Wednesday, 17 June 2026

क्रिया योग

 

सूत्र रूप संक्षेप : क्रियायोग एवं कुण्डलिनी तत्त्व- *निर्माण सूत्र-शुक्र + अंडाणु → डिम्ब → कशेरुकाएँ → सम्पूर्ण शरीर। *मूलाधार सूत्र- कंद के ऊपर स्वयम्भू लिंग स्थित; उसके चारों ओर कुण्डलिनी शक्ति सर्पाकार लिपटी रहती है।

                                                  ………………………………..

              चक्र सिद्धांत-शरीर के शक्ति-बिंदु = चक्र; प्राण वायु द्वारा अग्नितत्त्व मूलाधार से सहस्रार तक प्रवाहित होता है। *चक्र क्रम एवं शक्ति-मूलाधार → स्वाधिष्ठान → मणिपूर → अनाहत → विशुद्ध → आज्ञा → सहस्रार।  *दल एवं सामर्थ्य :मूलाधार : 2 दल ,स्वाधिष्ठान : 4 दल ,मणिपूरक : 6 दल ,अनाहत : 8 दल ,आनंद/हृदय : 12 दल ,विशुद्ध : 16 दल।

 *प्राण–अपान सिद्धांत-प्राण वायु शक्ति को ऊपर उठाती है; अपान वायु स्थिरता और विस्तार देती है।  *कोष निर्माण सूत्र-शक्ति–प्रकाश से अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनंदमय कोष निर्मित होते हैं।  

*क्रियायोग परिभाषा-क्रियायोग = प्राण नियंत्रण द्वारा आत्म-साक्षात्कार की वैज्ञानिक साधना।  * लहडी महाशय का सिद्धांत-“श्वास शांत ⇒ मन स्थिर ⇒ ईश्वर में लय।”  *योगानंद सिद्धांत- क्रियायोग = चेतना-विकास का “विमान मार्ग”; रीढ़ के छह चक्रों में प्राण संचरण।  *क्रिया गणित-आधा मिनट की एक क्रिया ≈ एक वर्ष का प्राकृतिक आध्यात्मिक विकास।  *सुषुम्ना नाड़ी सूत्र-रीढ़ की सूक्ष्म मध्य नाड़ी ही चेतना का राजमार्ग है।  *हं-सौ साधना-“हं” (श्वास भीतर) + “सौ” (श्वास बाहर) = “मैं वही ब्रह्म हूँ।”  *ओम् साधना-बाह्य इंद्रियों का निरोध → आंतरिक नाद श्रवण → ब्रह्मांडीय चेतना का अनुभव।  *महामुद्रा एवं ज्योति मुद्रामहामुद्रा → क्रिया की तैयारी; ज्योति मुद्रा → आंतरिक प्रकाश का दर्शन।  *ऊर्जा प्रवाह सिद्धांत- सामान्य ऊर्जा बाहर बहती है; क्रियायोग उसे रीढ़ मार्ग से मस्तिष्क की ओर मोड़ता है।  *छः चेतना केंद्र: मूलाधार (सुरक्षा), स्वाधिष्ठान (सृजन), मणिपूर (शक्ति), अनाहत (प्रेम), विशुद्ध (शांति), आज्ञा (अंतर्ज्ञान)। *कूटस्थ चैतन्य\आज्ञा चक्र में नीला प्रकाश + स्वर्ण घेरा + श्वेत तारा = ईश्वरीय द्वार।  *कर्म दहन सिद्धांत- चक्रों में संचित संस्कार क्रियायोग से शीघ्र नष्ट होते हैं।  *अंतिम लक्ष्य: प्राण स्थिरता → मन शून्यता → आत्म-साक्षात्कार → ब्रह्मानुभूति।

                          .............................................................................

                                              

क्रियायोग एवं चक्र - स्मरणीय सूत्र (Mnemonic)

1. चक्र क्रम याद रखने का सूत्र: “मू-स्व-मणि-अना-विशु-आज्ञा-सह”  2. चक्रों के कार्य याद रखने का सूत्र- मूलाधार-सुरक्षा। स्वाधिष्ठान-सृजन। मणिपूर-शक्ति। अनाहत-प्रेम। विशुद्ध-शांति। आज्ञा-अंतर्ज्ञान। सहस्रार-समाधि। (“सुर-सृ-श-प्रे-शां-अं-सम”) 3. दल (पंखुड़ी) संख्या याद रखने का सूत्र- “2-4-6-8-12-16” याद सूत्र: “दो चार छः आठ, बारह सोलह ” ।  4. पंचकोष सूत्र- “अन्न-प्राण-मन-विज्ञान-आनंद” स्मरण सूत्र:“अप्रमविआ”(अ = अन्नमय, प्र = प्राणमय, म = मनोमय, वि = विज्ञानमय, आ = आनंदमय) । 5. क्रियायोग का मूल सिद्धांत: “श्वास शांत → मन शांत → ईश्वर प्राप्ति ” ।  6. हं-सौ साधना सूत्र; “हं भीतर, सौ बाहर” । “मैं वही ब्रह्म हूँ।” 7. ओम् साधना सूत्र: “नाद से ब्रह्म तक” ।  8. प्राण यात्रा सूत्र: “मूल से सहस्रार तक” । 9. योगानंद क्रिया गणित सूत्र: “आधा मिनट क्रिया = एक वर्ष विकास” । 10. कूटस्थ सूत्र-“नीला प्रकाश + स्वर्ण घेरा + श्वेत तारा” ।11. सम्पूर्ण क्रियायोग सूत्र- “प्राण नियंत्रण → चक्र जागरण → कर्म दहन → आत्मबोध” ।

 

.....................................

