मध्यप्रदेश की धरती आध्यात्मिक रूप से बहुत समृद्ध रही है। यहाँ कई महान संतों ने जन्म लिया और अपनी साधना से समाज को नई राह दिखाई।
संत कवि ईसुरी 1841 - 1909 ई. मेंढकी (झांसी के पास, कार्यक्षेत्र बुंदेलखंड) 'बुंदेलखंड के जयदेव' और फाग विधा के जनक।
संत गजानन महाराज 19वीं शताब्दी शेगांव (महाराष्ट्र), पर इनका प्रभाव मालवा-निमाड़ में अत्यधिक है।
कुबेर मगरे (कुबेर बाबा): इनका संबंध इंदौर और मालवा क्षेत्र से रहा है। इन्होंने समाज सेवा और अध्यात्म के माध्यम से लोगों को जोड़ा
श्री चक्रधर स्वामी :(Sarvajna Shri Chakradhar Swami)जन्म नाम हरिपालदेव / Haripaladevaजन्म वर्ष लगभग 1194 ई. (13वीं शताब्दी) जन्म तिथि भाद्रपद शुक्ल द्वितीया के दिन माना जाता है (पंचांग अनुसार)जन्म स्थान Bharuch (भादोच), गुजरात, भारत पिता का नाम विषलदेव (Vishal Deva) माता का नाम मल्हना देवी / Malhana Devi धर्म / पंथ महानुभाव पंथ (Mahanubhav Sampradaya) मुख्य कार्यक्षेत्र गुजरात से महाराष्ट्र तक भक्ति प्रचार एवं अध्यात्मिक शिक्षा अध्यात्मिक योगदान महानुभाव पंथ की स्थापना, भक्ति और सामाजिक समता का प्रचार विशेष जानकारी चक्रधर स्वामी को अद्वैत-धार्मिक सुधारक और कृष्ण भक्ति के समर्थक के रूप में जाना जाता है।
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चक्रधर स्वामी: महानुभाव पंथ के अन्य प्रमुख साधक (Mahanubhava Parampara) जन्म: ~1194 ई. इन्हें अंतिम अवतार और संप्रदाय का केंद्र मानते हैं।
महानुभाव पंथ की परंपरा में चक्रधर स्वामी से पहले और बाद में कई अन्य संत माने जाते हैं। वैध मान्यताओं के अनुसार निम्न संत पंथ की परंपरा से जुड़े हैं-
चक्रपाणी प्रभु (Chakrapani / Changadeva Raul) Phaltan (महाराष्ट्र) — जन्म: ~1121 ई. इन्हें पंथ के पहले अवतार के रूप में माना जाता है।
गोविंद प्रभु (Govinda Prabhu) Amravati (महाराष्ट्र) — जन्म: Bhadrapada Shukla Trayodashi, 1187 ई. पंथ के दूसरे अवतार और चक्रधर के गुरु।
निष्कर्ष- सबसे प्रमुख संत: श्री चक्रधर स्वामी -महानुभाव पंथ के संस्थापक, जन्म भादोच (Bharuch) में हुआ और उन्होंने भक्ति-परंपरा का विस्तृत प्रचार किया। अन्य पंथ-संत: चक्रपाणी प्रभु तथा गोविंद प्रभु –ये पंथ की परंपरा के प्रारंभिक सिद्धांतों से जुड़े प्रमुख साधक हैं।
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विंध्य क्षेत्र_(रीवा – सीधी – शहडोल – मऊगंज – सतना – पन्ना – ग्वालियर तक)
संत/साधक क्षेत्र काल (अनुमान) लोकमान्यता-
संत बिरसिंह बाबा - रीवा 15–16वीं सदी वनवासी योगी, पशु-रक्षक।
संत भीखमदास मऊगंज -16वीं सदी निर्गुण भक्ति।
संत हरिहरदास सतना 15वीं सदी रामनाम साधना।
संत गोरखनाथ (विंध्य भ्रमण) रीवा–सीधी 11–12वीं नाथ परंपरा।
संत कंकाली बाबा -पन्ना 17वीं तांत्रिक-योगी।
संत चरणदास -(विंध्य शाखा) ग्वालियर अंचल 18वीं निर्गुण संत।
संत लखेश्वर बाबा- सीधी 16वीं लोकदेव।
संत नरहरिदास -ग्वालियर 16वीं वैष्णव संत।
संत दयाराम बाबा -भिंड 17वीं अहिंसा उपदेश।
