Wednesday, 28 January 2026

सिंदूर लगाया है तो प्रणाम तो करना है। माने तो महाबली, माने तो रामभक्त, माने तो राष्ट्रभक्त। न मानें तो भी नायक तो है ही। 

रुचि से, अरुचि से, भय से, दंड से, दान से, भेद से मानना नियति है। अर्जित सम्मान गांडीव है। परशुराम है। वर्तमान का वैश्विक नायक है। 

मानो तो साथ है अन्यथा अकेला हाथ है।

मानने से देश को दिशा मिलेगी। राष्ट्र का तीर्थ जिंदा रहेगा। भारत माता जगद्गुरू रहेगी। सांस्कृतिक राष्ट्र, वादों से मुक्त चिर पुरातन नित्य नूतन जीवन मूल्यों को संरक्षित करेगा। ऋषियों का कल्प संकल्प के साथ भविष्य बनेगा।

ब्राह्मण तो ब्रह्म में रमण करता है। उसे राम ही प्रिय हैं। वह जाति नहीं तप है। वह ऋत का वाहक है। वह दर्शन देता है। अध्यात्म को खेता है। वह संस्सृत का नेता है।

 वह समदर्शी को भजता है, समदर्शी रहता है। वह संतत्प नहीं। वह संत हैं। संतत्व को जीता है।समाज का मार्गदर्शन करता है। 

वह राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति करता है। ब्राह्मण-ब्राह्मण है। वह अग्नि- होता है। अग्नेमय सुपथा राये.... (ईशावास्योपनिषद)

29/01/26
उमेश कुमार सिंह 

क्या इतिहास दुहराया जा रहा है

क्या इतिहास दुहराया जा रहा है?
मंडल -कमंडल। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह!
अब यूजीसी+ कमंडल!!

दरअसल यह एक दिन की भड़ास नहीं है। सरकार का पलड़ा सामाजिक न्याय के साथ जाति के बजन और वोट के जतन में बराबर एक तरफ झुकता आ रहा है।

जातियां सरकार बनाती हैं तो उपकृत होना स्वाभाविक है।

किंतु इस बार कुछ तो चूक हुई। एसी-एस टी के नाम पर अभी भी हिन्दू एस सी,एस टी की तुलना में धर्मांतरित ईसाई ज्यादा लाभ ले रहे हैं। एस सी एस टी यह ढुलमुल नीति देख अपना धर्म बदलकर ईसाई बन रहे हैं।

 नियम अपनी जगह है। किस पर लागू होगा स्पष्ट है। किंतु व्यवहार में हिन्दू मतांतरित हो रहा है।

दूसरी यह व्याधि ओबीसी को जोड़ कर आ गई है। इसमें अब सभी मत पंथ के ओबीसी आयेंगे। हमारी बात आप समझ रहे हैं ।
 
यह एम बाय समीकरण को पुष्ट करेगा। लाभ किसको कितना मिलेगा पता नहीं। शिकायतों का क्या होगा?समय बतायेगा।

किंतु हिन्दू जिस तरह सवर्ण -अवर्ण के नाम पर, अगड़ा, पिछड़ा के नाम पर, अनारक्षित -आरक्षित के नाम पर बंटेगा, सनातन को ही हानि पहुंचायेगा। 

सरकारें बन बिगड़ सकती हैं, किंतु जातीय लाभ-हानि भविष्य तो छोड़िए वर्तमान में भी घातक है।

इस पर सरकार 'भय गति सांप छछूंदर केरी।' की स्थिति में आ गई है।

पता नहीं सरकार के सलाहकार कौन हैं? शिक्षा के क्षेत्र में कितने राष्ट्रीय विचारों को लेकर संगठन कार्य कर रहे हैं, क्या उनको विश्वास में नहीं लिया गया। विद्यार्थी परिषद की अपील तो यही बता रही है।

रा शिक्षा निति - 2020 बनी थी तब कहा गया था इतने - इतने लोगों से पूछा गया था।अब क्यों राय नहीं ली गई?

कितने विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, छात्रों से राय ली गई? कुलपतियों को भूल जाइये। वे तुलसी बाबा के अनुसार - प्रिय बोलने में विश्वास रखते हैं? क्या शैक्षणिक संगठनों के अध्यक्ष -महामंत्री भी प्रिय बोलने बाले -
सचिव,बैद, गुरु बन गये हैं?

हो सके तो आरक्षण का लाभ ले रहे या उसकी परिधि में आ रहे संगठन प्रमुख,नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रेट्स अवश्य विचार करें।

 देश सुरक्षित है तो हम सब सुरक्षित हैं, अन्यथा उदाहरण आंखों के सामने हैं।
अति उत्साह गाय बनाते -बनाते गधा न बना दे।

27/01/26

चिंतन

मित्रवर!

आदरणीय मोदी जी और शाह जी देश के लिए वह सब कर रहे हैं , जो चाहिए किंतु टीम और तंत्र भी उसी चिंतन का होना चाहिए। 

जनता का सम्प्रेषण दिशा देगा। पूर्णता तो देवताओं में भी नहीं होती।तभी तो अंशावतार कहा जाता है। कर्ता तो एक ही दीनानाथ हैं। 

काल किसी को क्षमा नहीं करता। हां कभी कभी सौ दो सौ साल भी दिशा पकड़ने को कम लगते हैं।
आरक्षण का युक्तियुक्तकरण आवश्यक है 🙏 

प्रतिभा को यह कह कर नहीं दबाया या उसके अधिकार से बंचित किया जा सकता कि उसके पुर्खों ने किसी वर्ग,जाति पर अत्याचार किये हैं तो अब उन्हें अत्याचार सहना होगा।

समानता और समरसता का यह मार्ग भी सिंहावलोकन की अपेक्षा रखता है।

यह ज्योतिष का कौन-सा आचार्य है जो समाज सेवकों को बताता है कि आज जिसे आप सवर्ण कह रहे हैं , वह कल राजा,आतातायी, गरीबों पर अत्याचार करने वाला था।

और जो आज दलित के नाम पर चार पीढ़ियों से आरक्षण ले रहे हैं,  वे हमारे तथाकथित अत्याचारी पुरखों से कुचले गये थे।

पुनर्जन्म का भारतीय दर्शन आत्मा की अमरता के परिप्रेक्ष्य में कहता है , न कि जाति विशेष में पूर्व जन्मों का चिट्ठा बताता है।

फिर यह सवर्णों को जिन्हें संविधान निर्माताओं/ समाजसेवकों ने अघोषित उपाधि दे डाली कहां से जन्म-जन्मांतर का खाका प्राप्त किए हैं।

कहने को पंचवर्षीय योजनाओं का विचार है। किंतु क्या वह केवल भौतिक वस्तुओं के निर्माण और संग्रह के लिए ही है। गुण दोष के आधार पर आरक्षण, चुनाव प्रणाली,मुफ्त राशन वितरण, मतांतरित व्यक्तियों के आरक्षण के सम्बंध में पुनर्विचार का अवसर नहीं देता?

