Wednesday, 30 April 2025

geeta 10-11

 

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ (10/१५)


भावार्थ : हे पुरूषोत्तम! हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी! हे समस्त देवताओं के देव! हे समस्त प्राणियों को उत्पन्न करने वाले! हे सभी प्राणियों के ईश्वर! एकमात्र आप ही अपने आपको जानते हैं या फ़िर वह ही जान पाता है जिसकी अन्तर-आत्मा में प्रकट होकर आप अपना ज्ञान कराते हैं। (१५)


(अर्जुन द्वारा भगवान के ऎश्वर्यों के वर्णन के लिए प्रार्थना)


वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्याह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ (१६)


भावार्थ : हे कृष्ण! कृपा करके आप अपने उन अलौकिक ऎश्वर्यपूर्ण स्वरूपों को विस्तार से कहिये जिसे कहने में केवल आप ही समर्थ हैं, जिन ऎश्वर्यों द्वारा आप इन सभी लोकों में व्याप्त होकर स्थित हैं। (१६)

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌ ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ (१७)


भावार्थ : हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार आपका निरन्तर चिंतन करके आपको जान सकता हूँ, और मैं आपके ईश्वरीय स्वरूप का किन-किन भावों से स्मरण करूँ? (१७)

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌ ॥ (१८)


भावार्थ : हे जनार्दन! अपनी योग-शक्ति और अपने ऎश्वर्यपूर्ण रूपों को फिर भी विस्तार से कहिए, क्योंकि आपके अमृत स्वरूप वचनों को सुनते हुए भी मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। (१८)


(भगवान द्वारा अपने ऎश्वर्यों का वर्णन)
श्रीभगवानुवाच


हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ (१९)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे कुरुश्रेष्ठ! हाँ अब मैं तेरे लिये अपने मुख्य अलौकिक ऎश्वर्यपूर्ण रूपों को कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार की तो कोई सीमा नहीं है। (१९)

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ (२०)


भावार्थ : हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ और मैं ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति का, मैं ही सभी प्राणियों के जीवन का और मैं ही सभी प्राणियों की मृत्यु का कारण हूँ। (२०)

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌ ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ (२१)


भावार्थ : मैं सभी आदित्यों में विष्णु हूँ, मैं सभी ज्योतियों में प्रकाशमान सूर्य हूँ, मैं सभी मरुतों में मरीचि नामक वायु हूँ, और मैं ही सभी नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ। (२१)

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ (२२)


भावार्थ : मैं सभी वेदों में सामवेद हूँ, मैं सभी देवताओं में स्वर्ग का राजा इंद्र हूँ, सभी इंद्रियों में मन हूँ, और सभी प्राणियों में चेतना स्वरूप जीवन-शक्ति हूँ। (२२)

रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌ ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌ ॥ (२३)


भावार्थ : मैं सभी रुद्रों में शिव हूँ, मैं यक्षों तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ, मैं सभी वसुओं में अग्नि हूँ और मै ही सभी शिखरों में मेरु हूँ। (२३)

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌ ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ (२४)


भावार्थ : हे पार्थ! सभी पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति मुझे ही समझ, मैं सभी सेनानायकों में कार्तिकेय हूँ, और मैं ही सभी जलाशयों में समुद्र हूँ। (२४)

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ (२५)


भावार्थ : मैं महर्षियों में भृगु हूँ, मैं सभी वाणी में एक अक्षर हूँ, मैं सभी प्रकार के यज्ञों में जप (कीर्तन) यज्ञ हूँ, और मैं ही सभी स्थिर (अचल) रहने वालों में हिमालय पर्वत हूँ। (२५)

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ (२६)


भावार्थ : मैं सभी वृक्षों में पीपल हूँ, मैं सभी देवर्षियों में नारद हूँ, मै सभी गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ और मै ही सभी सिद्ध पुरूषों में कपिल मुनि हूँ। (२६)

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌ ।
एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌ ॥ (२७)


भावार्थ : समस्त घोड़ों में समुद्र मंथन से अमृत के साथ उत्पन्न उच्चैःश्रवा घोड़ा मुझे ही समझ, मैं सभी हाथियों में ऐरावत हूँ, और मैं ही सभी मनुष्यों में राजा हूँ। (२७)

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌ ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ (२८)


भावार्थ : मैं सभी हथियारों में वज्र हूँ, मैं सभी गायों में सुरभि हूँ, मैं धर्मनुसार सन्तान उत्पत्ति का कारण रूप प्रेम का देवता कामदेव हूँ, और मै ही सभी सर्पों में वासुकि हूँ। (२८)

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌ ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌ ॥ (२९)


भावार्थ : मैं सभी नागों (फ़न वाले सर्पों) में शेषनाग हूँ, मैं समस्त जलचरों में वरुणदेव हूँ, मैं सभी पितरों में अर्यमा हूँ, और मैं ही सभी नियमों को पालन करने वालों में यमराज हूँ। (२९)

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌ ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌ ॥ (३०)


भावार्थ : मैं सभी असुरों में भक्त-प्रहलाद हूँ, मै सभी गिनती करने वालों में समय हूँ, मैं सभी पशुओं में सिंह हूँ, और मैं ही पक्षियों में गरुड़ हूँ। (३०)

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌ ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ (३१)


भावार्थ : मैं समस्त पवित्र करने वालों में वायु हूँ, मैं सभी शस्त्र धारण करने वालों में राम हूँ, मैं सभी मछलियों में मगर हूँ, और मैं ही समस्त नदियों में गंगा हूँ। (३१)

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ॥ (३२)


भावार्थ : हे अर्जुन! मैं ही समस्त सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत हूँ, मैं सभी विद्याओं में ब्रह्मविद्या हूँ, और मैं ही सभी तर्क करने वालों में निर्णायक सत्य हूँ। (३२)

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ (३३)


भावार्थ : मैं सभी अक्षरों में ओंकार हूँ, मैं ही सभी समासों में द्वन्द्व हूँ, मैं कभी न समाप्त होने वाला समय हूँ, और मैं ही सभी को धारण करने वाला विराट स्वरूप हूँ। (३३)

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌ ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ (३४)


भावार्थ : मैं ही सभी को नष्ट करने वाली मृत्यु हूँ, मैं ही भविष्य में सभी को उत्पन्न करने वाली सृष्टि हूँ, स्त्रीयों वाले गुणों में कीर्ति, सौन्दर्य, वाणी की मधुरता, स्मरण शक्ति, बुद्धि, धारणा और क्षमा भी मैं ही हूँ। (३४)

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्‌ ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहऋतुनाम कुसुमाकरः॥ (३५)


भावार्थ : मैं सामवेद की गाने वाली श्रुतियों में बृहत्साम हूँ, मैं छंदों में गायत्री छंद हूँ, मैं महीनों में मार्गशीर्ष और मैं ही ऋतुओं में वसंत हूँ। (३५)

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌ ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌ ॥ (३६)


भावार्थ : मैं छलने वालों का जुआ हूँ, मैं तेजस्वियों का तेज हूँ, मैं जीतने वालों की विजय हूँ, मैं व्यवसायियों का निश्चय हूँ और मैं ही सत्य बोलने वालों का सत्य हूँ। (३६)

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ (३७)


भावार्थ : मैं वृष्णिवंशियों में वासुदेव हूँ, मैं ही पाण्डवों में अर्जुन हूँ, मैं मुनियों में वेदव्यास हूँ, और मैं ही कवियों में शुक्राचार्य हूँ। (३७)

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌ ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्‌ ॥ (३८)


भावार्थ : मैं दमन करने वालों का दंड हूँ, मैं विजय की कामना वालों की नीति हूँ, मैं रहस्य रखने वालों का मौन हूँ और मैं ही ज्ञानीयों का ज्ञान हूँ। (३८)

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌ ॥ (३९)


भावार्थ : हे अर्जुन! वह बीज भी मैं ही हूँ जिनके कारण सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि संसार में कोई भी ऎसा चर (चलायमान) या अचर (स्थिर) प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना अलग रह सके। (३९)

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ (४०)


भावार्थ : हे परन्तप अर्जुन! मेरी लौकिक और अलौकिक ऎश्वर्यपूर्ण स्वरूपों का अंत नहीं है, मैंने अपने इन ऎश्वर्यों का वर्णन तो तेरे लिए संक्षिप्त रूप से कहा है। (४०)

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥ (४१)


भावार्थ : जो-जो ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तुयें है, उन-उन को तू मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुआ समझ। (४१)

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥ (४२)


भावार्थ : किन्तु हे अर्जुन! तुझे इस प्रकार सारे ज्ञान को विस्तार से जानने की आवश्यकता ही क्या है, मैं तो अपने एक अंश मात्र से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण करके सर्वत्र स्थित रहता हूँ। (४२)


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद्भगवद् गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में 'विभूति-योग' नाम का दसवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ।

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

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अध्याय ११ - विश्वरूप दर्शन योग

(अर्जुन द्वारा विश्वरूप के दर्शन के लिये प्रार्थना)

(भगवान द्वारा विश्वरूप का वर्णन)
श्रीभगवानुवाच


पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ (५)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों अनेक प्रकार के अलौकिक रूपों को और अनेक प्रकार के रंगों वाली आकृतियों को भी देख। (५)

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ (६)


भावार्थ : हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तू मुझमें अदिति के बारह पुत्रों को, आठों वसुओं को, ग्यारह रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को, उनचासों मरुतगणों को और इसके पहले कभी किसी के द्वारा न देखे हुए उन अनेकों आश्चर्यजनक रूपों को भी देख। (६)

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्‌ । मम देहे गुडाकेशयच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि ॥ (७)


भावार्थ : हे अर्जुन! तू मेरे इस शरीर में एक स्थान में चर-अचर सृष्टि सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को देख और अन्य कुछ भी तू देखना चाहता है उन्हें भी देख। (७)

न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्‌ ॥ (८)


भावार्थ : किन्तु तू अपनी इन आँखो की दृष्टि से मेरे इस रूप को देखने में निश्चित रूप से समर्थ नहीं है, इसलिये मैं तुझे अलौकिक दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मेरी इस ईश्वरीय योग-शक्ति को देख। (८)


(संजय द्वारा धृतराष्ट्र के समक्ष विश्वरूप का वर्णन)
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्‌ ॥ (९)


