Sunday, 15 September 2019

गांधी और लिपि (भाग ६)

गांधी और लिपि (भाग ६)

  ‘हिन्द स्वराज्य’ में (गांधी के शब्द), ‘‘सारे हिंदुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होनी चाहिए। हिंदू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार में अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।’’
२ फरवरी, १९४२ में प्रकाशित हरिजन के आलेख का एक अंश, ‘‘जो लोग राष्ट्रभाषा के हिमायती हैं, उन्हें उसके हिन्दी और उर्दू दोनों रूप सीखने चाहिए। इन्हीें लोगों की कोशिश से हमें वह भाषा मिलेगी, जो सब की भाषा कहलाएगी। भाषा का जो रूप अधिक लोकप्रिय होगा और जिसे लोग, फिर वे हिन्दू हों या मुसलमान, ज्यादा समझ सकेंगे, वेशक वहीं राष्ट्रभाषा बनेगी। लेकिन अगर लोग मेरी तज़बीज़ को आमतौर पर अपना लें तो फिर न तो भाषा का सवाल रहेगा और न वह किसी राजनीतिक झगड़े की जड़ ही बन सकेगा।’’
२७ फरवरी,१९४५ वर्धा में ‘अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी प्रचार-सभा’ का उद्वोधन भाषा नीति के मतभेदों / पक्षों को उजागर करता है, जरा इसे पढ़े, ‘‘श्री आनंद कौसल्यायन ने जो कहा, वह मैं समझा। वे दब-दबकर बोले हैं। हिन्दी साहित्य सम्मेलन की तरफ से उन्होंने यह कहा कि दो लिपियों का बोझ हो सके तो निकाल दिया जाए। मैं आज भी हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हूँ। उसमें मैं अपने-आप नहीं गया था। जमनालाल जी जिस काम में जाते, उसमें अपने साथ मुझे भी घसीट ले जाते थे। वे मुझे इन्दौर ले गए। वहाँ मैंने सम्मेलन को एक नई चीज दी। उसे सब हजम कर गए। मैंने कहा था- ‘हिन्दी वह जबान है, जिसे हिन्दू-मुसलमान दोनों बोलते हैं और जिसे लोग दोनों लिपियों में लिखते हैं। मेरा यह ठहराव मंजूर हो गया। मैंने उसे सम्मेलन के नियमों में शामिल कर दिया। बाद में फिर वह नियम बदल दिया गया, तो दूसरी बात है’, इसलिए अब अगर मैं सम्मेलन में से निकल जाऊँ तो मुझे दु:ख न होगा।’’
२२ फरवरी,१९४६ मद्रास (प्रार्थनासभा),‘‘कल तो मुझे आपसे निराशा हुई। मैंने टूटी-फूटी हिन्दुस्तानी में अपनी बात समझाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहा। जब मैं हिन्दुस्तानी में बोला, तब स्वयं राजाजी भी मेरी बात को पूरी तरह नहीं समझ पाए। इस मामले में राजा जी दोशी न. १ हैं। वे आपको तमिल में संबोधित करते हैं, लेकिन जब वे मद्रास से बाहर जाते हैं, तब अंग्रेजी में बात करते हैं।  यदि समुद्र का पानी अपना खारापन छोड़ दे तो उसे सुस्वादु कहाँ से बनाया जाएगा? देश भर में राजा जी की प्रतिष्ठा अंग्रेजी के एक अच्छे वक्ता के रूप में है, लेकिन उन्होंने हिन्दुस्तानी नहीं सीखी है। मैं आप सब लोगों से यहाँ और इसी समय यह वचन (और आप केवल वचन देगें ही नहीं, बल्कि वचन का पालन करने की प्रतिज्ञा भी करेंगे) लेना चाहता हूँ कि आप सब लोग हिन्दुस्तानी सीखेंगे। क्या आपको देश की स्वाधीनता के लिए इतना थोड़ा-सा भी नहीं करना चाहिए ? क्या आप तमिलनाडु के दो करोड़ लोगों से अंग्रेजी सीखने की अपेक्षा करते हैं ? अथवा क्या आप शेष भारत से आशा रखते हैं कि वे लोग आपसे संभाषण करने के लिए आपकी चार भाषाओं में से एक भाषा सीखेगे ? मैं कहता हूँ कि हिन्दुस्तानी सीखना आपका कर्म है जो दक्षिण को उत्तर भारत से मिला देगी।’’ यहाँ गांधी जी की स्वाधीनता की चिंता थोड़ा हिन्दू-मुसलमान से हट कर है जिसका मौन संदेश भी है कि देश की एकता के लिए भारत की अन्यभाषाओं का अन्त:सम्बन्ध व्यवहार में आना आवश्यक है, तभी हमारी स्वाधीनता टिक सकेगी।
आगे देखें, ‘‘हममें कई ऐसे हैं, जो हिन्दी और उर्दू को मिलाने की कोशिश करते हैं। कोई कहते हैं- ‘इसकी क्या आवश्यकता है।’ मैं तो सच्ची डेमोक्रसी (जनतंत्र या जमहूरियत) चाहता हूँ। सिर्फ हाँ-में-हाँ मिलाने से ‘डेमोक्रेसी’ ‘हिपोक्रेसी’ (कपट) बन जाती है। इसलिए मैंने कहा कि सिर्फ हाँ-में-हाँ न मिलाइए, अपनी सच्ची राय बताइए।’ यहाँ हिन्दुस्तानी की चिंता है। विचारणीय यह है कि क्या गाँधी की यह बात ‘हाँ-में-हाँ न मिलाइए’ आज कोई मान रहा है? और क्या गांधी स्वयं के लिए ‘हाँ में हाँ’ मिलाना अच्छा नहीं मानते थे ? आखिर गांधी  और टंडन जी के मतभेद का कारण यही न था ? यदि टंडन जी गांधी की बात में ‘हाँ में हाँ’ स्वीकार कर लेते या टंडन जी की बात गांधी जी स्वीकार कर लेते तो क्या बिगड़ता? जी, हाँ गांंंंधी के हाँ करने में शायद कुछ नहीं बिगड़ता बल्कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में ताकत ही मिलती किन्तु यदि टंडन जी हाँ में हाँ मिला देते तो आज हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी राजभाषा होती इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। गांधी जी हिन्दुस्तानी पर अड़े रहे और टंडन जी जैसे अनेक हिन्दी प्रेमी हिन्दी पर। गाँधी जी तो संविधान के अंतिम होने के पहले ही चल बसे और हम आज तक राष्ट्रभाषा न पा सके। राष्ट्र के इस दर्द को कौन समझे ?
‘लिपि और हिन्दुस्तानी’ को लेकर गांधी जी के और श्री पुरुषोत्तमदास टंडन के विरोध उभर कर आ गये थे जिसे गांधी के शब्दों में (सं.गां.वां, खण्ड-८२,पृ.१०६)देखें, ‘‘टंडन जी मेरे मित्र हैं। मैं उन्हें प्यार करता हूँ। हम दोनों बहुत अर्से तक एक साथ रहे हैं। लेकिन अब इस प्रश्र पर हम एक दूसरे के मार्ग में बाधा नहीं बनते। खुद मैं तो गंगा और जमुना के मिलन के बाद सरस्वती के दर्शन करना चाहता हूँ।’’
 वास्तव में उस समय (१९३५ ई.) से लेकर आज तक गांधी जी के इस गंगा-जमुना संस्कृति पर दो फाड़ बना हुआ है। ध्यान रहे गांधी जी ने इसी बात को लेकर २५ जुलाई, १९४५ में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ से भाषा-नीति के विरोध में त्यागपत्र दे दिया था, जिसे मंजूर भी कर लिया गया! २५ जुलाई, १९४५ को गाँधी जी ने जो तर्क दिया वह भी कुछ लोगों की नजरों में आज भी गांधी जी के दुराग्रह का संदेश देनेवाला है, ‘‘मेरे पास उर्दू खत आते हैं, हिन्दी आते हैं और गुजराती। सब पूछते हैं, मैं कैसे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ में रह सकता हूँ और ‘हिन्दुस्तानी सभा’ में भी?
