Sunday, 18 October 2026

'प्रहार' (1991, नाना पाटेकर)

 

 

यह टिप्पणी अपने मूल में एक महत्वपूर्ण काम करती है — यह "सुरक्षा में दृढ़ता" और "विधि के शासन" को परस्पर विरोधी के बजाय परस्पर पूरक मानती है। मेरी दृष्टि में इसका विश्लेषण आप जिन पाँच कोणों से देखना चाहते हैं, उन्हें अलग-अलग रखना उपयोगी है, क्योंकि असली तनाव इन्हीं के बीच की संधियों पर उभरता है।

विधि के स्तर पर

कानूनी ढाँचे के रूप में टिप्पणी के संदर्भ सही दिशा में हैं। UAPA (1967), BNS की धारा 113 (आतंकवादी कृत्य) और समूहों में वैमनस्य फैलाने के लिए धारा 196 — ये प्रावधान आतंकवाद और घृणा-प्रचार को अलग-अलग कानूनी श्रेणियों में रखते हैं, और यही भेद टिप्पणी का केंद्र है। विधि का सबसे मूल्यवान सिद्धांत यहाँ यह है कि अपराध कृत्य, संगठनात्मक संबंध और प्रमाण से सिद्ध होता है, पहचान या विचारधारा से नहीं। इसे संविधान से जोड़ें तो तीन परतें बनती हैं — अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत सरकार की शांतिपूर्ण आलोचना संरक्षित है; अनुच्छेद 21 और 22 उचित प्रक्रिया और मनमानी गिरफ़्तारी से रक्षा देते हैं; और हिंसा का उकसावा या सक्रिय समर्थन दंडनीय है। कसाब का उदाहरण इसी का प्रमाण है: 26/11 के दोषी को भी पूर्ण मुकदमा, वकील और उच्चतम न्यायालय तक अपील मिली — यानी कठोर कार्रवाई और निष्पक्ष न्याय साथ-साथ चल सकते हैं।

व्यवहार के स्तर पर

असली चुनौती यहीं है, क्योंकि कागज़ का कानून और उसका प्रयोग अक्सर अलग हो जाते हैं। UAPA की धारा 43D(5) जैसे प्रावधान ज़मानत को लगभग असंभव बना देते हैं, जिससे अभियुक्त वर्षों विचाराधीन रहते हैं और मुकदमे का परिणाम चाहे जो हो, "प्रक्रिया ही दंड" बन जाती है। दोषसिद्धि की दर अपेक्षाकृत कम रहना यह संकेत देता है कि आरोप लगाने और प्रमाणित करने के बीच बड़ा अंतराल है। यहाँ दो चिंताएँ एक साथ सच हैं, और ईमानदार विश्लेषण दोनों को स्वीकार करता है — एक ओर वास्तविक आतंकी ख़तरे मजबूत साधनों की माँग करते हैं; दूसरी ओर वही साधन असहमति, पत्रकारिता या आंदोलन पर लागू होने के प्रलेखित उदाहरण भी हैं। टिप्पणी जिस "प्रमाण बनाम पहचान" के भेद पर बल देती है, वह सैद्धांतिक रूप से स्पष्ट है, पर प्रवर्तन के विवेकाधिकार में ही धुँधला पड़ता है।

आंतरिक सुरक्षा के परिप्रेक्ष्य में

यहाँ टिप्पणी की सबसे व्यावहारिक बात यह है कि साक्ष्य-आधारित और समुदाय का विश्वास बनाए रखने वाला दृष्टिकोण केवल नैतिक रूप से नहीं, रणनीतिक रूप से भी बेहतर सुरक्षा देता है। भारत को इस्लामवादी उग्रवाद, वामपंथी सशस्त्र उग्रवाद और पूर्वोत्तर के जातीय संघर्ष — कई प्रकार के ख़तरों का सामना है, और प्रत्येक का मूल्यांकन उसके वास्तविक आचरण से होना चाहिए। किसी पूरे समुदाय को संदेह की दृष्टि से देखना प्रति-उत्पादक है, क्योंकि अलगाव स्वयं कट्टरपंथ की भर्ती का ईंधन बनता है। इसी कारण इस्लामी विधि की बहुलता और ICRC के उस अध्ययन का उल्लेख प्रासंगिक है, जो युद्ध में नागरिकों की रक्षा की परंपराओं को रेखांकित करता है — यह किसी आतंकी संगठन के आत्म-औचित्य को "संपूर्ण धर्म" मान लेने की भूल को रोकता है।