भावार्थ : संजय ने कहा - हे राजन्‌! इस प्रकार कहकर परम-शक्तिशाली योगी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्य-युक्त अलौकिक विश्वरूप दिखलाया। (९)

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्‌ ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌ ॥ (१०)
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्‌ ।सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌ ॥ (११)

भावार्थ : इस विश्वरूप में अनेकों मुँह, अनेकों आँखे, अनेकों आश्चर्यजनक दिव्य-आभूषणों से युक्त, अनेकों दिव्य-शस्त्रों को उठाये हुए, दिव्य-मालाऎँ, वस्त्र को धारण किये हुए, दिव्य गन्ध का अनुलेपन किये हुए, सभी प्रकार के आश्चर्यपूर्ण प्रकाश से युक्त, असीम और सभी दिशाओं में मुख किए हुए सर्वव्यापी परमेश्वर को अर्जुन ने देखा। (१०-११)

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ (१२)


भावार्थ : यदि आकाश में एक हजार सूर्य एक साथ उदय हो तो उनसे उत्पन्न होने वाला वह प्रकाश भी उस सर्वव्यापी परमेश्वर के प्रकाश की शायद ही समानता कर सके। (१२)

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ (१३)

भावार्थ : पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से अलग-अलग सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को सभी देवताओं के भगवान श्रीकृष्ण के उस शरीर में एक स्थान में स्थित देखा। (१३)

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ (१४)

भावार्थ : तब आश्चर्यचकित, हर्ष से रोमांचित हुए शरीर से अर्जुन ने भगवान को सिर झुकाकर प्रणाम करके और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बोला। (१४)

अर्जुन द्वारा विश्वरूप की स्तुति करना)

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्‍घान्‌ ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌ ॥ (१५)


भावार्थ : अर्जुन ने कहा - हे भगवान श्रीकृष्ण! मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं को तथा अनेकों विशेष प्राणीयों को एक साथ देख रहा हूँ, और कमल के आसन पर स्थित ब्रह्मा जी को, शिव जी को, समस्त ऋषियों को और दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ। (१५)

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्‌ ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ (१६)


भावार्थ : हे विश्वेश्वर! मैं आपके शरीर में अनेकों हाथ, पेट, मुख और आँखें तथा चारों ओर से असंख्य रूपों को देख रहा हूँ, हे विश्वरूप! न तो मैं आपका अन्त, न मध्य और न आदि को ही देख पा रहा हूँ। (१६)

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्‌ ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्‌ ॥ (१७)


भावार्थ : मैं आपको चारों ओर से मुकुट पहने हुए, गदा धारण किये हुए और चक्र सहित अपार तेज से प्रकाशित देख रहा हूँ, और आपके रूप को सभी ओर से अग्नि के समान जलता हुआ, सूर्य के समान चकाचौंध करने वाले प्रकाश को कठिनता से देख पा रहा हूँ। (१७)

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ (१८)


भावार्थ : हे भगवन! आप ही जानने योग्य परब्रह्म परमात्मा हैं, आप ही इस जगत के परम-आधार हैं, आप ही अविनाशी सनातन धर्म के पालक हैं और मेरी समझ से आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। (१८)

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्‌ ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्‌ ॥ (१९)


भावार्थ : आप अनादि है, अनन्त है और मध्य-रहित हैं, आपकी महिमा अनन्त है, आपकी असंख्य भुजाएँ है, चन्द्र और सूर्य आपकी आँखें है, मैं आपके मुख से जलती हुई अग्नि के निकलने वाले तेज के कारण इस संसार को तपते हुए देख रहा हूँ। (१९)

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्‌ ॥ (२०)


भावार्थ : हे महापुरूष! सम्पूर्ण आकाश से लेकर पृथ्वी तक के बीच केवल आप ही अकेले सभी दिशाओं में व्याप्त हैं और आपके इस भयंकर आश्चर्यजनक रूप को देखकर तीनों लोक भयभीत हो रहे हैं। (२०)

अमी हि त्वां सुरसङ्‍घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्‍घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ (२१)


भावार्थ : सभी देवों के समूह आप में प्रवेश कर रहे हैं उनमें से कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपका गुणगान कर रहे हैं, और महर्षिगण और सिद्धों के समूह 'कल्याण हो' इस प्रकार कहकर उत्तम वैदिक स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं। (२१)

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्‍घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ (२२)


भावार्थ : शिव के सभी रूप, सभी आदित्यगण, सभी वसु, सभी साध्यगण, सम्पूर्ण विश्व के देवता, दोनों अश्विनी कुमार तथा समस्त मरुतगण और पितरों का समूह, सभी गंधर्व, सभी यक्ष, समस्त राक्षस और सिद्धों के समूह वह सभी आश्चर्यचकित होकर आपको देख रहे हैं। (२२)

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌ ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्‌ ॥ (२३)


भावार्थ : हे महाबाहु! आपके अनेकों मुख, आँखें, अनेकों हाथ, जंघा, पैरों, अनेकों पेट और अनेक दाँतों के कारण विराट रूप को देखकर सभी लोक व्याकुल हो रहे हैं और उन्हीं की तरह मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। (२३)

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌ ।
दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ (२४)


भावार्थ : हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करता हुआ, अनेको प्रकाशमान रंगों से युक्त मुख को फैलाये हुए और आपकी चमकती हुई बड़ी-बड़ी आँखों को देखकर मेरा मन भयभीत हो रहा है, मैं न तो धैर्य धारण कर पा रहा हूँ और न ही शान्ति को प्राप्त कर पा रहा हूँ। (२४)

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ (२५)


भावार्थ : इस प्रकार दाँतों के कारण विकराल और प्रलयंकारी की अग्नि के समान आपके मुखों को देखकर मैं आपकी न तो कोई दिशा को जान पा रहा हूँ और न ही सुख पा रहा हूँ, इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप मुझ पर प्रसन्न हों। (२५)

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ (२६)

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्‍गै ॥ (२७)


भावार्थ : धृतराष्ट्र के सभी पुत्र अपने समस्त सहायक वीर राजाओं के सहित तथा पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, सूत पुत्र कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धा भी आपके भयानक दाँतों वाले विकराल मुख में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं, और उनमें से कुछ तो दाँतों के दोनों शिरों के बीच में फ़ंसकर चूर्ण होते हुए दिखाई दे रहे हैं। (२६-२७)

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ (२८)


भावार्थ : जिस प्रकार नदियों की अनेकों जल धारायें बड़े वेग से समुद्र की ओर दौड़तीं हुयी प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार सभी मनुष्य लोक के वीर योद्धा भी आपके आग उगलते हुए मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। (२८)

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ (२९)


भावार्थ : जिस प्रकार पतंगे अपने विनाश के लिये जलती हुयी अग्नि में बड़ी तेजी से प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार यह सभी लोग भी अपने विनाश के लिए बहुत तेजी से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। (२९)

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ (३०)


भावार्थ : हे विश्वव्यापी भगवान! आप उन समस्त लोगों को जलते हुए सभी मुखों द्वारा निगलते हुए सभी ओर से चाट रहे हैं, और आपके भयंकर तेज प्रकाश की किरणें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आच्छादित करके झुलसा रहीं है। (३०)

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌ ॥ (३१)


भावार्थ : हे सभी देवताओं में श्रेष्ठ! कृपा करके आप मुझे बतलाइए कि आप इतने भयानक रूप वाले कौन हैं? मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आप मुझ पर प्रसन्न हों, आप ही निश्चित रूप से आदि भगवान हैं, मैं आपको विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपके स्वभाव को नहीं जानता हूँ। (३१)


(भगवान द्वारा अपने प्रभाव का वर्णन)
श्रीभगवानुवाच


कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ (३२)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - मैं इस सम्पूर्ण संसार का नष्ट करने वाला महाकाल हूँ, इस समय इन समस्त प्राणीयों का नाश करने के लिए लगा हुआ हूँ, यहाँ स्थित सभी विपक्षी पक्ष के योद्धा तेरे युद्ध न करने पर भी भविष्य में नही रहेंगे। (३२)

तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्‍क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌ ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌ ॥ (३३)


भावार्थ : हे सव्यसाची! इसलिये तू यश को प्राप्त करने के लिये युद्ध करने के लिये खडा़ हो और शत्रुओं को जीतकर सुख सम्पन्न राज्य का भोग कर, यह सभी पहले ही मेरे ही द्वारा मारे जा चुके हैं, तू तो युद्ध में केवल निमित्त बना रहेगा। (३३)

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्‌ ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌ ॥ (३४)


भावार्थ : द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और भी अन्य अनेक मेरे द्वारा मारे हुए इन महान योद्धाओं से तू बिना किसी भय से विचलित हुए युद्ध कर, इस युद्ध में तू ही निश्चित रूप से शत्रुओं को जीतेगा। (३४)


(भययुक्त अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति)
संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ (३५)


भावार्थ : संजय ने कहा - भगवान के इन वचनों को सुनकर अर्जुन ने हाथ जोड़कर बारम्बार नमस्कार किया, और फ़िर अत्यन्त भय से कांपता हुआ प्रणाम करके अवरुद्ध स्वर से भगवान श्रीकृष्ण से बोला। (३५)

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा: ॥ (३६)


भावार्थ : अर्जुन ने कहा - हे अन्तर्यामी प्रभु! यह उचित ही है कि आपके नाम के कीर्तन से सम्पूर्ण संसार अत्यन्त हर्षित होकर आपके प्रति अनुरक्त हो रहा है तथा आसुरी स्वभाव के प्राणी आपके भय के कारण इधर-उधर भाग रहे हैं और सभी सिद्ध पुरुष आपको नमस्कार कर रहे हैं। (३६)

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ॥ (३७)


भावार्थ : हे महात्मा! यह सभी श्रेष्ठजन आपको नमस्कार क्यों न करें क्योंकि आप ही ब्रह्मा को भी उत्पन्न करने वाले हैं, हे अनन्त! हे देवादिदेव! हे जगत के आश्रय! आप अविनाशी, समस्त कारणों के मूल कारण, और आप ही परमतत्व है। (३७)

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ (३८)


