पाँच क्लेश- सूत्र रूप
(पतंजलि योगसूत्र की स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि द्वारा व्याख्या)
मूल क्लेश सूत्र:
“अज्ञान ही वह पर्दा है जो आत्मा और
परमात्मा के बीच खड़ा है।”
क्लेश श्रृंखला:
अविद्या →
अस्मिता → राग → द्वेष → अभिनिवेश ।
१. अविद्या सूत्र:
अविद्या = आत्म-विस्मृति । शरीर
को आत्मा मानना = मूल भ्रम । नश्वर को शाश्वत समझना = अज्ञान । समस्त
दुःखों का मूल = अविद्या ।
चेतना सूत्र:
“सपने को सत्य मान लेना ही अविद्या है।”
२. अस्मिता सूत्र:
अविद्या से उत्पन्न = अहंकार । “मैं शरीर हूँ” = झूठी पहचान । आत्मा का बुद्धि और देह से तादात्म्य
= अस्मिता । परिणाम = ब्रह्म चेतना से अलगाव ।
विज्ञान सूत्र:
सीमित ‘मैं’ = अस्मिता । असीम ‘मैं’ = आत्मा ।
३. राग सूत्र
: सुख की स्मृति = आसक्ति । इंद्रिय
सुख = बंधन का कारण । “मुझे यह चाहिए” = राग का स्वरूप । राग = संसार चक्र की जंजीर । मन सूत्र:
“जहाँ आकर्षण है, वहाँ बंधन है।”
४. द्वेष सूत्र:
दुःखद अनुभव = घृणा । सुख की चाह +
दुःख से भागना = मानसिक अशांति । राग और द्वेष = मन के दो झूले । संतुलन
सूत्र: आकर्षण और विकर्षण से ऊपर उठना = योग ।
५. अभिनिवेश सूत्र:
मृत्यु का भय = देह आसक्ति । आत्मा
को शरीर मानना = भय का कारण । =
भय का अंत ।
अमरत्व सूत्र:
“जो स्वयं को आत्मा जान लेता है, उसके लिए मृत्यु केवल परिवर्तन है।”
क्लेश-निवारण सूत्र: विवेक = अविद्या का नाश । ध्यान = अहंकार
का शमन। वैराग्य = राग-द्वेष से मुक्ति। आत्मज्ञान = मृत्यु भय का
अंत ।क्रियायोग = चेतना शुद्धि का विज्ञान।
सार सूत्र: “जब मनुष्य स्वयं को शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना
अनुभव करता है, तब पाँचों क्लेश स्वतः नष्ट हो जाते हैं और
कैवल्य का प्रकाश प्रकट होता है।”
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पाँच क्लेशों से मुक्ति का मार्ग : सयम और
क्रियायोग।
* हृदय का शुद्धिकरण: जब हृदय की
भावनाएँ शुद्ध होती हैं, तो 'राग'
और 'द्वेष' शांत हो जाते
हैं। * बुद्धि का जागरण: जब
बुद्धि जागृत होती है, तो 'अस्मिता'
(झूठा अहंकार) गल जाता है।
*कैवल्य: जब ये पाँचों
क्लेश मिट जाते हैं,
तो साधक 'कैवल्य' (परम मुक्ति) की अवस्था में पहुँच जाता है, जहाँ वह
अनुभव करता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि साक्षात् चैतन्य
है।
"जब
तक मन इन
पाँच क्लेशों के
प्रभाव में है,
वह एक गंदे
दर्पण की तरह
है जिसमें ईश्वर
का प्रतिबिंब साफ
नहीं दिखता। क्रियायोग इस दर्पण
को साफ करने
की प्रक्रिया है।"- स्वामी
श्री युक्तेश्वर गिरि
……………………………..
• क्षिप्त — रजोगुणी, चंचल और
इच्छाओं-क्रोध से व्याकुल मन।
• मूढ़ — तमोगुणी, आलस्य, अज्ञान और जड़ता से भरा मन।
• विक्षिप्त
— कभी एकाग्र, कभी भटकता; साधना का प्रारम्भिक स्तर।
• एकाग्र
— सत्त्वप्रधान, मन एक ध्येय पर स्थिर;
समाधि का आरम्भ।
• निरुद्ध
— चित्तवृत्तियों का पूर्ण शांत होना; कैवल्य
या परम समाधि।
........................................
