अध्ययन प्रस्तुत है:
1. वैश्विक रेडिकल शक्तियों का प्रचलित विमर्श क्या है?
वर्तमान समय में वैश्विक रेडिकल शक्तियों (चाहे वे सेमेटिक चरमपंथी हों, नक्सलपंथी हो , अराजकतावादी हों, या तथाकथि दक्षिणपंथी हों) का प्रचलित विमर्श बाह्य रूप मेन मुख्य रूप से पीड़ित होने की भावना (Victimhood), ऐतिहासिक अन्याय और 'हम बनाम वे' (Us vs Them) की बाइनरी पर टिका दिखता है। जैसे -
(i) ऐतिहासिक और ढांचागत उत्पीड़न (Structural Oppression): प्रचलित विमर्श यह स्थापित करता है कि वर्तमान किसी देश की अथवा वैश्विक व्यवस्था (आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक) किसी एक विशेष समूह को दबाने के लिए बनाई गई है।
(ii) पहचान की राजनीति (Identity Politics): राष्ट्रीयता या मानवता से ऊपर उठकर पूजा-पंथ , नस्लीय या वैचारिक पहचान को सर्वोच्च प्राथमिकता देना।
(iii) अस्तित्व का संकट (Existential Threat): यह प्रचारित करना कि "हमारी संस्कृति, धर्म या विचार खतरे में हैं" और यदि अभी कड़ा कदम (या हिंसा) नहीं उठाया गया, तो हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
(iv) वैकल्पिक न्याय (Alternative Justice): वर्तमान लोकतांत्रिक संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को 'दोषपूर्ण' बताकर अपने स्वयं के पंथीय नियमों या व्यवस्था को लागू करने की वकालत करना।
2. वैश्विक रेडिकल शक्तियों का प्रचलित एवं स्थापित विमर्श यही क्यों हुआ है?
यही विमर्श सबसे अधिक सफल और स्थापित इसलिए होता दिखाई देता है क्योंकि यह मानव मनोविज्ञान और सामाजिक असुरक्षाओं का बहुत सटीकता से शोषण करता है। इसके पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं:
(i) भावनात्मक अपील: तर्कों की तुलना में भय, क्रोध और अपमान की भावनाएं मानवी दिमाग को जल्दी प्रभावित करती हैं। "हम खतरे में हैं" का नारा लोगों को तुरंत एकजुट करता है।
(ii) जटिल समस्याओं का सरल समाधान: आधुनिक दुनिया की समस्याएं (जैसे बेरोजगारी, असमानता, सभ्यताओं का बदलाव) बहुत जटिल हैं। रेडिकल विमर्श इन सभी समस्याओं का दोष किसी एक 'विरोधी' या 'शत्रु' (जैसे कोई दूसरा धर्म, देश, साकार,व्यक्ति या विचार) पर मढ़ देता है, जिससे आम जनता को समझने में आसानी होती है।
(iii) वैश्वीकरण का असंतोष: वैश्वीकरण (Globalization) के कारण जिन समाजों को लगा कि वे आर्थिक या राजनैतिक रूप से पीछे छूट रहे हैं, वे अपनी जड़ों की ओर लौटे और रेडिकल विचारों को अपनाने लगे।
3. यह प्रचलित विमर्श स्थापित कैसे हुआ (विमर्श निर्माण की प्रक्रिया)?