 वे कहते हैं, सम्मेलन की दृष्टि से हिन्दी राष्ट्रभाषा हो सकती है, जिसमें नागरी लिपि ही को राष्ट्रीय स्थान दिया जाता है, जबकि मेरी दृष्टि में नागरी और फारसी-अरबी (उर्दू की लिपि) लिपि को स्थान दिया जाता है, जो भाषा न फारसीमयी है न संस्कृतमयी है। जब मैं सम्मेलन की भाषा और नागरी लिपि को पूरा राष्ट्रीय स्थान नहीं देता हूँ, तब मुझे सम्मेलन में से हट जाना चाहिए। ऐसी दलील मुझे योग्य लगती है। इस हालत में क्या सम्मेलन से हटना मेरा फर्ज नहीं होता है? ऐसा करने से लोगों को दुविधा न रहेगी और मुझे पता चलेगा कि मैं कहाँ हूँ।’’
‘मैं कहाँ हूँ।’ अपने को तौलना और साफगोई की वकालत करना भी गांधी जी का एक दृष्टिकोण रहा होगा। दूसरा मुझे लगता है विभाजन की रेखा गांधी के आँखों के सामने नाच रही थी और उसे वे किसी भी तरह बचाना चाहते थे, जिसमें भाषा और लिपि भी एक माध्यम बने, शायद यही उनका हठ रहा होगा, खैर।
हिन्दी साहित्य सम्मेलन को वे राष्ट्रभाषा के प्रतिकूल मानते हुए कहते हैं, ‘‘पहले पहल जब  ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ में मैंने हिन्दी की व्याख्या की, तब उसका विरोध नहीं के बराबर था। विरोध कैसे शुरू हुआ, इसका इतिहास बड़ा करुणाजनक है। मैं उसे याद भी नहीं रखना चाहता। मैंने यहाँ तक कहा था कि ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ नाम ही राष्ट्रभाषा के प्रचार के लिए सूचक नहीं था, न आज भी है। लेकिन मैं साहित्य के प्रचार की दृष्टि से सदर नहीं बना था। स्व. भाई जमनालाल जी और दूसरे अनेक मित्रों ने मुझे बताया था कि नाम चाहे कुछ भी हो, उन लोगों का मन साहित्य में नहीं था। उनका दिल राष्ट्रभाषा में ही था और इसीलिए मैंने दक्षिण में राष्ट्रभाषा का प्रचार बड़े जोरो से किया।’ (१८ जनवरी,१९४८)
लिपि पर गांधी जी के मत से हम असहमत हो सकते हैं किन्तु यह भी देखना होगा कि यह बात गांधी तब उठा रहे हैं जब इस देश में रोमन लिपि भी अपनी उपस्थिति जता रही है। गांधी जी रोमन लिपि से कतई सहमत नहीं थे, ‘‘रोमन लिपि तो मात्र मुठ्ठी भर अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगों की है, जबकि फारसी कारोड़ों हिन्दू मुसलमाना लिखते हैं।’’
३ जुलाइ,१९३७ को गांघी जी लिखते हैं, ‘‘रोमन लिपि न तो हिंदुस्तान की सामन्य लिपि हो सकती है और न होनी चाएि। यह प्रतियोगिता तो फारसी और देवनागरी के बीच ही हो सकती है और उसके अपने मौलिक गुणों को अलग रख दें तो भी देवनागरी ही सारे हिन्दुस्तान की सामान्य लिपि होनी चाहिए।’’
गांधी जी संस्कृत से निकली विभिन्न भाषाओं के लिए भी एक ही लिपि चाहते थे, (१५ अगस्त, १९३६ ‘हरिजन में) ‘‘जो अलग-अलग भाषाएं संंस्कृत से निकली हैं, या जिनका उसके साथ गहरा सम्बन्ध रहा है, पर जो जुदा-जुदा लिपियों में लिखी जाती हैं, उनकी एक ही लिपि होनी चाहिए और वह लिपि निस्संदेह देवनागरी ही है।’’
वर्तमान गृहमंत्री जी का हिन्दी को लेकर दिया वयान एक आशा की किरण हैं। कुछ विरोधी स्वर उभर रहे हैं किन्तु यहाँ गांधी जी के दृष्टिकोण को समझना और उसको बाहर लाना आवश्यक है, गांधी जी मानते हैं कि राष्ट्रीय भाषा हिन्दी मुस्लिम विरोधी नहीं है(११ नवम्बर,१९१७), ‘‘ मैं यह कहता आया हूँ कि राष्ट्रीय भाषा एक होनी चाहिए और वह हिन्दी होनी चाहिए। मैंने सुना है कि इस सम्बन्ध में कई मुसलमान बंधुओं के मन में गलतफहमी है। उनमें बहुतेरों का ख्याल है कि ‘हिन्दी होनी चाहिए’ यह कहकर मैं उर्दू का विरोध करता हूँ। हिन्दी भाषा से मेरा मतलव उस भाषा से हैं, जिसे उत्तर भारत में हिन्दू और मुसलमान दोनों बोलते हैं और जो नागरी तथा उर्दू लिपि में लिखी जाती है। उर्दू के लिए मेरेे मन में कोई द्वेष नहीं है। मेरी तो यह मान्यता है कि दोनों भाषाएं एक ही है। मेरे ख्याल से तो दोनों भाषाओं का गठन, दोनों का ढंग, संस्कृत और अरबी शब्दों के भेद को छोडक़र, एक ही प्रकार का है। मेरा झगड़ा तो अंग्ररेजी के विरुद्ध है। मुझे द्वेष उससे भी कोई नहीं है, परंतु अग्रेजी भाषा के माध्याम से हम अपनी जनता से घुलमिल नहीं सकते और उनके साथ एक रस होकर काम नहीं कर सकते। मेरे कहने का आशय इतना ही है। हिन्दी को आप हिन्दी कहें या हिन्दुस्तानी, मेरे लिए तो दोनों एक ही हैं। हमारा कर्तव्य यह है कि हम अपना राष्ट्रीय कार्य हिन्दी भाषा में करें, लिपि के संबंध में वह होगा कि हिन्दू बालक नागरी में लिखेगा और मुसलमान उर्दू में। इससे किसी प्रकार की भी हानि नहीं है। पर दोनों ही दोनों लिपि सीखेंगे। हमारे बीच हमें अपने कानों में हिन्दी के ही शब्द सुनाई दें-अंग्रेजी के नहीं। इतना ही नहीं, हमारी धारासभाओं में जो वाद-विवाद होता है वह भी हिन्दी में होना चाहिए। ऐसी स्थिति लाने के लिए मैं जीवन-भर प्रयत्न करूँगा।’’
आज जिस हिन्दी का उपयोग साहित्य और शिक्षा संस्थानों मे हो रहा है उसमें विश्व के विभिन्न भाषाओं के शब्द घुलमिल गये हैं। हिन्दी संस्कृत उद्भूत होने (कुछ लोग ऐसा नहीं मानते) के कारण उसमें शब्द निर्माण की ही नहीं तो शब्द शोधन की अद्भुत सामथ्र्य है। कमी है तो संवैधानिक दर्जा प्राप्त होने की। आज राजभाषा हिन्दी जिस तरह उपेक्षित है उसमें चिंता होनी चाहिए। गांधी की चिंता अंग्रेजी की ज्यादा है जो आज भी उतनी ही आवश्यक और चिंतनीय है। आज जो थोड़ा बहुत आवाज दक्षिण या अन्य की आ रही है वह वोट और सत्ता का भ्रम है। जो देश को कम दलों के लिए ज्यादा घातक है। लिपि का विविधता से हिन्दी को कोई फर्क नहीं पड़ता। जहाँ तक परिनिष्ठिति हिन्दी का प्रश्र है वह साहित्य में बनी हुई है। जिस देश में अवधारणा है कि प्रत्येक तेरह कोस में वानी बदल जाती है, वहाँ बोलियों और उपबोलियों के सन्दर्भ को ध्यान में रखना होगा।
यहाँ आपका ध्यान मैं इस ओर भी खींचना चाहता हँू कि लेख का आशय भी यह है कि जब बड़े लोगों के ‘विचार / अहम / मैं कहाँ हूँ / हाँ-में हाँ’ आदि पर अटक जाते हैं तब भारत जैसे ‘नित्य नूतन चिरपुरातन’ की अवधारणावाला देश अपनी ‘वाणी’ भी नहीं पाता है। आज इसे गांधी काल से सबक लेते हुए छोडऩा ही होगा। काल की यही माँग है।
ध्यान देना होगा कि भौगोलिक स्वतंत्रता (अखण्डता) के साथ भाषिक स्वतंत्रता अभी बाकी हैं। विश्वास है जिस तरह सत्तर सालों बाद कई सुधार हो रहें हैं तो यह राष्ट्रभाषा का विवाद भी एक नियति को प्राप्त होगा। इसमें गांधी की भूमिका को भी आने वाली पीढ़ी स्मरण रखेगी। वर्तमान गृहमंत्री जी का हिन्दी को लेकर दिया वयान एक आशा की किरण हैं।











