Wednesday, 21 January 2026

अभिमुक्तेश्वरानंद

अभिमुक्तेश्वरानन्द जी को जिस तरह सोशल मीडिया पर लक्ष्य किया जा रहा है, वह दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डालेगा।सनातन में सब प्रकार के लोग हैं। सनातन सब को पचा कर चलता आया है, इसलिए सनातन है।वे जो कर रहे हैं उन्हें यदि बोध होगा तो ठीक है अन्यथा वे स्वयं अपने कर्मों का फल भोगेंगे।दरअसल इसमें शंकराचार्यों को ही केवल अभिमत देना चाहिए। यह उनकी व्यवस्था है।हर बात में यदि हिन्दू स्वयं को सोशल मीडिया में सनातन का न्यायाधीश बनेगा तो वह परम्परा को क्षति पहुंचायेगा।यदि वे स्वयं के विवेक से नकारात्मक या धर्म व्यवस्था के विपरीत कार्य कर राज्य विधि व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे हैं तो सरकार या संन्यास मार्गी कार्यवाही करेंगे।यदि वे किसी विशिष्ट एजेंडे के तहत माघ मेला जैसे पर्व पर लोकेषणा प्राप्त करना चाहते हैं तो ईश्वर उन्हें रास्ता दिखायेगा।नीति -धर्म - व्यवस्था -अतिरेक आदि को ईश्वरीय व्यवस्था ही ठीक करती है। माध्यम भी वही तय करती है।अंत में यह स्मरण रखना होगा हिन्दू समाज को किसी भी तरह एक रहना होगा,चाहे वह राजनीति हो, राष्ट्र नीति हो, अध्यात्म हो या सांस्कृतिक धरोहर और विरासत हो।

Monday, 19 January 2026

लेखक,लेखन और समाज



01 जनवरी से प्रारम्भ हुआ. 19/01/2026 को ख़त्म हो रहा है.

बिन्दुवार संक्षेप

1. कार्य पूर्ण होने से पहले उसका प्रचार नहीं करना चाहिए; कर्म स्वयं अपनी वाणी होता है।
* लघुकथा विमर्श इसका प्रमाण है।

2. कर्म की शक्ति शब्दों से अधिक प्रभावशाली और परिणामकारी होती है।
* स्पष्ट है भाषण, उद्वोधन, चर्चा की तुलना में लेखन कर्म अधिक महत्वपूर्ण है। तभी तो हम आज समीक्षा कर रहे हैं।

3. साधना और सृजन में प्रसिद्धि बाधक होती है, सहायक नहीं।
* कभी कभी लेखक जब प्रसिद्ध, पुरस्कार और सम्मान की ओर दोड़ता है तो उसके उत्कृष्ट लेखन में बाधा पैदा होती है।

4. न्यूटन-हेले प्रसंग यह दिखाता है कि महान व्यक्ति 'नाम' नहीं, 'कार्य' को महत्त्व देता है।

5. न्यूटन ने ग्रंथ प्रकाशित होने की चिंता नहीं की, न ही लेखक-नाम को आवश्यक माना।

6. सच्चा साधक प्रशंसा-निन्दा से अप्रभावित रहकर अपने लक्ष्य में रत रहता है।
* समीक्षाएं और पाठक की टिप्पणियां जहां लेखक को प्रोत्साहित करती हैं, वही प्रशंसा और निंदा उसको लक्ष्य से विचलित करती हैं।

7. किसी व्यक्ति या रचना का सही मूल्यांकन उसके जीवनकाल में प्रायः संभव नहीं होता।
,* इसलिए फल की इच्छा से अनासक्त रह कर रचना कर्म करते रहना चाहिए।

8. भारतीय ऋषि-परम्परा में मौलिकता का अहं नहीं, परम्परा की निरन्तरता का भाव है।
*लेखक को मौलिकता के अहं से दूर रहना चाहिए। विचार प्रवाह के साथ लक्ष्मी की तरह साधक के पास पहुंचते रहते हैं ।
धन जैसे बांटने से बढ़ता है,चिंतन भी साझा करने से सामर्थ्य प्राप्त करता है।


9. वेद अपौरुषेय माने गए क्योंकि वे व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* साहित्यकार की यही समझ उसे समष्टि से जोड़ती है।