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🕉️ 2. मालवा – निमाड़ – नर्मदा अंचल
(इंदौर – उज्जैन – देवास – सीहोर – होशंगाबाद – मंडला – अमरकंटक – पेंड्रा)
संत स्थान काल पहचान_
संत दादू दयाल- (मालवा भ्रमण) उज्जैन 16वीं निर्गुण।
संत रामानंद -(नर्मदा तट) मंडला 14वीं रामभक्ति।
संत नर्मदादास -अमरकंटक 15वीं नर्मदा उपासक।
संत हरिराम बाबा -होशंगाबाद 17वीं नर्मदा तप।
संत भीलट बाबा पेंड्रा 16वीं आदिवासी संत।
संत कालू राम देवास -18वीं सामाजिक सुधार।
संत गंगादास बाबा -सीहोर 17वीं योग साधना।
संत नागेश्वर बाबा -मंडला 15वीं शैव।
संत झींगनाथ -अमरकंटक 14वीं नाथ योग।
संत लालदास -उज्जैन 16वीं निर्गुण संत।
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3. भोपाल – विदिशा – सागर – बुंदेलखंड विस्तार
संत क्षेत्र काल लोक छवि-
संत गोरख बाबा -(स्थानीय परंपरा) विदिशा 12वीं नाथ।
संत चरनदास -(सागर परंपरा) सागर 18वीं निर्गुण।
संत ब्रह्मानंद बाबा -भोपाल 17वीं ध्यान साधना।
संत खैराती बाबा -सीहोर 16वीं लोकसंत।
संत गरीबदास -बुंदेलखंड 18वीं निर्गुण।
संत तेजाजी -(प्रभाव क्षेत्र) मालवा-बुंदेल 15वीं लोकदेव।
संत गोविंददास -विदिशा 17वीं वैराग्य।
संत परमहंस बाबा -सागर ।
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1. निमाड़ अंचल (खरगोन, खंडवा, बड़वानी)
निमाड़ को "संतों की खेती" कहा जाता है।
संत कालूजी महाराज -(खरगोन): सिंगाजी के समकालीन और उनके भतीजे/शिष्य माने जाते हैं।
संत बालीनाथ +(इंदौर/उज्जैन): लोक कथाओं में इनका उल्लेख मिलता है, विशेषकर अनुसूचित समाज और पिछड़ों के उद्धारक के रूप में।
अज्ञात बाबा - (मक्सी/देवास मार्ग): इस क्षेत्र में कई ऐसे "मौन साधक" रहे हैं जिन्हें स्थानीय लोग केवल 'बाबा' या 'महाराज' के नाम से जानते हैं, जिनका कोई लिखित इतिहास नहीं है।
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महाकौशल और नर्मदा तट (जबलपुर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर)
नर्मदा के किनारे "परिक्रमावासी" संतों की एक लंबी परंपरा है जो गुमनाम रहकर साधना करते हैं।
•स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती -(सिवनी/नरसिंहपुर): झोतेश्वर के परमहंसी गंगा आश्रम के माध्यम से लोक कल्याण।
सच्चिदानंद 'पगला बाबा' -(जबलपुर): नर्मदा किनारे के एक प्रसिद्ध अवधूत संत।
गोंडवाना के अज्ञात ऋषि: डिंडोरी और मंडला के जनजातीय क्षेत्रों में ऐसे अनेक संत हैं जो प्रकृति पूजा और अध्यात्म को जोड़ते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग 'बैगा साधु' के रूप में सम्मान देते हैं।
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4. ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड (ग्वालियर, दतिया, सागर)
यहाँ सिद्धों और तांत्रिक संतों की प्रधानता रही है-
• स्वामी जी महाराज (दतिया): पीतांबरा पीठ के संस्थापक, जिनका वास्तविक परिचय आज भी रहस्यमय और "अज्ञात" जैसा ही है।