स्मरणीय सूत्र (Mnemonic)- बाबाजी, ज्ञानगंज और क्रियायोग । 1. गुरु-परंपरा सूत्र: “बा-ला-यो”- बा = महावतार बाबाजी, ला = लहड़ी महोदय , यो = परमहंश योगानंद, तात्पर्य : स्रोत-बा → सेतु-ला → विश्वदूत-यो  2. बाबाजी का मिशन सूत्र- “गृहस्थ–विश्व–विज्ञान” । तात्पर्य : गृहस्थों हेतु योग । विश्वशांति हेतु प्रसार । वैज्ञानिक युग हेतु साधना ।  3. क्रियायोग प्रवाह सूत्र: “हिमालय → लाहिड़ी → संसार” 4. बाबाजी भविष्यवाणी सूत्र: “पूर्व का योग + पश्चिम का विज्ञान = विश्व संतुलन” ।  5. ज्ञानगंज सूत्र- “अदृश्य सिद्धभूमि” ।  सूत्र: “ज्ञा = ज्ञान, गंज = भंडार” = “ज्ञान का दिव्य भंडार” । 6. स्वर्ण महल सूत्र- “इच्छा भोग → कर्म दहन → मुक्ति” । 7. पदार्थ-ऊर्जा सिद्धांत-  स्मरण सूत्र: “ऊर्जा ही पदार्थ का संघनन” । 8. लाहिड़ी महाशय संदेश- “घर में रहो, भीतर जियो” । 9. ज्ञानगंज संबंध सूत्र- “बाबाजी = स्रोत, ज्ञानगंज = केंद्र, क्रियायोग = विद्या” । 10. सूक्ष्म यात्रा सूत्र- “स्थिर शरीर, गतिमान चेतना” ।  11. बाबाजी वचन सूत्र- “जब तक एक भी जीव मुक्त नहीं, मैं यहीं हूँ।” 12. सम्पूर्ण सार सूत्र-“क्रियायोग = प्राण विज्ञान + चक्र जागरण + आत्ममुक्ति” ।

                                               ...................................................

 

1. जीवन सूत्र- “काम में हाथ, ईश्वर में मन” = कर्मयोग + ध्यानयोग का संतुलन। 2. गृहस्थ योग सूत्र- “घर में योग, मन में संयोग” । भाव : गृहस्थ रहकर भी आत्मसाक्षात्कार संभव। 3. “पेंशनर योगी” सूत्र- “दफ्तर बाहर, ध्यान भीतर” । 4. क्रियायोग लोकतंत्र सूत्र- “योग सबके लिए” । स्मरण सूत्र: “साधु नहीं, साधना जरूरी।” 5. धर्मसमन्वय सूत्र-  “धर्म अनेक, प्राण एक” । 6. स्थितप्रज्ञ सूत्र- “खुली आँखें, भीतर समाधि” । (शाम्भवी मुद्रा) । 7. तनाव मुक्ति सूत्र- “शांत श्वास = शांत तंत्रिका तंत्र = शांत मन” । 8. चमत्कार सूत्र- “मन-विजय ही महाचमत्कार” । 9. आसक्ति त्याग सूत्र-“वस्तु नहीं, आसक्ति छोड़ो” ।.10. महासमाधि सूत्र- “मृत्यु नहीं, प्रकाश में विलय” । 11. अंतिम योग क्रिया सूत्र- “प्राण ऊपर, चेतना मुक्त” ।  12. तीन बार घूमने का सूत्र- “चक्र जागरण→ ब्रह्मरंध्र प्रवेश” । 13. गुरु दर्शन सूत्र- “गुरु शरीर से नहीं, चेतना से जुड़े हैं” ।  14. क्रियायोग का अंतिम संदेश- “नियमित क्रिया = निर्भय मृत्यु” ।  15. सम्पूर्ण जीवन सूत्र- “कर्तव्य + क्रिया + स्थिरत्व = मुक्ति” । 16. लाहिड़ी महाशय का महावाक्य-“संसार में रहो, पर संसार को भीतर मत रहने दो।” 17. सम्पूर्ण सार-सूत्र-“साधारण जीवन, असाधारण चेतना” ।

Top of Form

Bottom of Form

"मृत्यु क्या है? यह केवल उस प्रकाश में विलीन होना है ,जिससे हम आए थे।" -लाहिड़ी महाशय

 .................................................................

 

1. आध्यात्मिक परंपरा का दृष्टिकोण: क्रियायोग और सिद्धयोग की परंपरा में “महासमाधि”, “सूक्ष्म यात्रा”, “टेलिपैथिक संचार”, “प्रकटीकरण” आदि को उच्च योग-सिद्धियाँ माना जाता है।  (i) गुरु-शिष्य के बीच मानसिक संचार। (ii) समाधि में सूक्ष्म लोकों का अनुभव। (iii) सिद्धाश्रम/ज्ञानगंज जैसी अवधारणाएँ । (iv) मृत्यु के बाद शरीर का लंबे समय तक सुरक्षित रहना।

2. योगिक प्रतीकवाद की सम्भावना: कई विद्वान इन कथाओं को प्रतीकात्मक या आंतरिक आध्यात्मिक अवस्थाओं का रूपक भी मानते हैं। उदाहरण: *“ज्ञानगंज” = चेतना की उच्च अवस्था ।  *“सूक्ष्म यात्रा” = गहन ध्यानावस्था में चेतना का विस्तार ।  *“मानसिक प्रसारण” = अत्यंत संवेदनशील अंतर्ज्ञान । *“प्रकटिकरण” = साधक की चेतना में दिव्य अनुभूति ।

                   भारतीय योग परंपरा में बाहरी घटना से अधिक महत्व “अनुभव” और “चेतना-परिवर्तन”  है।

                                                 ............................

No comments:

Post a Comment