भावार्थ : आप आदि देव सनातन पुरुष हैं, आप इस संसार के परम आश्रय हैं, आप जानने योग्य हैं तथा आप ही जानने वाले हैं, आप ही परम धाम हैं और आप के ही द्वारा यह संसार अनन्त रूपों में व्याप्त हैं। (३८)

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ (३९)


भावार्थ : आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा तथा सभी प्राणीयों के पिता ब्रह्मा भी है और आप ही ब्रह्मा के पिता भी हैं, आपको बारम्बार नमस्कार! आपको हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! फिर भी आपको बार-बार नमस्कार! करता हूँ। (३९)

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ (४०)


भावार्थ : हे असीम शक्तिमान! मैं आपको आगे से, पीछे से और सभी ओर से ही नमस्कार करता हूँ क्योंकि आप ही सब कुछ है, आप अनन्त पराक्रम के स्वामी है, आप ही से समस्त संसार व्याप्त हैं, अत: आप ही सब कुछ हैं। (४०)

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ (४१)

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌ ॥ (४२)


भावार्थ : आपको अपना मित्र मानकर मैंने हठपूर्वक आपको हे कृष्ण!, हे यादव! हे सखा! इस प्रकार आपकी महिमा को जाने बिना मूर्खतावश या प्रेमवश जो कुछ कहा है, हे अच्युत! यही नही हँसी-मजाक में आराम करते हुए, सोते हुए, बैठते हुए या भोजन करते हुए, कभी अकेले में या कभी मित्रों के सामने मैंने आपका जो अनादर किया हैं उन सभी अपराधों के लिये मैं क्षमा माँगता हूँ। (४१,४२)

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌ ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ (४३)


भावार्थ : आप इस चल और अचल जगत के पिता और आप ही इस जगत में पूज्यनीय आध्यात्मिक गुरु हैं, हे अचिन्त्य शक्ति वाले प्रभु! तीनों लोकों में अन्य न तो कोई आपके समान हो सकता हैं और न ही कोई आपसे बढकर हो सकता है। (४३)

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌ ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌ ॥ (४४)


भावार्थ : अत: मैं समस्त जीवों के पूज्यनीय भगवान के चरणों में गिरकर साष्टाँग प्रणाम करके आपकी कृपा के लिए प्रार्थना करता हूँ, हे मेरे प्रभु! जिस प्रकार पिता अपने पुत्र के अपराधों को, मित्र अपने मित्र के अपराधों को और प्रेमी अपनी प्रिया के अपराधों को सहन कर लेता हैं उसी प्रकार आप मेरे अपराधों को सहन करने की कृपा करें। (४४)


(अर्जुन द्वारा चतुर्भुज रूप के लिए प्रार्थना)


अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ (४५)


भावार्थ : पहले कभी न देखे गये आपके इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और साथ ही मेरा मन भय के कारण विचलित भी हो रहा है, इसलिए हे देवताओं के स्वामी! हे जगत के आश्रय! आप मुझ पर प्रसन्न होकर अपने पुरूषोत्तम रूप को मुझे दिखलाइये। (४५)

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ (४६)


भावार्थ : हे हजारों भुजाओं वाले विराट स्वरूप भगवान! मैं आपके मुकुट धारण किए हुए और हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म लिए रूप का दर्शन करना चाहता हूँ, कृपा करके आप चतुर्भुज रूप में प्रकट हों। (४६)


(भगवान द्वारा विश्वरूप के दर्शन की महिमा और चतुर्भुज दर्शन)
श्रीभगवानुवाच


मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात्‌ ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्‌ ॥ (४७)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के प्रभाव से तुझे अपना दिव्य विश्वरूप दिखाया है, मेरे इस तेजोमय, अनन्त विश्वरूप को तेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया है। (४७)

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ (४८)


भावार्थ : हे कुरुश्रेष्ठ! मेरे इस विश्वरूप को मनुष्य लोक में न तो यज्ञों के द्वारा, न वेदों के अध्ययन द्वारा, न दान के द्वारा, न पुण्य कर्मों के द्वारा और न कठिन तपस्या द्वारा ही देखा जाना संभव है, मेरे इस विश्वरूप को तेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया है। (४८)

मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम्‌ ।
व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ (४९)


भावार्थ : हे मेरे परम-भक्त! तू मेरे इस विकराल रूप को देखकर न तो अधिक विचलित हो, और न ही मोहग्रस्त हो, अब तू पुन: सभी चिन्ताओं से मुक्त होकर प्रसन्न-चित्त से मेरे इस चतुर्भुज रूप को देख। (४९)

संजय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ (५०)


भावार्थ : संजय ने कहा - वासुदेव भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से इस प्रकार कहने के बाद अपना विष्णु स्वरूप चतुर्भुज रूप को प्रकट किया और फिर दो भुजाओं वाले मनुष्य स्वरूप को प्रदर्शित करके भयभीत अर्जुन को धैर्य बँधाया। (५०)


(चतुर्भुज रूप के दर्शन की दुर्लभता और अनन्य भक्ति द्वारा सुलभता)
अर्जुन उवाच


दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ (५१)


भावार्थ : अर्जुन ने कहा - हे जनार्दन! आपके इस अत्यन्त सुन्दर मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिर चित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ। (५१)

श्रीभगवानुवाच


सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्‍क्षिणः ॥ (५२)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - मेरा जो चतुर्भज रूप तुमने देखा है, उसे देख पाना अत्यन्त दुर्लभ है देवता भी इस शाश्वत रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं। (५२)

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा ॥ (५३)


भावार्थ : मेरे इस चतुर्भुज रूप को जिसको तेरे द्वारा देखा गया है इस रूप को न वेदों के अध्यन से, न तपस्या से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जाना संभव है। (५३)

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ (५४)


भावार्थ : हे परन्तप अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही मेरा साक्षात दर्शन किया जा सकता है, वास्तविक स्वरूप को जाना जा सकता है और इसी विधि से मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है। (५४)

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ (५५)


भावार्थ : हे पाण्डुपुत्र! जो मनुष्य केवल मेरी शरण होकर मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करता है, मेरी भक्ति में स्थित रहता है, सभी कामनाओं से मुक्त रहता है और समस्त प्राणियों से मैत्रीभाव रखता है, वह मनुष्य निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करता है। (५५)


ॐतत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः॥ इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद्भगवद् गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में विश्वरूप दर्शन-योग नाम का ग्यारहवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ॥



॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

Wednesday, 16 April 2025

रिटायर्ड परचून की दुकान

सेवानिवृत्त छोटा कर्मचारी परेशान है-

किसी ने सुझाव दिया -
" रिटायर्ड लोग परचून की दुकान खोलें। गौ आश्रम खोलें। सरकार के स्थानीय प्रतिनिधियों की जय जोहार करें। शेष की इच्छा जगत प्रपंच है। 'दिल्लीश्वरोवा जगदीश्वरोवा'।"

"सरकारें पंजाब सरकार से सीखे और सब को समान न्याय के आधार पर विधायकों /सांसदों (केन्द्र सरकार भी) को भी एक पेंशन का ही प्रावधान रखे।" 

सरकारों का खजाना नहीं लुटेगा। पूर्व मुख्यमंत्रियों की आजीवन बंगला, गाड़ी, विशेष सहायक, टेलीफोन, बिजली के बिल, चिकित्सा सुविधाएं भी बंद होनी चाहिए। 

एक मुख्यमंत्री आने वाली सात पीढ़ी के लिए कमा लेता है फिर क्या वह अपने जीवन काल में भी उस धन का अपने जनता की सेवा में  ख़र्च नहीं कर सकता? कैसा त्याग और कैसी सेवा?

 जब मुख्यमंत्री रहते हैं तो समझाते हैं -"क्या लेके आया बंदे,क्या ले के जायेगा!"

फिर यह सुविधा स्वीकार करना सरकारी खजाने का दुरुपयोग नहीं है?

 इस सुविधा का दुरुपयोग सबसे अधिक मुख्यमंत्री करते हैं।अपने रहते अपने पुराने बंगले को आलीशान (केजरीवाल की तरह) कोठी बना लेते हैं और उनकी सुविधा बरकरार रहती है। 

यह बंद होना चाहिए। त्याग तपस्या के आधार को लिए भाजपा को इस पर अवश्य चिंतन करना चाहिए। 

यदि मुख्यमंत्रियों को सुविधा देना है तो भाजपा कार्यालय में उन्हें जनता की समस्या सुनने और संगठन में योगदान करने के लिए कमरा देना चाहिए।

यही चलता रहा तो कुछ दिनों में राजधानी के महत्वपूर्ण इलाकों की अरबों-खरबों की जमीन, बंगला भूतपूर्व (भूतों)के हवाले हो जायेगी। क्योंकि पांच साल में कभी-कभी तीन मुख्यमंत्री भी बन जाते हैं!

ऐसे अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए जो नियम के विरुद्ध जाकर निर्माण की अनुमति देकर निर्माण कराते हैं।

एक फ़ैशन गौ शाला का चला है। सरकारी बंगलों में सरकारी खर्च पर गौशालाओं की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

ऐसे प्रेमी,कृपाल जनों को फ़ार्म हाउस बना कर गौसेवा करनी चाहिए। सब लोग लालूजी ही बनना चाहते हैं तो उस ग्वाल के बेटे को चारा खाने की सज़ा क्यों?

अब जब मुखिया ही अपने भविष्य को तय करने में जुटा हो तो पेंशनर्स -सेवक क्या पायेंगे? इसीलिए कहता हूं सेवानिवृत्त के पहले अपने लिए धंधा तय कर लें। 

क्या आप को नहीं लगता कि दरअसल यह लोकतंत्र प्रकारांतर से राजतंत्र ही है।
क्योंकि  राजनेता, ब्यूरोक्रेट्स, विभिन्न प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आखिर आचरण से क्या प्रकट करते हैं? 