• संत गुलाब सिंह -(सागर): बुंदेलखंड के लोक भजनों में इनका नाम प्रमुखता से आता है।
• देव प्रभाकर शास्त्री 'दद्दा जी' -(कटनी/दतिया): शिवलिंग निर्माण के माध्यम से जन-जन को जोड़ने वाले आधुनिक लोक संत।
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क्षेत्र संत का नाम (स्थानीय संबोधन) विशेषता-
बड़वानी -'पहाड़ी बाबा' सतपुड़ा की कंदराओं में रहने वाले अज्ञात साधु।
होशंगाबाद- 'नर्मदा माई के पागल' कई ऐसे अवधूत जो नर्मदा किनारे बिना कुछ मांगे रहते थे।
मालवा 'खड़ेवरी बाबा' -वे साधु जो वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर तपस्या के लिए प्रसिद्ध हुए।
झाबुआ - 'भिलट देव' इन्हें जनजातीय समाज में एक दिव्य पुरुष और रक्षक संत के रूप में पूजा जाता है।
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रायसेन (सांची) -सारिपुत्र और महामोगलायन बुद्ध के प्रधान शिष्य। इनकी अस्थियाँ आज भी यहाँ पूजनीय हैं।
अनूपपुर (अमरकंटक)- ऋषि भृगु व मार्कण्डेय नर्मदा पुराण के अनुसार यहाँ इन ऋषियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व तपस्या की थी।जबलपुर (तेवर) जाबालि ऋषि जिनके नाम पर 'जाबालिपुरम्' (जबलपुर) पड़ा।चित्रकूट (सतना) ऋषि अत्रि और सती अनुसूया रामायण काल के प्रसिद्ध ऋषि युगल।मन्दसौर तपस्वी वत्सभट्टी गुप्त काल से पूर्व के प्रसिद्ध विद्वान और साधक।
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भाग 2: मध्यकाल (19वीं सदी से पूर्व - भक्ति काल)
• संत धन्ना जाट (मालवा क्षेत्र): भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत, जिनका प्रभाव पश्चिमी मध्य प्रदेश में बहुत है।
बुंदेलखंड और बघेलखंड (सागर, दतिया, रीवा)
• अक्षर अनन्य (दतिया/सेवढ़ा): 17वीं-18वीं सदी। छत्रसाल के समकालीन प्रसिद्ध वेदान्ती संत।
अज्ञात 'सिद्ध बाबा' (भिंड/मुरैना): चंबल के हर गांव में एक 'सिद्ध बाबा' की ओट (स्थान) होती है। ये अधिकतर 16वीं-18वीं सदी के स्थानीय योद्धा-संत रहे हैं।
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भाग 3: अज्ञात और लोक-विस्मृत संत (लोक कथाओं के आधार पर)-
1. कनफड़े साधु (मालवा): ये अज्ञात नाथपंथी साधु थे जो 12वीं सदी के बाद पूरे मालवा के गांवों में घूमते थे। आज भी इनके मठ 'अज्ञात' नामों से मिलते हैं।
2. बावली बाबा (होशंगाबाद/नर्मदा तट): 18वीं सदी के आसपास नर्मदा किनारे कई ऐसे संत हुए जिन्होंने अपनी पहचान छिपाई और केवल 'बावली' (पागल) कहलाना पसंद किया।
3. पहाड़ी पीर (पचमढ़ी/बैतुल): सतपुड़ा की पहाड़ियों में कई अज्ञात सूफी संत और हिंदू योगियों की गुफाएं हैं जो 15वीं सदी के आसपास की मानी जाती हैं।
4. मौन साधक (अमरकंटक): नर्मदा की कंदराओं में ऐसे कई संतों का जिक्र लोककथाओं में है जिन्होंने कभी अपना नाम नहीं बताया और 'गुफा वाले बाबा' के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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• ब्रह्म बाबा (अज्ञात - गाँव-गाँव): बुंदेलखंड के लगभग हर पुराने गाँव के बाहर एक 'ब्रह्म बाबा' का स्थान होता है। ये वे अज्ञात विद्वान संत थे जिन्होंने लोक कल्याण के लिए अपने प्राण त्यागे।