हठ छोड़ संविधान और गांधी की मंशा ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’ को आत्मसात करें


हठ छोड़ संविधान और गांधी की मंशा ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’ को आत्मसात करें

डॉ उमेश कुमार सिंह

  केन्द्र की पहल पर नुक्ताचीनी करने वाले अपने को गाँधी के साथ दक्षिण के संतों के आयने में देखें तो उन्हें ध्यान में आ जायेगा कि भारत की भाषा के लिए पूर्वजों का क्या सपना था? आज देश 70 साल में भी हिन्दी भाषा को मान्यता नहीं दे पा रहा है? इसका कारण देश की जनता नहीं उनके हठी और सत्ता-राजनीति के स्वार्थी नेता और प्रशासन के चिपकू  व्यूरोक्रेट और टेक्रोक्रेट तथा छद्म बुद्धिजीवी और अंग्रेजी के पालतू गुलाम हैं।

  १५ सितम्बर के समाचार पत्रों, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोसल मीडिया में कुछ लोग हिन्दी दिवस पर भारत सरकार के गृहमंत्री के सीधे-साधे वयान पर छाती पीटते नजर आये। आखिर गृहमंत्री का वह वयान कौन सा है, देखें-  “हमारे देश की सभी भाषाओं की व्यापकता और समृद्धता विश्व की किसी भी भाषा से बहुत अधिक है। मैं देशवासियों से आह्वान करता हूँ कि आप अपने बच्चों से, अपने सहकर्मियों से अपनी भाषा में बात कीजिए क्योंकि अगर हम ही अपनी भाषाओं को छोड़ देंगे तो उन्हें लम्बे समय तक जीवित कैसे रखा जायेगा। .. भारत की अनेक भाषाएं और बोलियाँ हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन देश की एक भाषा ऐसी हो, जिससे विदेशी भाषाएँ हमारे देश पर हावी ना हों इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने एकमत से हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकर किया।“

अब जरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का देशवासियों के नाम १४ सितम्बर का संदेश भी देखें-“हिन्द दिवस पर आप सभी को बहुत-बहुत बधाई। भाषा की सरलता,सहजता और शालीनता अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान करती है। हिन्दी ने इन पहलुओं को खूबसूरती से समाहित किया है।“

अब राजनेताओं की प्रतिक्रियाएँ-
‘अगर केंन्द्र ने एक तरफा रूप से हिन्दी थोपी तो न सिर्फ तमिलनाडु बल्कि बंगाल, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों में इसकी प्रतिक्रिया (विपरीत) होगी और समर्थन नहीं मिलेगा।’ - (के .पंडीराजन-तमिलनाडु, संस्कृति मंत्री)

‘हम लगातार हिन्दी को थोपे जाने का विरोध कर रहे हैं। अमित शाह की टिप्पणी से हमें आघात पहुँचा है, यह देश की एकता को प्रभावित करेगा। हम माँग करते हैं कि वह बयान वापस लें।’- (एम के स्टालित द्रमुक प्रमुख)

‘अगर भारत को सिर्फ हिन्दी का ही देश बनाना हैे तो सिर्फ हिन्दी भाषी राज्य ही इसका हिस्सा होंगे। तमिलनाडु और पूर्वाेत्तर जैसे कई अन्य क्षेत्र इसका हिस्सा नहीं होंगे।’- (वाइको एमडीएमके प्रमुख)

‘पहचान नहीं हो सकती.. हिन्दी को वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान बनाने के लिए अन्य भाषाओं की पहचान छीनने की कोशिश क्या निन्दनीय नहीं है?- (एस रामदास पीएमके प्रमुख)

हिन्दी राष्ट्रभाषा है,यह झूठ बोला जाना बंद होना चाहिए। सभी को पता होना चाहिए कि कन्नड़ की तरह यह भी भारत की २२ अधिकारिक भाषाओं में से एक है। झूठ बोलकर या गलत जानकारी देकर एक भाषा को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।’- (सिद्धारमैंया, पूर्व सीएम कर्नाटक)

इसी प्रकार अनेक टिप्पणियाँ आईं जिनका विस्तार भय से जिक्र सम्भव नहीं। सभी सुधीजनों ने पढ़ी ही होंगी।

१४ सितम्बर (हिन्दी दिवस) की दो खबर भोपाल की- एक ,‘प्रदेश निर्वाचन आयोग ने हिन्दी को समय, धन नष्ट करने वाली भाषा बताया। निकाय चुनाव में अभ्यार्थी आवेदन में अंग्रेजी में लिखेंगे अपना नाम।’ (यह खबर आर टी आई से प्राप्त अजय दुबे के हवाले से आई है।) प्रश्र है जिस निकाय का आप चुनाव कराने जा रहे हैं उसमें क्या सभी अंग्रेजी के जानने वाले हैं। यदि आप अगूठाछाप या केवल हिन्दी के जानकार का फार्म अंग्रेजी में भरवायेंगे तो जाहिर है वह दूसरे द्वारा भरा गया होगा और उसमें केवल उसके या तो अँगूठा लगा होगा या हिन्दी में हस्ताक्षर किया होगा।

मुझे इस अवसर पर गांधी याद आ रहे हैं, १९/८/१९११ को “इंडियन ओपिनियनमें क्या लिखते हैं, ‘‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृत्ति पायी जाती है। मानो उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता अर्थात् परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। .. इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति-चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो-इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धांत को भूल जाने के खतरा मोल ले रहे हैं।”

दूसरी समाचार, अटलबिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में बोलते हुए प्रदेश के मा. राज्यपाल महोदय ने हिन्दी विश्वद्यिालय को विशेष दर्जा देने की सलाह दी जिसे वहां उपस्थित उच्च शिक्षा मंत्री ने तत्काल सरकार की ओर से सहमति दे दी।

इस सुखद समाचार को जब हम आप से साझा कर रहे हैं तब भी हमें बापू ही याद आ रहे हैं। उनके कूछ भाषणों / आलेख के अंशों को उद्धृत करना यहाँ समीचीन होगा।

गांधी जी कहते हैं, “जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाये जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं हो सकेगा। यह तो स्वयं सिद्ध है कि :
 १. सारी जनता को नये ज्ञान की जरूरत है।
 २. सारी जनता कभी अंग्रेजी नहीं समझ सकती।
 ३. यदि अंग्रेजी पढऩे वाला ही नया ज्ञान प्राप्त कर सकता है,तो सारी जनता को नया ज्ञान मिलना असम्भव है।”

“हिन्द स्वराज्य” में भाषा के प्रति उनके आग्रह को देखकर रोमांच होता है, ‘भारत की भाषा अंग्रेजी नहीं है, हिन्दी है। वह आपको सीखनी पड़ेगी।’

२० अक्टूबर,१९१७ में राष्ट्रभाषा के पक्ष में बड़े ही तार्किक ढंग से गांधी जी अपनी बात कहते हैं,
      १. वह भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसान होनी चाहिए।
           २. उस भाषा को ज्यादातर लोग बोलते हों।
          ३. उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक
      कामकाज शक्य होना चाहिए।
     ४.  वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान होनी चाहिए।
      ५. उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या अस्थायी स्थिति पर जोर न
     दिया जाए।”
अंग्रेजी को वे इन पाँचों कसौटियों में खरा नहीं पाते।

