आदरणीय यह लिख किसके लिए रहे हैं। परिस्थितियों में परास्त होना भारतीय मेधा का काम नहीं।
करुणा ही अरुणा की जननी है। सूर्य तप कर प्रकाश देता है। ब्राह्मण भिक्षु बन जीवन को सार्थक करते हुए ही जगत की निस्सारत को इंगित करता है।
शूद्र और दलित जाति नहीं हमारी सामूहिक आकांक्षा के रौंदें गये वह पिंड हैं जहां ब्रम्ह और ब्रह्मांड बसता है।
विद्या संतुलन का नाम है। संतोष संत की पह चान है। परोपकार और धैर्य संस्कृति का अभिषेक है।
नेतृत्व पर विश्वास अटल होगा जब, पापों का घट फूटेगा तब।
अब राम, कृष्ण,बुद्ध, महावीर, कपिल,कणाद नहीं आने वाले हैं।
रामकृष्ण, विवेकानंद, महर्षि अरविन्द भी नहीं।
संदेश साफ है, रास्ता हमारे आत्मविश्वास, राष्ट्र की आकांक्षा,, और आत्मवत् सर्वभूतेषु के बोध, से होकर जाता है।
नकारात्मकता तो सर्वत्र अंधेरा बन फैली है, अरुणोदय बन निशा तिमिर बेधन करें।
पूरब की लाली दक्षिण तक बिखेर दें।
सब कुछ अपनी आंखों के सामने तो ऋषि, तपस्वी,साधक भी नहीं देख सके।
सुप्रभातम्
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