सूत्र रूप संक्षेप :
क्रियायोग एवं कुण्डलिनी तत्त्व- *निर्माण सूत्र-शुक्र + अंडाणु → डिम्ब →
कशेरुकाएँ → सम्पूर्ण शरीर। *मूलाधार सूत्र- कंद के ऊपर स्वयम्भू लिंग स्थित; उसके
चारों ओर कुण्डलिनी शक्ति सर्पाकार लिपटी रहती है।
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चक्र
सिद्धांत-शरीर के शक्ति-बिंदु = चक्र; प्राण
वायु द्वारा अग्नितत्त्व मूलाधार से सहस्रार तक प्रवाहित होता है। *चक्र क्रम
एवं शक्ति-मूलाधार →
स्वाधिष्ठान → मणिपूर → अनाहत → विशुद्ध → आज्ञा → सहस्रार। *दल एवं सामर्थ्य :मूलाधार : 2
दल ,स्वाधिष्ठान : 4 दल ,मणिपूरक : 6 दल ,अनाहत : 8 दल ,आनंद/हृदय : 12 दल ,विशुद्ध : 16 दल।
*प्राण–अपान सिद्धांत-प्राण वायु शक्ति
को ऊपर उठाती है; अपान वायु स्थिरता और विस्तार देती है। *कोष निर्माण सूत्र-शक्ति–प्रकाश से
अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनंदमय कोष निर्मित होते हैं।
*क्रियायोग
परिभाषा-क्रियायोग = प्राण नियंत्रण द्वारा आत्म-साक्षात्कार की
वैज्ञानिक साधना। * लहडी महाशय का सिद्धांत-“श्वास शांत ⇒ मन स्थिर ⇒ ईश्वर में लय।” *योगानंद सिद्धांत- क्रियायोग =
चेतना-विकास का “विमान मार्ग”; रीढ़ के छह चक्रों में
प्राण संचरण। *क्रिया गणित-आधा
मिनट की एक क्रिया ≈ एक वर्ष का प्राकृतिक आध्यात्मिक
विकास। *सुषुम्ना नाड़ी सूत्र-रीढ़
की सूक्ष्म मध्य नाड़ी ही चेतना का राजमार्ग है। *हं-सौ साधना-“हं” (श्वास भीतर) + “सौ” (श्वास बाहर) = “मैं वही ब्रह्म हूँ।” *ओम् साधना-बाह्य इंद्रियों का निरोध → आंतरिक नाद श्रवण → ब्रह्मांडीय चेतना का अनुभव। *महामुद्रा
एवं ज्योति मुद्रामहामुद्रा →
क्रिया की तैयारी; ज्योति मुद्रा → आंतरिक प्रकाश का दर्शन। *ऊर्जा प्रवाह सिद्धांत- सामान्य ऊर्जा
बाहर बहती है; क्रियायोग उसे रीढ़ मार्ग से मस्तिष्क की
ओर मोड़ता है। *छः चेतना केंद्र: मूलाधार
(सुरक्षा), स्वाधिष्ठान (सृजन), मणिपूर
(शक्ति), अनाहत (प्रेम), विशुद्ध
(शांति), आज्ञा (अंतर्ज्ञान)। *कूटस्थ चैतन्य\आज्ञा
चक्र में नीला प्रकाश + स्वर्ण घेरा + श्वेत तारा = ईश्वरीय द्वार। *कर्म दहन सिद्धांत- चक्रों में संचित
संस्कार क्रियायोग से शीघ्र नष्ट होते हैं। *अंतिम लक्ष्य: प्राण स्थिरता → मन शून्यता →
आत्म-साक्षात्कार → ब्रह्मानुभूति।
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क्रियायोग एवं
चक्र - स्मरणीय सूत्र (Mnemonic)
1. चक्र क्रम याद रखने का सूत्र: “मू-स्व-मणि-अना-विशु-आज्ञा-सह” 2.
चक्रों के कार्य याद रखने का सूत्र- मूलाधार-सुरक्षा।
स्वाधिष्ठान-सृजन। मणिपूर-शक्ति।
अनाहत-प्रेम।
विशुद्ध-शांति। आज्ञा-अंतर्ज्ञान। सहस्रार-समाधि। (“सुर-सृ-श-प्रे-शां-अं-सम”) 3. दल
(पंखुड़ी) संख्या याद रखने का सूत्र- “2-4-6-8-12-16” याद सूत्र: “दो
चार छः आठ, बारह
सोलह ” । 4.
पंचकोष सूत्र- “अन्न-प्राण-मन-विज्ञान-आनंद” स्मरण सूत्र:“अप्रमविआ”(अ = अन्नमय, प्र = प्राणमय, म = मनोमय, वि = विज्ञानमय, आ = आनंदमय) । 5.
क्रियायोग का मूल सिद्धांत: “श्वास
शांत → मन शांत → ईश्वर प्राप्ति ” । 6.
हं-सौ साधना सूत्र; “हं
भीतर, सौ
बाहर” । “मैं
वही ब्रह्म हूँ।” 7.
ओम् साधना सूत्र: “नाद
से ब्रह्म तक” । 8.
प्राण यात्रा सूत्र: “मूल
से सहस्रार तक” । 9. योगानंद क्रिया गणित सूत्र: “आधा
मिनट क्रिया = एक वर्ष विकास” । 10.