फिल्म के संदर्भ में

'प्रहार' (1991, नाना पाटेकर) इसी तनाव का सांस्कृतिक रूपक है। फिल्म का भावनात्मक आकर्षण उस सैनिक में है जो नागरिक समाज की उदासीनता और अराजकता से क्षुब्ध होकर स्वयं "प्रहार" करता है — यानी व्यवस्था की धीमी, अपूर्ण प्रक्रिया को लाँघकर निर्णायक, व्यक्तिगत कार्रवाई। लोकप्रिय सिनेमा का यह "लालफीताशाही काटने वाला नायक" बिंब सुरक्षा के प्रति जन-कल्पना को गढ़ता है, और ठीक यहीं वह ख़तरा छिपा है जिसकी ओर यह टिप्पणी इशारा करती है: संकट के समय उचित प्रक्रिया को "बाधा" और बल-प्रयोग को "समाधान" मान लेने का प्रलोभन। संवैधानिक लोकतंत्र का उत्तर यह है कि वैध बल व्यक्तिगत प्रतिशोध से नहीं, विधि के माध्यम से ही संचालित हो — अन्यथा 'प्रहार' का नायकत्व न्याय के बजाय सतर्कतावाद (vigilantism) बन जाता है।

संक्षेप में — टिप्पणी का सबसे बड़ा योगदान यह स्थापित करना है कि दो प्रकार की विफलताएँ समान रूप से ख़तरनाक हैं: अति-प्रतिक्रिया, जहाँ पहचान या असहमति को ही आतंकवाद मान लिया जाए; और अल्प-प्रतिक्रिया, जहाँ वास्तविक ख़तरे पर कार्रवाई न हो। दोनों से बचाव का साझा आधार यही है — प्रमाण, न्याय और संविधान। कानून यह ढाँचा देता है; चुनौती उसके व्यवहार को उसी स्तर तक उठाने की है।

यदि आप चाहें तो मैं इसे एक संरचित शोध-नोट या प्रस्तुति के रूप में भी ढाल सकता हूँ, या किसी एक कोण — जैसे UAPA के ज़मानत-प्रावधान या सिनेमा और सुरक्षा-विमर्श — पर गहराई से लिख सकता हूँ।

 

इस नोट पर एक संक्षिप्त टिप्पणी:

मूल ढाँचा और उसकी खूबी: इस नोट की सबसे बड़ी ताकत इसका विश्लेषणात्मक आधार है — यह आतंकवाद को "कृत्य और प्रमाण" की कसौटी पर परखता है, न कि "पहचान और विचारधारा" की। तीन चीज़ें इसे संतुलित बनाती हैं: कृत्य और पहचान के बीच का स्पष्ट भेद, इस्लामी विधिशास्त्र की बहुलता को स्वीकारना (ताकि किसी एक संगठन की व्याख्या को पूरे धर्म का प्रतिनिधि न मान लिया जाए), और कसाब मामले के ज़रिए यह दिखाना कि निष्पक्ष न्याय और प्रभावी कार्रवाई परस्पर विरोधी नहीं हैं। कानूनी संदर्भ भी सही बैठते हैं - UAPA, 1967; BNS की धारा 113 (आतंकवादी कृत्य) और धारा 196 (समूहों के बीच वैमनस्य)।

कुछ बिंदु जो और गहराई दे सकते हैं:नोट जहाँ सिद्धांत में संतुलित है, वहाँ कुछ व्यावहारिक तनाव जोड़े जा सकते हैं:(i) "वैचारिक जवाबदेही" की सीमा-रेखा: विचार और उकसावे के बीच की रेखा बहुत महीन है। अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भाषण की स्वतंत्रता और घृणा-भाषण/उकसावे के बीच संतुलन व्यवहार में सबसे कठिन प्रश्न है — नोट इसे सिद्धांत रूप में छूता है पर इसकी जटिलता को और उभारा जा सकता है।(ii) UAPA का व्यावहारिक पक्ष: यह कानून लंबी विचाराधीन हिरासत और अपेक्षाकृत कम दोषसिद्धि दर को लेकर आलोचना का विषय रहा है। यानी "प्रभावी कार्रवाई" और "निष्पक्ष प्रक्रिया" का संतुलन कागज़ पर जितना साफ़ है, व्यवहार में उतना नहीं — इस खाई का ज़िक्र नोट को और मज़बूत करता।(iii) निष्कर्ष की धार: अंतिम वाक्य ("आधार धर्म या समुदाय का सामूहिक संदेह नहीं, बल्कि प्रमाण, न्याय और संविधान") नोट का सबसे सशक्त हिस्सा है और इसे शुरुआत में भी रखा जा सकता था।

कुल मिलाकर यह एक सुविचारित, विधि-केंद्रित नोट है जो राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक मर्यादा को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय साथ-साथ रखता है।

 

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संक्षिप्त शोध-टिप्पणी: ‘प्रहार’, भारत की सुरक्षा, कट्टरपंथ और कानून

