Sunday, 18 October 2026

जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना

८५९

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। 
सत्य सील दढ़ ध्वजा पताका ॥ 
बल विवेक दम परहित घोरे।
 छमा कृपा समता रजु जोरे ॥

बल शौर्य और उसके पति हैं। सत्य और शील सदाचार उसकी मजबूत और है। विवेक दमन्द्रका होना) और परोपकारये चार उसके घोडे हैं. क्षमा दया और समता रूपी डोरी रथ में जोड़ें हुए हैं।॥ ३ ।।

ईस भजन सारथी सुजाना। 
बिरति चर्म संतोष कृपाना ।। 
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा 
बर बिग्यान कठिन को दंडा ॥

ईश्वर भजन ही [ उस रथको चलानेवाला] चतुर सारथि है। वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है. श्रर विज्ञान कठिन धनुष है ॥ ४ ॥

अमल अचल मन त्रोन समाना । 
सम जम नियम सिलीमख नाना ।।

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । 
एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥

निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकसके समान है। शम (मनका वशमें होना), (अहिंसादि] यम और शौचादि । नियम ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजयका दूसरा उपाय नहीं है ॥ ५ ॥

सखा धर्ममय अस रथ जाकें।
 जीतन कहं न कतहँ रिप ताकें ॥ 

हे सखे। ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतनेको कहीं शत्रु ही नहीं है॥ ६ ॥

- महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
 जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ॥ ८० (क)॥

हे धीरबुद्धिवाले सखा ! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु)-रूपी महान् दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है [ रावणकी तो बात ही क्या है] ॥ ८० (क) ॥

सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ॥ ८० (ख)॥

प्रभुके वचन सुनकर विभीषणजीने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये [और कहा-] कृपा और सुखके समूह श्रीरामजी! आपने इसी बहाने मुझे [महान्] उपदेश दिया ॥ ८० (ख) ॥



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