३१ दिसम्बर कोलकाता विश्वद्यिालय में ‘‘देश सेवा करने के लिए उत्सुक सब हैं, परन्तु राष्ट्रसेवा तक तब सम्भव नहीं है जब तक कोई राष्ट्रभाषा न हो। दु:ख की बात है कि हमारे बंगाली भाई राष्ट्रभाषा का प्रयोग न करके राष्ट्रीय हत्या कर रहे हैं। इसके बिना देश की आम जनता के हृदयों तक नहीं पहुँचा जा सकता। इस अर्थ में बहुत लोगों के द्वारा हिन्दी को काम में लाया जाना मानवतावाद के क्षेत्र की बात हो जाती है। यह तो बात शिक्षा जगत के लिए रही।

अब जरा नेताओं, समाजसेवकों से राष्ट्रभाषा की गांधी की अपेक्षा को समझे, कोलकाता में ही अखिल भारतीय समाज-सेवा-सम्मेलन में उनका भाषण, “पहली और सबसे बड़ी समाज-सेवा जो हम कर सकते हैं वह यह है कि हम इस स्थित से पीछे हटें, देशी भाषाओं को अपनायें, हिन्दी को राष्ट्रभाषा के  रूप में उसके स्वाभाविक पद पर प्रतिष्ठित कर और सभी प्रांत अपना-अपना समस्त कार्य अपनी देशी भाषाओं में तथा राष्ट्र का कार्य हिंदी में प्रारम्भ कर दें।”

     इन उत्तर से लेकर दक्षिण भारतीय विभिन्न भाषा-भाषी नेताओं, समाजसुधारकों और व्यूरोक्रेट़स के लिए उस संत का और क्या अपेक्षा हो सकती है?

स्मरण रखें देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने कोई अपना एजेण्डा देश के सामने नहीं रखा है, बल्कि वे उसी बात का आग्रह कर रहे हैं जिसे गांधी, रवीन्द्रनाथ जी से कह रहे हैं। यह उनके मन की नहीं देश के अन्तरात्मा की आवाज थी।  २१ जनवरी,१९१८ को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को लिखे पत्र में उनकी हिन्दी के लिए भविष्य की इच्छा और चिंता दोनों हैं, बापू लिखते हैं, मैं मार्च में इन्दौर में होने वाले “हिन्दी साहित्य सम्मेलन” के अधिवेशन में अपने भाषण के लिए कुछ प्रश्रों पर विचारवान नेताओं के मत एकत्र करना चाहता हूँ, वे प्रश्र इस प्रकार हैं-
१. क्या हिन्दी अन्त:प्रान्तीय व्यवहार तथा अन्य राष्ट्रीय कार्रवाई के लिए उपयुक्त एकमात्र
  सम्भव राष्ट्रीय भाषा नहीं है।
२. क्या हिन्दी काँग्रेस के आगामी अधिवेशन में मुख्यत: उपयोग में लाई जाने वाली भाषा न
   होनी चाहिए।
३. क्या हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों में ऊँची शिक्षा देशी भाषाओं के माध्यम से देना
  वांछनीय और सम्भव नहीं है ? 
४. और क्या हमें प्रारम्भिक शिक्षा के बाद अपने विद्यालयों में हिन्दी को अनिवार्य द्वितीय भाषा नहीं बना देना चाहिए ?
मैं महसूस करता हूँ, कि यदि हमें जनसाधारण तक पहुँचना है और यदि राष्ट्रीय सेवकों को सारे भारतवर्ष के जन साधारण से सम्पर्क करना है, तो उपर्युक्त प्रश्र तुरन्त हल किय जाने चाहिए।”

दक्षिण भारत के क्षेत्रीय नेताओं / तथाकथित बुद्धिजीवियों को गृहमंत्री के वयान पर प्रतिक्रिया देने वाले को गांधी जी की दक्षिण से अपेक्षा को समझना चाहिए- वे २५ मई, १९१८ को हनुमंत राव को पत्र लिखते हैं, “तुम हिन्दी का अध्ययन कर लोगे तो अपने काम का क्षेत्र व्यापक कर सकोगे। .. मैं नहीं जानता कि तुम्हारा इस ओर ध्यान गया है या नहीं, मेरा तो गया ही है। द्रविड़ों और अन्य भारतीयों के बीच लगभग न पटनेवाली खाई पड़ गयी है। निश्चय ही हिन्दी भाषा उसे पाटने वाला छोटे-से-छोटा और कारगर सेतु है। अंग्रेजी कभी उसको स्थान नहीं ले सकती। हिन्दी में कई ऐसी अवर्णनीय वस्तु है जिससे वह सीखने में आसान होती है। हिन्दी व्याकरण के साथ जितनी छूट ली जा सकती है, उतनी मैंने और किसी भाषा के व्याकरण के साथ ली जाती नहीं देखी। इसलिए मैं कहता हूँ कि राष्ट्रीय काम करने के लिए हिन्दी का ज्ञान नितान्त आवश्यक है।”

२२ जनवरी, १९२१ “जो बात मैं जोर देकर आपसे कहना चाहता हूँ वह यह कि आप सबकी एक सामान्य भाषा होनी चाहिए, सभी भारतीयों की एक सामान्य भाषा होनी चाहिए, ताकि वे भारत के जिस हिस्से में भी जाएँ, वहाँ के लोगों से बातचीत कर सकें। इसके लिए आपको हिन्दी अपनाना चाहिए।”
२३ मार्च,१९२१ विजयनगर, “हिन्दी पढऩा इसलिए जरूरी है कि उससे देश में भाईचारे की भावना पनपती है। हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा बना देना चाहिए। हिन्दी आम जनता की भाषा होनी चाहिए। आप चाहते हैं कि हमारा राष्ट्र एक ओर संगठित हो, इसलिए आपको प्रान्तीयता के अभियान को छोड़ देना चाहिए। हिन्दी तीन ही महीनों में सीखी जा सकती है।”
‘यंग इण्डिया’ नवम्बर १०,१९२१ “हिन्दी के भावनात्मक अथवा राष्ट्रीय महत्त्व की बात छोड़ दें, तो भी यह दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है कि तमाम राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं को हिन्दी सीख लेनी चाहिए और राष्ट्र की तमाम कार्यवाही हिन्दी में ही की जानी चाहिए।”

२४ मार्च,१९२५ मद्रास, “मेरी राय में भारत में सच्ची राष्ट्रीयता के विकास के लिए हिन्दी का प्रचार एक जरूरी बात है, विषेष रूप से इसलिए कि हमें उस राष्ट्रीयता को आम जनता के अनुरूप  साँचे में ढालना है।”

          २१ दिसम्बर, १९३३ पैराम्बदूर की मजदूर-सभा में, “साथी मजदूरो, यदि आप सारे भारत के मजदूरों के दु:ख सुख को बाँटना चाहते हैं, उनके साथ तादात्म्य् स्थापित करना चाहते हैं, तो आपको हिन्दी सीख लेनी चाहिए, जब तक आप ऐसा नहीं करते, तब तक उत्तर और दक्षिण में कोई मेल नहीं हो सकता।”

राजगोपालाचारी मद्रास प्रान्त के मुख्यमंत्री के नाते १९३७ में मद्रास में स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जाना अनिवार्य की तो मातृभाषा खतरे में हैके नाम पर आन्दोलन शुरु हो गया तब गांधी जी राजा साहब के पक्ष में उतर आये, १०/९/१९३८ (हरिजन) में, हमने बार-बार  घोषणा की है कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा या प्रान्तों के आपसी व्यवहार की सामान्य भाषा है या होनी है , यदि हमारी इस घोषणा के पीछे ईमानदारी है, तो हिन्दी के ज्ञान को अनिवार्य बनाने में बुराई कहाँ है ? ‘मातृभाषा खतरे में हैयह नारा या तो अज्ञान रूप है या एक पाखंड है और जहाँ इसके पीछे ईमानदारी है, वहाँ भी उन लोगों की देशभक्ति के लिए अपवादमय चीज है।.. .. यदि हमें अखिल भारतीय राष्ट्रीयता के धर्म तक पहुँचना है, तो प्रान्तीयता के आचरण को भेदना होगा। भारत एक देश और एक राष्ट्र है अथवा अनेक देश और अनेक राष्ट्र ? जो मानते हों कि यह एक देश है उन्हें राजाजी को अपना पूरा समर्थन देना चाहिए।“

इसके अतिरिक्त अब जरा विचार करें, यदि हमें सुब्रह्मण्यम् भारती को पढऩा है, तो उनकी पुस्तकें- वाचालि सपथम्, कुयिलु पट्टु, कण्णन पाट्टु, और ज्ञानरथ को कैसे पढ़ें? हमें अंग्रेजी नहीं आती तो कम-से कम हिन्दी अनुवाद तो सारा देश पढ़ सकता है?

