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Saturday, 14 September 2019

भाषा और गांधी (भाग पांच)

)
                                 १४/९/१९ (क्रमश:)

गांधी जी का ध्यान जितना दक्षिण की तरफ था उतना ही पूर्व की तरफ भी, तगाँधी और भाषा (भाग: पाँचभी तो १३ दिसम्बर,१९२० का कोलकाता में उनका आत्मविश्वास दिखाई देता है, ‘‘यह निश्चित है कि सारे देश में जहाँ कहीं देश के विभिन्न हिस्सों, के लोगों की मिली-जुली सभाएँ और बैठकें होंगी, उनमें अभिव्यक्ति  का राष्ट्रीय माध्यम हिन्दी ही होगी।’’

२२ जनवरी,१९२१ ‘‘जो बात मैं जोर देकर आपसे कहना चाहता हूँ वह यह कि आप सबकी एक सामान्य भाषा होनी चाहिए, सभी भारतीयों की एक सामान्य भाषा होनी चाहिए, ताकि वे भारत के जिस हिस्से में भी जाएँ, वहाँ के लोगों से बातचीत कर सकें। इसके लिए आपको हिन्दी अपनाना चाहिए।’’

  २३ मार्च,१९२१ विजयनगर, ‘‘हिन्दी पढऩा इसलिए जरूरी है कि उससे देश में भाईचारे की भावना पनपती है। हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा बना देना चाहिए। हिन्दी आम जनता की भाषा होनी चाहिए। आप चाहते हैं कि हमारा राष्ट्र एक ओर संगठित हो, इसलिए आपको प्रान्तीयता के अभियान को छोड़ देना चाहिए। हिन्दी तीन ही महीनों में सीखी जा सकती है।’’

‘यंग इण्डिया’ नवम्बर १०,१९२१ ‘‘हिन्दी के भावनात्मक अथवा राष्ट्रीय महत्त्व की बात छोड दें, तो भी यह दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है कि तमाम राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं को हिन्दी सीख लेनी चाहिए और राष्ट्र की तमाम कार्यवाही हिन्दी में ही की जानी चाहिए।’’

२४ मार्च,१९२५ मद्रास, ‘‘मेरी राय में भारत में सच्ची राष्ट्रीयता के विकास के लिए हिन्दी का प्रचार एक जरूरी बात है, विषेष रूप से इसलिए कि हमें उस राष्ट्रीयता को आम जनता के अनुरूप  साँचे में ढालना है।’’

  २१ दिसम्बर, १९३३ पैराम्बदूर की मजदूर-सभा में, ‘‘साथी मजदूरो, यदि आप सारे भारत के मजदूरों के दु:ख सुख को बाँटना चाहते हैं, उनके साथ तादात्म्य् स्थापित करना चाहते हैं, तो आपको हिन्दी सीख लेनी चाहिए, जब तक आप ऐसा नहीं करते, तब तक उत्तर और दक्षिण में कोई मेल नहीं हो सकता।’’

    राजगोपालाचारी मद्रास प्रान्त के मुख्यमंत्री के नाते १९३७ में मद्रास में स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जाना अनिवार्य की तो ‘मातृभाषा खतरे में है’ के नाम पर आन्दोलन शुरु हो गया तब गांधी जी राजा साहब के पक्ष में उतर आये, १०/९/१९३८ (हरिजन) में, ‘‘ हमने बार-बार  घोषणा की है कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा या प्रान्तों के आपसी व्यवहार की सामान्य भाषा है या होनी है , यदि हमारी इस घोषणा के पीछे ईमानदारी है, तो हिन्दी के ज्ञान को अनिवार्य बनाने में बुराई कहाँ है ? ‘मातृभाषा खतरे में है’ यह नारा या तो अज्ञान रूप है या एक पाखंड है और जहाँ इसके पीछे ईमानदारी है, वहाँ भी उन लोगों की देशभक्ति के लिए अपवादमय चीज है।.. .. यदि हमें अखिल भारतीय राष्ट्रीयता के धर्म तक पहुँचना है, तो प्रान्तीयता के आचरण को भेदना होगा। भारत एक देश और एक राष्ट्र है अथवा अनेक देश और अनेक राष्ट्र ? जो मानते हों कि यह एक देश है उन्हें राजाजी को अपना पूरा समर्थन देना चाहिए।’’