कथा लम्बी है फिर किसी प्रसंग में। शेष आप सब जानते ही हैं।

उमेश कुमार सिंह 
16/4/25

Sunday, 13 April 2025

जीवन

2024 पृष्ठ -तीन (8)

 
वर्ष देख जीवन के बीतते 
उतराता - डूबता हूं 
आश्चर्य में 
किस रहस्यपूर्ण डोर से बंधकर
पहुंचता जा रहा हूं 
अनदेखे अपठित काल के
अगले पृष्ठ को पढ़ने ।

गिनते हुए वर्ष के नवीन पृष्ठ 
जो लिखा जा चुका है
विधाता के हाथ
परंतु जीने का पुरुषार्थ-
भ्रम जिंदा है कि
मैं ही लिखता आ रहा हूं।

कर्म और प्रारब्ध का द्वंद्व 
लेकर एक दिन  
विदा होना है
किसी को आज
 तो
किसी को कल ।

चालू रहेगी यह अक्षुण्ण
काल की अनंत यात्रा
क्योंकि काल गति अखंड है !!

राम

(5)

ठीक एक माह बाद
आज के ही दिन
तथाकथित धर्मों के ठेकेदारों
के चंगुल से मुक्त
भारत के ही नहीं
दुनिया के अनभिषिक्त सभी अस्पृश्य पा सकेंगे माथे पर राम-रज
चरणों में राम-पादुका
हृदय में पवित्रता-समानता- एकात्मकता का अनंत यात्राओं से प्रतीक्षित अनुराग।

उस दिन से न होगी कोई जाति
न कोटा आरक्षित -अनारक्षित का

झर पड़ेंगे हृदय की गहराई से जन्म जन्मांतर से सहेजे धरोहर-मंत्र

समर्पित हो सकेंगे 
उस देवता के चरणों में खुली
पृथ्वी और आकाश की अंजुलि से।

अब कभी देवता न हो सकेंगे कैद किसी मंदिर में 

दर्शन होंगे दुनिया के किसी कोने में बैठे अस्पृश्य को
मंदिर के बाहर और भीतर भी।

तमाम सम्प्रदायों द्वारा उपेक्षित
बौनों द्वारा संचालित आदिम मनुष्य
 पा सकेगा शबरी, जटायू, निषाद -बानर के मैत्री भाव।

'परस्परं भावयन्तु' के सनातन सूत्र में एकरस होकर
पार कर सकेंगे बाधाओं की दीवार
 नहीं खड़ा होगा कोई पहरेदार
नहीं आयेंगे नजर विभिन्न तरह के जाति -सम्प्रदाय- वंचित -शोषित बाड़ों में बंद मनुष्य ।

 सारी सीमाओं के पार
 होगा 'चिर सनातन, नित्य नूतन' मनुष्य
जहां एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से,
 एक धरती दूसरी धरती से कर रहे होंगे आलिंगन।

'वसुधैव कुटुम्बकम' की नाभि !!
हे राम ! पुनः 'अयोध्या' सार्थक होगी।

-उमेश 
22/12/23

Friday, 28 March 2025

जन्मदिन की शुभकामनाएं

आज डॉ मोहन यादव जी का जन्म (दिन)  दिनांक है। अशेष शुभकामनाएं।

अनेक संदेश फेसबुक पर पढ़ने और देखने को मिल रहे हैं।

अधिकतम संदेश मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को हैं तो कुछ यशस्वी मुख्यमंत्री जी को। डां मोहन यादव को एक भी नहीं दिखा।

प्रभुता को बधाई / शुभकामनाएं हैं या..... व्यक्ति को.?

अनेक फोटो इसलिए भी हैं कि  सभ्य समाज को यह जता दें कि डां मोहन यादव मुख्यमंत्री , मध्यप्रदेश, उनको जानते हैं।

अनुभव के आधार पर लिख सकता हूं कि डॉ मोहन यादव जी की यह विशेषता है कि उनसे जिनका एक भी बार सम्बंध बना वे उसे स्मरण रखते हैं और निभाते हैं। फिर भी बधाई देने वाले को लगता है स्मरण दिलाना 'सनद रहे वक्त पर काम आयेगा ' जैसा है। कुछ सहज अपनत्व भी।

ठीक भी है सत्ताशीर्ष से कौन नहीं जुड़ना चाहता है। भले ही शायर लिख- लिख कर थक गये हो कि -

हस्ती के मत फरेब आ जाइयो 'असद',
आलम तमाम हल्कए -दामे-ख्याल है।।

एक मजेदार बात की ओर एक मित्र ने ध्यान दिलाया। आज के समाचार पत्रों में मा मुख्यमंत्री जी के कार्यकाल में उनके उपलब्धियों को लेकर उनका स्तुतिगान किया है। यह अनुचित भी नहीं है। 

लेकिन मजेदार बात यह है कि स्तुति कर्ता पत्रकार गण कोई और नहीं,  वही हैं जो कल तक भूत मुख्यमंत्री जी की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। शब्दजाल वही, सधे हुए वाक्य वही।तरकश और तीर भी वही। है न आश्चर्य!!

कई मीडिया घराने के खाटी पत्रकारों ने तो अपनी पुरानी पोस्ट ही उलट कर डाल दी। आखिर दो शब्द नया लिखने की तोहमत क्यों मोल लें।

कारण लिखते समय उपलब्धियों में कुछ ईमानदारी और पत्रकारिता धर्म जग गया कि अनेक विभागों के बजट में से राशि लेकर लाड़ली बहना योजना को दे दी गई। अफसर आखिर न भी कैसे करते? उनके वेतन तो रुकेंगे नहीं। दुखी होंगे तो अतिथि, संविदा कर्मी, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता या छोटा कर्मचारी!!

एक ने बताया कि जन्मदिन पर भा मजदूर संघटन से जुड़े कई संगठन आंदोलन की योजना बना रहे हैं!!
आखिर इस माह के उनके वेतन का बजट/ पैसा जो विभाग ने अन्यत्र ट्रांसफर कर दिया।

 फिर  संगठन के पदाधिकारियों को सूखे गले से चासनी की शुभकामनाएं भी तो देनी है। कैसे दें तो संगठन मुखिया ने कहा, चलो ऐसा करो कि सरकार भी खुश रहे और वर्कर भी चिल्ल पो न करें।

अन्यथा तो कृपा फिर कब जागेगी,कौन जाने। फिर दम भी तो बताना  है। ऐसे में याद आती हैं पंक्तियां -

बूंद पानी की हूं, थोड़ी सी हवा है मुझमें,
इस बिजाअत पर क्या तुरफां अयां है मुझमें।।

खैर, आज प्रसन्नता का दिन है। प्रदेश के मुखिया का जन्मदिन है। 

किसी प्रदेश की सारी जनता की इच्छा रहती है कि उसके और उसके मुखिया का सम्बन्ध कैसा हो,अंग्रेजी कवि सार्जेंट जायस किलमर की इन पंक्तियों में अभिव्यक्त पा रही है -
A tree that looks At God All day;
And lift her leafy Arms to pray;

...... A tree that may in summer wear 
A nest of robins in her hair;

अंत में -

" जीवेत शरद: शतम् शतम्, सुदिनं सुदिनं जन्मदिनम् । भवतु मंगलम्।।

 विजयीभव सर्वदा, जन्मदिनस्य हार्दिक शुभेच्छा:।

 आने वाले दिनों में  डॉ  मोहन यादव जी (मुख्यमंत्री) के नेतृत्व में प्रदेश का अंतिम व्यक्ति भी विकास कर स्वाभिमानी बन सके (कटोरा याचक और दाता दोनों का छूट सके) । तदर्थ, संविदा,कर्मी शब्दों से जवानी मुक्ति पा सके।

प्रदेश को वैभव  की अनंत ऊँचाइयों पर ले जाने हेतु आप माध्यम बनें। शुभकामनाएं 
🙏🙏🙏🌹

Monday, 3 March 2025

तिरुवल्लुवर और ‘तिरूकुरल’

 

 

                                                    तिरुवल्लुवर और  ‘तिरूकुरल’

              तिरुवल्लुवर तमिल के एक प्रसिद्ध कवि हैं जिन्होंने तमिल में नीति पर आधारित  ‘तिरुकुरल’ या ‘थिरूकुरल’ नामक ग्रंथ की रचना की। उन्हें थेवा पुलवर, वल्लुवर और पोयामोड़ी पुलवर जैसे नामों से जाना जाता है। तिरुवल्लुवर का जन्म मायलापुर में हुआ था। उनकी पत्नी वासुकि ईश्वर अनुग्रह प्राप्त विदुषी थीं।  एक ऐसी आदर्श पत्नी जिसने कभी भी अपने पति के आदर्शों की अवज्ञा नहीं की और उनका शतश: पालन किया। तिरुवल्लुवर ने लोगों को बताया कि एक व्यक्ति गृहस्थ या गृहस्थ स्वामी का जीवन जीने के साथ-साथ एक दिव्य जीवन या शुद्ध और पवित्र जीवन जी सकता है। उन्होंने लोगों को बताया कि शुद्ध और पवित्रता से परिपूर्ण दिव्य जीवन जीने के लिए परिवार को छोड़कर संन्यासी बनने की आवश्यकता नहीं है। उनकी ज्ञान भरी बातें और शिक्षा अब एक पुस्तक के रूप में मौजूद है जिसे ‘‘थिरूकुरल’’ के रूप में जाना जाता है, तमिल कैलेंडर की अवधि उसी समय से है और उसे तिरुवल्लुवर ‘आन्दुवर्ष’ के रूप में संदर्भित किया जाता है। तिरुवल्लुवर के अस्तित्व का समय पुरातात्विक साक्ष्य के बजाय ज्यादातर भाषाई साक्ष्यों पर आधारित है । उनके काल का अनुमान 200 ई.पू. से 30 ई.पू. के बीच लगाया गया है।

              तिरुवल्लुवर में ‘तिरु’ एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ महनीय होता है, जो श्री के समान है और ‘वल्लुवर’ ; तमिल परंपरा के अनुसार ‘वल्लुवन’ के लिए एक विनम्र नाम से बना है। उनके वास्तविक नाम के बजाए ‘वल्लुवन’ नाम एक सामान्य नाम है जो उनकी जाति या व्यवसाय का प्रतिनिधित्व करता है। लोक मान्यता है कि ‘थीरूकुरल’ के लेखक का नाम उनके समुदाय पर रखा गया है । तिरुवल्लुवर के जन्म के बारे में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। माना जाता है कि तिरुवल्लुवर का जन्म और लालन-पालन मायलापुर में हुआ था जो वर्तमान में मद्रास शहर का एक हिस्सा है। उन्हें जुलाहे अथवा बुनकर जाति में माना जाता है । एक अन्य मत के अनुसार शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध सम्प्रदायों का तर्क है कि तिरुवल्लुवर उनसे सम्बन्धित हैं। तिरुवल्लुवर के जन्म के बारे में जो किंवदंतियां हैं उनमें एक यह भी है कि उन्हें एक जैन संत तथा हिंदू कहा गया है। वल्लुवर जतीय नाम है।  