तथाकथित समाज के आर्थिक रूप से प्रतिभावान युवा आज दर -दर रोजी रोटी को भटक रहे हैं! कार्यालयों में अपने से कम योग्य व्यक्ति के सामने अपमानित हो नौकरी कर रहे हैं। चयन से लेकर प्रमोशन तक जाति,वर्ग में पैदा होना एक मनुष्य के लिए वरदान बना दिया तो दूसरे को श्राप!! यह प्राकृतिक न्याय नहीं है। 

सतहत्तर साल में सुधार नहीं हुआ।केवल सत्ता पक्ष विपक्ष को गाली दे,समय पास करे, तंत्र लूट खसोट करे और यह सवर्ण का एजेंडा खड़ा कर हिंदुओं को बांटे। वाह रे! नीति निर्माताओं!! 

सुधरो, समझो, वोट और सत्ता की खुमारी से बाहर आकर सड़ांध मार रहे कैंसर की शल्य चिकित्सा करो। अन्यथा आज जैसे आप अपने पूर्व के सत्ताधारियों को नकारा साबित कर रहे हैं कल आपको भी यही उपाधि मिलेगी।

 सत्ता देश के लोक मंगल के लिए है और इसमें संतों, आचार्यों, और समाजों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

यह विचार आज अपेक्षित है। समाज स्वार्थ से ऊपर उठे यह विचार होना चाहिए।
शेष जिसकी जैसी मर्ज़ी। हरि ओम् तत्सत 🕉️🙏

संतों की विरासत

संतों की विरासत को जीवित रखने के लिए यह आवश्यक है कि 'भारतीय ज्ञान परंपरा' को शिक्षा के हर स्तर पर (व्यक्ति, परिवार, कुटुंब, राज्य और राष्ट्र आदि के साथ ) साझा किया जाए ।

 युवाओं में स्व’ (आत्म-बोध) और अतीत के प्रति गौरव का भाव जागृत हो । पश्चिमी अंधानुकरण के स्थान पर धर्म, नैतिकता और वैज्ञानिक चेतना के बीच संतुलन बनाया जाए । 

कुटुम्ब भाव सुगन्धित-सुवासित रहे।सामाजिक समरसता व्यवहार से आये न कि धन, पद और प्रतिष्ठा के संतुष्टीकरण से ।

 संतों का सत्संग सतत चले, मठ, मंदिर और धर्मशालाएं धार्मिकता के साथ सांस्कृतिक केंद्र बने ।

 मनुष्य की दृष्टि वैश्विक हो । स्त्री, बाल, वृद्ध सुरक्षित और अनुकूलित रहें। साहित्य का विकास परम्परा के अन्वेषण के साथ हो। गौवंश, नदियाँ और जलस्रोत पवित्र और प्राणमय बने रहें। सरस्वती अपने सभी स्वरूपों में प्रसन्नवदना रहे । 

सत्ता निरहंकारी हो। संत परोपकारी हों। तभी बोध होगा कि भारत की वास्तविक शक्ति इसके सैनिक धर्म के साथ संत और ऋषि भाव में है, जहाँ अध्यात्मिकता सांस्कृतिक कलेवर के साथ राष्ट्र को बलवती बनाती है।

 भारतवर्ष एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में अपने अमरता के विश्वास को विश्व के कल्याण के लिए कारक बना रहे । 

 तभी सनातन राष्ट्र विश्व गुरु के पद पर आसीन रहकर संसृति के भविष्य की दुबिधा और द्वंद्व से ग्रसित मानवता को त्राण के सूत्र दे सकेगा।

 - विश्व धरा की प्रथम स्रोतस्विनी माँ नर्मदा के दोनों स्वरुप ‘नर्मदा और रेवा’ को प्रणाम। 🙏🙏🙏🕉️ 

24/01/26

Wednesday, 21 January 2026

अभिमुक्तेश्वरानंद

अभिमुक्तेश्वरानन्द जी को जिस तरह सोशल मीडिया पर लक्ष्य किया जा रहा है, वह दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डालेगा।सनातन में सब प्रकार के लोग हैं। सनातन सब को पचा कर चलता आया है, इसलिए सनातन है।वे जो कर रहे हैं उन्हें यदि बोध होगा तो ठीक है अन्यथा वे स्वयं अपने कर्मों का फल भोगेंगे।दरअसल इसमें शंकराचार्यों को ही केवल अभिमत देना चाहिए। यह उनकी व्यवस्था है।हर बात में यदि हिन्दू स्वयं को सोशल मीडिया में सनातन का न्यायाधीश बनेगा तो वह परम्परा को क्षति पहुंचायेगा।यदि वे स्वयं के विवेक से नकारात्मक या धर्म व्यवस्था के विपरीत कार्य कर राज्य विधि व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे हैं तो सरकार या संन्यास मार्गी कार्यवाही करेंगे।यदि वे किसी विशिष्ट एजेंडे के तहत माघ मेला जैसे पर्व पर लोकेषणा प्राप्त करना चाहते हैं तो ईश्वर उन्हें रास्ता दिखायेगा।नीति -धर्म - व्यवस्था -अतिरेक आदि को ईश्वरीय व्यवस्था ही ठीक करती है। माध्यम भी वही तय करती है।अंत में यह स्मरण रखना होगा हिन्दू समाज को किसी भी तरह एक रहना होगा,चाहे वह राजनीति हो, राष्ट्र नीति हो, अध्यात्म हो या सांस्कृतिक धरोहर और विरासत हो।

Monday, 19 January 2026

लेखक,लेखन और समाज



01 जनवरी से प्रारम्भ हुआ. 19/01/2026 को ख़त्म हो रहा है.