कूटस्थ सूत्र-“नीला
प्रकाश + स्वर्ण घेरा + श्वेत तारा” ।11.
सम्पूर्ण क्रियायोग सूत्र- “प्राण
नियंत्रण → चक्र जागरण → कर्म दहन →
आत्मबोध” ।
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स्मरणीय सूत्र (Mnemonic)- बाबाजी, ज्ञानगंज और क्रियायोग । 1. गुरु-परंपरा सूत्र: “बा-ला-यो”- बा = महावतार बाबाजी, ला = लहड़ी महोदय , यो = परमहंश योगानंद, तात्पर्य : स्रोत-बा
→ सेतु-ला → विश्वदूत-यो 2.
बाबाजी का मिशन सूत्र- “गृहस्थ–विश्व–विज्ञान” । तात्पर्य : गृहस्थों हेतु योग । विश्वशांति हेतु प्रसार ।
वैज्ञानिक युग हेतु साधना । 3.
क्रियायोग प्रवाह सूत्र: “हिमालय → लाहिड़ी → संसार” 4. बाबाजी भविष्यवाणी सूत्र: “पूर्व का योग + पश्चिम का विज्ञान = विश्व संतुलन” । 5.
ज्ञानगंज सूत्र- “अदृश्य सिद्धभूमि” । सूत्र: “ज्ञा = ज्ञान, गंज = भंडार” = “ज्ञान का दिव्य भंडार” । 6.
स्वर्ण महल सूत्र- “इच्छा भोग → कर्म दहन → मुक्ति” । 7. पदार्थ-ऊर्जा
सिद्धांत-
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1. जीवन सूत्र- “काम में हाथ, ईश्वर में मन” = कर्मयोग + ध्यानयोग का संतुलन। 2.
गृहस्थ योग सूत्र- “घर
में योग, मन
में संयोग” । भाव
: गृहस्थ रहकर भी आत्मसाक्षात्कार संभव। 3.
“पेंशनर योगी”
सूत्र- “दफ्तर बाहर, ध्यान भीतर”
। 4. क्रियायोग
लोकतंत्र सूत्र- “योग सबके लिए”
। स्मरण सूत्र: “साधु नहीं, साधना जरूरी।” 5.
धर्मसमन्वय सूत्र- “धर्म अनेक, प्राण एक” । 6.
स्थितप्रज्ञ सूत्र- “खुली
आँखें, भीतर
समाधि” । (शाम्भवी
मुद्रा) । 7.
तनाव मुक्ति सूत्र- “शांत
श्वास = शांत तंत्रिका तंत्र = शांत मन”
। 8. चमत्कार सूत्र- “मन-विजय ही महाचमत्कार”
। 9. आसक्ति
त्याग सूत्र-“वस्तु
नहीं, आसक्ति
छोड़ो” ।.10. महासमाधि सूत्र- “मृत्यु नहीं, प्रकाश में विलय”
। 11. अंतिम योग क्रिया सूत्र-
“प्राण
ऊपर, चेतना
मुक्त” । 12.
तीन बार घूमने का सूत्र- “चक्र
जागरण→ ब्रह्मरंध्र प्रवेश”
। 13. गुरु
दर्शन सूत्र- “गुरु
शरीर से नहीं, चेतना
से जुड़े हैं” । 14.
क्रियायोग का अंतिम संदेश- “नियमित
क्रिया = निर्भय मृत्यु” । 15. सम्पूर्ण जीवन सूत्र-
“कर्तव्य
+ क्रिया + स्थिरत्व = मुक्ति” । 16.
लाहिड़ी महाशय का महावाक्य-“संसार
में रहो, पर
संसार को भीतर मत रहने दो।” 17.
सम्पूर्ण सार-सूत्र-“साधारण
जीवन, असाधारण
चेतना” ।
"मृत्यु क्या है?
यह केवल उस प्रकाश में विलीन होना है ,जिससे हम आए
थे।" -लाहिड़ी
महाशय
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1. आध्यात्मिक
परंपरा का दृष्टिकोण: क्रियायोग और सिद्धयोग की
परंपरा में “महासमाधि”, “सूक्ष्म यात्रा”, “टेलिपैथिक
संचार”, “प्रकटीकरण” आदि को उच्च योग-सिद्धियाँ माना जाता
है। (i) गुरु-शिष्य
के बीच मानसिक संचार। (ii) समाधि में सूक्ष्म लोकों का अनुभव।
(iii) सिद्धाश्रम/ज्ञानगंज जैसी अवधारणाएँ । (iv) मृत्यु के बाद शरीर का लंबे समय तक सुरक्षित रहना।
2. योगिक
प्रतीकवाद की सम्भावना: कई विद्वान इन कथाओं को
प्रतीकात्मक या आंतरिक आध्यात्मिक अवस्थाओं का रूपक भी मानते हैं। उदाहरण: *“ज्ञानगंज” = चेतना की उच्च अवस्था ।
*“सूक्ष्म यात्रा” = गहन ध्यानावस्था में चेतना का
विस्तार । *“मानसिक
प्रसारण” = अत्यंत संवेदनशील अंतर्ज्ञान । *“प्रकटिकरण” =
साधक की चेतना में दिव्य अनुभूति ।
भारतीय योग परंपरा में
बाहरी घटना से अधिक महत्व “अनुभव” और “चेतना-परिवर्तन” है।
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