्थना के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

          इसी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिज्ञा (शपथ) "सर्वशक्तिमान परमेश्वर तथा अपने पूर्वजों का स्मरण कर मैं प्रतिज्ञा करता हूँ की अपने पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, और हिन्दू समाज का संरक्षण कर हिन्दू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूँ । संघ का कार्य मैं प्रामाणिकता से, नि:स्वार्थ बुद्धि से तथा तन, मन, धन पूर्वक  करूंगा  और इस व्रत का मैं आजन्म पालन करूंगा।  भारत माता की जय । "

 जिसमें देश की रक्षा और हिंदू समाज के संगठन का संकल्प लिया जाता है, उसे वर्ष 1940 के दशक के शुरुआती वर्षों ,  विशेषकर श्रीगुरुजी के कार्यकाल के दौरान संगठन को एक स्पष्ट वैचारिक व औपचारिक रूप देते समय संघ की कार्यपद्धति में आधिकारिक रूप से शामिल किया गया था। यही से संघ की साहित्य की यात्रा प्रारम्भ होती है । आज साहित्य तो बहुत प्रचुर मात्रा में है किन्तु पाठक कम हैं और उससे भी कम विषयबोध और आचरण की सुचिता उतनी ही कम ।

            पुस्तक कहती है शाखा में संघ दिखाई देता है तो साहित्य में संघ बोलता है, संवाद करता है । प्रश्न है क्या साहित्य का संवाद बिना आचरण के सार्थकता को प्राप्त कर सकता है ? क्या साहित्य बिना व्यवहार में उतरे जीवन की अभिव्यक्ति दे सकता है ? विचारणीय है साहित्य यदि ठीक से पढ़ा गया और उसने जीवन को गढ़ने की उत्सुकता दिखाई तो शाखा से परिचय होता है । शाखा ही है जहां आत्मीयता, समरसता के संस्कार दृढ़ होते हैं। संस्कार निष्ठा को प्रगाढ़ करता है । तब स्वयंसेवक का जीवन समाज में उतरता है। किन्तु शाखा का विकल्प शाखा ही है ।   

            अखंड भारत केवल भारत-पाकिस्तान विभाजन तक सीमित नहीं है। यह विभाजन की यात्रा अफगानिस्तान 1887 से 1947 तक की है । महाभारत के पात्र गांधार की स्मृति दिलाते हैं तो रामायण मान्धाता के राज्य को भी। साहित्य, व्याकरण, शक्तिपीठ भारत की सांस्कृतिक यात्रा को पूर्ण करते हैं।

             भारत कोई कोरी स्लेट नहीं। भारत में विज्ञान की उज्ज्वल पम्परा विज्ञान और अध्यात्म पर आधारित है। किन्तु इसका आधार उसके अपने शब्दों की समझ पर निर्भर करता है । यथा - धर्मनिरपेक्षता नहीं पंथ निरपेक्षता, राष्ट्रवाद नहीं राष्ट्रीयता। यूरोप, जर्मनी, जापान कहीं भी इसका उस भाषा में शब्द नहीं है । इसी तरह राष्ट्रीयता शब्द है में राष्ट्रवाद का पर्याय नहीं , राष्ट्र का सत्त्व अंतर्निहित है। पुस्तक की इन तथ्यत्मक त्रुटियों को भी समझना होगा। विचारणीय पक्ष यह भी है की हमें आलेख,शोध-आलेख और रचनाधर्म की आत्मा को समझना होगा । चिंतन को ठीक से समझना होगा। अन्यथा कथ्य प्रभावी नहीं होता । 

            15 अगस्त, 1947 को भौगोलिक विभाजन हुआ। वह आज भी कट्टरता और उदारता के द्वन्द्व में जी रहा है। स्मरण रखना होगा राष्ट्र की चिति भूगोल के कटने से समाप्त नहीं होती, वह कहीं प्रज्ज्वलित दिखती है तो कहीं राख़ के ढेर के नीचे दाबी रहती है । इसी तरह भारत नहीं 'भारतवर्ष'। अर्थात काल और भूगोल की अवधारणा । यही वह तत्व बोध है जो विभाजन को स्वीकार नहीं करता । महर्षि अरविंद घोषणा कराते है यह विभाजन कृतिम है ।   

