Wednesday, 28 January 2026

सिंदूर लगाया है तो प्रणाम तो करना है। माने तो महाबली, माने तो रामभक्त, माने तो राष्ट्रभक्त। न मानें तो भी नायक तो है ही। 

रुचि से, अरुचि से, भय से, दंड से, दान से, भेद से मानना नियति है। अर्जित सम्मान गांडीव है। परशुराम है। वर्तमान का वैश्विक नायक है। 

मानो तो साथ है अन्यथा अकेला हाथ है।

मानने से देश को दिशा मिलेगी। राष्ट्र का तीर्थ जिंदा रहेगा। भारत माता जगद्गुरू रहेगी। सांस्कृतिक राष्ट्र, वादों से मुक्त चिर पुरातन नित्य नूतन जीवन मूल्यों को संरक्षित करेगा। ऋषियों का कल्प संकल्प के साथ भविष्य बनेगा।

ब्राह्मण तो ब्रह्म में रमण करता है। उसे राम ही प्रिय हैं। वह जाति नहीं तप है। वह ऋत का वाहक है। वह दर्शन देता है। अध्यात्म को खेता है। वह संस्सृत का नेता है।

 वह समदर्शी को भजता है, समदर्शी रहता है। वह संतत्प नहीं। वह संत हैं। संतत्व को जीता है।समाज का मार्गदर्शन करता है। 

वह राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति करता है। ब्राह्मण-ब्राह्मण है। वह अग्नि- होता है। अग्नेमय सुपथा राये.... (ईशावास्योपनिषद)

29/01/26
उमेश कुमार सिंह 

क्या इतिहास दुहराया जा रहा है

क्या इतिहास दुहराया जा रहा है?
मंडल -कमंडल। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह!
अब यूजीसी+ कमंडल!!

दरअसल यह एक दिन की भड़ास नहीं है। सरकार का पलड़ा सामाजिक न्याय के साथ जाति के बजन और वोट के जतन में बराबर एक तरफ झुकता आ रहा है।

जातियां सरकार बनाती हैं तो उपकृत होना स्वाभाविक है।

किंतु इस बार कुछ तो चूक हुई। एसी-एस टी के नाम पर अभी भी हिन्दू एस सी,एस टी की तुलना में धर्मांतरित ईसाई ज्यादा लाभ ले रहे हैं। एस सी एस टी यह ढुलमुल नीति देख अपना धर्म बदलकर ईसाई बन रहे हैं।

 नियम अपनी जगह है। किस पर लागू होगा स्पष्ट है। किंतु व्यवहार में हिन्दू मतांतरित हो रहा है।

दूसरी यह व्याधि ओबीसी को जोड़ कर आ गई है। इसमें अब सभी मत पंथ के ओबीसी आयेंगे। हमारी बात आप समझ रहे हैं ।
 
यह एम बाय समीकरण को पुष्ट करेगा। लाभ किसको कितना मिलेगा पता नहीं। शिकायतों का क्या होगा?समय बतायेगा।

किंतु हिन्दू जिस तरह सवर्ण -अवर्ण के नाम पर, अगड़ा, पिछड़ा के नाम पर, अनारक्षित -आरक्षित के नाम पर बंटेगा, सनातन को ही हानि पहुंचायेगा। 

सरकारें बन बिगड़ सकती हैं, किंतु जातीय लाभ-हानि भविष्य तो छोड़िए वर्तमान में भी घातक है।

इस पर सरकार 'भय गति सांप छछूंदर केरी।' की स्थिति में आ गई है।

पता नहीं सरकार के सलाहकार कौन हैं? शिक्षा के क्षेत्र में कितने राष्ट्रीय विचारों को लेकर संगठन कार्य कर रहे हैं, क्या उनको विश्वास में नहीं लिया गया। विद्यार्थी परिषद की अपील तो यही बता रही है।

रा शिक्षा निति - 2020 बनी थी तब कहा गया था इतने - इतने लोगों से पूछा गया था।अब क्यों राय नहीं ली गई?