महर्षि रमण तमिलनाडु के मदुरै शहर में जन्में। जरा उनके जीवन को समझें। रमण सोलह वर्ष के थे तभी उनके चाचा के यहाँ ‘तिरूवन्नमलाई’ से एक अतिथि पधारे। वैंकटरमण ने पूछा यह गाँव कहाँ है? अतिथि ने बताया अरुणाचल में। सहसा रमण का ध्यान कुलोतुग के पेरिसपुरणकी तमिल कविताओं में पढ़ी कविताओं के कारण शैव संतों के विचारों ने रमण के मन-बुद्धि को झकझोर डाला।  क्या मेरा भी सपना सच होगा, मैं भी उन संतों के समान बन सकूँगा।’

रमण के सम्पूर्ण जीवन को समझने के लिए यदि हमें तमिल और अंग्रेजी नहीं आती तो उनकी पुस्तक चालीस कविताएँको हिन्दी न होती तो हम कैसे पढ़ पाते। आखिर कैसे उनके श्रेष्ठ आध्यात्मिक जीवन को समझ पाते। और यदि रमण को हम केवल तमिल या अंग्रेजी तक ही सीमितकर लें और उन्हें भी यदि संस्कृत भाषा का ज्ञान नहीं होता तो आखिर तमिलभाषिओं को  शंकराचार्य की ‘ विवेक चूणामणि‘ का तमिल में आनन्द कैसे मिलता ?

           हम क्यों भूल जाते हैं कि आज सारा देश यदि श्रीनिवास रामानुजम को स्मरण कर पा रहा है तो केवल तमिल के कारण नहीं तो हिन्दी का उसमें बड़ा योगदान है। इसी तरह क्या दक्षिण भारतीय केवल अपनी भाषा बोध के कारण महर्षि अरविन्द, रवीन्द्र नाथ टैगोर, बंकिमचन्द्र, प्रसाद, प्रेमचन्द को समझ सकते थे? रामानुजाचार्य, तिरुवल्लुवर, बल्लभाचार्य (तेलुगु), नायन्मार संतों को सारा देश कैसे समझ पाता?भारतीय संविधान की आंठवी अनुसूची की सभी भाषाओं का ही नहीं तो बोलिओं और उपबोलियों का भी मनुष्य जीवन के निर्माण में अतुलनीय भूमिका है।

           रवीन्द्र नाथ टैगोर, की कविता का हिन्दी अनुवाद -
 “इस धरा पर वह महान आत्मा उतर रही है
 तो घासों की पत्तियाँ, सिहर-सिहर उठती हैं इस संभावना में
 स्वर्ग में नगाड़े बजने लगते हैं..
 काली रात का दुर्ग धूल में मिल जाता है
 और फैल जाता है, भोर का उजाला
 एक नए जीवन का आश्वासन कोई भय नहीं
 और आकाश  में प्रतिध्वनित होने लगता है यह मंत्र
 एक नए मान की विजय का हो रहा है आगमन।”

तमिलनाडु के तिरुवल्लुवर की कृति ‘तिरुक्कुलरल’ को हम कैस पढ़ सकते थे यदि हिन्दी अनुवाद हमारे समाने न होता। उनके छंदों के कुछ हिन्दी अनुवाद पढऩा आवश्यक है- जैसे पानी जिस मिट्टी में वो बहता है उसके अनुसार बदलता है, इसी प्रकार व्यक्ति अपने मिलने वालों के चरित्र को आत्मसात करता है।.. यहाँ तक की  उत्तम पुरुष जो मन की पूरी अच्छाई रखत है वह भी पवित्र संग से और मजबू होता है।’

 यदि हिन्दी नहीं होती और हिन्दी प्रेमी को तमिल और बंगला नहीं आती होती तो क्या देश बंगला और तमिल के इस अनुवाद का रसास्वादन पा सकता है? क्या इस संदेश को हमारे नेता/ ब्यूरोक्रेट्स/ टेक्रोक्रेट्स/ वामपंथी/ प्रगतिशील (जिनकी रोटी-रोजी ही हिन्दी और अनुवाद पर चल रही है) समझ सकेंगे।

रवीन्द्रनाथ की एक अनुदूति कविता और तिरुवल्लुवर के दो अनूदित उक्त उपदेशों को रख कर अपनी बात इस आशा से समाप्त करुँगा कि भारत एक राष्ट्र है, एक गणतंत्र है। दोनों रूपों में उसकी एक राष्ट्रभाषा और एक राजभाषा आवश्यक है। आज अंग्रेजी को हम सहन कर सकते हैं किन्तु हिन्दी को नहीं, इससे अधिक इस देश की विडम्बना और क्या हो सकती है। देश की भोली भाली जनता का उसके मातृभाषा से पृथक कर, उसे अपना वोट बैंक साधने वाले नेताओं को खास तौर से दक्षिण भारत के नेताओं को यदि युगानुकूल भाषा की चेतना नहीं आई, यदि हठ नहीं छोड़ा तो दस साल के अन्दर हिन्दी प्रेमी राजनीतिक दल पूरे दक्षिण की राजनीति पर कब्जा करेगा। गांधी के संदेश को स्वीकारने के अलावा ‘नान्या: पंथा:।’


Saturday, 14 September 2019

भाषा और गांधी (भाग पांच)

)
                                 १४/९/१९ (क्रमश:)

गांधी जी का ध्यान जितना दक्षिण की तरफ था उतना ही पूर्व की तरफ भी, तगाँधी और भाषा (भाग: पाँचभी तो १३ दिसम्बर,१९२० का कोलकाता में उनका आत्मविश्वास दिखाई देता है, ‘‘यह निश्चित है कि सारे देश में जहाँ कहीं देश के विभिन्न हिस्सों, के लोगों की मिली-जुली सभाएँ और बैठकें होंगी, उनमें अभिव्यक्ति  का राष्ट्रीय माध्यम हिन्दी ही होगी।’’

२२ जनवरी,१९२१ ‘‘जो बात मैं जोर देकर आपसे कहना चाहता हूँ वह यह कि आप सबकी एक सामान्य भाषा होनी चाहिए, सभी भारतीयों की एक सामान्य भाषा होनी चाहिए, ताकि वे भारत के जिस हिस्से में भी जाएँ, वहाँ के लोगों से बातचीत कर सकें। इसके लिए आपको हिन्दी अपनाना चाहिए।’’

  २३ मार्च,१९२१ विजयनगर, ‘‘हिन्दी पढऩा इसलिए जरूरी है कि उससे देश में भाईचारे की भावना पनपती है। हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा बना देना चाहिए। हिन्दी आम जनता की भाषा होनी चाहिए। आप चाहते हैं कि हमारा राष्ट्र एक ओर संगठित हो, इसलिए आपको प्रान्तीयता के अभियान को छोड़ देना चाहिए। हिन्दी तीन ही महीनों में सीखी जा सकती है।’’

‘यंग इण्डिया’ नवम्बर १०,१९२१ ‘‘हिन्दी के भावनात्मक अथवा राष्ट्रीय महत्त्व की बात छोड दें, तो भी यह दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है कि तमाम राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं को हिन्दी सीख लेनी चाहिए और राष्ट्र की तमाम कार्यवाही हिन्दी में ही की जानी चाहिए।’’

२४ मार्च,१९२५ मद्रास, ‘‘मेरी राय में भारत में सच्ची राष्ट्रीयता के विकास के लिए हिन्दी का प्रचार एक जरूरी बात है, विषेष रूप से इसलिए कि हमें उस राष्ट्रीयता को आम जनता के अनुरूप  साँचे में ढालना है।’’

  २१ दिसम्बर, १९३३ पैराम्बदूर की मजदूर-सभा में, ‘‘साथी मजदूरो, यदि आप सारे भारत के मजदूरों के दु:ख सुख को बाँटना चाहते हैं, उनके साथ तादात्म्य् स्थापित करना चाहते हैं, तो आपको हिन्दी सीख लेनी चाहिए, जब तक आप ऐसा नहीं करते, तब तक उत्तर और दक्षिण में कोई मेल नहीं हो सकता।’’