• लाल जी महाराज (टीकमगढ़): रामानंदी संप्रदाय के अज्ञात संत, जिन्होंने इस क्षेत्र में भक्ति मार्ग को ग्रामीण स्तर पर फैलाया।
• संत लक्ष्मणदास (रीवा): 18वीं सदी के आसपास। लोकमान्यता है कि इन्होंने रीवा के राजाओं को आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया, पर स्वयं झोपड़ी में रहे।
• तीरका बाबा- (सीधी/सिंगरौली): ये एक अज्ञात सिद्ध संत थे जो लोक कथाओं में चमत्कारी महापुरुष के रूप में जाने जाते हैं।
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3. मालवा अंचल (इंद्रौर, उज्जैन, धार, रतलाम, देवास)
कालू बाबा (अज्ञात - देवास अंचल): खेतों की रक्षा करने वाले संत के रूप में लोकमान्य।
• खड़ेवरी बाबा (अज्ञात): मालवा के कई गांवों में ऐसे संतों की समाधियाँ हैं जो आजीवन तपस्या में लीन रहे और अपना परिचय गुप्त रखा।
4. महाकौशल अंचल (जबलपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी, नरसिंहपुर)
नर्मदा तट के कारण यहाँ 'परिक्रमावासी' अज्ञात संतों की भरमार है।
• बौना महाराज (जबलपुर/मंडला): 18वीं सदी के एक ऐसे सिद्ध संत जिनका कद छोटा था, लेकिन उनकी आध्यात्मिक पहुँच बहुत बड़ी मानी जाती थी।
5. ग्वालियर अंचल (ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी)
यहाँ 'सिद्धों' और 'नागा साधुओं' की लोकमान्यता अधिक है।
• सिद्ध बाबा (मुरैना/चंबल): चंबल के बीहड़ों और गांवों में 'सिद्ध बाबा' के नाम से सैकड़ों स्थान हैं। ये वे अज्ञात संत थे जो डाकुओं और राजाओं दोनों को सन्मार्ग पर लाते थे।
• संत गुलाब सिंह (शिवपुरी): 18वीं सदी के लोक संत जिनके पदों को आज भी ग्रामीण अंचलों में गाया जाता है।
• गोपाल दास जी (ग्वालियर): तानसेन के समय के अज्ञात संत जो संगीत को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम मानते थे।
6. भोपाल और मध्य क्षेत्र (भोपाल, रायसेन, विदिशा)
यहाँ सूफी संतों और वैरागी संतों का संगम मिलता है।
• पहाड़ी बाबा (रायसेन): रायसेन के किले और आसपास की पहाड़ियों में रहने वाले अज्ञात विरक्त साधु।
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अज्ञात संतों की पहचान का सूत्र:
मध्य प्रदेश में यदि आपको सबसे पुराने अज्ञात संतों को खोजना हो, तो इन तीन शब्दों को याद रखें:
1. खेड़ापति: हर गाँव का वह अज्ञात संत जो गाँव का रक्षक माना गया।
2. ब्रह्मदेव: वे विद्वान संत जिनका नाम लुप्त हो गया पर स्थान पूज्य है।
3. ओघड़/अवधूत: वे जो नर्मदा किनारे या श्मशान में साधना करते थे।
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1. निमाड़ अंचल (खरगोन, खंडवा, बड़वानी)
निमाड़ को "संतों की खेती" कहा जाता है। यहाँ कई ऐसे संत हुए जिन्होंने समाज सुधार और भक्ति का अनूठा संगम प्रस्तुत किया।
• संत कालूजी महाराज (खरगोन): सिंगाजी के समकालीन और उनके भतीजे/शिष्य माने जाते हैं।
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