कुरल का अर्थ दोहा होता है। उनके ग्रंथ का प्रारम्भ सर्वशक्तिमान परमात्मा की वन्दना से होता है अत: उन्हें नास्तिक नहीं कहा जा सकता। उनके परमेश्वर सर्वशक्तिमान हैं, सारे संसार के निर्माता हैं और जो अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। दरअसल कुरल किसी भी विशिष्ट या सांप्रदायिक धार्मिक आस्था की वकालत नहीं करता है। एक कथा में उन्हें पंड्या शासकों की प्राचीन राजधानी मदुरै से जोड़ा जाता है, जिन्होंने तमिल साहित्य को सख्ती से बढ़ावा दिया था। और उन्होंने अपनी कृति ‘थिरुकुरल’ को जमा करने के लिए मदुरै की यात्रा की ताकि वे राजा पंडियन और उनके कवियों के समूह से अनुमोदन प्राप्त कर सके। कुछ परंपरागत कहानियाँ हैं जिसमें कहा गया है कि मदुरै का तमिल संगम; नियमित तौर पर आयोजित किया जाने वाला प्रख्यात विद्वानों और शोधकर्ताओं की ऐसी (सभा) सम्मेलन  व प्राधिकरण था जिसके माध्यम से तिरुक्कुरल को विश्व के सामने पेश किया गया। हो सकता है कि तिरुवल्लुवर ने अपना अधिकांश जीवन मदुरै में बिताया हो क्योंकि यह पांडिया शासकों के अधीन था जहाँ कई तमिल कवि आगे बढ़े। अभी हाल ही में कन्याकुमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शोध केन्द्र  द्वारा दावा किया गया कि वल्लुवर एक राजा थे जिन्होंने तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के एक पहाड़ी इलाके वल्लुवनाडु पर शासन किया था।

जॉर्ज उग्लो पोप या जी.यू. पोप जैसे अधिकांश शोधकर्ताओं और तमिल के महान शोधकर्ताओं ने जिन्होंने तमिलनाडु में कई वर्ष बिताए और तिरुक्कुरल का अंग्रेजी में अनुवाद किया है, उन्होंने तिरुवल्लुवर को परैयार के रूप में पहचाना है। कार्ल ग्रौल (1814-1864) ने पहले ही 1855 तक तिरुक्कुरल को बौद्ध पंथ की एक कृति के रूप में चित्रित किया था। इस संबंध में यह विशेष जिज्ञासा  का विषय था कि थिरुक्कुरल के लेखक तिरुवल्लुवर को तमिल परंपरा में परैयार के रूप में पहचाना गया; जैसा कि, संयोग से, अन्य प्रसिद्ध प्राचीन तमिल लेखकों के मामले में था।  

              ‘तिरुक्कुरल’ तमिल की एक सबसे श्रद्धेय प्राचीन कृति है। ‘तिरुक्कुरल’ का निर्माण ‘तिरु’ और ‘कुरल’ दो शब्दों को जोड़कर हुआ है अर्थात् तिरु + कुरल = तिरुक्कुरल। कुरल को दुनिया का आम विश्वास माना जाता है, क्योंकि यह मानव नैतिकता और जीवन में बेहतरी का रास्ता दिखलाता है। माना जता है कि बाइबल, कुरान, गीता और रामचरितमानस की तरह कुरल का भी अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया है। 1730 में ‘तिरुक्कुरल’ का लैटिन अनुवाद कोस्टांज़ो बेस्ची द्वारा किया गया जिससे यूरोपीय बुद्धिजीवियों को उल्लेखनीय रूप से तमिल साहित्य के सौंदर्य और समृद्धि को जानने में मदद मिली।

‘तिरुक्कुरल’ तीन वर्गों में विभाजित है। पहले खंड में अरम, विवेक और सम्मान के साथ अच्छे नैतिक व्यवहार, शुद्धाचरण को बताया गया है। खंड दो में पारुल सांसारिक मामलों की सही ढंग से चर्चा की गई है और तीसरे अनुभाग इन सम में पुरुष और महिला के बीच प्रेम सम्बन्धों पर विचार किया गया है।  प्रथम खंड में 38 अध्याय हैं, दूसरे में 70 अध्याय और तीसरे में 25 अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में कुल 10 दोहे या कुरल है और कुल मिलाकर कृति में 1330 दोहे हैं।

              भारत में कन्याकुमारी के दक्षिणी सिरे पर स्वामी विवेकानंद शिला के पास संत तिरुवल्लुवर की 133 फुट लंबी प्रतिमा बनाई गई है, जहाँ अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर मिलते हैं।  जिसे ‘तिरुवाल्लुवर स्टैचू फेरी टर्मिनल’ के नाम से जाना जाता है। 30 दिसंबर, 2024 से स्वामी विवेकानंद शिला और तिरुवल्लुवर की प्रतिमा को ‘ग्लास फाइबर फुट ओवर ब्रिज’ बनाकर जोड़ा गया है।  तिरुक्कुरल के 133 फुट लंबी प्रतिमा को 01 जनवरी, 2025 को तमिलनाडु सरकार ने  ‘बुद्धि की प्रतिमा’ घोषित किया है । प्रतिमा में (ध्यान से देखें तो तीन उँगलियाँ आकाश को इंगित करती दिखाई देती हैं ) तिरुक्कुरल के सम्पूर्ण अध्यायों या अथिया करम का प्रतिनिधित्व मिलता है जो उनकी तीन अँगुलियाँ- अरम, पोरूल और इबनम; अर्थात् तीन विषयों- धन, नैतिकता और प्रेम की ओर इंगित करती हैं। तिरूकुरल के तीन भागों को धर्म, अर्थ और काम के रूप में भी माना जाता है।

क्रमश:

              तिरुक्कुरल : तिरुक्कुरल में नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र और विदुर नीति का किस प्रकार समावेश किया गया है, इसे भी यहाँ देखना चाहिए। तिरुक्कुरल प्रथम भाग- तमिल भाषा के प्राचीनतम् ग्रंथों में तीन ग्रंथ ऐसे हैं जो सर्वव्यापी और कालजयी हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं- तिरुवासगम, तिरुमंदिरम् और तिरुकुरल। दूसरे शब्दों में कहें यह तीनों ग्रंथ क्रमश: तमिल संस्कृति (सनातन परम्परा) के हृदय, आत्मा और तमिल जीवन हैं। तुरुकुरल एक प्रवित्र ग्रंथ है। यह भारत के संत तिरुवल्लवर की महान कृति है। जिसके अध्ययन से हम आन्तरिक शांति, समन्वय, स्वास्थ्य, धन, शक्ति, कृपा और शुभकामनाओं का आनन्द उठा सकते हैं।  तिरुकुरल की अर्थ दृष्टि घर, समाज और राष्ट्र के अन्दर शान्ति और सुख को उजागर करती है। इसका आधार देश, समाज, घर के आर्थिक सम्बन्ध से है। इसके अंदर गीता का समन्वय भी दिखाई देता है ।  

              यह भारतवर्ष का वह काल था जब दक्षिण भारत में लोग गलियों, चौराहों और सार्वजनिक स्थलों पर एकत्रित होकर यह चर्चा करते थे कि सत्य और असत्य क्या है? नैतिक और अनैतिक क्या है? जातीय संवेदनाएँ उतनी गहरी नहीं थी। यद्यपि जैन, बौद्ध जैसे सनातन परम्परा के सम्प्रदाय उस समय अपने अस्तित्व में थे, तथापि मनुष्य का मन इतना उदार था कि वह अपने अलावा दूसरे के मत को भी सुनने को तैयार था। तिरुवल्लवर भी अपने समय के सभी धर्मों, सम्प्रदायों से अभिन्न थे।  तिरुवल्लुवर ऋषियों द्वारा स्थापित प्रथमत: भारतीय जीवन के तीन पुरुषार्थों की बात करते हैं- अर्थ, धर्म, काम। उनका मानना है कि यदि मनुष्य इन तीनों को साध ले तो चौथा मोक्ष स्वयमेव सिद्ध होता है। तिरुकुरल में यह तीन भागों में क्रमश: अर्थुप्पल, पोर्तुप्पल और कामाथुप्पल नाम से जाने जाते हैं। उनका यह भी मानना है कि मोक्ष अनुभूति का विषय है न कि चर्चा का।

 वस्तुतः दो हज़ार वर्ष पूर्व तिरुवल्लुवर के हृदय सागर और मस्तिष्क के मंथन के फलस्वरूप निकले हुए सुचिन्तित विचार रत्न इतने मूल्यवान हैं कि बीसवीं शताब्दी के इस भौतिक और अणु युग में भी इनका महत्व और उपयोगिता कम नहीं हुई है और इसमें संदेह नहीं है कि यह आने वाले भविष्य का भी मार्गदर्शन करेगी ।

 तिरुक्कुरल मुक्तक काव्य होने पर भी विषयों के प्रतिपादन में एक क्रमबद्धता लिए हुए है और विषयों की व्यापकता विषय-सूची को देखने से ही ज्ञात हो सकती है। जबकि धर्म-कांड में ईश्वर, स्तुति, गार्हस्थ्य, संन्यास, अध्यात्म, नियति का बल आदि व्यक्तिगत आचारों और व्यवहारों पर विचार किया है। अर्थ-कांड में राजनीति के अलावा जिसके अंतर्गत शासकों का आदर्श, मंत्रियों का कर्तव्य, राज्य की अर्थ-व्यवस्थाए सैन्य आदि आते हैं, सामाजिक जीवन की सारी बातों पर विचार किया गया है।