10. अनाम रहकर कार्य करना भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठ माना गया है।
* साहित्य एकांत साधना है। समय के साथ साधना पूर्ण होने पर वह लोक के सामने आती है।

11. वास्तविक सौंदर्य के दर्शन से पहले अपनी सीमाओं का बोध नहीं होता (नॉटरडेम का कुबड़ा प्रसंग)।
* हमारी ही रचना सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा अहंकार पालना साहित्यकार को पालना उचित नहीं है।वृहत्तर साहित्य के अध्ययन से यह भ्रम दूर होता है और लेखक का लेखन गंभीरता को प्राप्त होता है।

12. साहित्य और आलोचना आत्मबोध तथा विनम्रता उत्पन्न करने का माध्यम हैं।
* रचना कर्म अदृश्य सत्ता/नियंत्ता के निर्देश से होता है।

13. साहित्य में लेखक, समीक्षक और पाठक का त्रिकोणात्मक संबंध होता है।

14. लेखक रचना का सृजन करता है, समीक्षक उसका अर्थ खोलता है, पाठक उसे जीवन देता है।

15. बिना पाठक के रचना अपूर्ण मानी जाती है।

16. रचना की महत्ता उसके लोकमंगल, मानवीय सत्य और वैचारिक गहराई में निहित है।

17. साहित्य का उद्देश्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सार्थक संप्रेषण है।

18. सच्चा साहित्य अपने समय से संवाद ंकरता है और भविष्य को दिशा देता है।

ह्विटमैंन की पंक्तियां हैं -
बन्धु तुम पुस्तक को नहीं,
मुझे स्पर्श कर रहे हो।
तुम्हारे हाथों में पुस्तक नहीं 
मेरी काया है।
इन पृष्ठों से प्रकट होकर मैं 
तुम्हारे हृदय में समा जाउंगा।
........


Sunday, 11 January 2026

वागर्थाविव


कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।

करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम।।

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यंपादस्पर्शं क्षमस्व मे ।


वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।

जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥


ॐ मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा उशि मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्यो रुद्र रिलीष:।।

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, प्रदक्षिणा समर्पयामि।

पुष्पाञ्जलि -

ॐ मा नस्तोके तनये मा न आयुधि मा नो गोषु मा नो अश्वेष रीरिषः । मा नो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥ 

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।

नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे।        साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः ॥  पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः    त्राहि मां पार्वतीनाथ सर्वपापहरो भव ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, प्रार्थनापूर्वक-नमस्कारान् समर्पयामि। अनया पूजया श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवः प्रीयतां न मम। श्रीसाम्बसदाशिवार्पणमस्तु ।

......

ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते ।

 गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते ॥

तप्तकाञ्चनगौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि ।

वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये ॥

हरे कृष्णहरे कृष्णकृष्ण कृष्णहरे हरे

हरे रामहरे रामराम राम हरे हरे।

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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाम्।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥


सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।

सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ।।

............

अथ हृदयादिन्यासः

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक इति हृदयाय नम।

….......

ॐ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेन स्वयं व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्येमहाभारतम् । अद्वैतामृतवर्षिणी भगवतीमष्टादशाध्यायिनी-मम्ब त्वामनुसंदधामि भगवद्‌गीते भवद्वेषिणीम् ॥ १ ॥

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्रं

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ॥ २ ॥


प्रपन्नपारिजाताय  तोत्त्रवेत्रैकपाणये।ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः ॥ ३ ॥

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ४


 भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला। अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः ॥ ५ ॥

पाराशर्यवचः सरोजममलंगीतार्थगन्धोत्कटं

नानाख्यानककेसरंहरिकथासम्बोधनाबोधितम् । 

लोके सज्जनषट्पदैरहरहः पेपीयमानं मुदा भूयाद्भारतपङ्कजं कलिमलप्रध्वंसि नः श्रेयसे ॥ ६ ॥

मूकं करोति वाचालं पङ्गु लङ्घयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥ ७ ॥

......