    राजगोपालाचारी मद्रास प्रान्त के मुख्यमंत्री के नाते १९३७ में मद्रास में स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जाना अनिवार्य की तो ‘मातृभाषा खतरे में है’ के नाम पर आन्दोलन शुरु हो गया तब गांधी जी राजा साहब के पक्ष में उतर आये, १०/९/१९३८ (हरिजन) में, ‘‘ हमने बार-बार  घोषणा की है कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा या प्रान्तों के आपसी व्यवहार की सामान्य भाषा है या होनी है , यदि हमारी इस घोषणा के पीछे ईमानदारी है, तो हिन्दी के ज्ञान को अनिवार्य बनाने में बुराई कहाँ है ? ‘मातृभाषा खतरे में है’ यह नारा या तो अज्ञान रूप है या एक पाखंड है और जहाँ इसके पीछे ईमानदारी है, वहाँ भी उन लोगों की देशभक्ति के लिए अपवादमय चीज है।.. .. यदि हमें अखिल भारतीय राष्ट्रीयता के धर्म तक पहुँचना है, तो प्रान्तीयता के आचरण को भेदना होगा। भारत एक देश और एक राष्ट्र है अथवा अनेक देश और अनेक राष्ट्र ? जो मानते हों कि यह एक देश है उन्हें राजाजी को अपना पूरा समर्थन देना चाहिए।’’

राजा जी को समर्थन देने की बात १०/९/१९३८ (हरिजन) में, सामने आती है किन्तु अब जरा गाँधी की मजबूरी भी समझे। कुछ का मत है कि १९३६ में गाँधी ‘हिन्दुस्तानी’ के पक्ष में खड़े दिखते हैं किन्तु ‘हिन्द स्वराज्य’ में जिक्र आता है कि (गांधी के शब्दों में ही), ‘‘सारे हिंदुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी चाएि। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होनी चाहिए। हिंदू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों  लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार में अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।’’

गाँधी जी संविधान सभा की अंतिम कार्यवाई तक जिन्दा नहीं रहे और हिन्दी राजभाषा बन कर रह गई। क्या यह वस्तुत: लिपि का झगड़ा था ? यदि गाँधी जिन्दा होते तो भी हिन्दी क्या राष्ट्रभाषा बन पाती, यह प्रश्न  आज भी यक्ष प्रश्न  बन मेरे मन में खड़ा है।
 
                                        समाप्त

गाँधी और भाषा (भाग: चार)

गाँधी और भाषा (भाग: चार)
                                              १३/९/१९ (क्रमश:)

२१ जनवरी,१९१८ को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को लिखे पत्र में उनकी हिन्दी के लिए भविष्य की इच्छा और चिंता दोनों हैं, वे लिखते हैं, ‘‘मैं मार्च में इन्दौर में होने वाले ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन में अपने भाषण के लिए कुछ प्रश्रों पर विचारवान नेताओं के मत एकत्र करना चाहता हूँ, वे प्रश्र इस प्रकार हैं-
१. क्या हिन्दी अन्त:प्रान्तीय व्यवहार तथा अन्य राष्ट्रीय कार्रवाई के लिए उपयुक्त एकमात्र
  सम्भव राष्ट्रीय भाषा नहीं है।
२. क्या हिन्दी काँग्रेस के आगामी अधिवेशन में मुख्यत: उपयोग में लाई जाने वाली भाषा न
   होनी चाहिए।
३. क्या हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों मे ऊँची शिक्षा देशी भाषाओं के माध्यम से देना
  वांछनीय और सम्भव नहीं है ?
४. और क्या हमें प्रारम्भिक शिक्षा के बाद अपने विद्यालयों में हिन्दी को अनिवार्य द्वितीय
  भाषा नहीं बना देना चाहिए ?
मैं महसूस करता हूँ, कि यदि हमें जनसाधारण तक पहुँचना है और यदि राष्ट्रीय सेवकों को
सारे भारतवर्ष के जन साधारण से सम्पर्क करना है, तो उपर्युक्त प्रश्र तुरन्त हल किय जाने
चाहिए। ’’
मार्च १८, इन्दौर के भाषण में वे कहते हैं, ‘‘जैसे अंग्रेज अपनी मादरी जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैस ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। हिन्दी सब समझते हैं। इसे राष्ट्रभाषा बनाकर हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। .. .. साहित्य का प्रदेश भाषा की भूमि जानने पर ही निश्चित हो सकता है। यदि हिन्दी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिन्दी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। जैसे भाषक वैसी भाषा। भाषा-सागर में स्नान करने के लिए पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण से पुनीत महात्मा आएंगे, तो सागर का महत्त्व स्नान करने वालों के अनुरूप होना चाहिए।
(उसी सभा में) ..सबसे कष्टदायी मामला द्रविड़ भाषाओं के लिए है। वहाँ तो कुछ प्रयत्न भी नहीं हुआ है। हिन्दी भाषा सिखाने वाले शिक्षकों को तैयार करना चाहिए। ऐसे शिक्षकों की बड़ी ही कमी है।’’
तब वे २५ मई, १९१८ को हनुमंत राव को पत्र लिखते हैं, ‘‘तुम हिन्दी का अध्ययन कर लोगे तो अपने काम का क्षेत्र व्यापक कर सकोगे। .. मैं नहीं जानता कि तुम्हारा इस ओर ध्यान गया है या नहीं, मेरा तो गया ही है। द्रविड़ों और अन्य भारतीयों के बीच लगभग न पटनेवाली खाई पड़ गयी है। निश्चय ही हिन्दी भाषा उसे पाटने वाला छोटे-से-छोटा और कारगर सेतु है। अंग्रेजी कभी उसको स्थान नहीं ले सकती। हिन्दी में कई ऐसी अवर्णनीय वस्तु है जिससे वह सीखने में आसान होती है। हिन्दी व्याकरण के साथ जितनी छूट ली जा सकती है, उतनी मैंने और किसी भाषा के व्याकरण के साथ ली जाती नहीं देखी। इसलिए मैं कहता हूँ कि राष्ट्रीय काम करने के लिए हिन्दी का ज्ञान नितान्त आवश्यक है।’’
स्वराज, स्वदेशी और राष्ट्रभाषा गाँधी के राष्ट्रीय जागरण के अंग थे। १६जून,१९२० को ‘यंग इण्डिया’ में वे क्या लिखते हैं जरा देखें, ‘‘मुझे पक्का विश्वास है कि किसी दिन हमारे द्रविड़ भाई-बहन गम्भीर भाव से हिन्दी का अध्ययन करने लगेंगे। आज अंग्रेजी भाषा पर अधिकार प्राप्त करने के  लिए वे कितनी मेहनत करते हैं, उसका आठवाँ हिस्सा भी हिन्दी सीखने में करें, तो बाकी हिन्दुस्तान जो आज उनके लिए बन्द किताब की तरह है, उससे वे परिचित होंगे और हमारे साथ उनका ऐसा तादात्य  स्थापित हो जाएगा जैसा पहले कभी न था।’’

गाँधी और भाषा (भाग: तीन

गाँधी और भाषा (भाग: तीन)
१२/९/१९ (क्रमश:)

 २०/१०/१९१७ द्वितीय गुजरात शिक्षा सम्मेलन (भड़ौच) में मातृभाषा हो शिक्षा का माध्यम को लेकर दिया गया वक्तव्य, ‘‘यह बात सबको अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि इस दिशा में हमारा पहला काम है विचारपूर्वक शिक्षा का माध्यम निश्चित करना। इसके बिना और सब कोशिशें लगभग बेकर साबित हो सकती हैं। .. ..वैसे तो यह प्रश्र सारे भारत का है, किन्तु हर एक क्षेत्र अथवा प्रांत इस पर अपनी हद तक स्वतंत्र रूप से विचार कर सकता है। फिर भी ऐसा नहीं है कि जब तक भारत को सारे भाग एकमत न हो जाएं तब तक अकेला गुजरात आगे क दम बढ़ा ही नहीं सकता।’’