बिन्दुवार संक्षेप

1. कार्य पूर्ण होने से पहले उसका प्रचार नहीं करना चाहिए; कर्म स्वयं अपनी वाणी होता है।
* लघुकथा विमर्श इसका प्रमाण है।

2. कर्म की शक्ति शब्दों से अधिक प्रभावशाली और परिणामकारी होती है।
* स्पष्ट है भाषण, उद्वोधन, चर्चा की तुलना में लेखन कर्म अधिक महत्वपूर्ण है। तभी तो हम आज समीक्षा कर रहे हैं।

3. साधना और सृजन में प्रसिद्धि बाधक होती है, सहायक नहीं।
* कभी कभी लेखक जब प्रसिद्ध, पुरस्कार और सम्मान की ओर दोड़ता है तो उसके उत्कृष्ट लेखन में बाधा पैदा होती है।

4. न्यूटन-हेले प्रसंग यह दिखाता है कि महान व्यक्ति 'नाम' नहीं, 'कार्य' को महत्त्व देता है।

5. न्यूटन ने ग्रंथ प्रकाशित होने की चिंता नहीं की, न ही लेखक-नाम को आवश्यक माना।

6. सच्चा साधक प्रशंसा-निन्दा से अप्रभावित रहकर अपने लक्ष्य में रत रहता है।
* समीक्षाएं और पाठक की टिप्पणियां जहां लेखक को प्रोत्साहित करती हैं, वही प्रशंसा और निंदा उसको लक्ष्य से विचलित करती हैं।

7. किसी व्यक्ति या रचना का सही मूल्यांकन उसके जीवनकाल में प्रायः संभव नहीं होता।
,* इसलिए फल की इच्छा से अनासक्त रह कर रचना कर्म करते रहना चाहिए।

8. भारतीय ऋषि-परम्परा में मौलिकता का अहं नहीं, परम्परा की निरन्तरता का भाव है।
*लेखक को मौलिकता के अहं से दूर रहना चाहिए। विचार प्रवाह के साथ लक्ष्मी की तरह साधक के पास पहुंचते रहते हैं ।
धन जैसे बांटने से बढ़ता है,चिंतन भी साझा करने से सामर्थ्य प्राप्त करता है।


9. वेद अपौरुषेय माने गए क्योंकि वे व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* साहित्यकार की यही समझ उसे समष्टि से जोड़ती है।

10. अनाम रहकर कार्य करना भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठ माना गया है।
* साहित्य एकांत साधना है। समय के साथ साधना पूर्ण होने पर वह लोक के सामने आती है।

11. वास्तविक सौंदर्य के दर्शन से पहले अपनी सीमाओं का बोध नहीं होता (नॉटरडेम का कुबड़ा प्रसंग)।
* हमारी ही रचना सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा अहंकार पालना साहित्यकार को पालना उचित नहीं है।वृहत्तर साहित्य के अध्ययन से यह भ्रम दूर होता है और लेखक का लेखन गंभीरता को प्राप्त होता है।

12. साहित्य और आलोचना आत्मबोध तथा विनम्रता उत्पन्न करने का माध्यम हैं।
* रचना कर्म अदृश्य सत्ता/नियंत्ता के निर्देश से होता है।

13. साहित्य में लेखक, समीक्षक और पाठक का त्रिकोणात्मक संबंध होता है।

14. लेखक रचना का सृजन करता है, समीक्षक उसका अर्थ खोलता है, पाठक उसे जीवन देता है।

15. बिना पाठक के रचना अपूर्ण मानी जाती है।

16. रचना की महत्ता उसके लोकमंगल, मानवीय सत्य और वैचारिक गहराई में निहित है।

17. साहित्य का उद्देश्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सार्थक संप्रेषण है।

18. सच्चा साहित्य अपने समय से संवाद ंकरता है और भविष्य को दिशा देता है।

ह्विटमैंन की पंक्तियां हैं -
बन्धु तुम पुस्तक को नहीं,
मुझे स्पर्श कर रहे हो।
तुम्हारे हाथों में पुस्तक नहीं 
मेरी काया है।
इन पृष्ठों से प्रकट होकर मैं 
तुम्हारे हृदय में समा जाउंगा।
........


Monday, 12 January 2026

प्रार्थना

            
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

शुचिता मन्त्र-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्ग तोऽपिवा । 
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तरः शुचिः ॥ 

ॐ सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्त्यादि हेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नमः ।।

ईशावास्योपनिषद

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

केनोपनिषद्
छंदोपनिषद 

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राण श्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि।
सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत् अनिराकरणमस्त्व निराकरणं मेऽस्तु । 
 तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु 
 धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 


प्रश्नोपनिषद् 
मुण्डकोपनिषद्
माण्डूक्योपनिषद् 

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । 
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम
 देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ 
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

ऐतरेयोपनिषद्

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। 
वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः ।
अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधामृत्यं वदिष्यामि।  सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु ।  अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ 
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!


तैत्तिरीयोपनिषद

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम्  ।
ॐ शान्तिः । शान्तिः शान्तिः ।

श्वेताश्वतरोपनिषद्

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
 सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। 
ॐ शान्तिः शान्तिः ॥ शान्तिः !!!


बृहदारण्यकोपनिषद् -

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। 
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः शान्ति:

...............
 हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। 
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।।15 ॥

…....….............

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मिन्समूह  तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि  योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ||16||
…........................
 वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम् ।
 ॐ क्रतो स्मर कृतः स्मर क्रतो स्मर कृतः स्मर ॥ 17॥
…....................
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । 
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥१८॥
ऐ…….....

 शिवमानसपूजा

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं 
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्। 
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा 
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥
 सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं 
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम्। 
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं 
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु।।
छत्रै चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं  निर्मलं 
वीणाभेरिमृदंङ्गकाहलकला गीतं च नित्यं तथा।
 साष्टांग प्रणति: स्तुतिर्बहुविधा होतत्समस्तं मया।।
 सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ 
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।
 पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । 
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वागिरो ।।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ 
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् । 
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व 
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥
….....................
                  अथ ध्यानम् 

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् । वामाङ्कारूढ़सीतामुखकमलमिलल्लोचनंनीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥
              …..................

ध्यानम्

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं
 चारुचन्द्रावतंसं
 रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं 
परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।
 पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं 
वसानं
 विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं 
पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥

..............
मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ॥ 
पद्मनाभं सहस्राक्षं वनमालिं हलायुधम्
गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥
विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।
दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्गं गरुडध्वजम् ॥
अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम्।।
..............
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
 शिवं केवल भासकं भासकानाम् ।
 तुरीयं तमः पारमाद्यन्तहीनं
 प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥ ७ ॥ 

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते 
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते । 
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
 नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥ ८ ॥ 

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ 
महादेव शम्भो महेशं त्रिनेत्र ।
 शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
 त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥ ९॥

शंम्भो महेशं करुणामय शूलपाणें 
गौरीपते पशुपते  पशुपाशनाशिन् । 
काशीपते करुणया जगदेतदेक -
स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ।। १० ।।

 त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे 
त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृण विश्वनाथ।
 त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥ ११॥
             .............