अथ गीतामाहात्म्यम् 

गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतः पुमान् । विष्णोः पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जितः ॥ १ ॥

गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च। नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ॥२॥

मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्त्रानं दिने दिने । सकृद्गीताम्भसि स्त्रानं संसारमलनाशनम् ॥ ३॥

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥ ४ ॥

भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनिःसृतम्।गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥५।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥ ६॥

 एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव ।एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥ ७॥

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॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै-र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥

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श्रवणं कीर्तनं स्मरणं विष्णोः पादसेवनं ।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥(श्रीमद्भावतम १५.२३)

Saturday, 10 January 2026

मंत्र

 

समानो मंत्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम्
समानं मंत्रमभिमंत्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ।।

              हमारा उद्देश्य एक ही होक्या हम सब एक मन के हो सकते हैंऐसी एकता बनाने के लिए मैं एक समान प्रार्थना करता हूँ।

समानि व आकूति: समाना हृदयानि व: ।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।।

              हमारा उद्देश्य एक हो, हमारी भावनाएँ सुसंगत हो। हमारा विचार संयोजन हो। जैसे इस विश्व के,  ब्रह्मांड के विभिन्न सिद्धांतों और  क्रियाकलापों में तारात्मयता और एकता है ॥ (ऋग्वेद 8.49.4)

              विचार करें यह प्रार्थना अपने को सीधे विश्व से जोड़ती है । यह कौन सी संस्कृति है ? वैदिक संस्कृति, सनातन संस्कृति , हिन्दू संस्कृति । जहाँ अपने लिए नहीं सम्पूर्ण जीवमात्र के लिए है प्रार्थना है ?

सर्वेषां मंगलं भूयात्, सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

(गरुण पु अ.३५/५१)

 “सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो, किसी को भी कोई दुख ना रहे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

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              यह शान्ति कैसे मिले तो हे परमपिता मुझे असत से सत की ओर ले चल, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल, मृत्यु से अमृत की ओर ले चल -

 असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय 
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।

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प्रश्न उठता है कि हमारा अतीत कैसा था तो मैथिलीशरण गुप्त जी कहते हैं -
भू -लोक का गौरव,

प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां?
फैला मनोहर गिरि हिमालय

और गंगाजल कहां,
संपूर्ण देशों से अधिक

किस देश का उत्कर्ष है,

उसका कि जो ऋषि भूमि है,

वह कौन, भारतवर्ष है?


यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है

इसके निवासी आर्य हैं

विद्या कला कौशल्य सबके

जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि

हम अधोगति में पड़े ।

पर चिह्न उनकी उच्चता के

आज भी कुछ हैं खड़े
हाँ, वृद्ध भारतवर्ष ही 

संसार का सिरमौर है, 

ऐसा पुरातन देश कोई 

विश्व में क्या और है?

 भगवान की भव-भूतियों का 

यह प्रथम भण्डार है।

 विधि ने किया नर-सृष्टि का 

पहले यहीं विस्तार है।
संसार को पहले हमीं ने 

दी ज्ञान भिक्षा दान की

आचार की विज्ञान की 

व्यापार की व्यवहार की

(मैथिली शरण गुप्त)

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पर्वत कहता शीश उठाकर , 

तुम भी ऊंचे बन जाओं ।

सागर कहता  लहराकर , 

मन में गहराई लाओ ।

पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ों , 

कितना ही हो सर पर भार।

नभ कहता है फैलो इतना , 

ढक लो तुम सारा संसार। 

 (सोहनलाल द्विवेदी)


Monday, 5 January 2026

सुनो यजमानों

बात निकली है तो महाजनों की बात यजमानों तक -

भाई .......जी !आपकी चिंता जायज है।

 महाभारत का प्रसंग है -
तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नाःनैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥

तात्पर्य , तर्क स्थिर नहीं; श्रुतियाँ भी भिन्न- भिन्न कहती हैं; एक भी ऐसा ऋषि नहीं जिनका मत प्रमाण के तौर पर लिया जा सके; उसपर धर्म का तत्त्व भी गूढ है ।

 इसलिए महापुरुष जिस मार्ग पर चले, उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिये।
युगानुकुल महापुरुषों को समझें -

* संविधान सभा के सदस्यों में राजभाषा को लेकर एक मत नहीं।

* राष्ट्र भाषा का जिक्र नहीं।

* मातृभाषा के आधार पर प्रदेश और बांग्लादेश बना।

* 75 वर्षों बाद भी राजभाषा का भविष्य जाति/प्रांत आधारित राजनीति करने वाले नेताओं पर निर्भर है।