श्री युक्तेश्वर जी का
समाधान: क्रियायोग द्वारा प्राण को स्थिर कर मन को क्षिप्त-मूढ़ अवस्था से उठाकर
एकाग्र और अंततः निरुद्ध अवस्था तक पहुँचाया जाता है। “चित्त का निरोध ही योग है; मन शांत होने पर आत्मा
अपना वास्तविक स्वरूप देखती है।” —
*
इन पाँच अवस्थाओं को जानकर हम अपनी साधना का आत्म-विश्लेषण
(Self-analysis) कर सकते हैं।
* स्वामी श्री युक्तेश्वर
गिरि जी ने 'द होली साइंस' में "हृदय के चार चरणों" (Four Stages of the Heart) का
बहुत ही सुंदर वर्णन किया है।
* चित्त की अवस्थाओं को
बदलने के लिए हृदय का शुद्ध होना अनिवार्य है, क्योंकि जब तक हृदय में
भावनात्मक गंदगी (मल) है,
तब तक बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती।
* इन चार चरणों को पार
करके ही एक साधक 'कैवल्य' या पूर्ण मुक्ति तक पहुँचता है:
चार
चरण -
१. शुद्ध (Sudra/The Servant Stage): यह हृदय की वह प्राथमिक
अवस्था है जहाँ व्यक्ति केवल अपनी भौतिक इंद्रियों और शरीर के सुखों की सेवा करता
है। (i) लक्षण: इस चरण में मनुष्य बाहरी दुनिया के आकर्षणों का दास होता है। उसका हृदय 'अंधकार' में होता है और वह केवल
भौतिक लाभ-हानि को समझता है। (ii) साधना: यहाँ व्यक्ति को केवल 'अनुशासन' और 'सेवा' के माध्यम से ऊपर उठने की
प्रेरणा दी जाती है।
२. क्षत्रिय (Kshatriya/The Warrior Stage): जब साधक अपने भीतर के
विकारों (काम, क्रोध, लोभ) से लड़ना शुरू करता है, तो वह 'क्षत्रिय' अवस्था में आता है। (i) लक्षण: यहाँ हृदय में संघर्ष होता है। साधक अपनी बुरी आदतों को छोड़ने का प्रयास करता
है। वह अब केवल शरीर नहीं,
बल्कि 'ऊर्जा' और
'इच्छाशक्ति' के स्तर पर सक्रिय होता
है। (ii) साधना: यहाँ 'धैर्य' और 'साहस' की आवश्यकता होती है।
३. वैश्य (Vaisya/The Cultivator Stage): इस चरण में साधक
आध्यात्मिक अनुभवों का "संग्रह" करना शुरू करता है। (i) लक्षण: यहाँ हृदय अधिक सूक्ष्म हो जाता है। साधक यह समझने लगता है कि आंतरिक शांति और
ईश्वरीय आनंद ही वास्तविक संपत्ति है। वह संसार और अध्यात्म के बीच तुलना करना सीख
जाता है। (ii) साधना: यहाँ 'एकाग्रता' और 'ज्ञान' का संचय मुख्य उद्देश्य
होता है।
४. ब्राह्मण (Brahmin/The Knower Stage): यह हृदय की उच्चतम अवस्था
है जहाँ साधक 'ब्रह्म' (परमात्मा) को जानने के
योग्य हो जाता है। (i) लक्षण: यहाँ हृदय के सारे विकार (राग-द्वेष) समाप्त हो जाते हैं। हृदय दर्पण की तरह
स्वच्छ हो जाता है जिसमें परमात्मा का प्रकाश साफ़ दिखता है। यहाँ साधक को अनुभव
होता है कि "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ)। (ii) साधना: यहाँ केवल 'समर्पण' और 'समाधि' शेष रहती है।
श्री युक्तेश्वर जी का
निष्कर्ष: *
ये चार चरण जन्म आधारित 'जाति' नहीं
हैं, बल्कि हृदय के विकास के स्तर हैं। एक व्यक्ति जन्म से
ब्राह्मण हो सकता है, लेकिन यदि उसका हृदय केवल भौतिक सुखों में लगा है, तो वह आध्यात्मिक रूप से 'शुद्ध' (सेवक) स्तर पर ही है। *
"जब
हृदय इन चार चरणों को पार कर लेता है, तब वह 'परमहंस' की
अवस्था प्राप्त करता है—जहाँ संसार और ईश्वर का भेद मिट जाता है।" -स्वामी श्री युक्तेश्वर
गिरि
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