यह विमर्श रातोंरात स्थापित नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे दशकों की एक सुनियोजित संस्थागत और तकनीकी प्रक्रिया (Institutional & Technological Process) रही है:
(i) अकादमिक और बौद्धिक आधार (Academic Backing): शुरुआत में इन विचारों को विश्वविद्यालयों, थिंक-टैंक्स और विचारकों द्वारा 'सिद्धांतों' के रूप में गढ़ा गया। जब किसी विचार को बौद्धिक आवरण मिल जाता है, तो उसकी स्वीकार्यता बढ़ जाती है।
(ii) मीडिया और इको-चेम्बर (Echo Chambers): सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब, एल्गोरिदम) ने इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाई। एल्गोरिदम उपभोक्ता को वही दिखाता है जो उसके गुस्से या पूर्वाग्रह को बढ़ाता है। इससे लोग अपने ही जैसे विचारों के 'इको-चेम्बर' में कैद हो गए।
(iii) कल्चरल पैठ (Gramscian Strategy): एंटोनियो ग्राम्शी के 'सांस्कृतिक आधिपत्य' (Cultural Hegemony) के सिद्धांत की तरह, फिल्मों, साहित्यों, नारों और लोक-कलाओं के माध्यम से रेडिकल विचारों को सामान्य (Normalize) बनाया गया।
(iv) वित्तीय और राज्य-प्रायोजित समर्थन: कई वैश्विक शक्तियों और खुफिया एजेंसियों ने अपने भू-राजनीतिक हितों (Geopolitical Interests) के लिए इन विमर्शों को भारी फंडिंग और हथियार मुहैया कराए।
4. वह वैकल्पिक विमर्श क्या है जो हम चलाना चाहते हैं? (प्रस्तावित अध्ययन)
यदि हमें वैश्विक रेडिकल शक्तियों का मुकाबला करना है, तो हमारा विमर्श विनाशकारी (Destructive) के बजाय रचनात्मक (Constructive) होना चाहिए। इस नए विमर्श का मूल मंत्र "वसुधैव कुटुम्बकम्" (विश्व एक परिवार है), "सांस्कृतिक सह-अस्तित्व" और "सत्य एवं तर्क" होना चाहिए। इस वैकल्पिक विमर्श के मुख्य तत्व निम्नलिखित होने चाहिए:
(i) साझा मानवता और सार्वभौमिक मूल्य: विमर्श का केंद्र 'मत-पंथ या नस्ल' नहीं, बल्कि 'मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता, सह अस्तित्व, परोपकार और न्याय' होना चाहिए।
(ii) ऐतिहासिक सुधार बनाम प्रतिशोध: इतिहास की गलतियों को वर्तमान में हिंसा का औचित्य बनाने के बजाय, उनसे सीखकर उन्हीं के बीच से समन्वय के साथ आगे बढ़ने का विमर्श।
(iii) विविधता का उत्सव (Celebration of Diversity): 'समानता' (Uniformity) थोपने के बजाय 'विविधता में एकता' को बढ़ावा देना। प्रकृति की तरह समाज भी बहु सांस्कृतिक होने पर ही सुंदर और मजबूत रहता है। एक ईश्वर, एक धर्मग्रंथ की सोच से बाहर निकाला होगा ।
(iv) सद्भाव और विकास (Harmony & Progress): सेमेटिक पंथों की कट्टरता आर्थिक और सामाजिक पतन लाती है। नया विमर्श का आधार ' एकात्ममानव दर्शन' का चिंतन सेमेटिक पंथों तक भी जाये ।
5. इस विमर्श को शिक्षा जगत, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और लोकमानस में स्थापित करने की कार्ययोजना क्या हो ?