* प्रशासन का अंग्रेजी मोह भंग नहीं हो रहा।

*समाचार पत्रों, पत्रिकाओं को भाषा आधारित समाचार छापने की चिंता नहीं।

 * सम्पादक और वरिष्ठ संवाददाताओं को राजभाषा से दूरी बनायें रखने में कोई हिचकिचाहट नहीं।

* हिन्दी के उपन्यासों में अंग्रेजी का तड़का नहीं लगा तो जैसे पाठक को स्वाद नहीं देगा और लेखक को संतुष्टि नहीं मिलेगी।

* दरअसल ढाबा चलाने के लिए तड़का की जगह साधारण दाल भी खिलाई जा सकती है, कोई महाजन बताने बाला नहीं।

 *कहते हैं लिखा वही जाता है जो पाठक पसंद करता है। और पसंद तय करता है- पुरस्कार , सम्मान पत्र, बिक्री का विज्ञापन।इनके विज्ञापन की लकीरें खींचते हैं, महाजन!

* पीएम राइज स्कूल, सीएम राइज स्कूल?पीएम राइज कालेज!!एन ई पी? 

* दुकान का, मकान का,रहवासी समितियों का नाम -एवन्यू, विला, एन्क्लेव आदि आदि?

* पीपुल्स विश्वविद्यालय, सेम विश्वविद्यालय,सेज विश्वविद्यालय ?

* सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं, योजनाओं के नाम नाम के पीछे के दर्शन को कम विज्ञापन को ज्यादा प्रदर्शित करते हैं।.......विचार कौन करेगा? 

अब गुड़ में मक्खी नहीं बैठती जहां लालच दिखता हो, प्राण संकट में हों।अब चासनी बह रही है, जिसमें इच्छा अनुसार तैरिये, हर घाट पर लक्ष्मी पति बनाने के सूत्र रूप में जलेबी परोसी जा रही है, जिसके छोर को पकड़ना किसी भी एजेंसी के बस का नहीं। क्योंकि प्रत्येक एजेंसी का सूत्रधार और निर्देशक 'स्ववित्तीय' स्वेच्छाचारी और निरंकुश चासनी में जलेबी खा रहा है।
5/1/26भोपाल

मैं कौन हूं

छिति जल पावक गगन समीरा।
पंच रचित अति अधम सरीरा।।(४/११/-४)

बड़े भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा।।(७/४३-७)

कबहुंक करि करुना नर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही।।(७/४४-६)


ईस्वर अंस जीव अविनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।(७/११७-२)

ममैवाशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन: षष्ठानीनिन्द्रयाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।(गीत १५/७)

ईश्वर: सर्वभूतानां ह्रृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।(गीता१८/६१)

Sunday, 4 January 2026

लेखन लेखक एवं प्रकाशक


अप्रैल 1946 में दीनदयाल उपाध्याय उत्तर प्रदेश के सह प्रांत प्रचारक थे और प्रांत प्रचारक थे भाऊराव देवरस। 

लखनऊ में संघ की बैठक हो रही थी, भाऊराव देवरस विषय के इतर उस चिंता के बारे में बात करने लगे, जो उन्हें पिछले दिनों संघ की शाखाओं में बाल स्वयंसेवकों को देख-देख कर हो रही थी, “बच्चों का संघ के प्रति आकर्षित होना सुखद अहसास है, बाल मन चंचल और निष्कपट होता है। ऐसे में वही वक्त होता है, जब बच्चों के कोमल मन में सदविचारों को अंकित किया जा सकता है।

 बच्चों को बाल साहित्य बहुत पसंद होता है, पर चिंता की बात है कि हमारे पास बाल साहित्य नहीं है। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि कुछ ही समय में बच्चों से सम्बंधित थोड़ा साहित्य यहां उपलब्ध हो सके? ताकि बच्चे उस साहित्य का लाभ उठा सकें।”
 उनका ये कहना था कि स्वयंसेवक आपस में ही बात करना शुरू हो गए कि बाल साहित्य लिखना बहुत कठिन काम है? ये इतनी जल्दी नहीं लिखा जा सकता है, इस कार्य को करने के लिए तो कुशल लेखक की आवश्यकता होगी।