राजा जी को समर्थन देने की बात १०/९/१९३८ (हरिजन) में, सामने आती है किन्तु अब जरा गाँधी की मजबूरी भी समझे। कुछ का मत है कि १९३६ में गाँधी ‘हिन्दुस्तानी’ के पक्ष में खड़े दिखते हैं किन्तु ‘हिन्द स्वराज्य’ में जिक्र आता है कि (गांधी के शब्दों में ही), ‘‘सारे हिंदुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी चाएि। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होनी चाहिए। हिंदू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों  लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार में अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।’’

गाँधी जी संविधान सभा की अंतिम कार्यवाई तक जिन्दा नहीं रहे और हिन्दी राजभाषा बन कर रह गई। क्या यह वस्तुत: लिपि का झगड़ा था ? यदि गाँधी जिन्दा होते तो भी हिन्दी क्या राष्ट्रभाषा बन पाती, यह प्रश्न  आज भी यक्ष प्रश्न  बन मेरे मन में खड़ा है।
 
                                        समाप्त

गाँधी और भाषा (भाग: चार)

गाँधी और भाषा (भाग: चार)
                                              १३/९/१९ (क्रमश:)

२१ जनवरी,१९१८ को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को लिखे पत्र में उनकी हिन्दी के लिए भविष्य की इच्छा और चिंता दोनों हैं, वे लिखते हैं, ‘‘मैं मार्च में इन्दौर में होने वाले ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन में अपने भाषण के लिए कुछ प्रश्रों पर विचारवान नेताओं के मत एकत्र करना चाहता हूँ, वे प्रश्र इस प्रकार हैं-
१. क्या हिन्दी अन्त:प्रान्तीय व्यवहार तथा अन्य राष्ट्रीय कार्रवाई के लिए उपयुक्त एकमात्र
  सम्भव राष्ट्रीय भाषा नहीं है।
२. क्या हिन्दी काँग्रेस के आगामी अधिवेशन में मुख्यत: उपयोग में लाई जाने वाली भाषा न
   होनी चाहिए।
३. क्या हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों मे ऊँची शिक्षा देशी भाषाओं के माध्यम से देना
  वांछनीय और सम्भव नहीं है ?
४. और क्या हमें प्रारम्भिक शिक्षा के बाद अपने विद्यालयों में हिन्दी को अनिवार्य द्वितीय
  भाषा नहीं बना देना चाहिए ?
मैं महसूस करता हूँ, कि यदि हमें जनसाधारण तक पहुँचना है और यदि राष्ट्रीय सेवकों को
सारे भारतवर्ष के जन साधारण से सम्पर्क करना है, तो उपर्युक्त प्रश्र तुरन्त हल किय जाने
चाहिए। ’’
मार्च १८, इन्दौर के भाषण में वे कहते हैं, ‘‘जैसे अंग्रेज अपनी मादरी जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैस ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। हिन्दी सब समझते हैं। इसे राष्ट्रभाषा बनाकर हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। .. .. साहित्य का प्रदेश भाषा की भूमि जानने पर ही निश्चित हो सकता है। यदि हिन्दी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिन्दी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। जैसे भाषक वैसी भाषा। भाषा-सागर में स्नान करने के लिए पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण से पुनीत महात्मा आएंगे, तो सागर का महत्त्व स्नान करने वालों के अनुरूप होना चाहिए।
(उसी सभा में) ..सबसे कष्टदायी मामला द्रविड़ भाषाओं के लिए है। वहाँ तो कुछ प्रयत्न भी नहीं हुआ है। हिन्दी भाषा सिखाने वाले शिक्षकों को तैयार करना चाहिए। ऐसे शिक्षकों की बड़ी ही कमी है।’’
तब वे २५ मई, १९१८ को हनुमंत राव को पत्र लिखते हैं, ‘‘तुम हिन्दी का अध्ययन कर लोगे तो अपने काम का क्षेत्र व्यापक कर सकोगे। .. मैं नहीं जानता कि तुम्हारा इस ओर ध्यान गया है या नहीं, मेरा तो गया ही है। द्रविड़ों और अन्य भारतीयों के बीच लगभग न पटनेवाली खाई पड़ गयी है। निश्चय ही हिन्दी भाषा उसे पाटने वाला छोटे-से-छोटा और कारगर सेतु है। अंग्रेजी कभी उसको स्थान नहीं ले सकती। हिन्दी में कई ऐसी अवर्णनीय वस्तु है जिससे वह सीखने में आसान होती है। हिन्दी व्याकरण के साथ जितनी छूट ली जा सकती है, उतनी मैंने और किसी भाषा के व्याकरण के साथ ली जाती नहीं देखी। इसलिए मैं कहता हूँ कि राष्ट्रीय काम करने के लिए हिन्दी का ज्ञान नितान्त आवश्यक है।’’
स्वराज, स्वदेशी और राष्ट्रभाषा गाँधी के राष्ट्रीय जागरण के अंग थे। १६जून,१९२० को ‘यंग इण्डिया’ में वे क्या लिखते हैं जरा देखें, ‘‘मुझे पक्का विश्वास है कि किसी दिन हमारे द्रविड़ भाई-बहन गम्भीर भाव से हिन्दी का अध्ययन करने लगेंगे। आज अंग्रेजी भाषा पर अधिकार प्राप्त करने के  लिए वे कितनी मेहनत करते हैं, उसका आठवाँ हिस्सा भी हिन्दी सीखने में करें, तो बाकी हिन्दुस्तान जो आज उनके लिए बन्द किताब की तरह है, उससे वे परिचित होंगे और हमारे साथ उनका ऐसा तादात्य  स्थापित हो जाएगा जैसा पहले कभी न था।’’

