रुचि से, अरुचि से, भय से, दंड से, दान से, भेद से मानना नियति है। अर्जित सम्मान गांडीव है। परशुराम है। वर्तमान का वैश्विक नायक है।
मानो तो साथ है अन्यथा अकेला हाथ है।
मानने से देश को दिशा मिलेगी। राष्ट्र का तीर्थ जिंदा रहेगा। भारत माता जगद्गुरू रहेगी। सांस्कृतिक राष्ट्र, वादों से मुक्त चिर पुरातन नित्य नूतन जीवन मूल्यों को संरक्षित करेगा। ऋषियों का कल्प संकल्प के साथ भविष्य बनेगा।
ब्राह्मण तो ब्रह्म में रमण करता है। उसे राम ही प्रिय हैं। वह जाति नहीं तप है। वह ऋत का वाहक है। वह दर्शन देता है। अध्यात्म को खेता है। वह संस्सृत का नेता है।
वह समदर्शी को भजता है, समदर्शी रहता है। वह संतत्प नहीं। वह संत हैं। संतत्व को जीता है।समाज का मार्गदर्शन करता है।
वह राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति करता है। ब्राह्मण-ब्राह्मण है। वह अग्नि- होता है। अग्नेमय सुपथा राये.... (ईशावास्योपनिषद)
29/01/26
उमेश कुमार सिंह
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