उनका मानना था कि ‘‘विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा पाने में दिमाग पर जो बोझ पड़ता है वह असह्य  है। वह बोझ हमारे बच्चे उठा तो सकते हैं, लेकिन उसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ती है। वे दूसरा बोझ उठाने के लायक नहीं रह जाते। इससे हमारे स्नातक अधिकतर निकम्मे, कमजोर, निरुत्साही, रोगी और  कोरे नकलची बन जाते हैं। उनमें खोज करने की शक्ति, साहस, धीरज, वीरता, निर्भयता और अन्य गुण बहुत क्षीण हो जाते हैं। इससे हम नयी योजनाएँ नहीं बना सकते और यदि बनाते हैं तो उन्हें पूरा नहीं कर पाते। कुछ लोग, जिनमें उपर्युक्त गुण दिखाई देते हैं, अकाल ही काल के गाल में चले जाते हैं। ..हम मातृभाषी जगदीशचन्द्र बसु, प्रफुल्लचन्द्र राय को देखकर मोहान्ध हो जाते हैं। मुझे विश्वास है कि हमने पचास वर्ष तक मातृभाषा द्वारा शिक्षा पायी होती तो हममें इतने बसु और राय होते कि उन्हें देख कर हमें अचम्भा न होता।’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘माँ के दूध के साथ जो संस्कार और मीठे शब्द मिलते हैं, उनके और पाठशाला के बीच जो मेल होना चाहिए, वह विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने में टूट जाता है। हम ऐसी शिक्षा के वशीभूत होकर मातृद्रोह करते हैं। इसके अतिरिक्त विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा देने से अन्य हानियाँ भी होती हैं। शिक्षित वर्ग और सामान्य जनता के बीच में अन्तर पड़ गया है। हम जनसाधारण को नहीं पहचानते। जनसाधारण हमें नहीं जानता। वे हमें साहब समझते हैं और हमसे डरते हैं। वे हम पर भरोसा नहीं करते। यदि यही स्थिति अधिक समय तक कायम रही तो एक दिन लार्ड कर्जन (जो १८९९-१९०५ तक भारत के वायसराय थे) का यह आरोप सही हो जाऐगा कि शिक्षित वर्ग जनसाधारण का प्रतिनिधि नहीं है।’’

२१/०४/१९२० को ‘यंग इण्डिया’ में गाँधी जी भाषा के पक्ष में ‘देशी भाषाओं का हित’ लेख में विदेशी विद्वान को उद्धृत करते हुए, ‘‘सेंट पॉल्स कैथिड्रल कॉलेज, कलकत्ता के प्रिंसिपल रेवनेंड डब्ल्यू. ई.एस.हालैंड अपनी गवाही में लिखते हैं कि ‘जापान ने अपनी भाषा के प्रयोग से एक ऐसी शिक्षा प्रणाली खड़ी कर दी है जिसका पाश्चात्य जगत सम्मान करता है।’’

‘हिन्द स्वराज्य’ में भाषा के प्रति उनके आग्रह को देखकर रोमांच होता है, ‘भारत की भाषा अंग्रेजी नहीं है, हिन्दी है। वह आपको सीखनी पड़ेगी।’
२० अक्टूबर,१९१७ में राष्ट्रभाषा के पक्ष में बड़े ही तार्किक ढंग से गांधी जी अपनी बात कहते हैं,
        ‘‘१. वह भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसान होनी चाहिए।
   २. उस भाषा को ज्यादातर लोग बोलते हों।
   ३. उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक और
            राजनीतिक कामकाज शक्य होना चाहिए।
      ४.  वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान होनी चाहिए।
      ५. उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या अस्थायी स्थिति पर
       जोर न दिया जाए।’’

अंग्रेजी को वे इन पाँचों कसौटियों में खरा नहीं पाते। वे कहते हैं, ‘यह माने बिना काम चल ही नहीं सकता कि हिन्दी भाषा में ये सारे लक्षण मौजूद हैं। हिन्दी भाषा मैं उसे कहता हँू जिसे उत्तर में हिन्दू और मुसलमान बोलते हैं और देवनागरी या फारसी लिपि में लिखते हैं।’

११नवम्बर,१९१७ जरा गांँधी जी के आग्रह को समझने का प्रयत्न करें, ‘मैं कहता आया हूँ कि राष्ट्रीय भाषा एक होनी चाहिए और वह हिन्दी होनी चाहिए। हमारा कर्तव्य यह है कि हम अपना राष्ट्रीय कार्य हिन्दी भाषा में करें। हमारे बीच हम अपने कानों में हिन्दी के ही शब्द सुनाई दें, अंग्रेजी के नहीं। इतना ही नहीं, हमारी सभाओं में जो धारा प्रवाह वाद-विवाद होता है, वह भी हिन्दी में होना चाएि।  ऐसी स्थिति लाने के लिए मैं जीवनभर प्रयत्न करूँगा।’

३१ दिसम्बर कोलकाता विश्वद्यिालय में ‘‘देश सेवा करने के लिए उत्सुक सब हैं, परन्तु राष्ट्रसेवा तक तब सम्भव नहीं है जब तक कोई राष्ट्रभाषा न हो। दु:ख की बात है कि हमारे बंगाली भाई राष्ट्रभाषा का प्रयोग न करके राष्ट्रीय हत्या कर रहे हैं। इसके बिना देश की आम जनता के हृदयों तक नहीं पहुँचा जा सकता। इस अर्थ में बहुत लोगों के द्वारा हिन्दी को काम में लाया जाना मानवतावाद के क्षेत्र की बात हो जाती है।

कोलकाता में ही अखिल भारतीय समाज-सेवा-सम्मेलन में उनका भाषण, ‘पहली और सबसे बड़ी समाज-सेवा जो हम कर सकते हैं वह यह है कि हम इस स्थित से पीछे हटें, देशी भाषाओं को अपनायें, हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में उसके स्वाभाविक पद पर प्रतिष्ठित कर और सभी प्रांत अपना-अपना समस्त कार्य अपनी देशी भाषाओं में तथा राष्ट्र का कार्य हिंदी में प्रारम्भ कर दें।’’                              (क्रमश:)

गाँधी और भाषा (भाग: दो)

गाँधी और भाषा (भाग: दो)

दूसरी बात कि ‘‘जब वेल्स जैसी उपेक्षित भाषा के उद्धार के लिए वहां के लोग प्रयत्न कर सकते हैं, तब भारतवासी भी क्यों नहीं अपनी भाषाओं के विकास के लिए प्रयत्नशील हों। अंग्रेजी शिक्षण को स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है।’’

वे हिन्द स्वराज में लिखते हैं, ‘‘हमें अपनी सभी भाषाओं को चमकाना चाहिए।.. जो अंग्रेजी पुस्तकें काम की हैं, हमें उनका अनुवाद करना होगा। बहुत शास्त्र सीखने का दम्भ और भ्रम हमें छोडऩा होगा। सबसे पहले धर्म नीति की ही शिक्षा दी जानी चाहिए।’’

२८/५/१९१० को ‘इंडियन ओपिनियन’ में शिक्षा में मातृभाषा का स्थान विषय पर कहते हैं, ‘‘भारतीय युवक संस्कार सम्पन्न भारतीय की भांति अपनी मातृभाषा पढ़ या बोल नहीं सकता तो उसे शर्म आनी चाहिए। भारतीय बच्चों और उनके माता पिताओं में अपनी भाषाएँ पढऩे के बारे में जो लापरवाही देखी जाती है, वह अक्षम्य है। इससे तो उनके मन में अपने राष्ट्र के प्रति रत्ती-भर भी अभिमान नहीं रहेगा।’’

१९/८/१९११ को ‘इंडियन ओपिनियन’ में क्या लिखते हैं, ‘‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृत्ति पायी जाती है। मानो उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता अर्थात् परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। .. इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति-चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो-इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धांत को भूल जाने के खतरा मोल ले रहे हैं।’’