कितने विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, छात्रों से राय ली गई? कुलपतियों को भूल जाइये। वे तुलसी बाबा के अनुसार - प्रिय बोलने में विश्वास रखते हैं? क्या शैक्षणिक संगठनों के अध्यक्ष -महामंत्री भी प्रिय बोलने बाले -
सचिव,बैद, गुरु बन गये हैं?

हो सके तो आरक्षण का लाभ ले रहे या उसकी परिधि में आ रहे संगठन प्रमुख,नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रेट्स अवश्य विचार करें।

 देश सुरक्षित है तो हम सब सुरक्षित हैं, अन्यथा उदाहरण आंखों के सामने हैं।
अति उत्साह गाय बनाते -बनाते गधा न बना दे।

27/01/26

चिंतन

मित्रवर!

आदरणीय मोदी जी और शाह जी देश के लिए वह सब कर रहे हैं , जो चाहिए किंतु टीम और तंत्र भी उसी चिंतन का होना चाहिए। 

जनता का सम्प्रेषण दिशा देगा। पूर्णता तो देवताओं में भी नहीं होती।तभी तो अंशावतार कहा जाता है। कर्ता तो एक ही दीनानाथ हैं। 

काल किसी को क्षमा नहीं करता। हां कभी कभी सौ दो सौ साल भी दिशा पकड़ने को कम लगते हैं।
आरक्षण का युक्तियुक्तकरण आवश्यक है 🙏 

प्रतिभा को यह कह कर नहीं दबाया या उसके अधिकार से बंचित किया जा सकता कि उसके पुर्खों ने किसी वर्ग,जाति पर अत्याचार किये हैं तो अब उन्हें अत्याचार सहना होगा।

समानता और समरसता का यह मार्ग भी सिंहावलोकन की अपेक्षा रखता है।

यह ज्योतिष का कौन-सा आचार्य है जो समाज सेवकों को बताता है कि आज जिसे आप सवर्ण कह रहे हैं , वह कल राजा,आतातायी, गरीबों पर अत्याचार करने वाला था।

और जो आज दलित के नाम पर चार पीढ़ियों से आरक्षण ले रहे हैं,  वे हमारे तथाकथित अत्याचारी पुरखों से कुचले गये थे।

पुनर्जन्म का भारतीय दर्शन आत्मा की अमरता के परिप्रेक्ष्य में कहता है , न कि जाति विशेष में पूर्व जन्मों का चिट्ठा बताता है।

फिर यह सवर्णों को जिन्हें संविधान निर्माताओं/ समाजसेवकों ने अघोषित उपाधि दे डाली कहां से जन्म-जन्मांतर का खाका प्राप्त किए हैं।

कहने को पंचवर्षीय योजनाओं का विचार है। किंतु क्या वह केवल भौतिक वस्तुओं के निर्माण और संग्रह के लिए ही है। गुण दोष के आधार पर आरक्षण, चुनाव प्रणाली,मुफ्त राशन वितरण, मतांतरित व्यक्तियों के आरक्षण के सम्बंध में पुनर्विचार का अवसर नहीं देता?

तथाकथित समाज के आर्थिक रूप से प्रतिभावान युवा आज दर -दर रोजी रोटी को भटक रहे हैं! कार्यालयों में अपने से कम योग्य व्यक्ति के सामने अपमानित हो नौकरी कर रहे हैं। चयन से लेकर प्रमोशन तक जाति,वर्ग में पैदा होना एक मनुष्य के लिए वरदान बना दिया तो दूसरे को श्राप!! यह प्राकृतिक न्याय नहीं है। 

सतहत्तर साल में सुधार नहीं हुआ।केवल सत्ता पक्ष विपक्ष को गाली दे,समय पास करे, तंत्र लूट खसोट करे और यह सवर्ण का एजेंडा खड़ा कर हिंदुओं को बांटे। वाह रे! नीति निर्माताओं!! 

