युवाओं में स्व’ (आत्म-बोध) और अतीत के प्रति गौरव का भाव जागृत हो । पश्चिमी अंधानुकरण के स्थान पर धर्म, नैतिकता और वैज्ञानिक चेतना के बीच संतुलन बनाया जाए ।
कुटुम्ब भाव सुगन्धित-सुवासित रहे।सामाजिक समरसता व्यवहार से आये न कि धन, पद और प्रतिष्ठा के संतुष्टीकरण से ।
संतों का सत्संग सतत चले, मठ, मंदिर और धर्मशालाएं धार्मिकता के साथ सांस्कृतिक केंद्र बने ।
मनुष्य की दृष्टि वैश्विक हो । स्त्री, बाल, वृद्ध सुरक्षित और अनुकूलित रहें। साहित्य का विकास परम्परा के अन्वेषण के साथ हो। गौवंश, नदियाँ और जलस्रोत पवित्र और प्राणमय बने रहें। सरस्वती अपने सभी स्वरूपों में प्रसन्नवदना रहे ।
सत्ता निरहंकारी हो। संत परोपकारी हों। तभी बोध होगा कि भारत की वास्तविक शक्ति इसके सैनिक धर्म के साथ संत और ऋषि भाव में है, जहाँ अध्यात्मिकता सांस्कृतिक कलेवर के साथ राष्ट्र को बलवती बनाती है।
भारतवर्ष एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में अपने अमरता के विश्वास को विश्व के कल्याण के लिए कारक बना रहे ।
तभी सनातन राष्ट्र विश्व गुरु के पद पर आसीन रहकर संसृति के भविष्य की दुबिधा और द्वंद्व से ग्रसित मानवता को त्राण के सूत्र दे सकेगा।
- विश्व धरा की प्रथम स्रोतस्विनी माँ नर्मदा के दोनों स्वरुप ‘नर्मदा और रेवा’ को प्रणाम। 🙏🙏🙏🕉️
24/01/26
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