  ४ फरवरी, १९१६ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का उद्घाटन समारोह वक्तव्य (जहाँ गांधी जी को छोडक़र शेष लोगों ने अंग्रेजी में भाषण दिया था), ‘‘इस महान विद्यापीठ के प्रांगण में अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बोलना पड़े, यह अत्यन्त अप्रतिष्ठा और लज्जा की बात है। .. मुझे आशा है कि इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबन्ध किया जाएगा। हमारी भाषा हमारा ही प्रतिबिम्ब है और इसलिए यदि आप मुझसे यह कहें कि हमारी भाषाओं में उत्तम विचार अभिव्यक्ति किये ही नहीं जा सकते तब तो हमारा संसार में उठ जाना ही अच्छा है। क्या कोई व्यक्ति स्वप्र में भी यह सोच सकता है कि अंग्रेजी भविष्य में किसी भी दिन भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। (श्रोताओं की..नहीं..नहीं।) फिर राष्ट्र के पाँवों में यह बेड़ी किसलिए ? यदि हमें पिछले पचास वर्षों में देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गयी होती, तो आज हम किस स्थिति में होते। हमारे पास एक आजाद भारत होता, हमारे पास अपने शिक्षित आदमी होते जो अपनी ही भूमि में विदेशी जैसे न रहे होते, बल्कि जिनका बोलना जनता के हृदय पर प्रभाव डालता।’’

पूज्य बापू ने १५/१०/१९१७ को बिहार के भागलपुर शहर में छात्रों के एक सम्मेलन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा, ‘‘मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर के बराबर है। जो मातृभाषा का अपमान करता है, वह स्वेदश भक्त कहलाने लायक नहीं है। बहुत से लोग ऐसा कहते सुने जाते हैं कि ‘हमारी भाषा में ऐसे शब्द नहीं, जिनमें हमारे ऊँचे विचार प्रकट नहीं किये जा सकते।’

गांधी जी कहते हैं, ‘‘जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाये जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं हो सकेगा। यह तो स्वयं सिद्ध है कि :
 १. सारी जनता को नये ज्ञान की जरूरत है।
 २. सारी जनता कभी अंग्रेजी नहीं समझ सकती।
 ३. यदि अंग्रेजी पढऩे वाला ही नया ज्ञान प्राप्त कर सकता है,तो सारी जनता को नया ज्ञान मिलना असम्भव है।’’

मातृभाषा और शिक्षा पर गांधी जी के क्या विचार थे, उनके भागलपुर के भाषण से समझें- ‘‘ मुझे अंग्रेजी भाषा से बैर नहीं है। इस भाषा का भंडार अटूट है। यह राजभाषा है और ज्ञान की निधि से भरी-पूरी है। फिर भी मेरी राय है कि हिन्दुस्तान के सब लोगों को इसे सीखने की जरूरत नहीं है। किन्तु इस बारे में मैं ज्यादा नहीं कहना चाहता। जो विद्यार्थी अंग्रेजी पढ़ रहे हैं और जब तक दूसरी योजना प्रचलित नहीं होती और राज्य की शालाओं में परिवर्तन नहीं होता, तब तक विद्यार्थियों के लिए दूसरा कोई उपाय नहीं। इसलिए मैं मातृभाषा के इस बड़े विषय को यही समाप्त कर देता हूँ। मैं केवल इतना ही प्रार्थना करूँगा कि आपस के व्यवहार में और जहाँ जहाँ हो सके वहाँ सब लोग मातृभाषा का ही उपयोग करें। और विद्यार्थियों के सिवा जो महाशय यहाँ आये हैं, वे मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने का भगीरथ प्रयत्न करें।’’ (क्रमश:)

११सितम्बर,२०१९

गाँधी और भाषा। (भाग एक )

गाँधी और भाषा।  (भाग एक )

नवजागरण काल के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर किन्तु अंग्रेजी से प्रभावित राजा राम मोहनराय ने हिंदी की स्वीकार्यता सम्पर्क भाषा के रूप में तो मानी किन्तु उसे ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं माना। जिसका फायदा उठाकर मेकाले ने हमें अंग्रेजी का मुलम्मा पहना दिया जिसे आज भी हम कंठहार मान कर पहने घूम रहे हैं। यह अंग्रेजों की भारत को सदा अपना दास बनाये रखने की दूरगामी चाल थी।

 महात्मा गाँधी इस चाल को समझते थे इसीलिए उन्होंने अपने स्वराज के अभियान में मातृभाषा एवं राष्ट्रभाषा को कभी नहीं छोड़ा। वे देख चुके थे कि किस प्रकार शासक वर्ग भाषा की सामाजिक सापेक्षता और उसके ऐतिहासिक क्रम को कुचल डालते हैं। विश्व इस औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार हुआ है। हमारे यहाँ भी इस्लाम और अंग्रेजों के आगमन के साथ फारसी और अंग्रेजी ने अपना आधिपत्य बनाया।

 समझने की बात यह है कि आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व चीन के महान दार्शनिक कनफ्यूशियस ने भाषा को लेकर क्या कहा था, ‘‘ समाज की गलतियों या खराबियों को सिर्फ समाज की भाषा को ठीक करके ही खत्म किया जा सकता है क्योंकि भाषा अगर गलत हो जाए तो गलत बोला जाएगा, गलत बोला जाए तो गलत सुना जाएगा, और गलत कहकर जो गलत सुनाया गया है, उस पर जो अमल किया जाएगा वह गलत ही होगा और गलत अमल का परिणाम हमेशा गलत ही हुआ करता है। इसलिए गलत समाज की गलत बुनियाद हमेशा गलत भाषा ही डालती है।’’

 लंदन में पढ़ाई से लेकर दक्षिण अफ्रिका (१८९३ से १९१४ तक) के रंगभेद आन्दोलन तक गांधी को समझ आ गया था कि बिना स्वभाषा के साम्राज्यवादी ताकतों से नहीं लड़ा जा सकता। राष्ट्र अपनी भाषा के माध्यम से ही ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा, साहित्य और संस्कृति को उन्नति कर संरक्षित रख सकती है। गांधी की मान्यता भी कनफ्यूशियस के समान थी कि किसी भी कौम को पराई भाषा में काम करना  घातक है। इसका प्रमाण उनकी जनवरी,१९१० में छपी ‘हिन्द स्वराज’ तथा उनके ‘इंडियन ओपिनियन’ में छपे लेखों से मिलता है।

गांधी के भाषा सम्बन्धी चिन्तन पर विचार करते हुए दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए- पहला कि वे स्थानीय या प्रान्तीय स्तर पर शिक्षा के माध्यम के रूप में सम्बद्ध प्रांत की भाषा के समर्थक थे। दूसरा यह कि समय निष्पादन के लिए आपसी सम्पर्क एवं राजनीतिक तथा प्रशासनिक कार्यों के निष्पादन के माध्याम  के रूप में एक  राष्ट्रभाषा (हिन्दी) के वे प्रबल समर्थक रहे।

गांधी जी हिन्द स्वराज में औपनिवेशिक मंशा का खुलाशा करते हुए लिखते हैं, ‘‘ करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली, वह  सचमुच गुलामी की नींव थी। उसने इसी इरादे से वह योजना बनायी, यह मैं नहीं कहना चाहता। किन्तु इस कार्य का परिणाम यही हुआ है। हम स्वराज्य  की बात भी पराई भाषा में करते हैं, यह कैसी बड़ी दरिद्रता है।.. यह भी जानने लायक है कि जिस पद्धति को अंग्रेजों ने उतार फेंका  है, वही हमारा शृंगार बनी हुई है। वहाँ शिक्षा की पद्धतियाँ बदलती रही हैं। जिसे उन्होंने भुला दिया है, उसे हम मूर्खतावश चिपटये रहते हैं। वे अपनी भाषा की उन्नति करने का प्रयत्न कर रहे हैं। वेल्स इंग्लैण्ड का एक छोटा-सा परगना है। उसकी भाषा धूल के समान  नगण्य है। अब उसका जीर्णोद्धार किया जा रहा है। .. अंग्रेजी शिक्षण स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षण से दम्भ, द्वेष, आत्याचार आदि बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों ने जनता को ठगने और परेशान करने में कोई कसर नहीं रखी। भारत को गुलाम बनाने वाले तो इस अंग्रेजी को जानने वाले लोग ही है।  जनता की हाय अंग्रेजों को नहीं हमको लगेगी।’’ (क्रमशः)

(पढ़ते - पढ़ते ) १०/९/२०१९