इस पर भाऊराव बोले, ‘’कुशल लेखक की तलाश में तो काफी समय बीत जाएगा’’। तब बाबा आप्टे ने रास्ता दिखाया और दीनदयाल उपाध्याय की तरफ देखते हुए बोले कि “पंडितजी इस काम को अच्छी तरह से कर सकते हैं, उनमें लेखन की प्रतिभा है”।
 फिर तो बाकी स्वयंसेवक भी कहने लगे कि हां, केवल दीनदयाल जी ही ये कर सकते हैं। भाऊराव ने भी कह ही दिया कि, “हां पंडितजी, आप तो बहुत गुणवान, कुशल और योग्य हैं।आपके लिए मैं क्या कहूं? पर मुझे भी विश्वास है कि आप इस कार्य को भी सहजता से कर सकते हें।” अब चूंकि भाऊराव का आग्रह था तो दीनदयाल मना कर ही नहीं सकते थे और ठीक 24 घंटे बाद अपनी पांडुलिपि लेकर दीनदयाल जी भाऊराव के सामने उपस्थित थे।
 दीनदयाल जी बोले “यह देखिए, बच्चों के लिए यह पुस्तक कैसी रहेगी? भाऊराव ने उसे पढ़ा और बोले, अरे वाह, ये कब लिख डाली? भाऊराव उनकी प्रतिभा देखकर हैरान थे, बोले- आपकी प्रतिभा अनमोल है, इसको सहेज कर रखना हमारी जिम्मेदारी है।


एक युवा पं दीनदयाल उपाध्याय के संघ में आने के कुछ समय बाद उनके मन में उठते प्रश्न ।

क्या संघ कट्टरवाद का समर्थक है?
क्या अन्य धर्मो के प्रति उसका व्यवहार पक्षपातपूर्ण है?
ऐसा नहीं है तो फिर संघ अन्य धर्मों के प्रति उदासीन क्यों है?

उनके संघ के साथी इसका जबाब देकर पंडित जी को संतुष्ट नहीं कर सके। तब भेंट होती है, मा. भाऊराव देवरस से ।

 भेंट के दौरान दीनदयालजी ने अपने मन के प्रश्नों को उनके समक्ष रखते हुए उनसे भी वही सवाल पूछे।

 शांतिपूर्वक सारी बातें सुनने के बाद भाऊराव देवरस उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए बोले- 
(१) “हिंदू धर्म भारतवर्ष का सबसे प्राचीन धर्म है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रादुर्भाव हिंदू धर्म से ही हुआ है।
(२)  यह सही है कि संघ हिंदू धर्म की स्थापना और रक्षा की बात करता है, लेकिन इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि वह कट्टरता का समर्थक है।
  पर्वत से निकलने वाली गंगा की धारा विभिन्न स्थानों पर अलग- अलग नामों से पुकारी जाती है, लेकिन उसका स्वरूप और कार्य एक ही है। 

(३) उसी प्रकार भारतवर्ष के सभी धर्म हिंदुत्व रूपी गंगा की ही अलग-अलग धाराएँ हैं। जब हिंदुत्व की बात की जाती है तो इसमें वे सभी धर्म सहज ही सम्मिलित हो जाते हैं। हिंदू धर्म की स्थापना वास्तव में उन धर्मों की स्थापना भी है, जो किसी ना किसी रूप में उससे जुड़े हुए हैं।
   ये ठीक वैसा ही है जैसे किसी वृक्ष की ज़ड़ों की देखरेख करने से उसकी टहनियां भी हरी भरी हो जाती हैं”।

यह जिज्ञासु युवा के लिए समाधान की वह ख़ुराक़ थी जिसने देश को पं दीनदयाल उपाध्याय दिया।

युगवार्ता पत्रिका ने संघ के 100 साल पर ‘संघ की नींव के पत्थर’ नाम से एक विशेषांक छापा है, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय अपने लेख में लिखते हैं कि, “भाऊराव देवरस चलते फिरते विश्वविद्यालय थे, वे आचार्य भी थे और संस्थान भी।

अपने व्यवहार से कार्यकर्ता गढ़ते थे, उसे अपना संरक्षण देते थे और जब तक वो पौधे की अवस्था में होता था, तब तक उसकी देखरेख वे स्वयं करते थे,”