                बालकाण्ड

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।1।।

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्तः स्थमीश्वरम्।।2।।

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।3।।

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ।।4।।

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।5।।

यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।6।।

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-
भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7


अयोध्या काण्ड 

 यस्याड्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके 
भाले बालविद्युर्गले च गरलं यश्योरसि व्यालराट् । 
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा
 शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभिः श्रीशङ्करः पातुमाम् ॥ 

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा च मम्ले वनवासदु:खतः ।
 मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंञ्जुल मलमङ्गलप्रदा ॥

 नीलाम्बुजश्यामलकोमलांङ्गं सीतासमारोपितवामभागम् ।
 पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ॥


अरण्य काण्ड 
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं
वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।

मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं 
वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम् ॥
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं
पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् ।

राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभित
सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥ 


किष्किन्धाकाण्ड

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ 
शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ ।

 मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ
सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ।

 ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं 
चाव्ययं 
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा ।

 संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं 
धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् ।

सुंदर काण्ड
 शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
 ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । 
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १ ॥

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । 
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे 
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
 सकलगुणनिधान वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥

लंकाकांड 
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
 योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् । 
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं
 वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम् ॥ १ ॥

 शंङ्खेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं
कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम् ।
 काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं 
नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम् ॥ २ ॥

यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम् ।
 खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे ॥ ३ ॥

उत्तरकांड 
 केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं
 शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। 

पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं 
बन्धुना सेव्यमानं
नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम् ।। १ ।।

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ ।
 जानकी करसरोजलालितो चिन्तकस्य मनभृङ्गसंङ्गिनौ ॥ २ ॥

कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्। 
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम् ॥ ३ ॥

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अथ सप्तश्लोकी दुर्गा

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।
कलौ  हि कार्य सिद्धयर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ।

श्रुणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥

 ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः , अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थ सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । 
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १ ॥ 

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । 
दारिद्रधदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ २ ॥

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥३॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४॥

सर्वस्वरूपे  सर्वेशे  सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥५॥

रोगानशेषानपहंसि  तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां  विपन्नराणां
 त्वामाश्रिता  ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ ६ ॥

सर्वाबाधाप्रशमनं   त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ७ ॥

॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा ॥

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सिद्ध कुंजिका स्तोत्र -

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय 
ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।

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तत्त्व शुद्धि -
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । 
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा ॥ 
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्व तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाह।।

 भगवती का ध्यान पञ्चोपचार-

ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । 
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम् ॥ 

ध्यात्वा देवीं पञ्चपूजां कृत्वा योन्या प्रणम्य च।
 आधारं स्थाप्य मूलेन स्थापयेत्तत्र पुस्तकम् ॥

(1) शापोद्धार - करें-

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिका देव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा । 

 इक्कीस इक्कीस बार उत्कीलन हेतु जप करें-

“ ॐ श्रीं क्लीं ह्वीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।"

 (3) मृत संजीवनी विद्या का जप - पुनः मृत सञ्जीवनी विद्या का जप मूल सात-सात बार - निम्नाङ्कित मन्त्र से करें-

'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसञ्जीवन विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।”

- 4 ) सप्तशती - शाप - विमोचन मन्त्र - एक सौ आठ बार जप करने का विधान है-

'ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूँ ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।

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श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र – संस्कृत श्लोक

॥ ॐ श्री दुर्गायै नमः ॥

॥ईश्वर उवाच॥

शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने॥
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भव मोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥३॥

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥४॥

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥५॥

 अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥६॥

 अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥७॥

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥८॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥९॥

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥१०॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥१२

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥१३॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥१४॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥१५॥
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Sunday, 11 January 2026

वागर्थाविव


कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।

करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम।।

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यंपादस्पर्शं क्षमस्व मे ।


वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।

जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥


ॐ मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा उशि मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्यो रुद्र रिलीष:।।

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, प्रदक्षिणा समर्पयामि।

पुष्पाञ्जलि -

ॐ मा नस्तोके तनये मा न आयुधि मा नो गोषु मा नो अश्वेष रीरिषः । मा नो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥ 

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।

नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे।        साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः ॥  पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः    त्राहि मां पार्वतीनाथ सर्वपापहरो भव ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः, प्रार्थनापूर्वक-नमस्कारान् समर्पयामि। अनया पूजया श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवः प्रीयतां न मम। श्रीसाम्बसदाशिवार्पणमस्तु ।

......

ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते ।

 गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते ॥

तप्तकाञ्चनगौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि ।

वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये ॥

हरे कृष्णहरे कृष्णकृष्ण कृष्णहरे हरे

हरे रामहरे रामराम राम हरे हरे।

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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाम्।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥


सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।

सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ।।

............

अथ हृदयादिन्यासः

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक इति हृदयाय नम।

….......

ॐ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेन स्वयं व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्येमहाभारतम् । अद्वैतामृतवर्षिणी भगवतीमष्टादशाध्यायिनी-मम्ब त्वामनुसंदधामि भगवद्‌गीते भवद्वेषिणीम् ॥ १ ॥

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्रं

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ॥ २ ॥


प्रपन्नपारिजाताय  तोत्त्रवेत्रैकपाणये।ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः ॥ ३ ॥

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ४


 भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला। अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः ॥ ५ ॥

पाराशर्यवचः सरोजममलंगीतार्थगन्धोत्कटं

नानाख्यानककेसरंहरिकथासम्बोधनाबोधितम् । 

लोके सज्जनषट्पदैरहरहः पेपीयमानं मुदा भूयाद्भारतपङ्कजं कलिमलप्रध्वंसि नः श्रेयसे ॥ ६ ॥

मूकं करोति वाचालं पङ्गु लङ्घयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥ ७ ॥

......

अथ गीतामाहात्म्यम् 

गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतः पुमान् । विष्णोः पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जितः ॥ १ ॥

गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च। नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ॥२॥

मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्त्रानं दिने दिने । सकृद्गीताम्भसि स्त्रानं संसारमलनाशनम् ॥ ३॥

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥ ४ ॥

भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनिःसृतम्।गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥५।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥ ६॥

 एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव ।एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥ ७॥

..........

॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै-र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥

...........