            मिल, मेकाले और मार्क्स के साथ मैक्समूलर ने भी  हमारे अतीत पर गोली दागी हैं ? इतिहास, जीवन-दर्शन, पर  अनर्गल प्रश्न खड़ा किए ? किन्तु स्वत्त्वों की विस्मृति ने विदेशियों की गोली को वर्तमान की हमने तोप बना दिया । हमारा बोध , भाषा, भूषा, भजन, भोजन , भेषज, भ्रमण, आदि में बदला आया । तात्पर्य यह की आचरण हमने बदले हैं दोष उन्हें देते हैं । अतीत की इसी स्मृति को, 'स्व' के बोध में जब-जब खंडित दृश्य उपस्थित हुआ ऋषियों, संतों सामाजिक कार्यकर्ताओं, संगठनों ने जगाने का कार्य किया , आज उसी कार्य को संघ 100 वर्षों से कर रहा है ।  किन्तु क्या हमारी वृति और प्रवृति बदली है ?   

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति:, जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः।

केनापि देवेन हृदि स्थितेन, यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि॥

            मैं जानता हूँ कि धर्म क्या है, किंतु उसमें मेरी प्रवृत्ति (रुचि या झुकाव) नहीं होती। मैं यह भी जानता हूँ कि अधर्म क्या है, पर उससे मेरी निवृत्ति नहीं होती। मेरे हृदय में स्थित कोई अज्ञात शक्ति या मेरे संस्कार जैसा मुझसे करवाते हैं, मैं वैसा ही करता हूँ।  तात्पर्य यह की केवल सही और गलत का बौद्धिक ज्ञान (Information) होना ही पर्याप्त नहीं होता; यदि व्यक्ति के अंतःकरण और संस्कार कमजोर हैं, तो मनुष्य सब कुछ जानते हुए भी विवश होकर गलत मार्ग पर चलता चला जाता है।

            संघ गीत पर दो आलेख हैं । दूसरे आलेख में सर्वाधिक गलतियाँ हैं। यदि पुस्तक के अन्य संस्कारण आयें तो उसमें बारीकी से वर्तनी तथा गीत के शब्दों में सुधार अवश्य होना चाहिए ।

            संघ की इतिहास दृष्टि पर  इंदुशेखर जी कहते हैं की " संघ की इतिहास दृष्टि का सबसे बड़ा प्रमाण है, स्वयंसेवकों द्वारा प्रतिदिन पठनीय एकात्मता स्तोत्र। एकात्मता स्तोत्र राष्ट्र निर्माताओं की स्मृति को जीवंत बनाते हैं । भविष्य के भारत के दृष्टिकोण में आत्मनिर्भर भारत कैसे बने और कैसा होगा की चर्चा है जिसमें स्वदेशी से लेकर नारी सशक्तिकरण तक की बात है , जिसका निष्कर्ष विश्व गुरु भारत है । अगला आलेख प्रो हरीश कुमार का भी इसी विषय वस्तु को लेकर और उसी पुस्तक पर आधारित है । पद्मनाभ पाण्डेय ने कार्यकर्ता पुस्तक पर आलेख दिया है । यह पुस्तक अधिष्ठान आधारित कार्यकर्ता की लिए मार्गदर्शिका है । इसमें सिद्धांत और व्यवहार के समन्वय के बिना कार्यकर्ता सफल नहीं हो सकता की चर्चा है ।