गाँधी और भाषा (भाग: तीन

गाँधी और भाषा (भाग: तीन)
१२/९/१९ (क्रमश:)

 २०/१०/१९१७ द्वितीय गुजरात शिक्षा सम्मेलन (भड़ौच) में मातृभाषा हो शिक्षा का माध्यम को लेकर दिया गया वक्तव्य, ‘‘यह बात सबको अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि इस दिशा में हमारा पहला काम है विचारपूर्वक शिक्षा का माध्यम निश्चित करना। इसके बिना और सब कोशिशें लगभग बेकर साबित हो सकती हैं। .. ..वैसे तो यह प्रश्र सारे भारत का है, किन्तु हर एक क्षेत्र अथवा प्रांत इस पर अपनी हद तक स्वतंत्र रूप से विचार कर सकता है। फिर भी ऐसा नहीं है कि जब तक भारत को सारे भाग एकमत न हो जाएं तब तक अकेला गुजरात आगे क दम बढ़ा ही नहीं सकता।’’

उनका मानना था कि ‘‘विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा पाने में दिमाग पर जो बोझ पड़ता है वह असह्य  है। वह बोझ हमारे बच्चे उठा तो सकते हैं, लेकिन उसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ती है। वे दूसरा बोझ उठाने के लायक नहीं रह जाते। इससे हमारे स्नातक अधिकतर निकम्मे, कमजोर, निरुत्साही, रोगी और  कोरे नकलची बन जाते हैं। उनमें खोज करने की शक्ति, साहस, धीरज, वीरता, निर्भयता और अन्य गुण बहुत क्षीण हो जाते हैं। इससे हम नयी योजनाएँ नहीं बना सकते और यदि बनाते हैं तो उन्हें पूरा नहीं कर पाते। कुछ लोग, जिनमें उपर्युक्त गुण दिखाई देते हैं, अकाल ही काल के गाल में चले जाते हैं। ..हम मातृभाषी जगदीशचन्द्र बसु, प्रफुल्लचन्द्र राय को देखकर मोहान्ध हो जाते हैं। मुझे विश्वास है कि हमने पचास वर्ष तक मातृभाषा द्वारा शिक्षा पायी होती तो हममें इतने बसु और राय होते कि उन्हें देख कर हमें अचम्भा न होता।’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘माँ के दूध के साथ जो संस्कार और मीठे शब्द मिलते हैं, उनके और पाठशाला के बीच जो मेल होना चाहिए, वह विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने में टूट जाता है। हम ऐसी शिक्षा के वशीभूत होकर मातृद्रोह करते हैं। इसके अतिरिक्त विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा देने से अन्य हानियाँ भी होती हैं। शिक्षित वर्ग और सामान्य जनता के बीच में अन्तर पड़ गया है। हम जनसाधारण को नहीं पहचानते। जनसाधारण हमें नहीं जानता। वे हमें साहब समझते हैं और हमसे डरते हैं। वे हम पर भरोसा नहीं करते। यदि यही स्थिति अधिक समय तक कायम रही तो एक दिन लार्ड कर्जन (जो १८९९-१९०५ तक भारत के वायसराय थे) का यह आरोप सही हो जाऐगा कि शिक्षित वर्ग जनसाधारण का प्रतिनिधि नहीं है।’’

