छिति जल पावक गगन समीरा।
पंच रचित अति अधम सरीरा।।(४/११/-४)
बड़े भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा।।(७/४३-७)
देत ईस बिनु हेतु सनेही।।(७/४४-६)
ईस्वर अंस जीव अविनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।(७/११७-२)
ममैवाशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन: षष्ठानीनिन्द्रयाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।(गीत १५/७)
ईश्वर: सर्वभूतानां ह्रृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।(गीता१८/६१)
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