सुधरो, समझो, वोट और सत्ता की खुमारी से बाहर आकर सड़ांध मार रहे कैंसर की शल्य चिकित्सा करो। अन्यथा आज जैसे आप अपने पूर्व के सत्ताधारियों को नकारा साबित कर रहे हैं कल आपको भी यही उपाधि मिलेगी।

 सत्ता देश के लोक मंगल के लिए है और इसमें संतों, आचार्यों, और समाजों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

यह विचार आज अपेक्षित है। समाज स्वार्थ से ऊपर उठे यह विचार होना चाहिए।
शेष जिसकी जैसी मर्ज़ी। हरि ओम् तत्सत 🕉️🙏

संतों की विरासत

संतों की विरासत को जीवित रखने के लिए यह आवश्यक है कि 'भारतीय ज्ञान परंपरा' को शिक्षा के हर स्तर पर (व्यक्ति, परिवार, कुटुंब, राज्य और राष्ट्र आदि के साथ ) साझा किया जाए ।

 युवाओं में स्व’ (आत्म-बोध) और अतीत के प्रति गौरव का भाव जागृत हो । पश्चिमी अंधानुकरण के स्थान पर धर्म, नैतिकता और वैज्ञानिक चेतना के बीच संतुलन बनाया जाए । 

कुटुम्ब भाव सुगन्धित-सुवासित रहे।सामाजिक समरसता व्यवहार से आये न कि धन, पद और प्रतिष्ठा के संतुष्टीकरण से ।

 संतों का सत्संग सतत चले, मठ, मंदिर और धर्मशालाएं धार्मिकता के साथ सांस्कृतिक केंद्र बने ।

 मनुष्य की दृष्टि वैश्विक हो । स्त्री, बाल, वृद्ध सुरक्षित और अनुकूलित रहें। साहित्य का विकास परम्परा के अन्वेषण के साथ हो। गौवंश, नदियाँ और जलस्रोत पवित्र और प्राणमय बने रहें। सरस्वती अपने सभी स्वरूपों में प्रसन्नवदना रहे । 

सत्ता निरहंकारी हो। संत परोपकारी हों। तभी बोध होगा कि भारत की वास्तविक शक्ति इसके सैनिक धर्म के साथ संत और ऋषि भाव में है, जहाँ अध्यात्मिकता सांस्कृतिक कलेवर के साथ राष्ट्र को बलवती बनाती है।

 भारतवर्ष एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में अपने अमरता के विश्वास को विश्व के कल्याण के लिए कारक बना रहे । 

 तभी सनातन राष्ट्र विश्व गुरु के पद पर आसीन रहकर संसृति के भविष्य की दुबिधा और द्वंद्व से ग्रसित मानवता को त्राण के सूत्र दे सकेगा।

 - विश्व धरा की प्रथम स्रोतस्विनी माँ नर्मदा के दोनों स्वरुप ‘नर्मदा और रेवा’ को प्रणाम। 🙏🙏🙏🕉️ 

24/01/26

Wednesday, 21 January 2026

अभिमुक्तेश्वरानंद

अभिमुक्तेश्वरानन्द जी को जिस तरह सोशल मीडिया पर लक्ष्य किया जा रहा है, वह दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डालेगा।सनातन में सब प्रकार के लोग हैं। सनातन सब को पचा कर चलता आया है, इसलिए सनातन है।वे जो कर रहे हैं उन्हें यदि बोध होगा तो ठीक है अन्यथा वे स्वयं अपने कर्मों का फल भोगेंगे।दरअसल इसमें शंकराचार्यों को ही केवल अभिमत देना चाहिए। यह उनकी व्यवस्था है।हर बात में यदि हिन्दू स्वयं को सोशल मीडिया में सनातन का न्यायाधीश बनेगा तो वह परम्परा को क्षति पहुंचायेगा।यदि वे स्वयं के विवेक से नकारात्मक या धर्म व्यवस्था के विपरीत कार्य कर राज्य विधि व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे हैं तो सरकार या संन्यास मार्गी कार्यवाही करेंगे।यदि वे किसी विशिष्ट एजेंडे के तहत माघ मेला जैसे पर्व पर लोकेषणा प्राप्त करना चाहते हैं तो ईश्वर उन्हें रास्ता दिखायेगा।नीति -धर्म - व्यवस्था -अतिरेक आदि को ईश्वरीय व्यवस्था ही ठीक करती है। माध्यम भी वही तय करती है।अंत में यह स्मरण रखना होगा हिन्दू समाज को किसी भी तरह एक रहना होगा,चाहे वह राजनीति हो, राष्ट्र नीति हो, अध्यात्म हो या सांस्कृतिक धरोहर और विरासत हो।