२१/०४/१९२० को ‘यंग इण्डिया’ में गाँधी जी भाषा के पक्ष में ‘देशी भाषाओं का हित’ लेख में विदेशी विद्वान को उद्धृत करते हुए, ‘‘सेंट पॉल्स कैथिड्रल कॉलेज, कलकत्ता के प्रिंसिपल रेवनेंड डब्ल्यू. ई.एस.हालैंड अपनी गवाही में लिखते हैं कि ‘जापान ने अपनी भाषा के प्रयोग से एक ऐसी शिक्षा प्रणाली खड़ी कर दी है जिसका पाश्चात्य जगत सम्मान करता है।’’

‘हिन्द स्वराज्य’ में भाषा के प्रति उनके आग्रह को देखकर रोमांच होता है, ‘भारत की भाषा अंग्रेजी नहीं है, हिन्दी है। वह आपको सीखनी पड़ेगी।’
२० अक्टूबर,१९१७ में राष्ट्रभाषा के पक्ष में बड़े ही तार्किक ढंग से गांधी जी अपनी बात कहते हैं,
        ‘‘१. वह भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसान होनी चाहिए।
   २. उस भाषा को ज्यादातर लोग बोलते हों।
   ३. उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक और
            राजनीतिक कामकाज शक्य होना चाहिए।
      ४.  वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान होनी चाहिए।
      ५. उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या अस्थायी स्थिति पर
       जोर न दिया जाए।’’

अंग्रेजी को वे इन पाँचों कसौटियों में खरा नहीं पाते। वे कहते हैं, ‘यह माने बिना काम चल ही नहीं सकता कि हिन्दी भाषा में ये सारे लक्षण मौजूद हैं। हिन्दी भाषा मैं उसे कहता हँू जिसे उत्तर में हिन्दू और मुसलमान बोलते हैं और देवनागरी या फारसी लिपि में लिखते हैं।’

११नवम्बर,१९१७ जरा गांँधी जी के आग्रह को समझने का प्रयत्न करें, ‘मैं कहता आया हूँ कि राष्ट्रीय भाषा एक होनी चाहिए और वह हिन्दी होनी चाहिए। हमारा कर्तव्य यह है कि हम अपना राष्ट्रीय कार्य हिन्दी भाषा में करें। हमारे बीच हम अपने कानों में हिन्दी के ही शब्द सुनाई दें, अंग्रेजी के नहीं। इतना ही नहीं, हमारी सभाओं में जो धारा प्रवाह वाद-विवाद होता है, वह भी हिन्दी में होना चाएि।  ऐसी स्थिति लाने के लिए मैं जीवनभर प्रयत्न करूँगा।’