            'तत्त्वमसि' में शब्द प्रयोग है, सभी ब्रह्मसूत्र की जगह वैदिक वांगमय के सूत्र आना चाहिए था । वैदिक में सूत्र परंपरा है। ब्रह्म सूत्र वेदान्त दर्शन का वादरायन द्वारा रचित मूल ग्रंथ है । इसे उत्तर मीमांसा सूत्र, शारीरिक सूत्र आया नया प्रस्थान भी कहा जाता है । इसमें 555 सूत्र , चार अध्याय –समन्वय, अविरोध, साधन, और फल अध्याय हैं ।  

            कम से कम शब्दों में एक छोटा वाक्य सूत्र कहलाता है । सूत्र की परंपरा तीन जगह है- (एक) -  वेदांग से जुड़े सूत्र ग्रंथ ( कल्प सूत्र) कहलाते हैं ।  वेद को ठीक से समझने के लिए  इसमें से (कल्प) नियम /विधि  को चार प्रकार से सूत्रों में लिखा गया है – (i) श्रोत सूत्र -यज्ञ , आहुतियों की विधि। (ii) गृहय सूत्र –संस्कार , जन्म विवाह /पूजा –पाठ विधि ।  (iii) धर्म सूत्र – राजा-प्रजा हेतु  नियम, नैतिकता जो बाद में स्मृतियों के रूप में आईं ।  (vi) शूलभ सूत्र – ज्यामिती और गणित । (दो) -   दर्शन से जुड़े सूत्र -  षड्दर्शन के सूत्र : (i) न्याय दर्शन का न्यायसूत्र – महर्षि गौतम ।  (ii) वैशेषिक दर्शन का  वैशेषिक सूत्र- महर्षि कणाद । (iii) सांख्य दर्शन का न्याय सूत्र- महर्षि कपिल । (iv)  योग दर्शन का योग सूत्र – महर्षि पतंजलि (v) मीमांसा दर्शन – मीमांसा सूत्र – महर्षि जैमिनी (vi) वेदान्त दर्शन – ब्रह्म सूत्र – महर्षि पतंजलि । (तीन) -  व्याकरण सूत्र – आष्टाध्यायी चार हजार छोटे सूत्र ।  इन सूत्रो को  समझने के लिए जो व्याख्याएँ लिखी गई  उन्हें भाष्य, वर्तिका या वृति कहते हैं ।   

''तत्त्वमसि' और 'अहं ब्रह्मास्मि' दोनों ही सनातन धर्म के वेदों के महावाक्य हैं, जो जीव (आत्मा) और ब्रह्म (परमात्मा) की अद्वैतता (एकता) को दर्शाते हैं। किन्तु दोनों का दार्शनिक संदेश एक होते हुए भी इनके प्रयोग और दृष्टिकोण में थोड़ा अंतर है- 'तत्त्वमसि' सामवेद के एक मन्त्र के अनुसार इस सृष्टि का आदि कारण परब्रह्म ही है। इस मन्त्र में ब्रह्म का वाचक "तत्" शब्द है। वेदान्त में "तत्" सर्वनाम परम् सत् का वाचक माना गया है। यह प्राचीन परम्परा है। "तत्त्वमसि" महाकाव्य में "तत्" इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।  इसमें गुरु अपने शिष्य को सत्य का बोध कराता है, तब वह इसका प्रयोग करता है। इसमें 'तत्' (वह) का अर्थ संपूर्ण ब्रह्मांड या परम सत्य (ब्रह्म) है और 'त्वम' (तू) का अर्थ सुनने वाला शिष्य या जीव है। गुरु शिष्य को समझाता है कि जो परम शक्ति इस संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है, वही असल में तुम्हारा भी मूल स्वरूप है।