Monday, 19 January 2026

लेखक,लेखन और समाज



01 जनवरी से प्रारम्भ हुआ. 19/01/2026 को ख़त्म हो रहा है.

बिन्दुवार संक्षेप

1. कार्य पूर्ण होने से पहले उसका प्रचार नहीं करना चाहिए; कर्म स्वयं अपनी वाणी होता है।
* लघुकथा विमर्श इसका प्रमाण है।

2. कर्म की शक्ति शब्दों से अधिक प्रभावशाली और परिणामकारी होती है।
* स्पष्ट है भाषण, उद्वोधन, चर्चा की तुलना में लेखन कर्म अधिक महत्वपूर्ण है। तभी तो हम आज समीक्षा कर रहे हैं।

3. साधना और सृजन में प्रसिद्धि बाधक होती है, सहायक नहीं।
* कभी कभी लेखक जब प्रसिद्ध, पुरस्कार और सम्मान की ओर दोड़ता है तो उसके उत्कृष्ट लेखन में बाधा पैदा होती है।

4. न्यूटन-हेले प्रसंग यह दिखाता है कि महान व्यक्ति 'नाम' नहीं, 'कार्य' को महत्त्व देता है।

5. न्यूटन ने ग्रंथ प्रकाशित होने की चिंता नहीं की, न ही लेखक-नाम को आवश्यक माना।

6. सच्चा साधक प्रशंसा-निन्दा से अप्रभावित रहकर अपने लक्ष्य में रत रहता है।
* समीक्षाएं और पाठक की टिप्पणियां जहां लेखक को प्रोत्साहित करती हैं, वही प्रशंसा और निंदा उसको लक्ष्य से विचलित करती हैं।

7. किसी व्यक्ति या रचना का सही मूल्यांकन उसके जीवनकाल में प्रायः संभव नहीं होता।
,* इसलिए फल की इच्छा से अनासक्त रह कर रचना कर्म करते रहना चाहिए।

8. भारतीय ऋषि-परम्परा में मौलिकता का अहं नहीं, परम्परा की निरन्तरता का भाव है।
*लेखक को मौलिकता के अहं से दूर रहना चाहिए। विचार प्रवाह के साथ लक्ष्मी की तरह साधक के पास पहुंचते रहते हैं ।
धन जैसे बांटने से बढ़ता है,चिंतन भी साझा करने से सामर्थ्य प्राप्त करता है।


9. वेद अपौरुषेय माने गए क्योंकि वे व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* साहित्यकार की यही समझ उसे समष्टि से जोड़ती है।

10. अनाम रहकर कार्य करना भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठ माना गया है।
* साहित्य एकांत साधना है। समय के साथ साधना पूर्ण होने पर वह लोक के सामने आती है।

11. वास्तविक सौंदर्य के दर्शन से पहले अपनी सीमाओं का बोध नहीं होता (नॉटरडेम का कुबड़ा प्रसंग)।
* हमारी ही रचना सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा अहंकार पालना साहित्यकार को पालना उचित नहीं है।वृहत्तर साहित्य के अध्ययन से यह भ्रम दूर होता है और लेखक का लेखन गंभीरता को प्राप्त होता है।

