भाई .......जी !आपकी चिंता जायज है।
महाभारत का प्रसंग है -
तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नाःनैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥
तात्पर्य , तर्क स्थिर नहीं; श्रुतियाँ भी भिन्न- भिन्न कहती हैं; एक भी ऐसा ऋषि नहीं जिनका मत प्रमाण के तौर पर लिया जा सके; उसपर धर्म का तत्त्व भी गूढ है ।
इसलिए महापुरुष जिस मार्ग पर चले, उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिये।
युगानुकुल महापुरुषों को समझें -
* संविधान सभा के सदस्यों में राजभाषा को लेकर एक मत नहीं।
* राष्ट्र भाषा का जिक्र नहीं।
* मातृभाषा के आधार पर प्रदेश और बांग्लादेश बना।
* 75 वर्षों बाद भी राजभाषा का भविष्य जाति/प्रांत आधारित राजनीति करने वाले नेताओं पर निर्भर है।
* प्रशासन का अंग्रेजी मोह भंग नहीं हो रहा।
*समाचार पत्रों, पत्रिकाओं को भाषा आधारित समाचार छापने की चिंता नहीं।
* सम्पादक और वरिष्ठ संवाददाताओं को राजभाषा से दूरी बनायें रखने में कोई हिचकिचाहट नहीं।
* हिन्दी के उपन्यासों में अंग्रेजी का तड़का नहीं लगा तो जैसे पाठक को स्वाद नहीं देगा और लेखक को संतुष्टि नहीं मिलेगी।
* दरअसल ढाबा चलाने के लिए तड़का की जगह साधारण दाल भी खिलाई जा सकती है, कोई महाजन बताने बाला नहीं।
*कहते हैं लिखा वही जाता है जो पाठक पसंद करता है। और पसंद तय करता है- पुरस्कार , सम्मान पत्र, बिक्री का विज्ञापन।इनके विज्ञापन की लकीरें खींचते हैं, महाजन!
* पीएम राइज स्कूल, सीएम राइज स्कूल?पीएम राइज कालेज!!एन ई पी?
* दुकान का, मकान का,रहवासी समितियों का नाम -एवन्यू, विला, एन्क्लेव आदि आदि?
* पीपुल्स विश्वविद्यालय, सेम विश्वविद्यालय,सेज विश्वविद्यालय ?
* सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं, योजनाओं के नाम नाम के पीछे के दर्शन को कम विज्ञापन को ज्यादा प्रदर्शित करते हैं।.......विचार कौन करेगा?
अब गुड़ में मक्खी नहीं बैठती जहां लालच दिखता हो, प्राण संकट में हों।अब चासनी बह रही है, जिसमें इच्छा अनुसार तैरिये, हर घाट पर लक्ष्मी पति बनाने के सूत्र रूप में जलेबी परोसी जा रही है, जिसके छोर को पकड़ना किसी भी एजेंसी के बस का नहीं। क्योंकि प्रत्येक एजेंसी का सूत्रधार और निर्देशक 'स्ववित्तीय' स्वेच्छाचारी और निरंकुश चासनी में जलेबी खा रहा है।
5/1/26भोपाल
साधु साधु
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