आपकी संलग्न समीक्षा के आधार पर इस नोट का केंद्रीय विचार यह है कि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई तक सीमित नहीं है; उसमें न्यायिक प्रक्रिया, वैचारिक जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी शामिल है। समीक्षा स्वयं इस आवश्यक अंतर पर बल देती है कि आतंकवादी हिंसा का समर्थन, किसी आरोपी के लिए निष्पक्ष न्याय की माँग और सरकार की शांतिपूर्ण आलोचना एक ही बात नहीं हैं।

1. भारत और रेडिकल शक्तियाँ: भारत में इस्लामवादी उग्रवाद, वामपंथी सशस्त्र उग्रवाद अथवा किसी अन्य विचारधारा से प्रेरित हिंसा का मूल्यांकन उसके वास्तविक कृत्यों, संगठनात्मक संबंधों और उपलब्ध प्रमाणों से होना चाहिए। केवल धार्मिक पहचान, राजनीतिक विचारधारा या सरकार-विरोधी वक्तव्य को आतंकवाद का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

भारतीय कानून में आतंकवादी कृत्यों के लिए गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 113 सहित संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं। वहीं, विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने वाले कृत्यों पर तथ्यों और कानूनी शर्तों के अनुसार BNS की धारा 196 प्रासंगिक हो सकती है।

2. इस्लामी विधि और नागरिकों की सुरक्षा: इस्लामी विधिशास्त्र एकरूप नहीं है; इसमें विभिन्न परंपराएँ, व्याख्याएँ और ऐतिहासिक मतभेद हैं। इसलिए किसी आतंकवादी संगठन की धार्मिक व्याख्या को संपूर्ण इस्लाम का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति (ICRC) के अध्ययन में इस्लामी युद्ध-विधि की उन परंपराओं का विश्लेषण किया गया है जो नागरिकों और युद्ध में भाग न लेने वाले व्यक्तियों की रक्षा पर बल देती हैं।  इस संदर्भ में आतंकवादी संगठन के दावों की जाँच उसके वास्तविक आचरण, उसके दस्तावेजों और नागरिकों के विरुद्ध हिंसा के प्रमाणों से की जानी चाहिए-केवल उसके धार्मिक दावों से नहीं।

3. न्याय और संवैधानिक मर्यादा: कसाब के मामले का व्यापक संदेश यह है कि आतंकवादी अपराधों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया परस्पर विरोधी नहीं हैं। इसी प्रकार, किसी आरोपी के अधिकारों की रक्षा करना उसके कथित अपराध का समर्थन नहीं है। किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने या किसी संगठन को हिंसक गतिविधियों के लिए जिम्मेदार मानने का आधार विधिसम्मत प्रक्रिया और प्रमाण होने चाहिए।

निष्कर्ष: ‘प्रहार’ से जुड़ा यह विमर्श भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, कट्टरपंथ की आलोचना और कानून के शासन को एक साथ देखने का अवसर देता है। आतंकवाद के प्रति दृढ़ता आवश्यक है, लेकिन उसका आधार धर्म या समुदाय के प्रति सामूहिक संदेह नहीं, बल्कि प्रमाण, न्याय और संविधान होना चाहिए।

 

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मीडिया का मंथन काल : यह बवाल और पांच सवाल पत्रकारिता की आड़ में राजनीतिक प्रचार और प्रदर्शन से उठते प्रश्नों को समय रहते समझना और सुलझाना आवश्यक  

संभवतः 2020 की बात है। जब अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत की मीडिया रैंकिंग के लिए यहां के मीडिया का जायजा ले रही थीं, तब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ वरिष्ठ पत्रकारों की एक समिति बनाई थी .

।पीआईबी महानिदेशक की देखरेख में बनी इंडेक्स मॉनिटरिंग सेल नामक व्यवस्था में विभिन्न मुद्दों पर बात हुई। कुछ पत्रकारों ने अभिव्यक्ति और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर अपना पक्ष रखाकिसी रैंकिंग से पहले यह तय होना चाहिए कि पत्रकार कौन है, मीडिया संस्थान किसे माना जाए और वास्तविक पत्रकारिता की कसौटी क्या हो?  आज सीजेपी के कथित आंदोलन और जंतर-मंतर के प्रदर्शनों में भी ‘पत्रकारों’ के मुद्दे पर सवाल उठ रहे हैं। दिल्ली के हालिया प्रदर्शनों में हाथ में माइक्रोफोन, सामने कैमरा और ‘स्वतंत्र पत्रकार’ का परिचय-क्या इतना ही पत्रकार होने के लिए पर्याप्त है ।जो व्यक्ति प्रदर्शनकारियों के साथ नारे लगाता है, उनकी रणनीति में शामिल होता है, और फिर कैमरा लेकर पुलिस से सवाल करने पहुंचता है, वह पत्रकार है या आंदोलनकारी ।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर क्या संविधान किसी को यह अधिकार देता है कि वह पुलिसकर्मियों को घेरे, उनके काम में बाधा डाले और टकराव पैदा कर उसी को खबर बना दे ।

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