३१ दिसम्बर कोलकाता विश्वद्यिालय में ‘‘देश सेवा करने के लिए उत्सुक सब हैं, परन्तु राष्ट्रसेवा तक तब सम्भव नहीं है जब तक कोई राष्ट्रभाषा न हो। दु:ख की बात है कि हमारे बंगाली भाई राष्ट्रभाषा का प्रयोग न करके राष्ट्रीय हत्या कर रहे हैं। इसके बिना देश की आम जनता के हृदयों तक नहीं पहुँचा जा सकता। इस अर्थ में बहुत लोगों के द्वारा हिन्दी को काम में लाया जाना मानवतावाद के क्षेत्र की बात हो जाती है।

कोलकाता में ही अखिल भारतीय समाज-सेवा-सम्मेलन में उनका भाषण, ‘पहली और सबसे बड़ी समाज-सेवा जो हम कर सकते हैं वह यह है कि हम इस स्थित से पीछे हटें, देशी भाषाओं को अपनायें, हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में उसके स्वाभाविक पद पर प्रतिष्ठित कर और सभी प्रांत अपना-अपना समस्त कार्य अपनी देशी भाषाओं में तथा राष्ट्र का कार्य हिंदी में प्रारम्भ कर दें।’’                              (क्रमश:)

गाँधी और भाषा (भाग: दो)

गाँधी और भाषा (भाग: दो)

दूसरी बात कि ‘‘जब वेल्स जैसी उपेक्षित भाषा के उद्धार के लिए वहां के लोग प्रयत्न कर सकते हैं, तब भारतवासी भी क्यों नहीं अपनी भाषाओं के विकास के लिए प्रयत्नशील हों। अंग्रेजी शिक्षण को स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है।’’

वे हिन्द स्वराज में लिखते हैं, ‘‘हमें अपनी सभी भाषाओं को चमकाना चाहिए।.. जो अंग्रेजी पुस्तकें काम की हैं, हमें उनका अनुवाद करना होगा। बहुत शास्त्र सीखने का दम्भ और भ्रम हमें छोडऩा होगा। सबसे पहले धर्म नीति की ही शिक्षा दी जानी चाहिए।’’

२८/५/१९१० को ‘इंडियन ओपिनियन’ में शिक्षा में मातृभाषा का स्थान विषय पर कहते हैं, ‘‘भारतीय युवक संस्कार सम्पन्न भारतीय की भांति अपनी मातृभाषा पढ़ या बोल नहीं सकता तो उसे शर्म आनी चाहिए। भारतीय बच्चों और उनके माता पिताओं में अपनी भाषाएँ पढऩे के बारे में जो लापरवाही देखी जाती है, वह अक्षम्य है। इससे तो उनके मन में अपने राष्ट्र के प्रति रत्ती-भर भी अभिमान नहीं रहेगा।’’

१९/८/१९११ को ‘इंडियन ओपिनियन’ में क्या लिखते हैं, ‘‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृत्ति पायी जाती है। मानो उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता अर्थात् परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। .. इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति-चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो-इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धांत को भूल जाने के खतरा मोल ले रहे हैं।’’

  ४ फरवरी, १९१६ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का उद्घाटन समारोह वक्तव्य (जहाँ गांधी जी को छोडक़र शेष लोगों ने अंग्रेजी में भाषण दिया था), ‘‘इस महान विद्यापीठ के प्रांगण में अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बोलना पड़े, यह अत्यन्त अप्रतिष्ठा और लज्जा की बात है। .. मुझे आशा है कि इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबन्ध किया जाएगा। हमारी भाषा हमारा ही प्रतिबिम्ब है और इसलिए यदि आप मुझसे यह कहें कि हमारी भाषाओं में उत्तम विचार अभिव्यक्ति किये ही नहीं जा सकते तब तो हमारा संसार में उठ जाना ही अच्छा है। क्या कोई व्यक्ति स्वप्र में भी यह सोच सकता है कि अंग्रेजी भविष्य में किसी भी दिन भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। (श्रोताओं की..नहीं..नहीं।) फिर राष्ट्र के पाँवों में यह बेड़ी किसलिए ? यदि हमें पिछले पचास वर्षों में देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गयी होती, तो आज हम किस स्थिति में होते। हमारे पास एक आजाद भारत होता, हमारे पास अपने शिक्षित आदमी होते जो अपनी ही भूमि में विदेशी जैसे न रहे होते, बल्कि जिनका बोलना जनता के हृदय पर प्रभाव डालता।’’