 धर्म और अर्थ-कांड नीति प्रधान होने पर भी उनमें कविता की सरसता और सौन्दर्य दिखाई देता है।  काम-कांड में संयोग और वियोग श्रृंगार की ऐसी हृदयग्राही छटा है जो अन्यत्र दुर्लभ है। मुक्तक काव्य की तरह जहाँ इसके एक- एक कुरल, अपने में पूर्ण हैं, वहीं सारे कांड एक सुंदर नाटक के चलित दृश्य का भी आनंद देते हैं।

इन नाटकीय दृश्यों में प्रधान पात्र नायक और नायिका हैं और उनकी सहायता के लिये एक सखी और एक सखा का भी उपयोजन हुआ है। पूर्वराग, प्रथम मिलन, संयोगानन्द, विरह-दु:ख फिर पुनर्मिलन के साथ यह सरस कांड समाप्त होता है। दोहा छंद में तिरुक्कुरल का खूब अनुवाद हुआ है। अन्य भाषा-भाषियों को पद्यानुवाद से मूल कुरल को कंठस्थ करने में सुगमता है।  भारतीय भाषाओं और विश्व की कई भाषाओं में तिरुक्कुरल का अनुवाद हो चुका है । विशेषत: कई अनुवाद हिन्दी में हो चुके है। तिरुक्कुरल के प्रसिद्ध टीकाकार श्री परिमेलशगर हैं । 

 ‘कुरुल’ हिन्दी में दोहे के समान दो पंक्तियों का होता है। दस दोहों या कुरुल को मिलाकर एक अध्याय बनता है। इस प्रकार सम्पूर्ण कुरुल 133 चैप्टर तथा 1330 जोड़ों या दो पक्तियों के पदों या छंदों का है। प्रत्येक दोहा अपने आप में एक सम्पूर्ण विचार से गुंथे है। इसमें एक भी शब्द व्यर्थ के नहीं हैं और न ही किसी प्रकार के अर्थ या भाव बोध में बाधा आती है। प्रत्येक अध्याय एक बृहत विचार को अपने अन्दर समेटे है, यथा- मित्रता, स्वतंत्रता, न्याय इत्यादि। इस तरह दस दोहों  ‘कुरुल’ में पूरा एक विचार गुंथा हुआ है।

              सम्पूर्ण काव्य तीन भागों में विभक्त है। प्रथम खण्ड का शीर्षक है -अरम (नीति या आचरण) का प्रयोग तमिल में संस्कृत के   के समान होता है, जो भारीतय पारिवारिक जीवन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही आत्मिक उत्थान का मार्गदर्शन करता है। दूसरा खण्ड- पोरुल (अर्थ) के ‘कुरुल’ न केवल राजकीय अर्थ व्यवस्था बल्कि रोयल्टी, संसद , राजनीति और एलाएन्स की बात करते हैं । तीसरे खण्ड में काम (प्रेम) की बात आई है , जिसमे विवाह, पारिवारिक जीवन, दाम्पत्य प्रेम का वर्णन आता है। इस प्रकार तिरुकुल आदर्श और नैतिकता की पुस्तक है। इसका तमिल साहित्य में विशिष्ठ स्थान है। इसके अन्तर्गत नैतिकता की विभिन्न ऊँचाइयों, आत्मिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान, पूर्ण स्वास्थ्य, अर्थ और कामयावी के विभिन्न रास्तों का वर्णन है। यह ग्रंथ एक तरह से परिवार, माता, पुत्र, बच्चे, श्रमिक, शिक्षक, राजनेता, कलाकार और ग्रामीण सभी के लिए समान रूप से उपयोगी है।

              प्रथम खण्ड में तिरुवल्लुवर जी ज्ञान-अज्ञान, नैतिकता-अनैतिकता की बात करते हैं। जीवन में एक चरित्र और व्यवहार की शर्तों की बात भी सामने रखते हैं। पहले दस छंदों में ईश्वर की प्रार्थना की गई है। ईश्वर से अटूट सम्बन्धों की बात और ईश्वर को शान्ति का आधार, प्रसन्नता का घर और ज्ञान का भण्डार बताते हैं। संसार के सभी ज्ञान ईश्वर में समाप्त हो जाते हैं। जीवन का लक्ष्य क्या? उत्तर में जन्महीन मृत्यु, दर्द और पीड़ा, पुनरागमन के बन्धन से मुक्ति है और इसका प्राप्ति ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण पर ही सम्भव है। संसार में उनसे महान कोई नहीं है जिन्होंने इस संसार को त्याग दिया है। वे दोनों प्रकार के संसार को जानते हैं जिसमें ईश्वर प्राप्ति में अनेक कठिनाइयाँ हैं और शरीर, मन,बुद्धि का असहनीय कष्ट भी। वे उस संसार में जीते हैं जो शांति और आंतरिक आनन्द  होता है। पंचेन्द्रियों को बस में करने का अर्थ होता है, ईश्वर साक्षात्कार का प्रथम चरण। यह वह बीज है जो स्वर्ग में फूल बनता है। योगी जो इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, सचमुच में वही राजा होता है। शेष संसार दास है। तिरुववल्लुवर कहते हैं, हमें अच्छे और बुरे के पचड़े में ज्यादा नहीं पड़ना चाहिए। अच्छाई मन की शुद्धता है।

              पारिवारिक गुण-धर्म के बारे में बीस अध्यायों में लिखते हैं जो उपदेश सम्पूर्ण संसार के लिए उपयोगी हैं। परिवार, व्याह, संतान, सत्कार, मीठी वाणी, कृतज्ञता, आत्मसंयम, उत्तम चरित्र आदि के बारे में स्पष्ट निर्देश देते हैं। योगी का सच्चा कार्य ईश्वर सेवा और साक्षात्कार है। एक गृहस्थ जो धनार्जन करता है, उसका कतर्व्य है कि वह योगी भी हो। गृहस्थ को सदा आत्मनिरीक्षण करते रहना चाहिए। गृहणी पति की अच्छी कोषागार होती है ,तो बच्चे अच्छे खजांची।

              उनका मानाना है कि जो व्यक्ति बात-बात में अपमानित होना महसूस करता है और दर्द, कष्टों को सहने में अक्षम होता है, वह ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकता। अनादर्श और अनुपयोगी बातें मूर्खता की निशानी हैं। ध्यान रखना चाहिए कि यदि एक बार उदारता जीवन से चली गई तो उसका स्थान संकीर्णता अपने आप ले लेगी। दूसरे को प्यार करो। संसार एक दिन तुम्हारे कदमों में होगा। तिरुवल्लुवर तेरह अध्यायों में संन्यास के बारे में लिखते हैं। सार रूप में वे कहते हैं कि जो व्यक्ति आज सफल दिखाई देता है, वह अपने जीवन में अति कमजोर, निरीह और दुर्बल रहा है और उस समय अपने से सम्पन्न तथा उर्जावान के सामने निरीह रहा है। उसे दया और प्यार बाँटना कभी नहीं भूलना चाहिए। मनुष्य जैसा दिखता है उसे वैसा नहीं मानना चाहिए बल्कि वह कैसा कार्य करता है, यह उसकी सही पहचान होती है। एक सीधा तीर मनुष्य के सीने में दर्द पैदा करता है किन्तु एक तिरछी बासुरी मन को अपने स्वरों से आनन्दित करती है। तिरुवल्लुवर सदा इस पक्ष में है कि मनुष्य को परोपकार में जीना चाहिए तथा दूसरे की प्रसन्नता के लिए काम करना चाहिए। वे दिखावे के आदर्श के लिए दु:ख और कष्ट के पक्षपाती नहीं हैं। उनके अनेक कुरुल में  संस्कृत, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषायों के संतों के भाव  सामान रूप से दिखाई देते जो भारतीय एकात्मता के मूल रहस्य हैं 

तुरुवाल्लुवर के कुछ सूत्र जो आज तमिल और हिंदी या अन्य विषयों को लेकर हो रहे संवाद भारतवर्ष की एकात्मता के बाधक हैं  उनका समाधान देते हुए कहते हैं - ‘यदि आप पूछतें है कि सत्य क्या हो सकता है तो हम कहेंगे कि दुष्टता रहित, दुर्भाव रहित वाणी ही सत्य है।’ (291) ‘यदि सत्य की शुद्धता होगी तो उसका अर्थ होता है कि वह मिश्रित सत्य नहीं होगा। सत्य असत्य से ही अनदेखा किया जाता है। या किया जा सकता है।’ (292) ‘अहिंसा सभी जीवन मूल्यों का लक्ष्य है। किसी भी जीव की हत्या पाप है।’ (321) ‘आप आवश्यक हो तो अपने जीवन को त्याग दे किन्तु दूसरे की हत्या न करें।’ (327)  ‘ईश्वरीय अधिष्टान के प्रति पूर्ण निष्ठा और सर्वस्व त्याग ही इस संसार के पुनरागमन से रोक सकती है।’ (331) ‘जो दिन तुम्हे बहुत ही विश्वसनीय और सत्य दिखता है वह एक चाकू के समान है और वह तुम्हारे जीवन के एक-एक भाग को धीरे-धीरे प्रतिदिन काट रहा है।।’ (384) ‘यह आत्मा इस शरीर से उसी  तरह एक दिन उड़ जायेगा जिस तरह पिजड़ या अण्डे से एक दिन पंछी उड़ जाता है।‘ (338) ‘मृत्यु जहाँ गहरी निद्रा है तो जन्म उस गहरी नीद से जागरण है।’ (339)

मुझे विश्वाश है संत तुरुवल्लुवर की दिव्यात्मा और उनके ‘कुरुल’ हमारे उन राजनेताओं और  तथाकथित लिबरल और सेक्युलर हिन्दुओं को अवश्य दृष्टि , मति और गति देंगे जो आज भी उत्तर-दक्षिण भूगौलिक रचना और तमिल -संस्कृत -हिंदी भाषाओं को लेकर राष्ट्र को ही नहीं तो विश्व को भी भ्रमित करने में सफलता और संतोष प्राप्त करने का भ्रम पाले हुए हैं  

Thursday, 27 February 2025

‘अज्ञेय’ ‘अज्ञेय’ की दृष्टि में

 

 

 ‘अज्ञेय’  ‘अज्ञेय’ की दृष्टि में

      

किसी का सत्य था,

मैंने संदर्भ में जोड़ दिया ।

कोई मधुकोष काट लाया था,

मैंने निचोड़ लिया ।

 

किसी की उक्ति में गरिमा थी

मैंने उसे थोड़ा-सा संवार दिया,

किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था

मैंने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया ।

 

कोई हुनरमन्द था,

मैंने देखा और कहा, ‘यों!’