श्रवणं कीर्तनं स्मरणं विष्णोः पादसेवनं ।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥(श्रीमद्भावतम १५.२३)

Saturday, 10 January 2026

श्रीनवग्रहस्तोत्रम्




जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
 तमोऽरि सर्वपापध्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १।।

दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥ २॥

 धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् । 
कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥

कुमारं प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
 सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥

देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसंनिभम् । 
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥

नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् । छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥

अर्धकायं महावीर्य चन्द्रादित्यविमर्दनम्। सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥

पलाशपुष्यसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९॥

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः । 
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥ १०॥

नरनारीनृपाणां च भवेद्दुः स्वप्ननाशनम् । 
ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥ ११॥

॥ महर्षिव्यासविरचितं नवग्रहस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

हनुमानाष्टक

॥ हनुमानाष्टक ॥

बाल समय रवि भक्ष्य लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ि दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥

अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।
हेरी थके तट सिन्धु सबै तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥

रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कहि सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥

बाण लग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सुत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दई तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥

रावन युद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥

बंधु समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाय सहाय भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥

काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होय हमारो ॥ ८ ॥

॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ॥

मंत्र

 

समानो मंत्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम्
समानं मंत्रमभिमंत्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ।।

              हमारा उद्देश्य एक ही होक्या हम सब एक मन के हो सकते हैंऐसी एकता बनाने के लिए मैं एक समान प्रार्थना करता हूँ।

समानि व आकूति: समाना हृदयानि व: ।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।।

              हमारा उद्देश्य एक हो, हमारी भावनाएँ सुसंगत हो। हमारा विचार संयोजन हो। जैसे इस विश्व के,  ब्रह्मांड के विभिन्न सिद्धांतों और  क्रियाकलापों में तारात्मयता और एकता है ॥ (ऋग्वेद 8.49.4)

              विचार करें यह प्रार्थना अपने को सीधे विश्व से जोड़ती है । यह कौन सी संस्कृति है ? वैदिक संस्कृति, सनातन संस्कृति , हिन्दू संस्कृति । जहाँ अपने लिए नहीं सम्पूर्ण जीवमात्र के लिए है प्रार्थना है ?

सर्वेषां मंगलं भूयात्, सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

(गरुण पु अ.३५/५१)

 “सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो, किसी को भी कोई दुख ना रहे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

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              यह शान्ति कैसे मिले तो हे परमपिता मुझे असत से सत की ओर ले चल, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल, मृत्यु से अमृत की ओर ले चल -

 असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय 
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।

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प्रश्न उठता है कि हमारा अतीत कैसा था तो मैथिलीशरण गुप्त जी कहते हैं -
भू -लोक का गौरव,

प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां?
फैला मनोहर गिरि हिमालय

और गंगाजल कहां,
संपूर्ण देशों से अधिक

किस देश का उत्कर्ष है,

उसका कि जो ऋषि भूमि है,

वह कौन, भारतवर्ष है?


यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है

इसके निवासी आर्य हैं

विद्या कला कौशल्य सबके

जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि

हम अधोगति में पड़े ।

पर चिह्न उनकी उच्चता के

आज भी कुछ हैं खड़े
हाँ, वृद्ध भारतवर्ष ही 

संसार का सिरमौर है, 

ऐसा पुरातन देश कोई 

विश्व में क्या और है?

 भगवान की भव-भूतियों का 

यह प्रथम भण्डार है।

 विधि ने किया नर-सृष्टि का 

पहले यहीं विस्तार है।
संसार को पहले हमीं ने 

दी ज्ञान भिक्षा दान की

आचार की विज्ञान की 

व्यापार की व्यवहार की

(मैथिली शरण गुप्त)

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पर्वत कहता शीश उठाकर , 

तुम भी ऊंचे बन जाओं ।

सागर कहता  लहराकर , 

मन में गहराई लाओ ।

पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ों , 

कितना ही हो सर पर भार।

नभ कहता है फैलो इतना , 

ढक लो तुम सारा संसार। 

 (सोहनलाल द्विवेदी)


श्री शिव कवच



ॐ सर्वाय क्षितिमूर्तये नमः। 
ॐ भवाय जलमूर्तये नमः। 
ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नमः। 
ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः।
 ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः। 
ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नमः। 
ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः।
 ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नमः।


विनियोगः
ॐ अस्य श्रीशिव-कवच-स्तोत्र-मंत्रस्य श्री ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टप् छन्दः।

श्रीसदा-शिव-रुद्रो देवता। ह्रीं शक्तिः। रं कीलकम्। श्रीं ह्री क्लीं बीजम्।

 श्रीसदा-शिव-प्रीत्यर्थे शिव-कवच-स्तोत्र-पाठे विनियोगः।
 
ऋष्यादि-न्यासः
श्री ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टप् छन्दभ्यो नमः मुखे । श्रीसदा-शिव-रुद्रो देवतायै नमः हृदि । ह्रीं शक्तये नमः नाभौ । रं कीलकाय नमः पादयो । श्रीं ह्री क्लीं बीजाय नमः गुह्ये । 

श्रीसदा-शिव-प्रीत्यर्थे शिव कवच-स्तोत्र-पाठे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे

कर-न्यासः –
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ ह्लां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ नं रिं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जनीभ्यां नमः ।

 ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ मं रुं अनादि-शक्‍ति-धाम्ने अघोरात्मने मध्यामाभ्यां नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ शिं रैं स्वतंत्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने अनामिकाभ्यां नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो जातात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।

अङ्ग-न्यासः -
ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ ह्लां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने हृदयाय नमः । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ नं रिं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने शिरसे स्वाहा । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ मं रुं अनादि-शक्‍ति-धाम्ने अघोरात्मने शिखायै वषट् । 

 ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ शिं रैं स्वतंत्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने कवचाय हुं ।  

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो जातात्मने नेत्र-त्रयाय वौषट् । 

ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट् ।  

              ॥ अथ ध्यानम् ॥

वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं काल कण्ठमरिन्दमम् ।
 सहस्र-करमत्युग्रं वंदे शंभुमुमा-पतिम् ॥ 
               ।। मूल-पाठ ।।  

मां पातु देवोऽखिल-देवतात्मा, 
संसार-कूपे पतितं गंभीरे । 
तन्नाम-दिव्यं वर-मंत्र-मूलं, 
धुनोतु मे सर्वमघं ह्रदिस्थम् ॥ १ ॥

 सर्वत्र मां रक्षतु विश्‍व-मूर्ति
र्ज्योतिर्मयानन्द-घनश्‍चिदात्मा । 
अणोरणीयानुरु-शक्‍तिरेकः, 
स ईश्‍वरः पातु भयादशेषात् ॥ २ ॥

यो भू-स्वरूपेण बिभात विश्‍वं, 
पायात् स भूमेर्गिरिशोऽष्ट-मूर्तिः ।
 योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति, 
सञ्जीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥ ३ ॥

कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा, 
सर्वाणि यो नृत्यति भूरि-लीलः ।
 स काल-रुद्रोऽवतु मां दवाग्नेर्वात्यादि-भीतेरखिलाच्च तापात् ॥ ४ ॥

 प्रदीप्त-विद्युत् कनकावभासो, 
विद्या-वराभीति-कुठार-पाणिः । चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः, 
प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम् ॥ ५ ॥

कुठार-खेटांकुश-पाश-शूल-कपाल-ढक्काक्ष-गुणान् दधानः ।
 चतुर्मुखो नील-रुचिस्त्रिनेत्रः, 
पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥ ६ ॥

कुन्देन्दु-शङ्ख-स्फटिकावभासो, 
वेदाक्ष-माला वरदाभयांङ्कः । 
त्र्यक्षश्‍चतुर्वक्त्र उरु-प्रभावः, सद्योऽधिजातोऽवस्तु मां प्रतीच्याम् ॥ ७ ॥

वराक्ष-माला-भय-टङ्क-हस्तः, 
सरोज-किञ्जल्क-समान-वर्णः । 
त्रिलोचनश्‍चारु-चतुर्मुखो मां, 
पायादुदीच्या दिशि वाम-देवः ॥ ८ ॥

वेदाभ्येष्टांकुश-पाश-टङ्क-कपाल-ढक्काक्षक-शूल-पाणिः । 
सित-द्युतिः पञ्चमुखोऽवताम् 
मामीशान-ऊर्ध्वं परम-प्रकाशः ॥ ९ ॥

मूर्धानमव्यान् मम चंद्र-मौलिर्भालं ममाव्यादथ भाल-नेत्रः ।
 नेत्रे ममाव्याद् भग-नेत्र-हारी, 
नासां सदा रक्षतु विश्‍व-नाथः ॥ १० ॥

पायाच्छ्रुती मे श्रुति-गीत-कीर्तिः, कपोलमव्यात् सततं कपाली ।
 वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो, 
जिह्वां सदा रक्षतु वेद-जिह्वः ॥ ११ ॥ 

कण्ठं गिरीशोऽवतु नील-कण्ठः, 
पाणि-द्वयं पातु पिनाक-पाणिः । 
दोर्मूलमव्यान्मम धर्म-बाहुर्वक्ष-
स्थलं दक्ष-मखान्तकोऽव्यात् ॥ १२ ॥

ममोदरं पातु गिरीन्द्र-धन्वा, 
मध्यं ममाव्यान्मदनान्त-कारी ।
 हेरम्ब-तातो मम पातु नाभिं, 
पायात् कटिं धूर्जटिरीश्‍वरो मे ॥ १३ ॥

ऊरु-द्वयं पातु कुबेर-मित्रो,
 जानु-द्वयं मे जगदीश्‍वरोऽव्यात् । 
जङ्घा-युगं पुङ्गव-केतुरव्यात्, 
पादौ ममाव्यात् सुर-वन्द्य-पादः ॥ १४ ॥

महेश्‍वरः पातु दिनादि-यामे,
 मां मध्य-यामेऽवतु वाम-देवः । 
त्र्यम्बकः पातु तृतीय-यामे,
 वृष-ध्वजः पातु दिनांत्य-यामे ॥ १५ ॥

पायान्निशादौ शशि-शेखरो मां,
 गङ्गा-धरो रक्षतु मां निशीथे । 
गौरी-पतिः पातु निशावसाने, 
मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्व-कालम् ॥ १६ ॥

अन्तःस्थितं रक्षतु शङ्करो मां,
 स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थित माम् ।
 तदन्तरे पातु पतिः पशूनां,
 सदा-शिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥ १७ ॥

तिष्ठन्तमव्याद् ‍भुवनैकनाथः, 
पायाद्‍ व्रजन्तं प्रथमाधि-नाथः । 
वेदान्त-वेद्योऽवतु मां निषण्णं,
 मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥ १८ ॥

 मार्गेषु मां रक्षतु नील-कंठः, 
शैलादि-दुर्गेषु पुर-त्रयारिः । 
अरण्य-वासादि-महा-प्रवासे, 
पायान्मृग-व्याध उदार-शक्तिः ॥ १९ ॥

 कल्पान्तकाटोप-पटु-प्रकोप-
स्फुटाट्ट-हासोच्चलिताण्ड-कोशः ।
 घोरारि-सेनार्णव-दुर्निवार-
महा-भयाद् रक्षतु वीर-भद्रः ॥ २० ॥

 पत्त्यश्‍व-मातङ्ग-रथावरूथ-
सहस्र-लक्षायुत-कोटि-भीषणम् । 
अक्षौहिणीनां शतमाततायिनाश्छिन्द्यान्मृडो घोर-कुठार-धारया ॥ २१ ॥

निहन्तु दस्यून् प्रलयानिलार्च्चिर्ज्ज्वलन् त्रिशूलं त्रिपुरांतकस्य ।
 शार्दूल-सिंहर्क्ष-वृकादि-हिंस्रान् सन्त्रासयत्वीश-धनुः पिनाकः ॥ २२ ॥

दुःस्वप्न-दुःशकुन-दुर्गति-दौर्मनस्य-
दुर्भिक्ष-दुर्व्यसन-दुःसह-दुर्यशांसि ।
 उत्पात-ताप-विष-भीतिमसद्‍-गुहार्ति-व्याधींश्‍च नाशयतु मे जगतामधीशः ॥ २३ ॥

        अमोघ शिव कवच 
             (संस्कृत में)

ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय ,सकल-तत्त्वात्मकायसर्व-मन्त्र-स्वरूपाय ,सर्व-यंत्राधिष्ठितायसर्व-तंत्र-स्वरूपाय,
 सर्व-तत्त्व-विदूराय ।

ब्रह्म-रुद्रावतारिणे , नील-कण्ठायपार्वती-मनोहर-प्रियायसोम-सूर्याग्नि-लोचनाय भस्मोद्‍-धूलित-विग्रहाय ।

महा-मणि-मुकुट-धारणाय, माणिक्य-भूषणाय ,सृष्टि-स्थिति-प्रलय-काल
-रौद्रावताराय , दक्षाध्वर-ध्वंसकाय ।

महा-काल-भेदनायमूलाधारैक-निलयाय , तत्त्वातीताय, गंगा-धराय ,सर्व-देवाधि-देवायषडाश्रयाय, वेदान्त-साराय ।

त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-
कोटि- ब्रह्माण्ड- नायकायानन्त-
वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्‍ख-
कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-
महा-नाग-कुल-भूषणाय।