पूज्य बापू ने १५/१०/१९१७ को बिहार के भागलपुर शहर में छात्रों के एक सम्मेलन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा, ‘‘मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर के बराबर है। जो मातृभाषा का अपमान करता है, वह स्वेदश भक्त कहलाने लायक नहीं है। बहुत से लोग ऐसा कहते सुने जाते हैं कि ‘हमारी भाषा में ऐसे शब्द नहीं, जिनमें हमारे ऊँचे विचार प्रकट नहीं किये जा सकते।’

गांधी जी कहते हैं, ‘‘जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाये जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं हो सकेगा। यह तो स्वयं सिद्ध है कि :
 १. सारी जनता को नये ज्ञान की जरूरत है।
 २. सारी जनता कभी अंग्रेजी नहीं समझ सकती।
 ३. यदि अंग्रेजी पढऩे वाला ही नया ज्ञान प्राप्त कर सकता है,तो सारी जनता को नया ज्ञान मिलना असम्भव है।’’

मातृभाषा और शिक्षा पर गांधी जी के क्या विचार थे, उनके भागलपुर के भाषण से समझें- ‘‘ मुझे अंग्रेजी भाषा से बैर नहीं है। इस भाषा का भंडार अटूट है। यह राजभाषा है और ज्ञान की निधि से भरी-पूरी है। फिर भी मेरी राय है कि हिन्दुस्तान के सब लोगों को इसे सीखने की जरूरत नहीं है। किन्तु इस बारे में मैं ज्यादा नहीं कहना चाहता। जो विद्यार्थी अंग्रेजी पढ़ रहे हैं और जब तक दूसरी योजना प्रचलित नहीं होती और राज्य की शालाओं में परिवर्तन नहीं होता, तब तक विद्यार्थियों के लिए दूसरा कोई उपाय नहीं। इसलिए मैं मातृभाषा के इस बड़े विषय को यही समाप्त कर देता हूँ। मैं केवल इतना ही प्रार्थना करूँगा कि आपस के व्यवहार में और जहाँ जहाँ हो सके वहाँ सब लोग मातृभाषा का ही उपयोग करें। और विद्यार्थियों के सिवा जो महाशय यहाँ आये हैं, वे मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने का भगीरथ प्रयत्न करें।’’ (क्रमश:)

११सितम्बर,२०१९

गाँधी और भाषा। (भाग एक )

गाँधी और भाषा।  (भाग एक )

नवजागरण काल के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर किन्तु अंग्रेजी से प्रभावित राजा राम मोहनराय ने हिंदी की स्वीकार्यता सम्पर्क भाषा के रूप में तो मानी किन्तु उसे ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं माना। जिसका फायदा उठाकर मेकाले ने हमें अंग्रेजी का मुलम्मा पहना दिया जिसे आज भी हम कंठहार मान कर पहने घूम रहे हैं। यह अंग्रेजों की भारत को सदा अपना दास बनाये रखने की दूरगामी चाल थी।

 महात्मा गाँधी इस चाल को समझते थे इसीलिए उन्होंने अपने स्वराज के अभियान में मातृभाषा एवं राष्ट्रभाषा को कभी नहीं छोड़ा। वे देख चुके थे कि किस प्रकार शासक वर्ग भाषा की सामाजिक सापेक्षता और उसके ऐतिहासिक क्रम को कुचल डालते हैं। विश्व इस औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार हुआ है। हमारे यहाँ भी इस्लाम और अंग्रेजों के आगमन के साथ फारसी और अंग्रेजी ने अपना आधिपत्य बनाया।