थका भारवाही पाया -

घुड़का या कोंच दिया, ‘क्यों!’

 

किसी की पौध थी,

मैंने सींची और बढ़ने पर अपना ली।

किसी की लगाई लता थी,

मैंने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली ।

 

किसी की कली थी

मैंने अनदेखे में बीन ली,

किसी की बात थी

मैंने मुँह से छीन ली ।

 

यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ,

काव्य-तत्त्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ ?

चाहता हूँ आप मुझे

एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ें ।

पर प्रतिमा..अरे, वह तो

जैसी आप को रुचे आप स्वयं गढ़ें ।     

(नया कवि आत्म-स्वीकार : अज्ञेय)

 

अज्ञेय का बचपन-  अज्ञेय बचपन में कैसे थे - “बचपन में हठी ऐसे रहे कि अपना माथा पक्का करने के लिए कुर्सी की पीठ पकड़कर बार-बार यों उससे टक्कर मारते हुए तब माथा पक्का किया। इस पक्के माथे से उन्होंने मास्टर होकर न जाने कितनों को टक्कर मारी और पक्के सिद्ध हुए। नालंदा की अमराई में एक डाक-बंगला था- हीरानंद शास्त्री उसमें रहे थे- अज्ञेय का शरारती बचपन वहाँ भी रंग लाया।”

“नालंदा में ही एक पुस्तक ऐसी मिली कि उसमें ‘बारूद’ बनाने की विधियाँ भी दी हुई थीं और उसी की सहायता से धीरे-धीरे गंधक और शोरा सब किस्तों में खरीद कर बारूद वगैरह बनाना शुरू किया। घर पर भोजन बनाना-मिठाइयाँ बनाना-पाक विद्या में गति प्राप्त की तथा आतिशबाजी बनाना भी सीखा।”

 

“ सन् 1921-22 का गाँधी युग। गाँधी जी का सत्याग्रह आंदोलन चला। इस आंदोलन का बालपन पर प्रभाव पड़ा और अँग्रेजी शिष्टाचार के प्रति ‘गुड मार्निंग, गुड इवनिंग’ के प्रति विरोध के बीज पनपे। लेकिन उनके घर तो पश्चिमी अदब-कायदे के अँग्रेजी दाँ लोग भी आते थे- उनसे ‘नमस्कार’ शुरू किया। गाँधी के प्रभाव में विदेशी कपड़ों का बहिष्कार। अज्ञेय ने बालपन से ही घर पर अपने विदेशी कपड़ों की होली जलाई।”

 

अज्ञेय के स्वयं के शब्दों में -“ लड़ाई-झगड़ा करके स्कूल छोड़कर चला आया, अलग-अलग प्रदेशों में रहने के कारण भाषा बदलती रही। बोलना लखनऊ में सीखा। फिर कश्मीर चले गए और फिर बिहार।”

 

 “इन तरह हिन्दी उनके लिए सीखी हुई भाषा रही। दक्षिण में वे कोरीविडी तथा ऊटकमण्ड में रहे- अँग्रेजी सीखी। पढ़ाई कम हुई इस तरह गढ़ा ज्यादा। इसका लाभ यह हुआ कि ‘भ्रष्ट भाषा’ से दूर रहे। आकर-ग्रंथों से भाषा का संस्कार पाया।”

“ पिता का कड़ा अनुशासन भी जीवन-भर काम आया। पिता से पुत्र की टकराहट भी कम नहीं रही। पिता दौरे पर जाते तो उनके साथ कभी-कभार तो अकेले अज्ञेय जाते। अकेले घूमने की प्रवृत्ति और अपनी आजादी का आनंद। हर जगह वे नारद-भाव से घूमे-रमे और रहे। आठ भाई, दो-बहिनें, माँ का स्वास्थ्य खराब तो घर का हर काम अकेले करना ही था। अज्ञेय में मौत के प्रति 'सखा-भावÓ की मनोभूमिका का रहस्य भी यही रहा कि वे अकेलेपन में रमे रहे।”

 

“ बचपन 1911 से 15 तक लखनऊ में रहे और तुतलाना हिंदी में शुरू किया। संस्कृत-मौखिक परंपरा से शिक्षा की आरंभ 1915 से 1919 में स्कूली शिक्षा में पिता हीरानंद शास्त्री को विश्वास न था। घर पर ही संस्कृत-अँग्रेजी-फारसी की शिक्षा मिली।”

“कुल परंपरा से मेरी पढ़ाई रटन्त से आरंभ हुई : गायत्री-मंत्र और अष्टाध्यायी के साथ-साथ मुझे अपने वयोवृद्ध गुरु की स्नेह भरी पंडिताऊ गालियाँ भी अभी तक याद हैं। लेकिन प्रबुद्ध-चेता पिता ने ‘स्वौजसभौट्छष्टाभ्यांभ्यस् डोसाम्सडिओस्मुप’ की रटाई के साथ-साथ अँग्रेजी की मौलिक शिक्षा भी आरंभ करवा दी और अक्षर ज्ञान से पहले ही मैं दो-ढाई सौ अँग्रेजी शब्द सीखकर वह भाषा वैसे बोलने लगा था, जिसे ‘फर्र-फर्र’ अँग्रेजी कहते हैं।

 

अज्ञेय नाम कैसे पड़ा- “ सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जन्मजात विद्रोही और देशभक्त क्रांतिकारी। उनके बचपन का एक नाम ‘सच्चा’। इस नाम को वे ‘सत्य’ नाम से सुरक्षित रखने में कभी नहीं चूके। लेखों-टिप्पणियों के नीचे कभी ‘वा’ कभी ‘वत्स’ कभी ‘वत्सल’ कभी ‘वात्स्यायन’। क्रांतिकारी-जीवन में वे छिपकर कभी ‘साइंटिस्ट’ कभी ‘मुहम्मद बख्श’ कभी ‘श्री गजानन’ कभी ‘डॉ. अब्दुल लतीफ’ कभी ‘समाज द्रोही नंबर’ आदि न जाने कितने छद्म नामों से लिखते रहे। ललित-निबंध ‘कुट्टि चातन्’ नाम से लिखे और रचनात्मक साहित्य-जैनेन्द्र कुमार द्वारा दिए गए नाम ‘अज्ञेय’ से। पत्रकारिता में हमेशा ‘सच्चिदानंद वात्स्यायन’ या ‘स.ही. वात्स्यायन’ का प्रयोग किया। अज्ञेय एक उन्मुक्त-विशाल किरीटी-तरु की तरह स्वाधीन जिए और जीवन-भर ‘स्वाधीनता’ को जीवन का सर्वोच्च मूल्य माना। इस तरह वह बाल-विद्रोही, सिपाही-विद्रोही, शिल्पी-चित्रकार, संपादक-आलोचक, व्याख्यता-राजनीतिक चिंतक, कर्मठ-श्रमरतमानक, प्रकृति और सागर के अद्भुत प्रेमी, चित्रकार, साहित्य के इतिहास-समीक्षक, भाषा के प्रेमी, यायावर सप्राण छाया-कल्पक न जाने क्या-क्या रहे।”

 

              अज्ञेय का क्रांतिकारी जीवन- “विद्यार्थी काल से ही वह 'क्रांतिकारी आंदोलन’ का अंग रहे। उनका क्रांतिकारियों से सम्पर्क  रहा। कॉलेज में सहपाठियों से राजनीति पर चर्चा और नीति बनाकर क्रांति से जुड़ने की मानसिक तैयारी। उन दिनों लाला लाजपतराय का पंजाब में व्यापक प्रभाव था। युवाओं में भगतसिंह की प्रसिद्धि। उनसे प्रभावित होकर विद्यार्थियों ने एक दल बनाया। गुप्त कार्य शुरू किए। पर्चें भी छापकर बाँटना प्रचार का अंग रहा। क्रांति होनी चाहिए, इस मनोभाव के कारण एक दिन ऐसा आया कि भगतसिंह दल के कुछ सदस्यों से परिचय हो गया। ये सदस्य उन दिनों ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन या एसोसिएशन’ के सदस्य नाम से जाने जाते थे। सदस्यगण उन दिनों भगतसिंह को जेल से छुड़ाने की योजना बना रहे थे। यह बड़ा काम था लेकिन बेहद कठिन जोखिमों से भरा। भगतसिंह को छुड़ाकर लाने के बाद छिपाकर रखने की व्यवस्था बड़ी चुनौती थी-

“ इन सबके सिलसिलें में उन लोगों की बात मेरे साथियों से और मुझसे हुई थी और उन्हीं के द्वारा फिर मेरा आजाद (चन्द्रशेखर आजाद) से परिचय हुआ। भगवतीचरण बोहरा से परिचय हुआ। और जो भगतसिंह को छुड़ाने की योजना थी उसका निर्देशन चंद्रशेखर आजाद को सौंपा गया था। वही योजना बना रहे थे और उन्होंने मुझे काम सौंपा था। उस ट्रक को चलाने का जिसमें भगतसिंह को छुड़ाकर ले जाने का प्रयत्न किया जाएगा।”

 

“अज्ञेय की गिरफ्तारी तो अमृतसर में हुई। वे वहाँ पर तरह-तरह के छद्म वेश धारण करके रहे। जहाँ गिरफ्तारी हुई वहाँ वे मुसलमान कारीगर बनकर, इलेक्ट्रीशियन का रूप धारण करके गुप्त वास करते थे। इलेक्ट्रीशियन बनकर अज्ञेय सुबह घर से निकल जाते और शाम ढले घर वापस आते। कभी-कभीर अमृतसर में एक प्रसिद्ध दुर्गामाता मंदिर के पास भी समय गुजारते। उसके बाद जलियाँवाला बाग की गली में एक कमरा लिया। वहाँ ‘साइन बोर्ड पेंटर’ बनकर रहे-और कलाकर अज्ञेय ने कुछ साइन बोर्ड पेंट किए भी। थोड़े से पैसे भी कमाए। शहर के बाहर ‘इलेक्ट्रीशियन’ बनकर और शहर में दूसरी जगह ‘साइन बोर्ड पेंटर’ बनकर। कुछ समय बाद एक मस्जिद में भी रहे और इमाम से अंतरंग होकर। वहाँ रहकर खाली कारतूसों तथा खराब हथियारों को ठीक कर कारखाना चलाने का मन भी बनाया-पिस्तौलें, रिवाल्वरें इकट्ठी भी की गईं।”