            किन्तु 'अहं ब्रह्मास्मि' ,"मैं ब्रह्म हूँ" । यह यजुर्वेद की बृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है। यह एक 'अनुसंधान वाक्य' या अनुभूति का वाक्य है। जब कोई साधक या ऋषि गहन साधना, ध्यान और आत्म-चिंतन के बाद स्वयं इस सत्य का अनुभव कर लेता है, तब वह उद्घोष करता है,"मैं ही ब्रह्म हूँ"। यह व्यक्तिगत अनुभव (साक्षात्कार) की अभिव्यक्ति है। तत्त्वमसि में मध्यम पुरुष   - "तू ऐसा है" जबकि अहं ब्रह्मास्मि में उत्तम पुरुष - "मैं ऐसा हूँ" है। निष्कर्ष: 'तत्त्वमसि' के माध्यम से गुरु शिष्य को बाहर से भीतर की ओर संकेत करता है, और जब वह शिष्य उस सत्य को खुद में पा लेता है, तो वह 'अहं ब्रह्मास्मि' के रूप में उसकी पुष्टि करता है। संघ दृष्टि से स्वयंसेवक भगवा ध्वज गुरु के सामने जो तत्वज्ञान प्राप्त करता है, वह तत्त्वमसि है, किन्तु जब वह बोध आत्मसाक्षातार में बदलता है , 'प्रचारक' वृति धारण करता है तब वह घोषणा करता है 'अहं ब्रह्मास्मि',"मैं ब्रह्म हूँ" । मैं इस हिन्दू धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण कर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूँ।

            तत्वमसि में एक वाक्य  आया है " संघ प्रचारक वे स्वयंसेवक होते हैं, जो  संघ के आदर्शों को जन-जन तक पहुचने और सेवा कार्यों के माध्यम से व्यावहारिक रूप से प्रस्तु करने का प्रयास करते हैं। वाक्य सामान्य दृष्टि में सही है किन्तु गहराई में  " संघ के आदर्श की जगह भारतीय धर्म, संस्कृति और समाज के आदर्शों को जन-जन तक पहुचाने का उपक्रम विभिन्न प्रयोगों के साथ कराते हैं।   दूसरा डॉ हेडगेवार जी का कथन " संघ का काम व्यक्ति निर्माण का है , वह व्यक्ति राष्ट्र निर्माण / राष्ट्र को युगानुकूल गढ़ने का कार्य करता है ।

          शीर्षक 10 एकात्मता स्त्रोत में बहुत गलतियाँ हैं । शेष 11 से 17 तक  संघ के  सेवा और सामाजिक समरसता की बात की गई है , जो समाज जीवन में जीने के लिए आवश्यक शर्त है । आपात काल राजनेटिक द्वेष आधृत घटना थी । किन्तु जयप्रकाश जी के आंदोलन और संघ की भूमिका ने उस काले अध्याय को देश के सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास में काला धब्बा बना दिया। किन्तु उसका एक दुर्भाग्य पूर्ण पक्ष भी है, लोगों ने उसे स्वतन्त्रता आंदोलन जैसा बता कर आर्थिक भुगतान भी प्राप्त किया। उसके स्वरूप ने मीसा बंदी स्वतन्त्रता सेनानी बना दिया।

            तात्पर्य यह की इन सत्ताईस अध्यायों की इस पुस्तक में पुस्तकों के परिचय के माध्यम से सैद्धांतिक पक्ष को रखा गया, एकात्मता स्त्रोत, संघ गीत के माध्यम से ध्येय पक्ष को उजागर किया गया है। भारत विभाजन की त्रासदी, आपातकाल और नैसर्गिक आपदा में स्वयंसेवकों की भूमिका को उजागर कर भावी पीड़ी को संघ को समझने का अवसर दिया गया है । सेवा संघ का शाखा का बाह्य क्रिया रूप है तो , इसे कठिन परिस्थिति में स्वयंसेवक को स्थिर रखने के लिए साहित्य की भूमिका बताई गई है । पुस्तक पाठक के अंदर आने जिज्ञासा को जन्म देत है तो संघ साहित्य की समाज के लिए उपादेयता भी सिद्ध करती है । पुस्तक की तथ्यात्मक त्रुटियों के साथ वर्तनी की त्रुटियाँ भी सुधारी जाने की अपेक्षा रखती है ।     

  

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