 प्रणव-स्वरूपाय, चिदाकाशाय ,
आकाश-दिक्स्वरूपाय,
 ग्रह-नक्षत्र-मालिने सकलाय ।

कलङ्क-रहितायसकल-लोकैक कर्त्रे ,
सकल-लोकैक-भर्त्रे सकल-लोकैक-संहर्त्रे 

सकल-लोकैक-गुरवे ,सकल-लोकैक-साक्षिणे ,सकल-लोकैक-वर-प्रदाय,
 सकल-लोकैक-शङ्कराय।

 शशाङ्क-शेखराय ,शाश्‍वत-निजावासाय ,
निराभासाय ,निरामयाय ,निर्मलाय, निर्लोभाय।

 निर्मदाय, निश्‍चिन्ताय,निरहङ्काराय निरंकुशाय निष्कलंकाय, निर्गुणाय ,
निष्कामाय, निरुपप्लवाय ।

निरवद्याय ,निरन्तराय निष्कारणाय, निरातङ्काय , निष्प्रपंचाय, निःसङ्गायनिर्द्वन्द्वाय , निराधाराय ।

निरोगाय, निष्क्रोधाय निर्मलाय, निष्पापाय ,
निर्भयाय, निर्विकल्पाय ,निर्भेदाय, निष्क्रियाय ।

निस्तुलाय, निःसंशाय ,
निरञ्जनाय , निरुपम-विभवाय,
 नित्य-शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय, परम-शान्त-स्वरूपाय ,
तेजोरूपाय, तेजोमयाय ।

जय जय रुद्र महा-रौद्र ,महावतार महा-भैरव काल-भैरव ,कपाल-माला-धर, खट्वाङ्ग-खङ्ग-चर्म- पाशाङ्कुश-डमरु-शूल- चाप-बाण-गदा-शक्ति- भिन्दिपाल-तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ- भुशुण्डी-शतघ्नी-चक्राद्यायुध ।

भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-
कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-
विस्फारित, ब्रह्माण्ड-मंडल ,नागेन्द्र-
कुण्डल, नागेन्द्र-वलय ,नागेन्द्र-चर्म-धर, मृत्युञ्जय, त्र्यम्बक, त्रिपुरान्तक, विश्‍व-रूप, विरूपाक्ष ,विश्‍वेश्वर ,वृषभ-वाहन, विश्वतोमुख !

सर्वतो रक्ष, रक्ष । मा ज्वल ज्वल । महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय- ! 
चोर-भय-मुत्सादयोत्सादय । 
विष-सर्प-भयं शमय शमय । 

चोरान् मारय मारय । 
मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय । 
त्रिशूलेन विदारय विदारय ।
 कुठारेण भिन्धि भिन्धि । 
खड्‌गेन छिन्धि छिन्धि । 

खट्‍वांगेन विपोथय विपोथय । 
मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय । 
वाणैः सन्ताडय सन्ताडय । 
रक्षांसि भीषय भीषय । 

अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय । कूष्माण्ड-वेताल-मारीच-गण-ब्रह्म-
राक्षस-गणान्‌ संत्रासय संत्रासय । 
ममाभयं कुरु कुरु वित्रस्तं मामाश्‍वासयाश्‍वासय । 

नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर 
सञ्जीवय सञ्जीवय क्षुत्तृड्‌भ्यां मामाप्याययाप्याय दुःखातुरं मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय मृत्युञ्जय 
त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते नमस्ते ।

  ।। इति श्रीस्कंदपुराणे एकाशीतिसाहस्रयां तृतीये ब्रह्मोत्तरकखण्डे अमोघ-शिव-कवचं समाप्तम् ।।   

Monday, 5 January 2026

सुनो यजमानों

बात निकली है तो महाजनों की बात यजमानों तक -

भाई .......जी !आपकी चिंता जायज है।

 महाभारत का प्रसंग है -
तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नाःनैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥

तात्पर्य , तर्क स्थिर नहीं; श्रुतियाँ भी भिन्न- भिन्न कहती हैं; एक भी ऐसा ऋषि नहीं जिनका मत प्रमाण के तौर पर लिया जा सके; उसपर धर्म का तत्त्व भी गूढ है ।

 इसलिए महापुरुष जिस मार्ग पर चले, उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिये।
युगानुकुल महापुरुषों को समझें -

* संविधान सभा के सदस्यों में राजभाषा को लेकर एक मत नहीं।

* राष्ट्र भाषा का जिक्र नहीं।

* मातृभाषा के आधार पर प्रदेश और बांग्लादेश बना।

* 75 वर्षों बाद भी राजभाषा का भविष्य जाति/प्रांत आधारित राजनीति करने वाले नेताओं पर निर्भर है।

* प्रशासन का अंग्रेजी मोह भंग नहीं हो रहा।

*समाचार पत्रों, पत्रिकाओं को भाषा आधारित समाचार छापने की चिंता नहीं।

 * सम्पादक और वरिष्ठ संवाददाताओं को राजभाषा से दूरी बनायें रखने में कोई हिचकिचाहट नहीं।

* हिन्दी के उपन्यासों में अंग्रेजी का तड़का नहीं लगा तो जैसे पाठक को स्वाद नहीं देगा और लेखक को संतुष्टि नहीं मिलेगी।

* दरअसल ढाबा चलाने के लिए तड़का की जगह साधारण दाल भी खिलाई जा सकती है, कोई महाजन बताने बाला नहीं।

 *कहते हैं लिखा वही जाता है जो पाठक पसंद करता है। और पसंद तय करता है- पुरस्कार , सम्मान पत्र, बिक्री का विज्ञापन।इनके विज्ञापन की लकीरें खींचते हैं, महाजन!

* पीएम राइज स्कूल, सीएम राइज स्कूल?पीएम राइज कालेज!!एन ई पी? 

* दुकान का, मकान का,रहवासी समितियों का नाम -एवन्यू, विला, एन्क्लेव आदि आदि?

* पीपुल्स विश्वविद्यालय, सेम विश्वविद्यालय,सेज विश्वविद्यालय ?

* सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं, योजनाओं के नाम नाम के पीछे के दर्शन को कम विज्ञापन को ज्यादा प्रदर्शित करते हैं।.......विचार कौन करेगा? 