 

रचनाकार अज्ञेय- “ जिन पाठकों ने उनकी कहानियाँ, कविताएँ-निबंध कभी भी पढ़े हैं- वे जानते हैं कि अज्ञेय अग्निधर्मा-आकाशधर्मा सर्जक और चिंतन का नाम है- उनकी सार्वजनिकता कहीं भी छिपी नहीं रह सकती- चाहे वे ‘ शेखर : एक जीवनी’ जैसा उपन्यास लिखे-या विद्रोही तेवर की कहानियाँ-कविताएँ। उन्होंने कविताओं में अपना ‘ आत्मपरिचय’ दिया है। ‘इस तरह मैं कवि हूँ, आधुनिक  हूँ, नया हूँ। यह भी कहा है- ‘मैं वह धनु हूँ जिसे साधने में प्रत्यंचा टूट गयी है स्खलित हुआ है बाण, जदपि ध्वनि दिग-दिगंत में फूट गयी है।’ अज्ञेय का ‘हियहारिल’ भी अनथक पंखों की चोटों से विचारों की हलचल उत्पन्न करता रहा है।”

अँग्रेजी में भी कुछ हलकी कविताएँ और तुकबंदियाँ रट ली थीं- हमारा दुर्भाग्य था कि तब हिंदी में बाल-साहित्य लगभग नहीं था। तो अँग्रेजी तुक से प्रेरणा पाकर अंग्रेजी के सहारे ही लोगों को चिढ़ाने वाली कुछ तुकबंदियाँ भी की थीं और एक-आध बार बड़ों की इस अवमानना के कारण दंड भी पाया था। स्पष्ट है कि इन्हें कविता नहीं का जा सकता, लेकिन ‘वागर्थसम्पृक्ति’ के ज्ञान के बाद अगला कदम तो छंद-परिचय ही है।” (आत्मपरक मेरी पहली कविता, पृ. 21) चार वर्ष के अज्ञेय ने ‘नाचत है भूमिरी’ गायी जिसमें भँवरी ही नहीं सारी भूमि नाच रही है। ताल और छंद पर खुद भी नाच रहे हैं। सृष्टा की शक्ति को, शब्द की शक्ति को पहचान लिया।

 

“ वे कभी यह नहीं भूल सके कि शब्द शक्ति का रूप है और शब्द का सार्थक प्रयोग सिद्धि। छठे वर्ष की बात है बहुत कुछ जाना-सीखा। कविता से भी परिचय बढ़ा और ग्यारहवें वर्ष में एक और टेनीसन की कविता से परिचय हुआ तो दूसरी ओर असहयोग के पहले दौर से और तत्कालीन ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ को भारत यात्रा के बहिष्कार के आंदोलन से।” इसी समय स्वामी दयानंद की गंगा को लक्ष्य करके लिखी गई कविता-उद्बोधनात्मक पढी-

‘गंगा उठो कि नींद में सदियाँ गुजर गयीं,

देखो तो सोते-सोते ही बरसें किधर गयीं।’

 

 वे लिखते नहीं - “इन सबकी सम्मिलित प्रेरणा से मैंने भी गंगा की एक स्तुति लिखी थ जो अनंतर गंगा मैया को ही भेंट चढ़ गयी। वह मुझे स्मरण होती तो पहली कविता के नाम पर कदाचित् उसी का उल्लेख होता। किंतु एक तो यह अँग्रेजी में थी, दूसरे कविता याद न होने पर भी इतना तो याद है कि इसके छंद पर, भाषा पर, शैली पर, टेनीसन की गहरी छाप थी।” सन् 1919 में पिता के साथ नालंदा आए। इसके बाद 1925 तक पिता के साथ रहे। शास्त्री जी नालंदा से पटना आए तो काशी प्रसाद जायसवाल, राखालदास बनर्जी से परिवार का परिचय हुआ। यहीं अज्ञेय के मन में अँग्रेजी से विद्रोह की भूमिका तैयार हुई। राखालदास के संपर्क में आकर बंगला सीखी और बंगला की तमाम पुस्तकें पढ़ डालीं।

 

“ सन् 1921 से 25 तक ऊटकमंड में रहे। सन् 1921 में उडिपी के मध्वाचार्य के द्वारा इनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। इसी मठ के पंडित ने छह महीने तक तमिल तथा संस्कृत की शिक्षा दी। यही वह समय है जब ‘भणोत्’ से ‘वात्स्यायन’ में परिवर्तन हुआ। इसी मठ में पहली बार गीता का अध्ययन किया और अन्य धर्मों के ग्रंथ पढ़े। टेनीसन के साथ वर्ड्सवर्थ, शेक्सपियर, लांगफेलो, हाल्ट हिटमैन गोडस्मिथ, तुर्गनेव, ताल्स्ताय को पढ़ा। अज्ञेय ने लिखा है- “ इन्हीं दिनों पिता के साथ ऊटकमण्ड चला गया। मैं स्वभाव से ही एकांतप्रिय था और परिस्थितियाँ भी अकेला रखती आयी थीं- यह ऊटकमण्ड से तीन मील दूर फर्नहिल नामक स्थान के एक बँगले में रहकर तो मानो एकांत में डूब ही गया-यद्यपि प्रकृति के स्पंदन भरे एकांत में, जिससें इस बात की चिंता नहीं थी कि परिवार के बाहर कोई भी हमारा एक शब्द भी समझने वाला न था, न हम किसी का एक भी शब्द समझते थे। इसी एकांत काल में मैंने पहले चित्र-संग्रह करना शुरू किया, मुख्यतया अवनीन्द्रनाथ ठाकुर और उनके नव-बंग संप्रदाय की शिष्य परंपरा के चित्र-और उनके एलबल बनाये। यहाँ सहसा पाया कि मैंने एक हस्तलिखित पत्रिका निकाल दी है-‘आनंद बंधु’ और इस पत्रिका में पहले पृष्ठ पर कविता से लेकर अंत में संपादकीय के बाद चित्र परिचय तक सब कुछ था- जैसा कि उससे पहले भी स्वर्गीय महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादकत्व में ‘सरस्वती’ में हुआ करता था । पहले अंक में तो कविता के नाम पर गुप्त जी की ‘नीलाम्बर-परिधान हरित तट पर सुंदर है’, वाली स्वदेश वंदना दी गयी थी, पर दूसरे अंक से समझ में आने लगा कि इस प्रकार उद्धृत सामग्री देना संपादन कला के विरुद्ध है। (आत्मपरक, पृ. 22)

 

आपके मन में प्रश्न उठ सकता है कि हिन्दी कविता के प्रति राग या चस्का या आकर्षण कैसे पदा हुआ? इसका उत्तर अज्ञेय से ही सुनिए-“इन्हीं दिनों गुप्त जी की कविता के अतिरिक्त मुकुटधर पाण्डेय, श्रीधर पाठक, हरिऔघ, रामचरित उपाध्याय और आरा के प्रेमयोगी देवेन्द्र की कविता से परिचय हुआ। इस सबसे छंदों के बारें में कौतूहल बढ़ा। रोला और वीर तो हिन्दी के अतिपरिचित छंद हैं, जिनसे कौन हिंदी कवि बचा होगा, और गुप्त जी (मैथिलीशरण गुप्त-अज्ञेय के गुरु-स्थानीय)की कृपा से हरिगीतिका और गीतिका पर भी हाथ साफ करने का साहस हुआ। लेकिन कुछ संस्कृत छंदों ने भी आकृष्ट किया। ‘हरिऔध’ की यशोदा का विलाप पढ़कर मैंने मालिनी छंद में कई एक विलाप लिखे- ‘राधा का प्रवंत्स्यपतिका, वीर-वधु का हत्यादि।’ मंदाक्रांता तब उतना अच्छा नहीं लगा था जितना बाद में लगने लगा, पर 'शिखरणी, पर मैं मुग्ध रहा विशेषकर पिता जी के 'महिम्नस्तोत्रÓ के कारण। लेकिन ये छंद कभी मुझसे सधे नहीं, और पीछे बरवै के आकर्षण में अपनी असफलता का दु:ख भी भूल गया।”

 

पिता जी ‘हिंदुस्तानी’ से चिढ़ते थे। वे संस्कारवान हिंदी के पक्षपाती थे और पिता के इन विचारों का प्रभाव अज्ञेय की मानसिकता पर जीवनपर्यंत रहा। एक गद्य-पद्यमयी रचना पर रायबहादुर हीरालाल ने अज्ञेय को पुरस्कृत किया। शब्द को ब्रह्म मानने वाले अज्ञेय की कविता ‘शब्द और सत्य’ के साथ बात समाप्त करता हूँ-

 

“ यह नहीं कि मैं ने सत्य नहीं पाया था

यह नहीं कि मुझ को शब्द अचानक कभी.कभी मिलता है ,

दोनों जब-तब सम्मुख आते ही रहते हैं।

प्रश्न यही रहता है ,

दोनों जो अपने बीच एक दीवार बनाये रहते हैं

मैं कब, कैसे, उनके अनदेखे

उसमें सेंध लगा दूँ

या भर कर विस्फोटक

उसे उड़ा दूँ।

 

कवि जो होंगे हों, जो कुछ करते हैं, करें,

प्रयोजन मेरा बस इतना है ,

ये दोनों जो

सदा एक-दूसरे से तन कर रहते हैं,

कब, कैसे, किस आलोक-स्फुरण में

इन्हें मिला दूँ-

दोनों जो हैं बन्धु सखा, चिर सहचर मेरे।

(दमोती बाग नयी दिल्ली 15 जून, 1957)

 

डॉ उमेश कुमार सिंह

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