12. साहित्य और आलोचना आत्मबोध तथा विनम्रता उत्पन्न करने का माध्यम हैं।
* रचना कर्म अदृश्य सत्ता/नियंत्ता के निर्देश से होता है।

13. साहित्य में लेखक, समीक्षक और पाठक का त्रिकोणात्मक संबंध होता है।

14. लेखक रचना का सृजन करता है, समीक्षक उसका अर्थ खोलता है, पाठक उसे जीवन देता है।

15. बिना पाठक के रचना अपूर्ण मानी जाती है।

16. रचना की महत्ता उसके लोकमंगल, मानवीय सत्य और वैचारिक गहराई में निहित है।

17. साहित्य का उद्देश्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सार्थक संप्रेषण है।

18. सच्चा साहित्य अपने समय से संवाद ंकरता है और भविष्य को दिशा देता है।

ह्विटमैंन की पंक्तियां हैं -
बन्धु तुम पुस्तक को नहीं,
मुझे स्पर्श कर रहे हो।
तुम्हारे हाथों में पुस्तक नहीं 
मेरी काया है।
इन पृष्ठों से प्रकट होकर मैं 
तुम्हारे हृदय में समा जाउंगा।
........


Sunday, 11 January 2026

वागर्थाविव


कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।

करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम।।

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यंपादस्पर्शं क्षमस्व मे ।


वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।

जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥


ॐ मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा उशि मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्यो रुद्र रिलीष:।।

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, प्रदक्षिणा समर्पयामि।

पुष्पाञ्जलि -

ॐ मा नस्तोके तनये मा न आयुधि मा नो गोषु मा नो अश्वेष रीरिषः । मा नो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥ 

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।

नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे।        साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः ॥  पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः    त्राहि मां पार्वतीनाथ सर्वपापहरो भव ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, प्रार्थनापूर्वक-नमस्कारान् समर्पयामि। अनया पूजया श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवः प्रीयतां न मम। श्रीसाम्बसदाशिवार्पणमस्तु ।

......

ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते ।

 गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते ॥

तप्तकाञ्चनगौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि ।

वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये ॥

हरे कृष्णहरे कृष्णकृष्ण कृष्णहरे हरे

हरे रामहरे रामराम राम हरे हरे।

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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाम्।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥


सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।

सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ।।

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अथ हृदयादिन्यासः

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक इति हृदयाय नम।

….......

ॐ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेन स्वयं व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्येमहाभारतम् । अद्वैतामृतवर्षिणी भगवतीमष्टादशाध्यायिनी-मम्ब त्वामनुसंदधामि भगवद्‌गीते भवद्वेषिणीम् ॥ १ ॥

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्रं

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ॥ २ ॥


प्रपन्नपारिजाताय  तोत्त्रवेत्रैकपाणये।ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः ॥ ३ ॥

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ४


 भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला। अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः ॥ ५ ॥

पाराशर्यवचः सरोजममलंगीतार्थगन्धोत्कटं

नानाख्यानककेसरंहरिकथासम्बोधनाबोधितम् । 

लोके सज्जनषट्पदैरहरहः पेपीयमानं मुदा भूयाद्भारतपङ्कजं कलिमलप्रध्वंसि नः श्रेयसे ॥ ६ ॥

मूकं करोति वाचालं पङ्गु लङ्घयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥ ७ ॥

......

अथ गीतामाहात्म्यम् 

गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतः पुमान् । विष्णोः पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जितः ॥ १ ॥

गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च। नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ॥२॥

मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्त्रानं दिने दिने । सकृद्गीताम्भसि स्त्रानं संसारमलनाशनम् ॥ ३॥

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥ ४ ॥

भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनिःसृतम्।गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥५।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥ ६॥

 एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव ।एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥ ७॥

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॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै-र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥

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श्रवणं कीर्तनं स्मरणं विष्णोः पादसेवनं ।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥(श्रीमद्भावतम १५.२३)