अब गुड़ में मक्खी नहीं बैठती जहां लालच दिखता हो, प्राण संकट में हों।अब चासनी बह रही है, जिसमें इच्छा अनुसार तैरिये, हर घाट पर लक्ष्मी पति बनाने के सूत्र रूप में जलेबी परोसी जा रही है, जिसके छोर को पकड़ना किसी भी एजेंसी के बस का नहीं। क्योंकि प्रत्येक एजेंसी का सूत्रधार और निर्देशक 'स्ववित्तीय' स्वेच्छाचारी और निरंकुश चासनी में जलेबी खा रहा है।
5/1/26भोपाल

मैं कौन हूं

छिति जल पावक गगन समीरा।
पंच रचित अति अधम सरीरा।।(४/११/-४)

बड़े भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा।।(७/४३-७)

कबहुंक करि करुना नर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही।।(७/४४-६)


ईस्वर अंस जीव अविनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।(७/११७-२)

ममैवाशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन: षष्ठानीनिन्द्रयाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।(गीत १५/७)

ईश्वर: सर्वभूतानां ह्रृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।(गीता१८/६१)

Sunday, 4 January 2026

लेखन लेखक एवं प्रकाशक


अप्रैल 1946 में दीनदयाल उपाध्याय उत्तर प्रदेश के सह प्रांत प्रचारक थे और प्रांत प्रचारक थे भाऊराव देवरस। 

लखनऊ में संघ की बैठक हो रही थी, भाऊराव देवरस विषय के इतर उस चिंता के बारे में बात करने लगे, जो उन्हें पिछले दिनों संघ की शाखाओं में बाल स्वयंसेवकों को देख-देख कर हो रही थी, “बच्चों का संघ के प्रति आकर्षित होना सुखद अहसास है, बाल मन चंचल और निष्कपट होता है। ऐसे में वही वक्त होता है, जब बच्चों के कोमल मन में सदविचारों को अंकित किया जा सकता है।

 बच्चों को बाल साहित्य बहुत पसंद होता है, पर चिंता की बात है कि हमारे पास बाल साहित्य नहीं है। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि कुछ ही समय में बच्चों से सम्बंधित थोड़ा साहित्य यहां उपलब्ध हो सके? ताकि बच्चे उस साहित्य का लाभ उठा सकें।”
 उनका ये कहना था कि स्वयंसेवक आपस में ही बात करना शुरू हो गए कि बाल साहित्य लिखना बहुत कठिन काम है? ये इतनी जल्दी नहीं लिखा जा सकता है, इस कार्य को करने के लिए तो कुशल लेखक की आवश्यकता होगी।

इस पर भाऊराव बोले, ‘’कुशल लेखक की तलाश में तो काफी समय बीत जाएगा’’। तब बाबा आप्टे ने रास्ता दिखाया और दीनदयाल उपाध्याय की तरफ देखते हुए बोले कि “पंडितजी इस काम को अच्छी तरह से कर सकते हैं, उनमें लेखन की प्रतिभा है”।
 फिर तो बाकी स्वयंसेवक भी कहने लगे कि हां, केवल दीनदयाल जी ही ये कर सकते हैं। भाऊराव ने भी कह ही दिया कि, “हां पंडितजी, आप तो बहुत गुणवान, कुशल और योग्य हैं।आपके लिए मैं क्या कहूं? पर मुझे भी विश्वास है कि आप इस कार्य को भी सहजता से कर सकते हें।” अब चूंकि भाऊराव का आग्रह था तो दीनदयाल मना कर ही नहीं सकते थे और ठीक 24 घंटे बाद अपनी पांडुलिपि लेकर दीनदयाल जी भाऊराव के सामने उपस्थित थे।
 दीनदयाल जी बोले “यह देखिए, बच्चों के लिए यह पुस्तक कैसी रहेगी? भाऊराव ने उसे पढ़ा और बोले, अरे वाह, ये कब लिख डाली? भाऊराव उनकी प्रतिभा देखकर हैरान थे, बोले- आपकी प्रतिभा अनमोल है, इसको सहेज कर रखना हमारी जिम्मेदारी है।


एक युवा पं दीनदयाल उपाध्याय के संघ में आने के कुछ समय बाद उनके मन में उठते प्रश्न ।

क्या संघ कट्टरवाद का समर्थक है?
क्या अन्य धर्मो के प्रति उसका व्यवहार पक्षपातपूर्ण है?
ऐसा नहीं है तो फिर संघ अन्य धर्मों के प्रति उदासीन क्यों है?

उनके संघ के साथी इसका जबाब देकर पंडित जी को संतुष्ट नहीं कर सके। तब भेंट होती है, मा. भाऊराव देवरस से ।

 भेंट के दौरान दीनदयालजी ने अपने मन के प्रश्नों को उनके समक्ष रखते हुए उनसे भी वही सवाल पूछे।

 शांतिपूर्वक सारी बातें सुनने के बाद भाऊराव देवरस उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए बोले- 
(१) “हिंदू धर्म भारतवर्ष का सबसे प्राचीन धर्म है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रादुर्भाव हिंदू धर्म से ही हुआ है।
(२)  यह सही है कि संघ हिंदू धर्म की स्थापना और रक्षा की बात करता है, लेकिन इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि वह कट्टरता का समर्थक है।
  पर्वत से निकलने वाली गंगा की धारा विभिन्न स्थानों पर अलग- अलग नामों से पुकारी जाती है, लेकिन उसका स्वरूप और कार्य एक ही है। 

(३) उसी प्रकार भारतवर्ष के सभी धर्म हिंदुत्व रूपी गंगा की ही अलग-अलग धाराएँ हैं। जब हिंदुत्व की बात की जाती है तो इसमें वे सभी धर्म सहज ही सम्मिलित हो जाते हैं। हिंदू धर्म की स्थापना वास्तव में उन धर्मों की स्थापना भी है, जो किसी ना किसी रूप में उससे जुड़े हुए हैं।
   ये ठीक वैसा ही है जैसे किसी वृक्ष की ज़ड़ों की देखरेख करने से उसकी टहनियां भी हरी भरी हो जाती हैं”।

यह जिज्ञासु युवा के लिए समाधान की वह ख़ुराक़ थी जिसने देश को पं दीनदयाल उपाध्याय दिया।

युगवार्ता पत्रिका ने संघ के 100 साल पर ‘संघ की नींव के पत्थर’ नाम से एक विशेषांक छापा है, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय अपने लेख में लिखते हैं कि, “भाऊराव देवरस चलते फिरते विश्वविद्यालय थे, वे आचार्य भी थे और संस्थान भी।

अपने व्यवहार से कार्यकर्ता गढ़ते थे, उसे अपना संरक्षण देते थे और जब तक वो पौधे की अवस्था में होता था, तब तक उसकी देखरेख वे स्वयं करते थे,”