 समझने की बात यह है कि आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व चीन के महान दार्शनिक कनफ्यूशियस ने भाषा को लेकर क्या कहा था, ‘‘ समाज की गलतियों या खराबियों को सिर्फ समाज की भाषा को ठीक करके ही खत्म किया जा सकता है क्योंकि भाषा अगर गलत हो जाए तो गलत बोला जाएगा, गलत बोला जाए तो गलत सुना जाएगा, और गलत कहकर जो गलत सुनाया गया है, उस पर जो अमल किया जाएगा वह गलत ही होगा और गलत अमल का परिणाम हमेशा गलत ही हुआ करता है। इसलिए गलत समाज की गलत बुनियाद हमेशा गलत भाषा ही डालती है।’’

 लंदन में पढ़ाई से लेकर दक्षिण अफ्रिका (१८९३ से १९१४ तक) के रंगभेद आन्दोलन तक गांधी को समझ आ गया था कि बिना स्वभाषा के साम्राज्यवादी ताकतों से नहीं लड़ा जा सकता। राष्ट्र अपनी भाषा के माध्यम से ही ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा, साहित्य और संस्कृति को उन्नति कर संरक्षित रख सकती है। गांधी की मान्यता भी कनफ्यूशियस के समान थी कि किसी भी कौम को पराई भाषा में काम करना  घातक है। इसका प्रमाण उनकी जनवरी,१९१० में छपी ‘हिन्द स्वराज’ तथा उनके ‘इंडियन ओपिनियन’ में छपे लेखों से मिलता है।

गांधी के भाषा सम्बन्धी चिन्तन पर विचार करते हुए दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए- पहला कि वे स्थानीय या प्रान्तीय स्तर पर शिक्षा के माध्यम के रूप में सम्बद्ध प्रांत की भाषा के समर्थक थे। दूसरा यह कि समय निष्पादन के लिए आपसी सम्पर्क एवं राजनीतिक तथा प्रशासनिक कार्यों के निष्पादन के माध्याम  के रूप में एक  राष्ट्रभाषा (हिन्दी) के वे प्रबल समर्थक रहे।

गांधी जी हिन्द स्वराज में औपनिवेशिक मंशा का खुलाशा करते हुए लिखते हैं, ‘‘ करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली, वह  सचमुच गुलामी की नींव थी। उसने इसी इरादे से वह योजना बनायी, यह मैं नहीं कहना चाहता। किन्तु इस कार्य का परिणाम यही हुआ है। हम स्वराज्य  की बात भी पराई भाषा में करते हैं, यह कैसी बड़ी दरिद्रता है।.. यह भी जानने लायक है कि जिस पद्धति को अंग्रेजों ने उतार फेंका  है, वही हमारा शृंगार बनी हुई है। वहाँ शिक्षा की पद्धतियाँ बदलती रही हैं। जिसे उन्होंने भुला दिया है, उसे हम मूर्खतावश चिपटये रहते हैं। वे अपनी भाषा की उन्नति करने का प्रयत्न कर रहे हैं। वेल्स इंग्लैण्ड का एक छोटा-सा परगना है। उसकी भाषा धूल के समान  नगण्य है। अब उसका जीर्णोद्धार किया जा रहा है। .. अंग्रेजी शिक्षण स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षण से दम्भ, द्वेष, आत्याचार आदि बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों ने जनता को ठगने और परेशान करने में कोई कसर नहीं रखी। भारत को गुलाम बनाने वाले तो इस अंग्रेजी को जानने वाले लोग ही है।  जनता की हाय अंग्रेजों को नहीं हमको लगेगी।’’ (क्रमशः)

(पढ़ते - पढ़ते ) १०/९/२०१९