इस नए विमर्श को केवल कागजों पर नहीं, बल्कि समाज के हर स्तर पर स्थापित करने के लिए एक बहु-आयामी (Multi-layered) रणनीति की आवश्यकता है:
(i) शिक्षा जगत (Academia) में स्थापना: पाठ्यक्रम में बदलाव: इतिहास और नागरिक शास्त्र की पुस्तकों में नागरिक कर्तव्य, शौर्य और शांति , दार्शनिकों और विभिन्न संस्कृतियों के बीच हुए रचनात्मक आदान-प्रदान को प्रमुखता दी जाए।
(ii) तार्किक क्षमता (Critical Thinking) का विकास: रटने की प्रणाली के बजाय छात्रों में 'प्रश्न पूछने' और 'फेक न्यूज व प्रोपेगैंडा' को पहचानने की क्षमता विकसित की जाए। उनके अंदर इतिहास बोध हो । शिक्षक आचार्य की यात्रा करते हुए गुरु की गरिमा स्थापित करे ।
(iii) शोध और फेलोशिप: विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित ऐसे शोधों को बढ़ावा दिया जाए जो रेडिकल ताकतों के दुष्प्रचार को अकादमिक और सांख्यिकीय तथ्यों से काट सकें।
(iv) सामाजिक स्तर (Social Level) पर स्थापना: सामुदायिक संवाद (Inter-community Dialogue): विभिन्न समुदायों के बीच त्योहारों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेलकूद के माध्यम से आपसी संपर्क बढ़ाया जाए ताकि 'अजनबीपन' दूर हो।
(v) इको-चेम्बर को तोड़ना: सोशल मीडिया पर ऐसे इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स को तैयार और समर्थित किया जाए जो सकारात्मकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भाईचारे की कहानियां साझा करें।
(vi) धार्मिक जगत (Religious Domain) में स्थापना: उदारवादी व्याख्या: धर्म एवं प्रत्येक मत-पंथ के भीतर जो मानवतावादी , लोककल्याणकारी और लोकमंगल प्रदान करने वाले उपदेश हैं (जैसे संत परंपरा, क्रांतिकारियों के जीवन, जातक कथाएँ, भक्ति आंदोलन, उपनिषदों का ज्ञान, या बौद्ध-जैन दर्शन), उन्हें मुख्य धारा में लाया जाए।
(vii) धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी: प्रमुख धार्मिक गुरुओं द्वारा कट्टरपंथ की खुले तौर पर निंदा की जाए और यह स्थापित किया जाए कि धर्म सबके लिए है तथा मत और पंथ का अर्थ जोड़ना है, तोड़ना नहीं।
(viii) राजनीतिक स्तर (Political Level) पर स्थापना: तुष्टीकरण और ध्रुवीकरण का विरोध: राजनीति को विकास, सुशासन (Governance), स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित करने के लिए कानून और जनमत का दबाव बनाया जाए।
(ix) कड़े कानूनी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय सहयोग: रेडिकल ताकतों को मिलने वाली वित्तीय मदद (Terror Funding) और सोशल मीडिया प्रोपेगैंडा को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर सख्त नीतियां लागू की जाएं।
(x) लोकमानस में स्थापना: तीज त्योहार में आज सिनेमा के गीत, नृत्य उपयोग हो रहे हैं। अतः वहां सकारात्मक, देश-राग को प्रोत्साहित करना। फिल्में, वेब सीरीज, नुक्कड़ नाटक और लोकगीत किसी भी विचार को आम जनमानस के अवचेतन मन में बैठाने के सबसे शक्तिशाली माध्यम हैं। अत: फिल्म सेंसर बोर्ड सशक्त और भारतीय दृष्टि को समझने वाला हो ।
(xi) नए विमर्श में मतांतरण, लिव इन रिलेशनशिप, गरवा थीम और उसके ट्रेनर की सतर्कता, समाज के सामने पेश करना चाहिए।
(xii) सकारात्मक रोल मॉडल्स: युवाओं के सामने धार्मिक कट्टरपंथियों के बजाय वैज्ञानिकों, समाज सुधारकों, उद्यमियों और सैनिकों को रोल मॉडल के रूप में पेश किया जाए।
अंत में- इस वैश्विक / राष्ट्रीय स्तर की रेडिकल विमर्श को और आगे बढ़ाने के लिए हमें इसके किसी एक विशिष्ट क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना होगा। जैसे - (i) क्या हम शिक्षा जगत के लिए एक विशिष्ट पाठ्यक्रम या शोध रूपरेखा तैयार करें? (ii) लोकमानस को प्रभावित करने के लिए एक डिजिटल मीडिया/सांस्कृतिक अभियान की रणनीति पर काम करना होग।
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